लाख टके का सवाल: एसआईआर (SIR) या आईएसआर (ISR)? पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का विश्लेषण

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Article Desk, tajnews.in | Friday, May 15, 2026, 11:20:15 AM IST

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Nilotpal Basu Writer
नीलोत्पल बसु
पूर्व सांसद एवं पोलिट ब्यूरो सदस्य, माकपा
(अनुवाद: संजय पराते)
माकपा के पोलिट ब्यूरो सदस्य और ‘पीपुल्स डेमोक्रेसी’ के संपादक नीलोत्पल बसु ने पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा चलाई गई ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (SIR) प्रक्रिया पर एक बेहद प्रखर और विश्लेषणात्मक आलेख लिखा है। संजय पराते द्वारा अनुदित इस आलेख में बताया गया है कि कैसे इस प्रक्रिया के नाम पर लाखों मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित करने की गहरी साज़िश रची गई है।
HIGHLIGHTS
  1. एसआईआर (SIR) के नाम पर चुनाव आयोग की नई कार्यप्रणाली: बिना दस्तावेज़ वाले नागरिकों को गैर-नागरिक मानकर उनके नाम हटाने की साज़िश।
  2. पश्चिम बंगाल में 6 अप्रैल तक लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए, जिनमें से 27 लाख लोगों को ‘अंडर एडजुडिकेशन’ (UA) श्रेणी में डाल दिया गया।
  3. लेखक का आरोप: नाम हटाने का यह पैटर्न जानबूझकर उन इलाकों में लागू किया गया, जहाँ मुस्लिम, अनुसूचित जाति और जनजाति की आबादी अधिक है।
  4. ताज न्यूज़ का संपादकीय विश्लेषण: मताधिकार (Voting Right) कोई रियायत नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है; इसे ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह खत्म नहीं किया जा सकता।

लाख टके का सवाल : एसआईआर या आईएसआर?

(आलेख : नीलोत्पल बसु, अनुवाद : संजय पराते)

बस यही बात है। स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (एसआईआर) या इंटेंसिव सबवर्ज़न ऑफ़ रोल्स (आईएसआर) — इस चुनावी मौसम में यह सबसे ज़्यादा गरमागरम बहस का विषय है ; न सिर्फ़ चुनाव से पहले की गहमागहमी के दौरान, बल्कि शायद उससे भी कहीं ज़्यादा चुनाव के बाद के माहौल में।

अभूतपूर्व एसआईआर : यह संशोधन नहीं, बल्कि व्यवस्था को पलटना है
शुरू से ही, बिहार में ही, एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) विवादों में घिर गया, क्योंकि 24 जून, 2025 को की गई घोषणा से पहले राजनीतिक दलों के साथ कोई परामर्श नहीं किया गया था — जैसा कि अब तक स्थापित परंपरा रही है। गहन पुनरीक्षण का काम हमेशा एक लंबी अवधि तक चलता रहा है। प्रथम चुनाव आयोग के समय से ही सामान्य सिद्धांत स्थापित था — प्रत्येक नागरिक के लिए मतदान के अधिकार की सार्वभौमिकता ; और मतदाता सूची तैयार करने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह और विशेष रूप से चुनाव आयोग की थी, ताकि अनुच्छेद 326 का अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके। मसौदा सूची (ड्राफ़्ट रोल) से नाम हटाने की निर्धारित प्रक्रिया आपत्तियों के आधार पर पूरी की जानी थी, जिनकी पुष्टि गृह मंत्रालय के परामर्श से की जानी अनिवार्य थी।

वर्तमान एसआईआर ने घर-घर जाकर गिनती करने की एक प्रक्रिया निर्धारित की थी, जिसके साथ ही एक लिखित आवेदन और 11 दस्तावेज़ों में से कोई एक दस्तावेज़ जमा करना ज़रूरी था। बहुत कम लोगों के पास ये दस्तावेज़ उपलब्ध है। ये दस्तावेज़ न दे पाने का मतलब था वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाना। असल में, इसका मतलब था कि मतदाता सूची में नाम शामिल नहीं होगा, क्योंकि यह एक बिल्कुल नई प्रक्रिया थी, जिसमें बिना दस्तावेज़ वाले नागरिक को गैर-नागरिक मान लिया जाता है और उसका नाम अपने-आप हटा दिया जाता है। यह अनुच्छेद 326 और वोट देने के सार्वभौमिक अधिकार का पूरी तरह से उल्लंघन था। गैर-नागरिकों की पहचान करने की ज़िम्मेदारी गृह मंत्रालय को सौंपी गई थी। लेकिन, सीएए और एनआरसी की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में नाकाम रहने के बाद, बड़बोले गृह मंत्री ने एक खतरनाक चाल चली। उसने एक तरीका सुझाया : पता लगाओ, नाम हटाओ और देश से निकालो — जिसके लिए एसआईआर की प्रक्रिया का इस्तेमाल किया गया, ताकि बिना दस्तावेज़ वाले नागरिकों को अपराधी ठहराया जाए और उन्हें देश से बाहर निकाल दिया जाए।

विपक्षी दलों ने मिलकर मुख्य चुनाव आयुक्त से मुलाक़ात की, लेकिन उन्हें उस हालत को, जो बड़े पैमाने पर लोगों के मताधिकार से वंचित होने का खतरा पैदा कर रही थी, को सुधारने का आश्वासन दिए बिना ही उनकी बातों को खारिज कर दिया गया। बहरहाल, जहाँ बिहार में हुई एसआईआर की प्रक्रिया ने कई सवाल खड़े किए थे, वहीं बाकी 12 राज्यों में बाद में हुई एसआईआर की प्रक्रिया में मैपिंग का काम बिहार जितना सख़्त नहीं हो पाया। ऐसा इस तथ्य के बावजूद हुआ कि चुनाव आयोग ने पारदर्शिता नहीं बरती और एसआईआर की प्रक्रिया शुरू करने को सही ठहराने के लिए 2002-03 के मूल आदेश को भी उजागर नहीं किया।

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पश्चिम बंगाल में एसआईआर का कालक्रम और कार्यप्रणाली
ज़ाहिर है, पश्चिम बंगाल में एसआईआर की कवायद शुरू से ही काफ़ी विवादित रही है। मैपिंग चरण से पता चला कि मसौदा संशोधन के दौरान एएसडीडी (अनुपस्थित, स्थानांतरित, हटाए गए, विस्थापित) श्रेणियों के तहत केवल 58 लाख नियमित विलोपन ही स्थापित किए गए थे। इसके साथ ही, ‘अंडर एडजुडिकेशन’ (यूए मामले) की न्यायिक समीक्षा के बाद 27 लाख अन्य मतदाता भी अयोग्य घोषित कर दिए गए। ये वही 27 लाख लोग हैं, जो चर्चा के केंद्र में आ गए हैं。

6 अप्रैल तक, लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे, जो एसआईआर प्रक्रिया के शुरू होने से पहले कुल मतदाताओं का लगभग 11.9% थे। मतदान से पहले, बताया गया कि ट्रिब्यूनलों के पास लगभग 34 लाख अपीलें लंबित थीं। इनमें से, 7 लाख अपीलें मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के विरोध में थीं, और 27 लाख अपीलें उन लोगों द्वारा दायर की गई थीं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। एसआईआर प्रक्रिया के तहत गठित अपीलीय ट्रिब्यूनलों ने 1,607 नामों को वापस मतदाता सूची में शामिल करने की अनुमति दी थी。

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में चल रही एसआईआर प्रक्रिया को लेकर कुछ चिंताएँ जताईं, और इस बात पर ज़ोर दिया कि उन लोगों द्वारा दायर अपीलों पर विचार करने के लिए एक “मज़बूत अपीलीय तंत्र” का होना ज़रूरी है, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। जस्टिस बागची ने कहा कि जब पश्चिम बंगाल की बात आई, तो चुनाव आयोग ने दूसरे राज्यों में अपनाई गई प्रक्रिया से हटकर एक नई श्रेणी ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (तार्किक विसंगति) शुरू कर दी। जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग ने बिहार एसआईआर मामले में अपनाए गए उस रुख से भी किनारा कर लिया, जिसके तहत यह कहा गया था कि जिन लोगों के नाम 2002 की वोटर लिस्ट में दर्ज थे, उन्हें दस्तावेज़ अपलोड करने की ज़रूरत नहीं है。

“किसी उम्मीदवार को चुनाव में हिस्सा लेने से गलत तरीके से रोकना, चुनाव रद्द करने का एक आधार है। लेकिन वोट देने का अधिकार अपने आप में — जब तक कि मतदाताओं की संख्या बहुत ज़्यादा न हो — जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 100 के तहत चुनाव रद्द करने के आधारों में से एक नहीं माना जाता। अगर 10% मतदाता वोट नहीं डालते और जीत का अंतर 10% से कम है… तो क्या होगा? मान लीजिए जीत का अंतर 2% है और 15% मतदाता, जिनकी पहचान हो चुकी है, वोट नहीं डाल पाए, तो शायद — हम कोई राय नहीं दे रहे हैं — लेकिन हमें निश्चित रूप से इस पर गंभीरता से विचार करना होगा। कृपया इस बात का ध्यान रखें कि किसी ऐसे जागरूक मतदाता की चिंता, जिसका नाम सही या गलत तरीके से सूची में नहीं है, हमारे ध्यान में नहीं है,” जस्टिस बागची ने चुनाव आयोग से कहा।

बहरहाल, इस चिंता के बावजूद, जस्टिस बागची को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट राज्य के 19 ज़िलों के लिए न्यायिक ट्रिब्यूनलों को कितना बड़ा काम सौंप रहा है। यह व्यवस्था कोलकाता हाई कोर्ट के ज़रिए बनाई गई थी, लेकिन चुनावों के पहले चरण तक यह ठीक से शुरू भी नहीं हो पाई थी। उन लोगों के मानसिक कष्ट की तो बात ही छोड़िए, जो पूरी तरह से चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई एसआईआर की गलत योजना और समय-सीमा के कारण इस संदिग्ध ‘यू ए’ श्रेणी में आ गए थे। जस्टिस बागची की यह उम्मीद कि अगर 70% काम भी पूरा हो जाता है, तो वह बहुत बढ़िया होगा, साफ़ तौर पर गलत साबित हुई। पूरे 19 ज़िला-वार ट्रिब्यूनल कोलकाता में ही होने के कारण, उन गरीब मतदाताओं को — जो पहली नज़र में नागरिक ही थे और जिनकी पहचान हो चुकी थी — अपने रोज़ाना की मज़दूरी छोड़कर दूर-दराज के ज़िलों से इतनी लंबी यात्रा करनी पड़ती है。

इस ट्रिब्यूनल प्रक्रिया की भारी विफलता का सबसे बड़ा संकेत कोलकाता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और एसआईआर अपीलीय ट्रिब्यूनल के सदस्य, जस्टिस टी. एस. शिवज्ञानम ने अपने इस्तीफे के बयान में उजागर किया है। उन्होंने बताया कि 5 से 27 अप्रैल के बीच, दिन-रात पूरी लगन से काम करने के बाद भी, वे कुल 1,777 अपीलों का ही निपटारा कर पाए, जिनमें से 1,717 अपीलों को उन्होंने सही ठहराया। उन्होंने आगे कहा कि ट्रिब्यूनल के सामने दायर की गई 33 लाख अपीलों को पूरा करने में चार साल लग जाएँगे। संयोग से, कांग्रेस के एक नेता को सुप्रीम कोर्ट के सीधे दखल से सुनवाई में प्राथमिकता मिली, उनका नाम मतदाता सूची में फिर से शामिल हो गया, वे चुनाव लड़े और जीत गए。

इसलिए, उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर अब यह स्पष्ट है कि यह कोई चुनावी पुनरीक्षण नहीं था, एक गहन कवायद होना तो दूर की बात है, बल्कि यह मतदाता सूचियों पर की गई एक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ थी। इसका निष्कर्ष बिल्कुल स्पष्ट है : यह मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित करने का एक सुनियोजित प्रयास था — और इसका सबसे अधिक खामियाज़ा उन मतदाताओं को भुगतना पड़ा, जो सामाजिक और आर्थिक पदानुक्रम में सबसे निचले पायदान पर थे。

सांप्रदायिक और सामाजिक आयाम
एसआईआर या आईएसआर, जैसा भी आप इसे कहना चाहें — के राज्य के सामाजिक ताने-बाने पर बेहद खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। जहाँ एएसडीडी के तहत 58 लाख नामों को हटाना ज़मीनी हकीकत के करीब लगता है, वहीं यूए श्रेणी की बात बिल्कुल ही अलग है। नामों को हटाने के इस पैटर्न का ज़िलेवार और इलाकेवार जनसंख्या घनत्व की बनावट से मिलान करने पर पता चलता है कि सबसे ज़्यादा नाम उन इलाकों से हटाए गए हैं, जहाँ मुस्लिम आबादी ज़्यादा है, और साथ ही उन इलाकों से भी, जहाँ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग रहते हैं। इसलिए, यह एक गहरी छाप छोड़ता है कि यह सब एक सोची-समझी योजना के तहत किया गया था, भले ही इसके पीछे कोई दुर्भावना न रही हो。

जिस तरह से एसआईआर की कवायद आयोजित की गई थी, उसका भाजपा को छोड़कर सभी राजनीतिक दलों ने विरोध किया था। इसने हिंदुत्व के उस लगातार दावे से मतदाताओं के प्रभावित होने की आशंका पैदा कर दी कि पश्चिम बंगाल ‘घुसपैठियों’ और ‘अवैध प्रवासियों’ से भरा हुआ है। लेकिन, वास्तव में, आज के पश्चिम बंगाल में इस बात में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं है। 12 साल पूरे करने के बाद भी, मोदी सरकार के पास इस बात का कोई दस्तावेज़ी सबूत मौजूद नहीं है। ज़ाहिर है, यह मैपिंग की कवायद भी इस बात को साबित नहीं कर सकी और इसीलिए, एक ‘अपरिक्षित सॉफ्टवेयर’ का इस्तेमाल किया गया और ‘तार्किक विसंगति’ का एक मनगढ़ंत विचार गढ़ा गया, जिसके चलते इतनी बड़ी संख्या में लोगों को ‘यूए’ (अनिर्धारित) श्रेणी में डाल दिया गया। भाजपा नेताओं का इस ‘बेबस स्थिति’ और इसके नतीजों पर लगभग जश्न मनाना — और साथ ही यूए श्रेणी में डाले गए लोगों को यह क्रूर धमकी देना कि उन्हें जल्द ही देश से बाहर निकाल दिया जाएगा — हिंदुत्व की मूल वैचारिक बुनियाद की ‘ताकत’ का एक रोंगटे खड़े कर देने वाला अहसास है。

स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “भारत के गरीबों में इतने सारे मुसलमान क्यों हैं? यह कहना बिल्कुल बकवास है कि उन्हें तलवार के ज़ोर पर धर्म परिवर्तन कराया गया था। उन्होंने ऐसा ज़मींदारों और पुजारियों के ज़ुल्म से आज़ादी पाने के लिए किया था ; और इसी का नतीजा है कि बंगाल में खेती-बाड़ी करने वालों में हिंदुओं के मुकाबले मुसलमानों की संख्या ज़्यादा है, क्योंकि वहाँ ज़मींदार बहुत ज़्यादा थे। इन गिरे हुए, कुचले हुए करोड़ों लोगों को ऊपर उठाने के बारे में कौन सोचता है? सिर्फ़ कुछ हज़ार ग्रेजुएट मिलकर कोई राष्ट्र नहीं बनाते, न ही कुछ अमीर लोग मिलकर कोई राष्ट्र बनाते हैं। यह सच है कि हमारे पास मौके कम हैं, लेकिन फिर भी 30 करोड़ लोगों को खाना-कपड़ा देने और उन्हें ज़्यादा आरामदायक, बल्कि आलीशान ज़िंदगी देने के लिए हमारे पास काफ़ी संसाधन हैं। हमारी 90 फ़ीसदी आबादी अशिक्षित है — इस बारे में कौन सोचता है? क्या ये ‘बाबू लोग’ — जिन्हें तथाकथित देशभक्त कहा जाता है— इस बारे में सोचते हैं?” [दीवानजी (श्री हरिदास विहारीदास देसाई) को लिखे पत्र से, जैसा कि ‘स्वामी विवेकानंद के संपूर्ण कार्यों’ में उद्धृत है।] ऐसा और किसी ने कहा है? इसलिए, अपने घुसपैठिया सिद्धांत को सही ठहराने की जगह, आरएसएस-भाजपा के नेताओं को चाहिए कि वे स्वामीजी के विचारों का और ज़्यादा गहराई से अध्ययन करें और फिर बंगाल के पुनरुद्धार के बारे में बात करें。

असम और ‘डी-वोटर’ की कवायद
चुनावी जश्न के इस माहौल में, यह बात अब और भी साफ़ होती जा रही है कि एसआईआर की कवायद का मकसद पश्चिम बंगाल पर सिर्फ़ चुनावी नतीजों से कहीं ज़्यादा गहरा असर डालना था। इसका उद्देश्य इस राज्य की पहचान से जुड़ी बुनियाद को फिर से गढ़ना था, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ संघर्षों में सबसे आगे रहा था। बंगाल सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सुधारों की सबसे समृद्ध विरासत का गवाह रहा है। इसलिए, बंगाल के ‘नकली पुनरुद्धार’ का ढोंग करना और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को इसका ‘अग्रदूत’ बनाकर पेश करना — जो असल में विभाजन को लागू करवाने वालों में से एक थे — पूरी तरह से बेतुकी कोशिश है। पिछली टीएमसी-नीत सरकार के ख़िलाफ़ लोगों में मौजूद भारी असंतोष (सत्ता-प्रतिकूलता कारक) का फ़ायदा उठाना एक बात है, लेकिन इस प्रगतिशील राज्य को आगे ले जाना बिल्कुल ही दूसरी बात है। समावेशी शासन स्थापित करने की जो नई बातें की जा रही हैं, वे एसआईआर को अपनाने की पृष्ठभूमि में लोगों पर कोई खास असर नहीं डाल पाएंगी ; क्योंकि एसआईआर तो अपने आप में एक पूरी तरह से विभाजनकारी कवायद है。

इसके बजाय, भाजपा असम वाली रणनीति अपनाने की कोशिश कर रही है, जहाँ बिना किसी सही जाँच-पड़ताल और असल नागरिकता की बारीकी से जाँच किए बिना ही, बिना दस्तावेज़ वाले मतदाताओं के एक तबके को अवैध ठहराने की कोशिशें की गई। असुरक्षा की भावना को भड़काकर, लोगों के कुछ खास तबकों के लिए ‘डी-वोटर’ (संदिग्ध मतदाता) की एक श्रेणी तय कर दी गई। इसे एनआरसी की प्रक्रिया और तथाकथित ‘डिटेंशन सेंटर’ (हिरासत केंद्रों) से जोड़ने की कोशिश की गई ; लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के बुरी तरह नाकाम होने से ऐसी स्थिति पैदा हो गई कि भारी-भरकम वित्तीय खर्च के बावजूद, ये दिखावटी सुविधाएँ आज खाली और वीरान जगहों में तब्दील हो चुकी हैं。

यह डिज़ाइन साफ़ है। यू ए श्रेणी के लोगों के भविष्य का फ़ैसला न्यायपालिका द्वारा किए जाने से पहले ही, राज्य सरकार सामाजिक कल्याण योजनाओं के लाभार्थियों के अधिकारों को खत्म करने के संकेत दे रही है। पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान जिन महिलाओं के नाम हटा दिए गए हैं, उन्हें राज्य सरकार की ‘अन्नपूर्णा भंडार’ योजना का लाभ नहीं मिलेगा। लेकिन, हममें से जो लोग एक समावेशी, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं, वे आम जनता के ज़्यादा से ज़्यादा तबकों को एकजुट करके — उनकी जाति, नस्ल और संप्रदाय की परवाह किए बिना और आजीविका के संकट को आधार बनाकर— विभाजन, व्यवधान और तोड़फोड़ की इस रणनीति को हराने के लिए आगे आएंगे। 27 लाख अनिर्णीत लोगों का मुद्दा इस प्रयास का मुख्य केंद्र होगा。

(लेखक माकपा के पोलिट ब्यूरो सदस्य, पूर्व सांसद और ‘पीपुल्स डेमोक्रेसी’ के संपादक हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: मताधिकार पर कुठाराघात और लोकतंत्र की बुनियाद पर प्रहार

नीलोत्पल बसु जी का यह आलेख भारतीय लोकतंत्र के उस सबसे स्याह और डरावने पहलू को उजागर करता है, जिस पर आज सबसे ज़्यादा चर्चा होनी चाहिए—नागरिकों से उनका सबसे बड़ा अधिकार, ‘मताधिकार’ (Right to Vote) छीनना। पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा चलाई गई एसआईआर (Special Intensive Revision) प्रक्रिया कोई सामान्य प्रशासनिक कवायद नहीं थी। जब एक ही झटके में लगभग 91 लाख मतदाताओं (जो कुल मतदाताओं का 11.9% है) के नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाएं, और उनमें से 27 लाख को ‘अंडर एडजुडिकेशन’ (UA) जैसी संदिग्ध श्रेणी में डाल दिया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रक्रिया ‘सुधार’ के लिए नहीं, बल्कि ‘बहिष्कार’ (Exclusion) के लिए रची गई थी। भारत के संविधान का अनुच्छेद 326 स्पष्ट रूप से ‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार’ (Universal Adult Suffrage) की गारंटी देता है, लेकिन इस प्रक्रिया ने एक नागरिक को यह साबित करने के लिए मजबूर कर दिया कि वह ‘गैर-नागरिक’ नहीं है। यह न्याय के मूलभूत सिद्धांत (Innocent until proven guilty) का सीधा उलट है।

सॉफ्टवेयर का खेल और गरीब-अल्पसंख्यकों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’:
आलेख में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु उठाया गया है कि ‘तार्किक विसंगति’ (Logical Discrepancy) के नाम पर एक ‘अपरिक्षित सॉफ्टवेयर’ का इस्तेमाल किया गया। इस तकनीकी जाल का सबसे बड़ा शिकार कौन हुआ? वे लोग जो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े हैं—मुस्लिम, दलित (SC) और आदिवासी (ST)। जब नामों को हटाने का पैटर्न एक विशेष जनसांख्यिकी (Demography) से मेल खाता है, तो इसे केवल ‘तकनीकी खराबी’ नहीं कहा जा सकता। यह एक सुनियोजित ‘डिजाइन’ का हिस्सा नज़र आता है। जिन गरीबों के पास रोज़ की रोटी का जुगाड़ नहीं है, उनसे 11 तरह के दस्तावेज़ मांगना और फिर उन्हें अपील करने के लिए ट्रिब्यूनलों के चक्कर कटवाना, असल में उन्हें ‘सिस्टम’ से बाहर फेंकने की एक क्रूर साज़िश है। जस्टिस टी.एस. शिवज्ञानम का यह बयान कि 33 लाख अपीलों को निपटाने में 4 साल लगेंगे, इस बात का प्रमाण है कि ट्रिब्यूनल की यह व्यवस्था पूरी तरह से दिखावटी और अव्यावहारिक थी।

असम का ‘डी-वोटर’ मॉडल और बंगाल की अस्मिता:
लेखक ने बिल्कुल सही चेताया है कि बंगाल में जो प्रयोग किया गया, वह दरअसल असम की ‘डी-वोटर’ (Doubtful Voter) और एनआरसी (NRC) प्रक्रिया का ही एक नया संस्करण है। जब राजनीतिक दल ‘घुसपैठियों’ का हौव्वा खड़ा करते हैं, तो उनका उद्देश्य केवल सीमा की सुरक्षा नहीं होता, बल्कि एक विशेष समुदाय को डराकर अपने बहुसंख्यक वोट बैंक को मज़बूत करना होता है। लेकिन बंगाल का इतिहास और इसका सामाजिक ताना-बाना (Social Fabric) हमेशा से समावेशी रहा है। स्वामी विवेकानंद का संदर्भ यह याद दिलाता है कि बंगाल में धर्मांतरण तलवार के ज़ोर पर नहीं, बल्कि ज़मींदारों के ज़ुल्म से बचने के लिए हुआ था। ‘ताज न्यूज़’ का यह स्पष्ट मानना है कि यदि किसी भी नागरिक को उसके मताधिकार से ‘प्रशासनिक चालबाज़ियों’ के ज़रिए वंचित किया जाता है, तो वह केवल एक वोट की चोरी नहीं है, बल्कि वह भारत के लोकतांत्रिक गणराज्य (Democratic Republic) की आत्मा की हत्या है। जब तक ये 27 लाख अनिर्णीत लोग दोबारा सूची में नहीं जोड़े जाते, तब तक किसी भी चुनावी जीत की वैधता हमेशा सवालों के घेरे में रहेगी।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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