संपादकीय संदर्भ: महिला आरक्षण का लंबा संघर्ष और ‘शर्तों’ के भंवर में फंसी आधी आबादी
भारत की राजनीति में ‘महिला आरक्षण’ (Women’s Reservation) एक ऐसा मुद्दा रहा है, जिसने दशकों तक संसद की सीढ़ियों से लेकर सड़क तक एक लंबा और कड़वा संघर्ष देखा है। देश की आबादी का आधा हिस्सा यानी महिलाएं, आज भी नीति-निर्माण की सर्वोच्च संस्थाओं (संसद और विधानसभाओं) में अपने आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए तरस रही हैं। 1996 में जब पहली बार एच.डी. देवेगौड़ा सरकार द्वारा 81वें संविधान संशोधन के रूप में महिला आरक्षण विधेयक पेश किया गया था, तब से लेकर आज तक, यह बिल कई बार संसद में आया और पितृसत्तात्मक राजनीति के शोरगुल में गुम हो गया। 2010 में राज्यसभा ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए इस विधेयक को पारित किया था, लेकिन तब भी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह लोकसभा की दहलीज पार नहीं कर सका।
सितंबर 2023 में, एक लंबे इंतज़ार के बाद, जब मोदी सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संविधान संशोधन) संसद के विशेष सत्र में पेश किया और उसे भारी बहुमत से पारित करवाया, तो देश भर की महिलाओं में एक नई उम्मीद जगी थी। लगा था कि अब लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। लेकिन, इस ‘ऐतिहासिक’ फैसले के साथ एक ऐसा ‘तकनीकी पेंच’ (Rider) जुड़ा था जिसने इस जीत के जश्न को फीका कर दिया। सरकार ने इस कानून के लागू होने को ‘जनगणना’ (Census) और ‘परिसीमन’ (Delimitation) की पूरी होने वाली प्रक्रिया से जोड़ दिया। सरल शब्दों में कहें तो, कानून तो पास हो गया, लेकिन वह लागू तब होगा जब देश की नई जनगणना होगी और उसके बाद निर्वाचन क्षेत्रों का नया परिसीमन तय होगा। इसी शर्त के कारण 2024 के लोकसभा चुनावों में देश की महिलाओं को इस आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका।
राजनीतिक विश्लेषकों और महिला संगठनों का तर्क है कि यदि सरकार की नीयत साफ़ थी, तो आरक्षण को तुरंत लागू किया जा सकता था, ठीक वैसे ही जैसे 2010 के बिल में प्रावधान था। परिसीमन का मुद्दा विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए एक गहरी चिंता का विषय है, क्योंकि जनसंख्या नियंत्रण में उनके बेहतर प्रदर्शन के कारण परिसीमन के बाद संसद में उनकी सीटें कम होने का डर है। ऐसे में महिला आरक्षण को इस विवादित मुद्दे के साथ जोड़ना, महिलाओं के हक़ को अनिश्चितकाल के लिए टालने की एक राजनीतिक चाल मानी जा रही है।
हाल ही में 16 अप्रैल 2026 को संसद के एक और विशेष सत्र में जब सरकार ने इस मुद्दे पर कुछ नए संवैधानिक संशोधन पारित कराने की कोशिश की, तो विपक्ष के कड़े विरोध के कारण वह सफल नहीं हो सकी। इसके बाद प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर महिलाओं के अधिकारों की “भ्रूण हत्या” करने का आरोप लगाया। प्रधानमंत्री के इन्ही बयानों और महिला आरक्षण के नाम पर हुई इस पूरी ‘राजनीतिक हेरा-फेरी’ का जवाब देते हुए, देश के जनवादी महिला आंदोलन की सबसे प्रखर आवाज़ों में से एक, राज्यसभा की पूर्व सांसद बृंदा करात जी ने यह खुला पत्र लिखा है। यह पत्र महज़ एक राजनीतिक आलोचना नहीं है, बल्कि देश की आधी आबादी के उस दर्द और गुस्से का दस्तावेज़ है, जो झूठे आश्वासनों और कागज़ी ‘वंदन’ से तंग आ चुकी है। पढ़िए वरिष्ठ नेत्री बृंदा करात जी का यह 100% मूल और प्रखर खुला पत्र:
प्रधानमंत्री को खुला पत्र : मोदी जी, कृपया भारत की महिलाओं के लिए आँसू न बहाएँ
(लेखिका : बृंदा करात, अनुवाद : संजय पराते)
(उस प्रधानमंत्री के नाम एक खुला पत्र, जिन्होंने देश की महिलाओं के साथ कई बार विश्वासघात किया है।)
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,
महिलाओं के लिए आरक्षण के मुद्दे पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में आपने कहा था कि, “महिलाओं को सत्ता में भागीदारी दिलाने की लड़ाई दशकों से चल रही है… कितनी ही महिलाओं ने मेरे सामने यह विषय उठाया है। कितनी ही बहनों ने मुझे पत्र लिखकर पूरी बात समझाई है।”
मोदी जी, आपके लिए यह एक और पत्र है उस व्यक्ति की ओर से, जो उस “दशकों लंबी लड़ाई” में एक सक्रिय भागीदार रही है, जिसका आपने अपने संबोधन में ज़िक्र किया है। उस ऐतिहासिक लड़ाई का नेतृत्व महिला संगठनों ने किया था ; इसका नेतृत्व पंचायतों में मौजूद उन लाखों महिलाओं ने किया था, जिन्होंने पितृसत्तात्मक संस्कृति से लोहा लेते हुए यह साबित किया है कि वे महज़ “मुखौटे” नहीं हैं। यह लड़ाई हज़ारों-लाखों प्रदर्शनों, रैलियों, विरोध प्रदर्शनों, धरनों और याचिकाओं के ज़रिए लड़ी गई थी। आपने अपने संबोधन में यह भी कहा था, “मैं भी उन लोगों में शामिल रहा हूँ, जिन्होंने इसके लिए प्रयास किए हैं।” नहीं मोदी जी, नहीं, संघर्ष के इन तमाम वर्षों के दौरान हमें आपकी ओर से कभी भी किसी तरह का कोई समर्थन नहीं मिला। आपका यह दावा सच्चाई से उतना ही दूर है, जितना कि गोडसे की विचारधारा गांधी की विचारधारा से दूर थी。
आइए मोदी जी, तथ्यों को प्रचार से अलग करके देखें। लेकिन उससे पहले महिलाओं के “दुख को बांटने” वाले आपके बयान और आपकी इस प्रतिज्ञा कि, “मैं देश की हर महिला को भरोसा दिलाता हूं, हम महिलाओं के आरक्षण की राह में आने वाली हर बाधा को दूर करेंगे”, के संदर्भ में यहां एक ठोस सुझाव है, जो आपके दुख और हर बाधा को दूर कर देगा। उस सबसे बड़ी बाधा को हटा दीजिए, जिसे आपकी सरकार द्वारा 2023 में लाए गए 106वें संविधान संशोधन में खड़ा किया गया था। यह संशोधन महिलाओं के आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ता है। मोदी जी, इस वाक्य को हटा दीजिए, और महिलाओं के लिए आरक्षण कल से ही लागू किया जा सकता है। लेकिन आप ऐसा नहीं करेंगे, मोदी जी। आपकी प्रतिबद्धता कभी भी महिलाओं के आरक्षण के प्रति थी ही नहीं。
आप 2014 में प्रधानमंत्री चुने गए थे। आपकी पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का वादा किया था। आपके नेतृत्व वाले गठबंधन ने 336 सीटें जीतीं थीं, जिनमें से आपकी अपनी पार्टी ने 282 सीटें हासिल की थीं। उस समय आपने इस दिशा में क्या “प्रयास” किया था? भारत की महिलाओं को बताइए कि आपने अपने पहले कार्यकाल में महिला आरक्षण विधेयक क्यों पारित नहीं किया? इतना ही नहीं मोदी जी, आपने तो इस विधेयक को सरकारी एजेंडा में शामिल करने से भी इंकार कर दिया था। 2017 के मानसून सत्र में, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के तत्कालीन महासचिव सीताराम येचुरी ने राज्यसभा के सदस्य के तौर पर, महिला आरक्षण विधेयक को सदन की कार्यसूची में शामिल करने की मांग की थी। आपने ऐसा करने से इंकार क्यों किया? जुलाई 2018 में, लोकसभा में सीपीआई(एम) की सांसद पी.के. श्रीमती (जो अब अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की अध्यक्ष हैं) ने इस मुद्दे को उठाया था। उस समय यह मुद्दा बेहद ज़रूरी था, क्योंकि 2019 में होने वाले चुनावों में सिर्फ़ एक साल का समय ही बचा था। कई पार्टियों ने उनका समर्थन किया, लेकिन आपकी सरकार ने उनकी इस अपील को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया था। कई विपक्षी पार्टियों की महिला सांसदों ने संसद के भीतर धरना दिया था और महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने की मांग की थी। संसद के बाहर भी, महिलाएं सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रही थीं और इस विधेयक को कार्यसूची में शामिल करके पारित करने की मांग कर रही थीं। लेकिन आपने कुछ भी नहीं किया। ऐसा क्यों, मोदी जी? इसका नतीजा यह हुआ कि 2019 के लोकसभा चुनावों में महिलाएं एक-तिहाई आरक्षण से वंचित रह गईं। इस मुद्दे पर यह आपका पहला विश्वासघात था。
2019 में आपने और भी बड़े बहुमत से जीत हासिल की थी ; आपके गठबंधन ने कुल 353 सीटें जीतीं, जिनमें से 303 सीटें आपकी पार्टी को मिली थी। यह एक बहुत बड़ा बहुमत था। आपने इसका इस्तेमाल कैसे किया? आपकी प्राथमिकता कारोबारियों की मदद करना थी। आप मज़दूरों के हितों के खिलाफ़ चार श्रम संहिताएं लेकर आए, और अपने बहुमत का इस्तेमाल करके किसानों के हितों के खिलाफ़ तीन विधेयक पारित करवा दिया। आपने अपने बहुमत का इस्तेमाल ‘महिला आरक्षण विधेयक’ लाने के लिए क्यों नहीं किया? आपने अपने कार्यकाल के लगभग आखिरी सत्र तक इंतज़ार क्यों किया, ताकि जब आप ‘महिला आरक्षण विधेयक’ का एक दोषपूर्ण मसौदा लेकर आएं, तो उसे किसी संसदीय समिति के पास भेजने के लिए बिल्कुल भी समय न बचे?
सितंबर 2023 में ही आपने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (एनएसवीए) नाम का एक विधेयक पेश किया था। इस खुले पत्र में आगे चलकर मैं आपके द्वारा चुने गए इस नाम पर फिर से बात करूँगी। कई लोगों ने कहा कि आपकी सरकार यह विधेयक इसलिए लाई थी, ताकि आने वाले 2024 के चुनावों के दौरान उसे इस बात की आलोचना का सामना न करना पड़े कि उसने दूसरी बार अपने वादे से मुँह मोड़ लिया है। लेकिन इस विधेयक का असली एजेंडा तो और भी ज़्यादा बुरा था। एनएसवीए के ज़रिए संविधान में संशोधन करते हुए एक नई धारा 334 (अ) जोड़ी गई, जिसमें यह कहा गया था कि महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था तभी लागू होगी, जब जनगणना और परिसीमन का काम पूरा हो जाएगा। महिलाओं के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस शर्त का ज़ोरदार विरोध किया था। हमने यह तर्क दिया था कि महिलाओं के लिए आरक्षण का जनगणना या परिसीमन से कोई लेना-देना नहीं है ; दूसरा, कि इस वजह से 2024 के चुनावों में महिलाओं को आरक्षण के अधिकार से वंचित रहना पड़ेगा ; और तीसरा, कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह पूरी प्रक्रिया आखिर कब तक पूरी हो पाएगी। संसद में विपक्षी दलों ने भी इनमें से कई मुद्दों को ज़ोर-शोर से उठाया था। तब आपने और केंद्रीय गृह मंत्री ने यह “गारंटी” दी थी कि 2029 के चुनावों से पहले जनगणना और परिसीमन का काम हर हाल में पूरा कर लिया जाएगा। आखिरकार, इस बिल को मंज़ूरी मिल गई। लेकिन, आपके द्वारा दिए गए उन आश्वासनों में से किसी पर भी अब तक अमल नहीं किया गया है。
मोदी जी, इसकी कीमत महिलाओं को चुकानी पड़ी है。
अगर आपने इस ‘लिंकेज’ (महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ने) पर ज़ोर न दिया होता और 2010 वाला विधेयक पेश किया होता —जिसके पक्ष में आपकी अपनी पार्टी ने उस समय वोट दिया था — तो आज लोकसभा में 180 महिलाएँ होतीं। इसके बजाय, उनकी संख्या घटकर सिर्फ़ 74 रह गई है, जो कि 2019 के मुकाबले भी कम है। इस दौरान दस विधानसभा चुनाव हुए हैं। एक-तिहाई होने के बजाय, उनकी संख्या 10% से भी कम है। आपके अपने गृह राज्य गुजरात में, 182 विधानसभा सीटों में से, 2022 में हुए चुनावों में, सिर्फ़ 15 महिलाएँ हैं, यानी लगभग 8 प्रतिशत। संसद में दो-तिहाई बहुमत होने के बावजूद, आपने ऐसा कानून बनाने से इंकार कर दिया, जो तत्काल प्रभाव से लागू हो सकता था। मोदी जी, यह आपका दूसरा विश्वासघात था。
राज्यों के महत्वपूर्ण चुनावों के बीच, 16 अप्रैल को, आपने महिला आरक्षण के मुद्दे पर संवैधानिक संशोधनों का एक नया सेट पारित करवाने के लिए संसद सत्र को आगे बढ़ा दिया। विपक्षी दलों के साथ न तो कोई पूर्व चर्चा हुई और न ही महिला संगठनों के साथ कोई परामर्श किया गया। सदन में ये संवैधानिक संशोधन पारित नहीं हो सके। महिला आरक्षण के मुद्दे का इस्तेमाल करके, 2011 की पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की आपकी चाल नाकाम हो गई। अब यह साफ़ है कि आपकी सरकार ने जान-बूझकर जनगणना की प्रक्रिया शुरू नहीं की, क्योंकि आपने शुरू से ही इस चालबाजी की योजना बना रखी थी। मोदी जी, यह आपका तीसरा विश्वासघात था。
आप संसद में सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करना चाहते थे। अपने संबोधन में आपने कहा, “नारी शक्ति वंदन संशोधन का मकसद किसी से कुछ छीनना नहीं था। नारी शक्ति वंदन संशोधन का मकसद तो सबको कुछ देना था ; यह देने के लिए किया गया एक संशोधन था।” दूसरे शब्दों में कहें तो, राजनीति में पितृसत्ता को छेड़ा नहीं जाना है — पुरुषों के पास ही सत्ता बनी रहे, उनकी संख्या बढ़ती रहे — और महिलाएँ बस एक ‘अतिरिक्त’ के तौर पर शामिल हो जाएँ। आपने अपनी ही पार्टी के भीतर मौजूद उस सामंती और जातिवादी ‘सरदारों’ वाले विपक्ष के साथ समझौता कर लिया, जो अपनी-अपनी ‘रियासतें’ चलाते हैं और जो महिलाओं के लिए आरक्षण के सबसे बड़े विरोधी रहे हैं। सीटों की संख्या बढ़ा देने से, उनकी स्थिति पर कोई आँच नहीं आती。
इसके अलावा, मनुवादी दृष्टिकोण भी स्पष्ट है। क्या यह सच नहीं है कि 2011 की जनगणना का इस्तेमाल करके, आपने दलित और आदिवासी महिलाओं को उनके लिए आरक्षित सीटों में उनके हक के हिस्से से वंचित कर दिया होता? 2001 और 2026 के बीच अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी बढ़ी है, इसलिए उनकी सीटों का अनुपात भी बढ़ना चाहिए। लेकिन आपका प्रस्ताव उन्हें इस अधिकार से वंचित कर देता。
और आखिर में, आइए हम परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाने के मुद्दे पर आते हैं। इस पर अलग से चर्चा की जाए। राज्यों की आबादी को आनुपातिक हिस्से का आधार नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि ऐसा करने से राज्यों को उनके विकास के लिए दंडित किया जाएगा। तो फिर आधार क्या हो सकता है? इस पर चर्चा और परामर्श होना चाहिए। वैसे भी, इसका महिला आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है。
महिलाएँ इस बात से खुश हैं कि महिला आरक्षण के मुद्दे पर आपकी हेरा-फेरी नाकाम रही। आप विपक्ष पर “पाप” करने का, “भ्रूण हत्या” करने का आरोप लगा रहे हैं, जिसके लिए उन्हें “सज़ा मिलेगी।” मोदी जी, अपने शब्दों का इस्तेमाल ज़रा सोच-समझकर कीजिए। अगर आपको ऐसी अशोभनीय उपमाएँ देनी ही हैं, तो आपको यह पता होना चाहिए कि वहाँ कोई भ्रूण नहीं था। वहाँ तो 2010 के आरक्षण विधेयक के रूप में एक पूरी तरह से विकसित “अस्तित्व” था, जिसके पक्ष में आपकी पार्टी ने वोट दिया था। आपने उस अस्तित्व को दफ़ना दिया। अगर कोई पाप है, तो वह यही है。
महिलाएँ आपकी सरकार द्वारा किए गए लगातार विश्वासघातों से तंग आ चुकी हैं। इसे “वंदन” का नाम न दें। हम सम्मान नहीं, बल्कि अपने अधिकार चाहते हैं। हमारी यह माँग इस दृढ़ विश्वास पर आधारित है कि संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी में संवैधानिक रूप से अनिवार्य वृद्धि भारत में लोकतंत्र को और अधिक मज़बूत करेगी। हम जाति जनगणना की माँग का समर्थन करते हैं। एक ऐसी माँग है, जिससे आप बचना चाहते हैं, क्योंकि आप नहीं चाहते कि भारत में मौजूद जातीय असमानताओं का सच अकाट्य आँकड़ों के माध्यम से दर्ज हो और उन पर उचित कार्रवाई की जाए。
और मोदी जी, कृपया हमारे लिए आँसू मत बहाइए – बस वैसा कीजिए, जैसा आपको 2014 में करना चाहिए था : संसद के अगले सत्र में बिना किसी शर्त या रोक-टोक के ‘महिला आरक्षण बिल’ लाइए, ताकि इसे अगले चुनावों में लागू किया जा सके। हमें दिखावा नहीं, काम चाहिए。
भवदीय,
बृंदा करात
(पत्र-लेखिका राज्यसभा की पूर्व सांसद, माकपा पोलिट ब्यूरो की पूर्व सदस्य तथा देश में जनवादी महिला आंदोलन की वरिष्ठ नेत्री हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)
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