बोलेंगे तो बोलोगे कि बोलते हैं! पीएम के ‘रात 8 बजे’ के संबोधन पर राजेंद्र शर्मा का तीखा राजनीतिक व्यंग्य

आर्टिकल Desk, Taj News | Monday, April 20, 2026, 05:00:00 AM IST

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Rajendra Sharma Writer
राजेंद्र शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
एवं संपादक, ‘लोक लहर’
‘लोक लहर’ के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा ने अपने इस तीखे और मारक व्यंग्य आलेख में प्रधानमंत्री के हालिया ‘रात 8 बजे’ वाले संबोधन पर करारी चुटकी ली है। दरअसल, उन्होंने पीएम को ‘थैंक यू’ कहा है कि इस बार उन्होंने नोटबंदी या लॉकडाउन जैसा कोई फरमान नहीं सुनाया, बल्कि सिर्फ विपक्ष को गरियाने का काम किया। इसके अलावा, उन्होंने 2023 के ‘महिला आरक्षण बिल’ को 3 साल बाद चुनाव के बीच में भुनाने की सत्ताधारी साजिश, और चुनाव आयोग की रहस्यमयी चुप्पी की पूरी बखिया उधेड़ दी है। इसलिए, बिना किसी देरी के पढ़िए यह शानदार राजनीतिक व्यंग्य:
HIGHLIGHTS
  1. प्रधानमंत्री का रात 8 बजे टीवी पर आना देश की जनता के लिए घबराहट का विषय होता है, लेकिन इस बार गनीमत रही कि कोई नोटबंदी या लॉकडाउन का ऐलान नहीं हुआ।
  2. दरअसल, यह ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ नहीं बल्कि सरकारी मशीनरी और सरकारी टीवी का खुला दुरुपयोग करके ऐन चुनाव के बीच विपक्ष को कोसने का एक चुनावी भाषण था।
  3. इसके अलावा, 2023 में ही पास हो चुके ‘महिला आरक्षण बिल’ को 3 साल तक ‘डीप फ्रीजर’ में रखकर अब चुनावी मौसम में उसे राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है।
  4. हकीकत में, जब बिलकीस बानो, हाथरस और महिला पहलवानों के मामलों में न्याय की ज़रूरत थी तब ‘नारी शक्ति’ के ये कथित रक्षक पूरी तरह खामोश क्यों बैठे थे?

संपादकीय संदर्भ: ‘रात 8 बजे’ का खौफ, महिला सुरक्षा का सच और चुनाव आयोग की चुप्पी

भारतीय राजनीति में ‘रात 8 बजे’ का समय आम जनता के लिए किसी रहस्य और घबराहट से कम नहीं रहा है। 8 नवंबर 2016 की वह रात जब देश के प्रधानमंत्री ने 8 बजे टीवी पर आकर ‘नोटबंदी’ (Demonetization) का ऐतिहासिक ऐलान किया था, तब से लेकर 2020 के संपूर्ण ‘लॉकडाउन’ (Lockdown) तक, रात 8 बजे के प्रसारण ने हमेशा देश की धड़कनें बढ़ाई हैं। जब भी यह खबर आती है कि प्रधानमंत्री ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ देने वाले हैं, तो देश का हर नागरिक अपनी जेब, अपनी यात्रा की टिकटें और राशन के डिब्बे टटोलने लगता है कि पता नहीं अब कौन सा नया नियम लागू होने वाला है। लेकिन, हाल ही में जब प्रधानमंत्री रात 8 बजे टीवी पर प्रकट हुए, तो कोई ऐसा फरमान नहीं आया जिसने जनता को लाइनों में खड़ा किया हो; बल्कि यह महज़ विपक्ष को कोसने और ‘महिला आरक्षण बिल’ पर राजनीतिक लाभ लेने का एक चुनावी भाषण बनकर रह गया। इसी दिलचस्प और हास्यास्पद विडंबना पर ‘लोक लहर’ के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा जी ने अपना यह प्रखर व्यंग्य लिखा है।

लोकतंत्र में ‘व्यंग्य’ (Satire) वह आईना है जो सत्ता के अहंकार और सिस्टम की खामियों को बिना किसी लाग-लपेट के सीधे जनता के सामने रखता है। राजेंद्र शर्मा जी ने अपने इस आलेख में ठीक उसी ‘काले हास्य’ (Dark Humor) का इस्तेमाल किया है। उन्होंने तंज कसते हुए प्रधानमंत्री को “बड्डा वाला थैंक यू” कहा है कि कम से कम इस बार उन्होंने जनता को ताली-थाली पीटने या किसी नई कतार में लगने का टास्क नहीं दिया।

इसके साथ ही, यह आलेख वर्तमान समय की कुछ बेहद चुभती हुई सच्चाइयों को भी बेनकाब करता है। महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम), जिसे 2023 में ही संसद के दोनों सदनों ने लगभग सर्वसम्मति से पास कर दिया था, उसे अचानक पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के अहम विधानसभा चुनावों के बीच ‘डीप फ्रीजर’ से बाहर निकालकर राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना सत्ता की ‘चुनावी टाइमिंग’ पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लेखक ने बड़ी ही बेबाकी से सवाल उठाया है कि यदि सत्ताधारी दल को महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों की इतनी ही चिंता है, तो वह तब क्यों चुप रहा जब गुजरात में बिलकीस बानो के दोषियों को रिहा कर उन्हें फूल-मालाएं पहनाई गईं? हाथरस की बेटी, उन्नाव, और दिल्ली की सड़कों पर न्याय के लिए संघर्ष कर रही महिला पहलवानों के समय यह ‘नारी वंदन’ का संकल्प कहाँ सो रहा था?

यह आलेख केवल एक भाषण की आलोचना नहीं है, बल्कि यह भारत के ‘चुनाव आयोग’ (Election Commission) की उस खामोशी पर भी गहरा प्रहार है, जो विपक्ष की हर छोटी बात पर नोटिस जारी कर देता है, लेकिन सत्ता पक्ष द्वारा सरकारी मशीनरी और सरकारी टीवी चैनलों के खुले दुरुपयोग पर “बापू के तीन बंदरों” की तरह आंख, कान और मुंह बंद करके बैठा रहता है। आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) अब महज़ एक ऐसा कागज़ी शेर बन गई है जो सिर्फ विपक्ष को डराने के काम आता है, जबकि सत्ताधारी दल बेखौफ होकर चुनावी रैलियों और टीवी संबोधनों का बेजा इस्तेमाल करता है। पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा जी का यह 100% मूल और बेहद मारक व्यंग्य आलेख:

राजनैतिक व्यंग्य-समागम बोलेंगे तो बोलोगे कि बोलते हैं! : राजेंद्र शर्मा

थैंक यू मोदी जी। ऐसा-वैसा नहीं, बड्डा वाला थैंक यू। आप रात आठ बजे के बाद टीवी पर प्रकट भी हुए, आधा घंटा बोले भी, पर वही विरोधियों के पाप गिनाने और उन्हें श्राप देने पर ही भाषण खत्म हो गया। सच पूछिए तो हम तो सांसें रोककर आखिर-आखिर तक इंतजार करते ही रह गए कि अब आयी नोटबंदी की घोषणा, अब आया लॉकडॉउन का एलान, पर कुछ भी नहीं आया।

यूं ही विपक्ष को गरियाने में आपका बोल-बचन का सारा कोटा खाली हो गया। और तो और, आपने तो इस बार ताली-थाली बजाने या दीया-बाती करने का टॉस्क तक नहीं दिया। सच पूछिए तो पहले तो हमें यकीन ही नहीं हुआ कि रात आठ बजे के बाद आप टीवी पर प्रकट भी हो गए और फिर भी अगली सुबह से हमें न तो किसी नयी लाइन में लगना है और न शहरों से जान बचाकर गांवों की ओर भागना है। यहां हम रसोई गैस की लाइनों और रसोई गैस की किल्लत के मारे मजदूरों-वजदूरों के गांवों की ओर भागने की बात नहीं कर रहे हैं। और दिल्ली-एनसीआर में मजदूरों के आंदोलन-वांदोलन करने पर उतर आने की बात तो हम हर्गिज-हर्गिज नहीं कर रहे हैं। आप तो पहले ही कह चुके थे कि वह सब तो चंगा सी! दिक्कत देखे, सो शहरी नक्सल या पाकिस्तानी।

सो बहुत-बहुत थैंक यू मोदी जी, रात आठ बजे के बाद टीवी पर आकर भी, सिर्फ चुनावी भाषण सुनाकर जान बख्शी कर देने के लिए। वर्ना जब से रात आठ बजे के बाद राष्ट्र के नाम आपके संबोधन के एलान की खबर सुनी थी, तब से दिल में कैसे-कैसे ख्याल आ रहे थे कि पूछो ही मत। खैर! हरेक कार्यकाल में एक का औसत मानें, तब भी प्रधानमंत्री के आपके चालू तीसरे कार्यकाल का नोटबंदी-लॉकडॉउन टाइप का एलान, इस पब्लिक पर उधार रहा!

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पर रात साढ़े आठ बजे टीवी पर आकर भी पब्लिक की इस जान-बख्शी के लिए मोदी जी का धन्यवाद करने की जगह, विपक्षी इसमें भी बाल की खाल निकालने में लगे हैं। और कुछ नहीं मिला, तो विरोध करने का यही बहाना पकड़कर बैठ गए हैं कि यह तो राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री का संबोधन था ही नहीं। माना टीवी पर प्रधानमंत्री की ही तस्वीर थी और विपक्ष के खिलाफ जो भी बक-झक की, प्रधानमंत्री ने ही की थी। लेकिन, यह राष्ट्र के नाम संबोधन तो था ही नहीं। यह तो एक और चुनावी भाषण था और वह भी ऐन चुनावी सीजन में। भाषण भी प्रधानमंत्री का नहीं, आरएसएस के स्वयंसेवक का था, जो प्रधानमंत्री का भेष धरकर टीवी पर आया था। यह तो विपक्ष के खिलाफ प्रचार के लिए, सरकारी पद से लेकर सरकारी टीवी तक के दुरुपयोग का मामला था। यानी विपक्षी, पब्लिक की जान बख्शी को ही मोदी जी का जुर्म बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उसके ऊपर से इसे चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन बताकर, इसके खिलाफ चुनाव आयोग से कार्रवाई की मांग और कर रहे हैं।

शुक्र है कि मोदी जी ने ज्ञानेश कुमार के जरिए चुनाव आयोग की ऐसी सैटिंग की है कि उनका और उनकी पार्टी का नाम आते ही, आयोग बापू के तीन बंदरों का पक्का अनुयाई बन जाता है — न कुछ गलत देखता है, न कुछ गलत सुनता है और गलत के बारे में कुछ बोलने का तो खैर सवाल ही नहीं उठता है। वर्ना आदर्श आचार संहिता के चक्कर में मोदी जी का राष्ट्र के नाम तो क्या, चुनावी सभाओं में संबोधन भी मुश्किल हो जाता!

और मोदी जी ने साढ़े आठ बजे टीवी पर आकर जो बोला, उसको भी तो देखिए! नारी शक्ति की उड़ान रोकने का विपक्ष ने जो पाप किया है, उसका क्या? महिला आरक्षण की भ्रूण हत्या का पाप! हमें पता है कि विपक्ष वाले इसमें भी कोई न कोई टेक्निकल पेंच डालकर, इस पाप का दोष भी उल्टे मोदी जी पर ही डालने की कोशिश करेंगे। बल्कि उन्होंने तो कहना भी शुरू कर दिया है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों के आरक्षण का कानून तो 2023 में ही बन चुका था और करीब-करीब एक राय से बन चुका था। बल्कि उसी समय विपक्ष ने, इस आरक्षण को तुरंत लागू कराने की मांग भी की थी और इसके लिए, इस आरक्षण के लागू होने से पहले 2026 के बाद की जनगणना और उसके बाद परिसीमन के पूरे होने की शर्त जोड़े जाने का विरोध किया था। विपक्ष की मानी जाती तो, 2024 के आम चुनाव से ही एक-तिहाई महिला आरक्षण लागू हो सकता था। पर तब मोदी जी-शाह जी की जोड़ी राजी পণ্ডিত नहीं हुई। अब तीन साल बाद उनको इस कानून की याद आयी है और नारी वंदन अधिनियम के लागू होने में देरी के नाम पर आंसू बहा रहे हैं!

एक सेकुलरवादी लेखिका ने तो मोदी जी के मामले में यह जानते हुए बॉयोलॉजी घुसा दी कि मोदी जी ठहरे नॉन-बायोलॉजीकल। कह रही हैं कि तीन साल पहले जो बच्चा पैदा हो चुका था, उसकी तीन साल बाद भ्रूण हत्या कैसे हो सकती है? जैसे उन्हें पता ही नहीं हो कि मोदी-शाह की पार्टी के पास वाशिंग मशीन ही नहीं है, डीप फ्रीजर भी है। जो अधिनियम 2023 में संसद के दोनों सदनों में लगभग एक राय से पास हुआ था, उसे मोदी-शाह की सरकार ने उसी डीप फ्रीजर में सुरक्षित रखा हुआ था और संसद में इस विशेष चर्चा के दौरान ही लागू करने के एलान के लिए बाहर निकाला था। तीन साल का हो गया तो क्या हुआ, डीप फ्रीजर में रहने से वह रहा तो भ्रूण का भ्रूण ही या ज्यादा तकनीकी ही होना है, तो नवजात कह लो। मोदी जी की नजरों में और करोड़ों माताओं-बहनों की नजरों में तो यह भ्रूण हत्या ही है。

अब प्लीज कोई ये मत कहना कि अगर मोदी जी को नारी वंदन की इतनी ही चिंता है, तो मोदी जी तब क्यों नहीं बोले, जब उनकी डबल इंजन सरकार के आशीर्वाद से बिलकीस बानो के दोषियों को माफी दिलाने के बाद, फूल मालाएं पहनाकर गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान स्वागत किया गया। या जब उनके अपने चुनाव क्षेत्र, वाराणसी में विश्वविद्यालय की छात्रा के भाजपायी-संघी बलात्कारियों का जमानत पर छूटने पर स्वागत किया गया? या हाथरस की बच्ची के मामले में। या सेंगर के मामले में। या महिला पहलवानों के मामले में। या राम-रहीम को बार-बार जेल से छोड़े जाने पर। या आसाराम की जमानत पर जमानत पर। या एप्सटीन फाइल पर। या जसोदा बेन के अधिकारों पर। सिंपल है, पहले नहीं बोलने से क्या हुआ? मोदी अब तो बोल रहे हैं। नारी शक्ति की उड़ान के लिए दरवाजे तोड़ रहे हैं! तमिलनाडु और बंगाल की माताएं और बहनें, मोदी जी की पहले की चुप्पी याद रखेंगी या अब उनके बोलने पर वोट देंगी?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोक लहर’ के संपादक हैं।)

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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