चुनाव संपन्न: अब चार तक, काटे नहीं कटते दिन और रात
बदलाव की आहट ने बढ़ाई सियासी हलचल
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बृज खंडेलवाल __________
चार मई को तय हो जाएगा ; दीदी लौटेंगी या दादा के हाथ आएगी पश्चिम बंगाल की कमान। लेकिन तब तक बड़े-बड़े नेताओं के दिलों की धड़कनें बगावत पर उतारू हैं, और दिल्ली से कोलकाता तक सियासी गलियारों में बेचैनी का आलम है।
चुनाव तो कई प्रांतों में हुए हैं ; पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु और पुदुचेरी , लेकिन सबकी निगाहें बंगाल पर टिकी हैं। 294 सीटों वाली इस विधानसभा में बहुमत का जादुई आंकड़ा 148 है, और इस बार की लड़ाई इसी आंकड़े के इर्द-गिर्द घूम रही है।
इस बार पश्चिम बंगाल में कुल 68,251,008 पंजीकृत मतदाताओं में से दोनों चरणों में औसत मतदान लगभग 91.57 प्रतिशत रहा। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: “इतनी बड़ी भागीदारी यह इशारा करती है कि जनता इस बार कुछ नया सोचकर आई है , शायद बदलाव की ओर।”
राज्य की राजनीति में इस बार सीधा मुकाबला सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच रहा। टीएमसी ने अपनी सामाजिक योजनाओं, महिला मतदाताओं, अल्पसंख्यक समर्थन और ‘बंगाली अस्मिता’ को ढाल बनाया। भाजपा ने भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और 15 साल की सत्ता के विरुद्ध उठी थकान को अपना हथियार बनाया। वामपंथी दल और कांग्रेस इस बार हाशिये पर नज़र आए । 2021 में इनके संयुक्त मोर्चे को महज़ एक सीट मिली थी, हालाँकि उनका वोट-शेयर 117 सीटों पर जीत के अंतर से अधिक रहा था।
चुनाव प्रचार के दौरान एक बड़ा विवाद मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर उठा, जिसमें अक्टूबर 2025 के बाद से लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए — यानी कुल मतदाताओं का करीब 12 प्रतिशत। टीएमसी ने इसे राजनीतिक षड्यंत्र बताया, जबकि भाजपा ने इसे अवैध घुसपैठियों की सफाई करार दिया。
मतदान के बाद जारी एग्जिट पोल्स ने तस्वीर को और रोमांचक बना दिया है। रिपब्लिक टीवी के ‘पोल ऑफ पोल्स’ में भाजपा को 155 से 158 सीटें मिलती दिख रही हैं , बहुमत के आंकड़े से साफ ऊपर। अधिकांश एजेंसियाँ भाजपा को 146 से 175 सीटों के बीच रख रही हैं, जबकि टीएमसी 120 से 140 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है। कुछ सर्वे टीएमसी को 177 से 195 सीटें भी देते हैं, जिससे साफ है कि सर्वे एकमत नहीं हैं。
उल्लेखनीय यह भी है कि एक्सिस माई इंडिया जैसी बड़ी एजेंसी ने इस बार बंगाल का एग्जिट पोल जारी नहीं किया, जिससे अटकलों का बाजार और गर्म है。
ममता बनर्जी ने सभी सर्वे खारिज करते हुए कहा कि उनकी पार्टी 226 से ज्यादा सीटें जीतेगी। दूसरी ओर भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी 180 से अधिक सीटों का दावा कर रहे हैं。
हालाँकि एग्जिट पोल्स हमेशा सही नहीं होते। 2021 में कई सर्वे गलत साबित हुए थे, जब भाजपा को बड़ी बढ़त दिखाने के बावजूद टीएमसी ने 215 सीटें जीती थीं। इस बार त्रिशंकु विधानसभा की संभावना पूरी तरह नकारी नहीं जा सकती。
उधर, असम में सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन के पक्ष में रुझान हैं। ज्यादातर सर्वे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की सरकार की वापसी के संकेत दे रहे हैं。
केरल में इस बार पारंपरिक ढर्रा टूटता दिख रहा है। मनोरमा न्यूज़-सीवोटर सर्वे में यूडीएफ को 82 से 94 सीटें और एलडीएफ को 44 से 56 सीटें मिलती दिख रही हैं। टुडेज़ चाणक्य का अनुमान है कि यूडीएफ 69, एलडीएफ 64 और भाजपा 7 सीटों के आसपास रहेगी। अगर ये रुझान सही निकले तो पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा लगातार दूसरी बार सत्ता में आने का रिकॉर्ड नहीं बना पाएगा。
तमिलनाडु में लोकल एक्टिविस्ट गोपाल कृष्णन के मुताबिक अधिकांश सर्वे डीएमके गठबंधन को बढ़त दे रहे हैं और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की वापसी की संभावना मजबूत दिखाई दे रही है। पुदुचेरी में एनडीए के पक्ष में संकेत हैं。
4 मई का इंतज़ार
4 मई की सुबह 8 बजे से मतगणना शुरू होगी। अगर बंगाल में भाजपा सत्ता में आई, तो यह 2011 के बाद पहली बार होगा जब ममता बनर्जी की पार्टी सत्ता से बाहर जाएगी। और अगर टीएमसी वापसी करती है, तो यह उन तमाम सर्वेक्षणों के मुँह पर एक और तमाचा होगा जो बंगाल की जनता को समझने का दावा करते हैं。
सस्पेंस अपने चरम पर है। चार मई का इंतज़ार है。
ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐसा अध्याय बन चुका है, जिसके परिणाम केवल एक राज्य की सत्ता तक सीमित नहीं रहेंगे। 91.57 प्रतिशत का अभूतपूर्व मतदान इस बात का जीवंत प्रमाण है कि बंगाल का मतदाता राजनीतिक रूप से कितना जागरूक और मुखर हो चुका है। आमतौर पर 90 प्रतिशत से ऊपर के मतदान को राजनीतिक पंडितों द्वारा सत्ता-विरोधी लहर (Anti-incumbency) का स्पष्ट संकेत माना जाता है, जहाँ मतदाता बदलाव के लिए घरों से बाहर निकलता है। लेकिन बंगाल के संदर्भ में, यह ध्रुवीकरण का भी परिचायक हो सकता है, जहाँ टीएमसी और भाजपा दोनों के कैडर और समर्थक अपने-अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए पूरी ताकत से मतदान केंद्रों पर उमड़ पड़े हों।
इस चुनाव का सबसे विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दा ‘मतदाता सूची का विशेष गहन संशोधन’ (Special Intensive Revision – SIR) रहा है। चुनाव से ठीक पहले लगभग 91 लाख मतदाताओं (कुल 12% वोटर बेस) के नाम काटे जाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गहरे सवाल खड़े करता है। तृणमूल कांग्रेस का यह आरोप कि इसमें अल्पसंख्यकों और टीएमसी समर्थकों को जानबूझकर निशाना बनाया गया है, राज्य में एक भारी असंतोष पैदा कर चुका है। वहीं, भाजपा इसे ‘स्वच्छ चुनाव’ और ‘घुसपैठियों की सफाई’ बताकर अपनी राजनीतिक ज़मीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। जिन 117 सीटों पर जीत का अंतर पिछली बार बेहद कम था, वहां ये 12% कटे हुए वोट नतीजे पलटने का सबसे बड़ा कारण बन सकते हैं। चुनाव आयोग की भूमिका और SIR की टाइमिंग आने वाले समय में अदालती और राजनीतिक बहसों का केंद्र बिंदु बनी रहेगी।
एग्जिट पोल्स की बात करें तो बंगाल के मतदाता अक्सर सर्वे एजेंसियों के गणित को उलझाने के लिए जाने जाते हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जब तमाम राष्ट्रीय मीडिया घरानों और ‘पोल ऑफ पोल्स’ ने भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने की भविष्यवाणी की थी, लेकिन परिणाम आने पर ममता बनर्जी की टीएमसी ने 215 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ वापसी की थी। बंगाल में एक ‘साइलेंट वोटर’ (Silent Voter) वर्ग है, विशेषकर महिला मतदाता, जो ‘लक्ष्मीर भंडार’ जैसी सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ उठाती हैं और अक्सर सर्वेक्षकों के सामने अपनी असली पसंद ज़ाहिर नहीं करतीं। इसके अलावा, राज्य में राजनीतिक हिंसा का इतिहास भी मतदाताओं को अपनी राय सार्वजनिक करने से रोकता है। इसलिए, यदि एग्जिट पोल्स के विपरीत टीएमसी 226 सीटों का अपना दावा सच कर दिखाती है, तो यह सर्वेक्षण एजेंसियों की विश्वसनीयता पर एक बार फिर गंभीर सवालिया निशान लगा देगा।
बंगाल के इतर, अन्य राज्यों के चुनावी रुझान भी राष्ट्रीय राजनीति के लिए गहरे संदेश छिपाए हुए हैं। केरल में यदि एग्जिट पोल्स सच साबित होते हैं और पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) को सत्ता से बाहर होना पड़ता है, तो यह राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथ के लिए एक बहुत बड़ा झटका होगा। केरल भारत में वामपंथ का अंतिम मजबूत गढ़ है, और वहां यूडीएफ (कांग्रेस गठबंधन) की वापसी वाम दलों को राष्ट्रीय राजनीति के हाशिये पर धकेल सकती है। वहीं, असम में हिमंत बिस्व सरमा की संभावित वापसी भाजपा की पूर्वोत्तर में अजेय पकड़ को दर्शाती है, और तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन के डीएमके गठबंधन की मजबूत स्थिति दक्षिण भारत में क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति के दबदबे को प्रमाणित करती है। कुल मिलाकर, 4 मई के परिणाम 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले देश के राजनीतिक विमर्श की नई पटकथा लिखेंगे। अगर बंगाल में भाजपा कमल खिलाती है, तो यह ‘लुक ईस्ट’ नीति की उसकी सबसे बड़ी जीत होगी; और अगर ममता किला बचा लेती हैं, तो वह राष्ट्रीय विपक्ष का सबसे मजबूत और निर्विवाद चेहरा बनकर उभरेंगी।