जब कानून कागज़ पर रहे और सड़क पर खून बहे! सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सड़क सुरक्षा पर डॉ. संजय चतुर्वेदी का विशेष आलेख

आर्टिकल Desk, Taj News | Sunday, April 19, 2026, 05:30:00 PM IST

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Dr Sanjay Chaturvedi Writer
डॉ. संजय चतुर्वेदी
वरिष्ठ स्तंभकार
एवं पूर्व सदस्य, सड़क सुरक्षा समिति
जिला सड़क सुरक्षा समिति (आगरा) के पूर्व सदस्य और वरिष्ठ स्तंभकार डॉ. संजय चतुर्वेदी ने अपने इस बेहद मार्मिक और तीखे आलेख में भारतीय राजमार्गों पर रोज़ाना बह रहे खून और प्रशासनिक विफलता की कड़वी हकीकत बयां की है। दरअसल, उन्होंने 13 अप्रैल 2026 के सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा आदेशों का हवाला देते हुए बताया है कि कैसे नियम और कानून सिर्फ कागज़ों पर दम तोड़ रहे हैं, जबकि बेतरतीब खड़े ट्रक और अवैध ढाबे लोगों की जान ले रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने डीएम और एसपी की जवाबदेही तय करने वाले इस नए आदेश पर बहुत गहरी रोशनी डाली है। इसलिए, बिना किसी देरी के पढ़िए यह झकझोर देने वाला विश्लेषण:
HIGHLIGHTS
  1. साल 2023 में भारत में सड़क दुर्घटनाओं में 1 लाख 72 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए, यानी हमारे देश की सड़कों पर हर दिन 474 ज़िंदगियां खत्म हो रही हैं।
  2. दरअसल, राष्ट्रीय राजमार्ग देश की कुल सड़कों का केवल 2% हैं, लेकिन सड़क हादसों में होने वाली कुल मौतों का लगभग 30% हिस्सा इन्हीं हाईवे पर होता है।
  3. इसके अलावा, 13 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा आदेश जारी करते हुए हाईवे के किनारे चल रहे सभी अवैध ढाबों और दुकानों को 60 दिन में हटाने का निर्देश दिया है।
  4. हकीकत में, समस्या कानूनों की कमी में नहीं, बल्कि उन्हें लागू करने वाली प्रशासनिक इच्छाशक्ति में है; अब सुप्रीम कोर्ट ने सीधे डीएम और एसपी को इसके लिए जवाबदेह बनाया है।

संपादकीय संदर्भ: भारतीय सड़कों पर बहता खून और सिस्टम की खामोशी

भारत में सड़क दुर्घटनाएं अब महज़ एक आँकड़ा बनकर रह गई हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) की वार्षिक रिपोर्टें चीख-चीख कर गवाही देती हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाओं में मौतें भारत में होती हैं। हर साल लगभग 1.5 से 2 लाख लोग इन जानलेवा हादसों का शिकार होते हैं। यह संख्या किसी युद्ध, आतंकवादी हमले या महामारी में मारे गए लोगों से कहीं अधिक है। यह एक मूक महामारी है जो रोज़ाना हमारी सड़कों पर तांडव कर रही है, लेकिन हमारा सिस्टम इसके प्रति पूरी तरह से सुन्न हो चुका है।

सबसे दुखद और भयावह पहलू यह है कि इन सड़क हादसों में मरने वालों में सबसे बड़ी संख्या 18 से 45 वर्ष के युवाओं की होती है, जो अक्सर अपने परिवारों के एकमात्र कमाने वाले होते हैं। जब कोई व्यक्ति सड़क हादसे में मारा जाता है, तो सिर्फ एक जान नहीं जाती, बल्कि पूरा का पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से तबाह हो जाता है। बच्चे अनाथ हो जाते हैं, और बूढ़े मां-बाप अपनी बुढ़ापे की लाठी खो बैठते हैं। यह एक ऐसा राष्ट्रीय नुकसान है जिसकी भरपाई किसी भी मुआवज़े से नहीं की जा सकती।

आखिर इन दर्दनाक हादसों का जिम्मेदार कौन है? क्या केवल तेज़ रफ्तार, ओवरटेक करने की होड़ या शराब पीकर गाड़ी चलाना ही मुख्य कारण है? नहीं। असली बीमारी हमारे उस ‘प्रशासनिक सिस्टम’ में है, जहाँ नियम तो बहुत हैं, लेकिन उनका पालन कराने वाली इच्छाशक्ति ‘कोमा’ में है। राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways) पर बिना इंडिकेटर या रिफ्लेक्टर के बेतरतीब खड़े भारी ट्रक, ब्लैक स्पॉट्स (दुर्घटना-प्रवण क्षेत्र) की बरसों तक अनदेखी, टूटी हुई सड़कें, और राजमार्गों के किनारे अवैध रूप से खुले ढाबे—ये सभी मौत के साक्षात निमंत्रण हैं। इन ढाबों के बाहर खड़े भारी वाहन हाईवे की लेन घेर लेते हैं, जिससे रात के अंधेरे में तेज़ रफ्तार गाड़ियां सीधे मौत के मुंह में समा जाती हैं।

चिकित्सा विज्ञान में ‘गोल्डन आवर’ (Golden Hour) का बहुत महत्व है—यानी दुर्घटना के बाद का वह पहला एक घंटा, जिसमें त्वरित चिकित्सा सहायता मिलने पर पीड़ित की जान बचाई जा सकती है। लेकिन भारत में अक्सर यह कीमती समय एम्बुलेंस के इंतज़ार, टोल प्लाज़ा के जाम और पुलिसिया कार्यवाही के डर में बर्बाद हो जाता है। हालांकि सरकार ने ‘गुड सेमेरिटन लॉ’ (Good Samaritan Law) लागू किया है, ताकि सड़क हादसों में घायलों की मदद करने वाले फरिश्तों को पुलिस या अस्पताल वाले परेशान न करें, लेकिन ज़मीनी स्तर पर भारी अज्ञानता और पुलिस के पुराने अड़ियल रवैये के कारण आज भी लोग सड़क पर तड़पते व्यक्ति की मदद करने से कतराते हैं।

सुप्रीम कोर्ट बार-बार कड़े निर्देश जारी करता है। हर जिले में ‘जिला सड़क सुरक्षा समितियां’ कागज़ों पर बनती हैं, बैठकों के मिनट्स औपचारिकता के लिए वेबसाइट पर अपलोड होते हैं, लेकिन ज़मीन पर गड्ढे, अवैध कट और मौत के मुहाने वैसे ही खुले रहते हैं। इसी गहरी प्रशासनिक विफलता और न्यायपालिका के ताज़ा कड़े आदेशों (13 अप्रैल 2026) पर, आगरा जिला सड़क सुरक्षा समिति के पूर्व सदस्य और वरिष्ठ स्तंभकार डॉ. संजय चतुर्वेदी ने अपना एक अत्यंत मारक और पीड़ादायक आलेख लिखा है। यह आलेख सिर्फ एक वैधानिक टिप्पणी नहीं, बल्कि हमारे सोए हुए प्रशासन और नागरिक समाज के लिए एक अंतिम ‘वेक-अप कॉल’ (Wake-up Call) है। पढ़िए डॉ. संजय चतुर्वेदी का यह 100% मूल और प्रामाणिक आलेख:

जब कानून कागज़ पर रहे और सड़क पर खून बहे
— डॉ. संजय चतुर्वेदी, आगरा

एक पल के लिए सोचिए। आप रात को किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर जा रहे हैं। अचानक सामने एक बड़ा ट्रक बिना लाइट के सड़क के बीचोबीच खड़ा है। बचने का मौका नहीं मिलता। हादसा हो जाता है। एम्बुलेंस के लिए फोन करते हैं, कोई जल्दी नहीं आती। घंटों इंतज़ार। और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यह कोई कल्पना नहीं है। यह भारत की सड़कों पर हर रोज़ घटने वाली सच्चाई है ।

साल 2023 में भारत में सड़क दुर्घटनाओं में एक लाख बहत्तर हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए । यानी हर दिन चार सौ चौहत्तर लोग, हर घंटे उन्नीस ज़िंदगियाँ। इनमें से पैंतीस हज़ार से ज़्यादा पैदल चलने वाले थे — वे लोग जो बस सड़क पार कर रहे थे या फुटपाथ पर चल रहे थे । चौवन हज़ार से ज़्यादा दुपहिया वाहन सवार केवल इसलिए मारे गए क्योंकि उन्होंने हेलमेट नहीं पहना था । सुप्रीम कोर्ट ने खुद अपने आदेश में कहा है कि ये मौतें टाली जा सकती थीं。
इन्हीं हालात को देखते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने तेरह अप्रैल दो हज़ार छब्बीस को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया । अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय राजमार्ग देश की कुल सड़कों का केवल दो प्रतिशत हैं, लेकिन इन पर सड़क दुर्घटना में होने वाली कुल मौतों का लगभग तीस प्रतिशत हिस्सा है । इसकी वजह है हाईवे पर बेतरतीब खड़े ट्रक, अवैध ढाबे और दुकानें, टूटी या अनुपस्थित लाइटें, दुर्घटनास्थल पर समय पर न पहुँचने वाली एम्बुलेंस, और ढीली प्रशासनिक निगरानी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जीवन का अधिकार हमारे संविधान की गारंटी है और सुरक्षित सड़क उसी गारंटी का एक अनिवार्य हिस्सा है । अदालत के शब्दों में, कोई भी प्रशासनिक या वित्तीय बाधा मानव जीवन की पवित्रता से ऊपर नहीं हो सकती。

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इस आदेश में सरकार और उसकी एजेंसियों को स्पष्ट समयसीमा में अनेक काम करने को कहा गया है । पंद्रह दिन के भीतर हर उस जिले में एक जिला राजमार्ग सुरक्षा टास्क फोर्स बनानी होगी जहाँ से राष्ट्रीय राजमार्ग गुज़रता है। तीस दिन में हाईवे किनारे दिए गए अवैध लाइसेंस और परमिट की समीक्षा करनी होगी। पैंतालीस दिन में दुर्घटना-प्रवण स्थानों की पूरी सूची सार्वजनिक करनी होगी। साठ दिन में राजमार्ग के आरक्षित क्षेत्र में बने सभी अवैध ढाबे और दुकानें हटानी होंगी। साठ दिन में हर पचहत्तर किलोमीटर पर एम्बुलेंस और रिकवरी क्रेन तैनात करनी होगी। और पचहत्तर दिन में सीधे सुप्रीम कोर्ट को जिलेवार अनुपालन रिपोर्ट देनी होगी。
लेकिन यहीं रुककर एक ज़रूरी सवाल पूछना चाहिए। क्या यह पहला कानून है? क्या यह पहला आदेश है? क्या यह पहली समिति है? नहीं
सन दो हज़ार सत्रह में सरकार ने देश के हर जिले में जिला सड़क सुरक्षा समिति गठित की थी, जिसमें कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, लोक निर्माण विभाग और NHAI के अधिकारी शामिल होने थे, और हर तीन महीने में बैठक होनी थी। सन दो हज़ार अठारह में सुप्रीम कोर्ट की एक निगरानी समिति ने सभी राज्यों को आदेश दिया कि सड़क मौतें हर साल कम से कम दस प्रतिशत कम करो, एम्बुलेंस का नक्शा बनाओ, हेलमेट के लिए वार्षिक लक्ष्य तय करो, और हाईवे पेट्रोलिंग सुनिश्चित करो। सन दो हज़ार बाईस में सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे की अध्यक्षता में बनी सुप्रीम कोर्ट समिति ने जिला समितियों को और मजबूत करते हुए पाक्षिक बैठकें अनिवार्य कीं, बैठकों के मिनट्स अड़तालीस घंटों के भीतर वेबसाइट पर डालने के निर्देश दिए, और आपातकालीन चिकित्सा योजना तैयार करने को कहा। अक्टूबर दो हज़ार पच्चीस में सुप्रीम कोर्ट ने फिर एक आदेश जारी किया जिसमें फुटपाथ ठीक करने, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग बनाने और हेलमेट को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए गए । और अब अप्रैल दो हज़ार छब्बीस में एक और आदेश。

हर आदेश इसलिए आया क्योंकि पिछला लागू नहीं हुआ ।

यह तथ्य हमें उस केंद्रीय प्रश्न तक ले जाता है जिससे हम बार-बार आँखें चुराते हैं। समस्या कानून में नहीं है। समस्या कानून को लागू करने की इच्छाशक्ति में है । हमारे पास मोटर वाहन अधिनियम है, उसका संशोधित रूप है, भारतीय सड़क कांग्रेस के विस्तृत दिशानिर्देश हैं, राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा नीति है, सुप्रीम कोर्ट के अनेक आदेश हैं, जिला समितियाँ हैं, निगरानी समितियाँ हैं। लेकिन सड़क पर आज भी अवैध पार्किंग है, ढाबे हाईवे के किनारे अनाधिकृत रूप से चल रहे हैं, दुर्घटना-प्रवण स्थान वर्षों से चिन्हित हैं पर ठीक नहीं हुए, आपातकालीन नंबर 1033, 108 और 112 अलग-अलग काम कर रहे हैं और उनमें कोई समन्वय नहीं है, और दुर्घटना का आँकड़ा अधूरा दर्ज होता है जो नीतिगत सुधार के किसी काम नहीं आता ।

इस बार सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग रास्ता अपनाया है। उसने केवल निर्देश नहीं दिए, बल्कि अधिकारियों को नाम लेकर जवाबदेह बनाया है । जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक की संयुक्त जिम्मेदारी तय की गई है। सीधे न्यायालय में अनुपालन रिपोर्ट माँगी गई है। अनुपालन न होने पर न्यायालय की अवमानना की संभावना खुली हुई है। यह इसलिए हुआ क्योंकि अदालत समझ चुकी है कि आदेश देना पर्याप्त नहीं है, उसे करवाना भी ज़रूरी है。

और यहाँ आम नागरिक की भी एक भूमिका है। अगर आपके इलाके में हाईवे के किनारे कोई अवैध ढाबा या दुकान है तो NHAI की शिकायत पोर्टल राजमार्ग यात्रा पर या 1033 पर सूचना दें। अगर सड़क पर कोई दुर्घटना हो और आप वहाँ हों तो घायल की मदद करें, क्योंकि कानून आपकी रक्षा करता है। अगर कोई बिना हेलमेट के चला रहा है तो समझाएँ। अपने जिले की सड़क सुरक्षा समिति की बैठकों की जानकारी माँगें क्योंकि यह आपका अधिकार है。

हर बार जब कोई सड़क हादसे में जाता है तो एक पूरा परिवार टूट जाता है। एक बच्चे का पिता चला जाता है। एक बूढ़े माँ-बाप का सहारा छिन जाता है। एक घर का दीपक बुझ जाता है। और यह सब टाला जा सकता था。

कानून है। अदालत का आदेश है। समितियाँ हैं। जागरूकता आ रही है। बस एक चीज़ चाहिए कि यह सब कागज़ों से उठकर सड़क पर उतरे। क्योंकि हर वह मौत जो रोकी जा सकती थी, एक ही सवाल छोड़ जाती है — हम कब जागेंगे ?

संलग्न: माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिनांक 13 अप्रैल 2026, Suo Moto Writ Petition Civil No. 9/2025

डॉ. संजय चतुर्वेदी
पूर्व सदस्य, जिला सड़क सुरक्षा समिति, आगरा
1/188, दिल्ली गेट, आगरा, उत्तर प्रदेश
मोबाइल: 9412261575
ईमेल: drsanjaychaturvedi@gmail.com

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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