संसद का विशेष सत्र और ज्योतिष का फेर: क्या ‘शुभ मुहूर्त’ ने कराया बंटाधार? विष्णु नागर का मारक आलेख

आर्टिकल Desk, Taj News | Monday, April 20, 2026, 09:15:00 AM IST

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Vishnu Nagar Writer
विष्णु नागर
प्रख्यात साहित्यकार
एवं स्वतंत्र पत्रकार
जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और प्रख्यात साहित्यकार विष्णु नागर ने अपने इस बेहद मारक और व्यंग्यात्मक आलेख में भारतीय राजनीति की उस विडंबना पर करारी चोट की है, जहां अहम फैसले ‘राजनीतिक समझ’ से कम और ‘ज्योतिषियों के शुभ मुहूर्त’ से ज़्यादा लिए जाते हैं। दरअसल, उन्होंने पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु चुनावों के बीचों-बीच संसद का ‘विशेष अधिवेशन’ बुलाने और उसमें ‘महिला आरक्षण बिल’ के गिरने की घटना को एक बड़ी रणनीतिक चूक के बजाय सत्ता की ‘हड़बड़ाहट’ करार दिया है। इसके अलावा, उन्होंने ममता बनर्जी और एमके स्टालिन की मजबूत ज़मीन पर भी गहरा विश्लेषण किया है। इसलिए, बिना किसी देरी के पढ़िए यह शानदार प्रहार:
HIGHLIGHTS
  1. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे अहम विधानसभा चुनावों के ठीक बीचों-बीच संसद का ‘विशेष अधिवेशन’ बुलाकर सरकार ने खुद अपनी राजनीतिक फजीहत करवा ली।
  2. दरअसल, लेखक ने तीखा तंज कसा है कि यह रणनीतिक चूक किसी गहरी राजनीतिक चाल का हिस्सा नहीं, बल्कि किसी ‘चमचे ज्योतिषी’ द्वारा बताए गए गलत ‘शुभ मुहूर्त’ का नतीजा है।
  3. इसके अलावा, महिला आरक्षण के मुद्दे पर ममता बनर्जी को घेरना सत्ता पक्ष की बड़ी भूल थी, क्योंकि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस पहले से ही महिलाओं को 33% आरक्षण दे चुकी है।
  4. हकीकत में, तमिलनाडु में एमके स्टालिन ‘परिसीमन’ (Delimitation) के मुद्दे पर केंद्र को पहले ही बैकफुट पर ला चुके हैं, जिससे दक्षिण में यह राजनीतिक ड्रामा पूरी तरह फ्लॉप साबित हुआ।

संपादकीय संदर्भ: भारतीय राजनीति में ‘व्यंग्य’ की परंपरा और ‘शुभ मुहूर्तों’ का चक्रव्यूह

भारतीय साहित्य और पत्रकारिता में ‘व्यंग्य’ (Satire) महज़ हंसाने का साधन नहीं है; यह सत्ता की आँख में आँख डालकर सच बोलने का सबसे धारदार हथियार रहा है। हरिशंकर परसाई और शरद जोशी की जिस महान परंपरा ने आज़ाद भारत की विसंगतियों को शब्दों के तीर से बेनकाब किया, उसी सशक्त और निर्भीक परंपरा के आधुनिक ध्वजवाहक विष्णु नागर जी हैं। जब मुख्यधारा का मीडिया सत्ता के स्तुतिगान में व्यस्त हो जाता है, तब विष्णु नागर जैसे लेखक अपनी पैनी कलम से राजनीतिक ड्रामों के पीछे छिपी ‘मूर्खता’ और ‘अहंकार’ का पर्दाफाश करते हैं। उनका वर्तमान आलेख भारतीय राजनीति की एक ऐसी ही हास्यास्पद और गंभीर विसंगति पर चोट करता है—जहाँ देश के अहम फैसले ज़मीनी हकीकत देखकर नहीं, बल्कि ‘ग्रह-नक्षत्रों’ और ‘ज्योतिषियों’ के बही-खातों को देखकर लिए जाते हैं。

भारत की सत्ता के गलियारों, विशेषकर दिल्ली की लुटियंस ज़ोन में, ‘तंत्र-मंत्र’ और ‘ज्योतिष’ का प्रभाव कोई नई बात नहीं है। राजनेताओं के लिए सत्ता किसी नशे से कम नहीं होती, और इस नशे को जीवन भर बनाए रखने के लिए वे अक्सर तर्क और विज्ञान को ताक पर रखकर ‘शुभ मुहूर्तों’ के मायाजाल में फंस जाते हैं। विष्णु नागर जी ने इसी कमज़ोरी को अपने व्यंग्य का केंद्र बनाया है। जब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे दो अत्यंत महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनावों का महासंग्राम चरम पर हो, तब अचानक बीच चुनाव में दिल्ली में संसद का ‘विशेष अधिवेशन’ बुलाने का क्या तुक था? और उससे भी बड़ी राजनीतिक फजीहत तब हुई, जब ‘महिला आरक्षण बिल’ (Women’s Reservation Bill) जिसे सत्ताधारी दल अपना ‘मास्टरस्ट्रोक’ मानकर लाया था, वह औंधे मुंह गिर गया。

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग इसे एक सोची-समझी चाल मान सकता है कि शायद सरकार ‘हार’ के ज़रिए ‘विक्टिम कार्ड’ (Victim Card) खेलना चाहती थी। लेकिन विष्णु नागर जी की लेखनी इस तथाकथित ‘चाणक्य नीति’ की बखिया उधेड़ देती है। वे साफ़ कहते हैं कि यह कोई मास्टरस्ट्रोक नहीं था, बल्कि किसी चापलूस ज्योतिषी द्वारा बताया गया ‘फर्जी शुभ मुहूर्त’ था, जिसके फेर में पड़कर 12 साल से अजेय होने का दंभ भरने वाली सत्ता ने अपनी ही फजीहत करा ली। जब आपके सामने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी जैसी कद्दावर नेत्री खड़ी हो, जिसने अपनी पार्टी और राजनीति में पहले से ही महिलाओं को 33 प्रतिशत से अधिक आरक्षण दे रखा है, तो वहां दिल्ली से ‘महिला हितैषी’ होने का ड्रामा करना राजनीतिक नासमझी के अलावा और क्या हो सकता है?

इसी तरह, तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन (M.K. Stalin) और उनकी पार्टी डीएमके (DMK) पहले ही केंद्र सरकार के खिलाफ ‘परिसीमन’ (Delimitation) के मुद्दे पर एक बड़ा मोर्चा खोल चुके हैं। दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनके अच्छे प्रदर्शन की सज़ा उन्हें संसद में उनकी सीटें कम करके दी जाएगी। ऐसे सुलगते माहौल में, चुनाव के बीच संसद सत्र बुलाकर अपना एजेंडा थोपने की कोशिश करना, दक्षिण के मतदाताओं को और भी नाराज़ करने वाला कदम साबित हुआ। राजनीति में टाइमिंग (Timing) सबसे अहम होती है, लेकिन जब टाइमिंग राजनीतिज्ञों के बजाय ‘पंचांग’ और ‘ज्योतिषियों’ के हाथों में चली जाए, तो नतीजा ‘बंटाधार’ ही होता है。

इस आलेख के ज़रिए विष्णु नागर ने सिर्फ एक बिल के गिरने पर तंज नहीं कसा है, बल्कि उन्होंने उस ‘इकोसिस्टम’ (Ecosystem) पर प्रहार किया है जहाँ चापलूसों की फौज सत्ताधीशों को यह यकीन दिला देती है कि वे कभी हार नहीं सकते, और उनकी हर गलती भी इतिहास का एक महान कदम है। पढ़िए प्रख्यात साहित्यकार विष्णु नागर जी का यह 100% मूल और बेहद मारक व्यंग्य आलेख:

राजनैतिक व्यंग्य-समागम

1. ज्योतिष के फेर में हुआ बंटाधार : विष्णु नागर

विद्वानों की बात विद्वान जानें, मगर मुझे लगता है कि नरेन्द्र मोदी ने जिद करके पश्चिम बंगाल तथा तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के बीचों-बीच संसद का विशेष अधिवेशन बुलाने की जो गफलत की, उसके पीछे कोई बड़ी चाल नहीं रही होगी, बल्कि मूर्खता पर इनका दिनों-दिन गहरा होता विश्वास रहा होगा। मूर्खता और क्रूरता के बगैर ये चार कदम भी चल नहीं सकते! दो कदम के बाद ही हांपने लगते हैं!

तो किसी ज्योतिषी को इन्होंने बुलाया होगा कि महाराज ये बताएं कि लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक के बहाने हिंदी प्रदेशों पर स्थायी कब्जा करने की जो कूट चाल हम चलना चाहते हैं, वह किस शुभ मुहूर्त में सफल होगी!

सच्चा ज्योतिषी वही होता है, जो अपने मोटे- तगड़े जजमान के सामने उसके मन की बात कहे। तो उस ज्योतिषी ने तत्काल अमित शाह की उपस्थिति में मोदी जी के सामने कुछ फर्जी जोड़-बाकी-गुणा-भाग करके बताया होगा कि राजाधिराज, यह शुभ काम आप 16 से 18 अप्रैल के बीच करें, तो दुनिया की कोई ताकत आपके इस विजय अभियान को रोक नहीं पाएगी। विपक्ष आपके चरणों में शीश रख देगा और संसद में वह आपकी जय-जयकार इतनी जोर से करेगा कि एनडीए गठबंधन के दल के नेता भी देखते रह जाएंगे! यह मुहूर्त हुजूर इतना अधिक लाभकर है कि आप प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की ऐसी अनोखी मिसाल कायम कर जाएंगे, जो दुनिया में आज तक किसी ने न की होगी। आप 2049 तक तो देश के प्रधानमंत्री रहेंगे ही रहेंगे और हुजूर, गणना तो यह भी बताती है कि आप उसके बाद भी प्रधानमंत्री बने रहेंगे। अगर आपकी इच्छा इस बीच राष्ट्रपति बनने की हुई, तो वह इच्छा भी आप जिस दिन चाहेंगे, ठीक उसी दिन पूरी हो जाएगी। आपकी जन्मकुंडली और आपके हाथ की रेखाएं बताती हैं कि आप सौ वर्ष की उम्र के बाद भी आज की तरह स्वस्थ रहेंगे और प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति पद पर रहेंगे और हुजूर योग तो इतने तगड़े हैं कि ऐसा समय भी आ सकता है कि दोनों पदों को आप ही शोभायमान करें। इस जीवन में कोई आपसे ये पद छीन नहीं सकता। आप बुरा न मानें, तो इसके आगे की भविष्यवाणी भी कर दूं कि जब भी आप इस दुनिया से स्वेच्छा से प्रयाण करने का विचार करेंगे, आप पद और उसकी कुर्सी समेत स्वर्ग की ओर प्रस्थान करेंगे। इंद्र आदि देवता आप पर वहां पुष्प वर्षा करेंगे। वहां आपके लिए रेड कार्पेट बिछेगा और देवतागण आपके इतने पीछे चलेंगे कि कैमरे में केवल आप ही आप दिखेंगे!

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भारत देश में चमचों का इतने बड़ा प्रेमी न इसके पहले कभी हुआ है और न इसके बाद होने की संभावना है।उसने आगा देखा, न पीछा और विशेष अधिवेशन बुला लिया। आप ही सोचिए कि न तो संसद भागी जा रही थी, न संसद सदस्य और न ये तीनों विधेयक भागे जा रहे थे और न इन्हें और अमित शाह के पद को कोई खतरा था। चुनाव के बाद अधिवेशन बुलाने से न तो अडानी का कोई आर्थिक नुक़सान होनेवाला था, न ट्रंप इस अधिवेशन को बुलाने की अनुमति देने से इंकार करता! ट्रंप से इनकी जो बातचीत पिछले दिनों चालीस मिनट तक हुई है, सूत्रों के अनुसार उसमें भी विशेष अधिवेशन का विषय आया था, तो उस भले आदमी ने उदारता दिखाते हुए कहा था कि माई डियर फ्रेंड मोडी, टुमको हम इसकी अनुमटि देता है।टुम जब चाहो, इसे बुलाने को सकटा。

इसके अलावा और क्या कारण रहा होगा कि माननीय प्रधानमंत्री जी ने ऐन चुनाव के बीचों-बीच अपनी नाक कटवाई का यह शुभ आयोजन रखवाया। यह आयोजन बाद में भी तो हो सकता था! ज्योतिषी जी से अगर मोदी जी कहते कि नहीं ज्योतिषी जी महाराज, चुनाव के बाद की कोई तिथि बताइए, तो उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि ‘नहीं’ कह पाता! वह फौरन पोथी पत्रा फिर से निकालता, फिर से फर्जी गुणा-भाग का खेल खेलता और दूसरी तिथि बता देता और उस तिथि को अप्रैल वाली तिथि से भी उत्तम बताता! उसके पिताजी का न पहले कुछ जा रहा था, न अब जानेवाला था, बल्कि वह तो तीसरी और चौथी तिथि भी बता देता! वह जरूर पहुंचा हुआ ज्योतिषी रहा होगा, तो नौ तिथियां अस्वीकार हो जातीं, तो दसवीं तिथि भी बता देता। दक्षिणा में वह केवल राज्यसभा की फकत एक सीट मांगता और जिला परिषद की सदस्यता पर राजी हो जाता!

पिछले लगभग बारह साल से पूरे देश को झांसा देने वाला यह महापुरुष इस ज्योतिषी के झांसे में आ गया और यह कांड कर बैठा। पहली बार इतनी तगड़ी मात खा गया। बरसों तक लोग इस पर हंसेंगे。

अच्छा चलो एक मिनट के लिए मान लेते हैं कि यह गड़बड़ ज्योतिषी के कारण नहीं हुई, बल्कि काफी राजनीतिक गुणा-भाग के बाद हुई। ये विधेयक अगर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु चुनाव के बाद लाए जाते, तो भी इतनी ही आसानी से गिर जाते! जब सरकार को बारह साल से हर दिन गिरने में कोई समस्या नहीं, तो इन विधेयकों को तो केवल एक दिन में एक साथ गिरना था! इन्हें क्या दिक्कत थी?

अगर ये दोनों गुजराती भाई सोच रहे थे कि ये विधेयक लाकर और ‘विपक्ष ने महिला आरक्षण विधेयक गिरा दिया’ का हल्ला मचा कर ये ममता बनर्जी या स्टालिन को हरा देंगे, तो ये बहुत ही दूर की कौड़ी ला रहे थे। स्टालिन का तो ये कुछ भी करके कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते हैं, इतना ये पहले भी जानते थे। स्टालिन ने तो पहले ही परिसीमन के सवाल पर इनके खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था और इनकी हवा टाइट कर दी थी। रही ममता बनर्जी, तो उन्हें किसी और तरकीब से तो हराने की सोचा जा सकता था, मगर इस मुद्दे पर उन्हें हराया नहीं जा सकता। एक तो वह खुद महिला मुख्यमंत्री हैं और दूसरे उन्होंने पहले ही महिलाओं को चुनाव में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण दे रखा है। ममता के विरुद्ध यह हथियार कारगर नहीं होगा, इतनी अक्ल इनके पास रही होगी, यह मानना चाहिए। हां, इस बार खरीद फरोख्त ये नहीं कर पाए, इसका अफसोस इन्हें जरूर रहा होगा!

तो सवाल यह है कि जल्दबाजी में ये ड्रामा करने से इन्हें क्या मिला, जिसका सेट तैयार नहीं था। प्रापर्टी पूरी नहीं थी और प्रकाश व्यवस्था में भी कमी थी! अभिनेता डायलॉग तक रट नहीं पाए थे।बात फिर ज्योतिषी पर आकर अटक जाती है。

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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