Article Desk, 🌐 tajnews.in | Tuesday, 28 July, 2026, 04:15:00 PM IST.


धर्मेंद्र प्रधान की विदाई से आरएसएस की शिक्षा परियोजना को बड़ा झटका
— सीमा चिश्ती
1967 में जब आरएसएस ने अपने राजनीतिक संगठन भारतीय जनसंघ के माध्यम से पहली बार सत्ता के गलियारों में प्रवेश किया और कुछ उत्तर भारतीय राज्यों में समाजवादियों के साथ संयुक्त विधायक दल (संविद) सरकारों का हिस्सा बना, तभी से उसका पहला और प्राथमिक लक्ष्य शिक्षा मंत्रालय पर अपना नियंत्रण स्थापित करना रहा। संघ परिवार इस ऐतिहासिक सत्य को बहुत अच्छी तरह समझता था कि देश की पाठ्यपुस्तकों और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के ज़रिए समाज पर दीर्घकालिक वैचारिक प्रभाव किस तरह स्थापित किया जा सकता है। यही वजह थी कि स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, जो राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेता, प्रख्यात विद्वान और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष थे, का उस शीर्ष पद पर होना आरएसएस के लिए हमेशा एक गहरी वैचारिक कसक का विषय बना रहा।
हालांकि इंदिरा गांधी की सरकार ने भी 1975 के आपातकाल के दौरान शिक्षा को राज्यों के विशेष अधिकार क्षेत्र (राज्य सूची) से निकालकर समवर्ती सूची में डालकर उसे अधिक केंद्रीकृत करने की दिशा में बड़ा नीतिगत कदम उठाया था, लेकिन ऐसा करने के पीछे आरएसएस के वैचारिक कारण उससे बिल्कुल अलग और कहीं अधिक स्पष्ट व दूरगामी हैं।
यह वैचारिक आग्रह 2002 में भाजपा के नेतृत्व वाली पहली एनडीए सरकार के दौरान साफ़ तौर पर सामने आया, जब स्कूली पाठ्यपुस्तकों में किए गए बड़े बदलावों को लेकर देशभर के शिक्षाविदों में भारी विवाद खड़ा हो गया और मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ तक पहुंचा। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि नया नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (NCF) भारत के धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी सिद्धांत का उल्लंघन करता है और इसे केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (सीएबीई) से विधिवत परामर्श किए बिना तैयार किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि भले ही सीएबीई की भूमिका मुख्य रूप से सलाहकार है, लेकिन पूर्व स्थापित लोकतांत्रिक परंपरा के अनुसार उससे अनिवार्य परामर्श किया जाना चाहिए, ताकि शिक्षा के विकास से जुड़े संवेदनशील मामलों में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर संवैधानिक समन्वय बना रहे।
उस दौर में देश के शिक्षा मंत्री कौन थे? भाजपा के सबसे प्रभावशाली कद्दावर नेताओं में गिने जाने वाले और पार्टी के दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके डॉ. मुरली मनोहर जोशी।
अब आइए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के तेरहवें वर्ष की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर। इस दौर में आरएसएस की व्यापक वैचारिक परियोजना में धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक थी। भाजपा संगठन के भीतर उन्हें कई रणनीतिक कारणों से एक अत्यंत अहम नेता माना जाता था। वे पार्टी अध्यक्ष पद के लिए सबसे संभावित और मजबूत ओबीसी चेहरा थे, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से कठिन राज्यों के प्रभारी थे, और ओडिशा में, जहां हाल ही में भाजपा ने ऐतिहासिक सरकार बनाई है, भविष्य के संभावित मुख्यमंत्री के रूप में भी देखे जा रहे थे। ऐसे में उनका इस तरह अचानक और अपमानजनक ढंग से केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर होना भाजपा के भावी नेतृत्व ढाँचे के लिए निश्चित रूप से बड़ा झटका है, लेकिन इससे भी कहीं अधिक गहरा और जानलेवा असर आरएसएस के दीर्घकालिक वैचारिक एजेंडे पर पड़ा है।
यही मुख्य वजह थी कि संघ के संस्कारों में रचे-बसे धर्मेंद्र प्रधान, जिनके पिता भी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके थे, मोदी सरकार के दौर में सबसे लंबे समय तक केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालते रहे। संघ नेतृत्व को उन पर पूरा अटूट भरोसा था कि वे देश के शिक्षा क्षेत्र में संघ के पूरे वैचारिक एजेंडे को पूरी निष्ठा, सतर्कता और कठोरता के साथ धरातल पर लागू करेंगे।
सड़कों और जंतर-मंतर पर उतरे आंदोलित प्रदर्शनकारियों के लिए धर्मेंद्र प्रधान भले ही एक व्यक्तिगत प्रतीक बन गए थे, लेकिन युवाओं का यह व्यापक आंदोलन दरअसल उस पूरी शिक्षा नीति के ख़िलाफ़ था, जिसे संघ-भाजपा देश भर में थोपना चाहती है। इस ऐतिहासिक छात्र आंदोलन ने भाजपा की उस व्यापक परियोजना की पोल खोलकर रख दी, जिसके तहत वह एक ऐसी नई शैक्षिक व्यवस्था खड़ी करना चाहती है, जहां आईआईटी जैसे शीर्ष तकनीकी संस्थानों में इंडियन नॉलेज सिस्टम (IKS) पर अत्यधिक ज़ोर दिया जाए, छात्र गलगोटिया जैसे निजी व्यावसायिक विश्वविद्यालयों में महँगी फीस भरकर पढ़ें, तकनीक के आकर्षक नारों को दोहराएं और तकनीक के प्रति केवल औपचारिक प्रतिबद्धता जताएं, जबकि वास्तविक विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जानबूझकर पीछे धकेला जाए। ऐसी व्यवस्था में तर्क, विवेक और वैज्ञानिक सोच की बुनियादी नींव को व्यवस्थित ढंग से संघ की वैचारिक प्राथमिकताओं से प्रतिस्थापित किया जाता है।
इस मॉडल में स्वतंत्र और लोकतांत्रिक छात्र संगठनों को या तो व्यावहारिक रूप से परिसरों से बेदखल कर दिया जाता है या उनके रोजमर्रा के कामकाज को प्रशासनिक दमन से हतोत्साहित किया जाता है, जिससे देश के विश्वविद्यालयों में पैदा हुए खाली स्थान पर लगभग पूरी तरह आरएसएस से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का एकछत्र वर्चस्व स्थापित हो जाए। विवादित राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 पर शुरुआत से ही यह गंभीर आरोप रहा है कि वह राज्यों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करती है। धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व वाले शिक्षा मंत्रालय ने तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे गैर-भाजपा शासित राज्यों पर अपनी नीतियां स्वीकार कराने के लिए केंद्रीय वित्तीय अनुदानों को आर्थिक दबाव के एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया। इसके अलावा, उनके पूरे कार्यकाल में देश भर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों (VCs) की नियुक्तियां भी लगातार ऐसे लोगों में से की गईं, जिनका सीधा संबंध आरएसएस के वैचारिक दायरे और शाखाओं से माना जाता है। इनमें से कई कुलपतियों की नियुक्तियां भारी शैक्षणिक विवादों में भी रहीं।
इस बड़े वैचारिक बदलाव के साथ-साथ समाज के शोषित व हाशिये पर मौजूद समुदायों के विद्यार्थियों और समूची सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के लिए मिलने वाली वित्तीय सहायता में भी योजनाबद्ध तरीके से भारी कटौती की गई है। मोदी सरकार के पिछले एक दशक के दौरान अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी छात्रों के लिए मिलने वाली राष्ट्रीय छात्रवृत्तियों का बजट लगातार और योजनाबद्ध तरीके से घटाया गया है। हाल ही में केंद्र सरकार ने यह भी आधिकारिक घोषणा की कि वह विज्ञान के मेधावी छात्रों के लिए वर्षों से सफलता पूर्वक चलाई जा रही ‘इंस्पायर-एसएचई’ (INSPIRE-SHE) छात्रवृत्ति योजना को आगे जारी नहीं रखेगी। इस ऐतिहासिक योजना ने विज्ञान के क्षेत्र में उच्च अनुसंधान और शिक्षा हासिल करने का सपना देखने वाले देश के हजारों गरीब विद्यार्थियों को अब तक संबल प्रदान किया था।
सार्वजनिक शिक्षा पर सरकारी बजटीय खर्च में लगातार आई गिरावट पर देश के अर्थशास्त्रियों द्वारा काफी कुछ लिखा जा चुका है। हाल ही में प्रसिद्ध आर्थिक विश्लेषक उदित मिश्रा ने प्रामाणिक आंकड़ों के साथ विस्तार से दिखाया कि केंद्र सरकार की खर्च संबंधी प्राथमिकताओं में शिक्षा लगभग सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है। उनके अनुसार, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से कुल केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय की हिस्सेदारी घटकर लगभग आधी रह गई है। यह 2013-14 में कुल बजट का 4.6 प्रतिशत थी, जो लगातार सिमटते हुए 2025-26 के बजट में घटकर मात्र 2.5 प्रतिशत ही रह गई।
स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में शिक्षा को हमेशा सामाजिक समानता और आर्थिक उन्नति का सबसे महत्वपूर्ण व पवित्र माध्यम माना गया है। लेकिन मोदी सरकार के दौरान आरएसएस के वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की हड़बड़ी में इस पारदर्शी रास्ते को लगभग पूरी तरह बंद कर दिया गया है। इस भयावह स्थिति को सरकार की कई संस्थागत विफलताओं ने और अधिक गंभीर बना दिया। इनमें देश भर में एक के बाद एक लगातार हो रहे प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक (Paper Leaks), राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) जैसी नई और गैर-जवाबदेह संस्थाओं द्वारा अत्यधिक केंद्रीकृत परीक्षा व्यवस्था का लगातार कुप्रबंधन, और वर्षों तक केंद्र व राज्यों में लाखों खाली पड़े सरकारी पदों पर भर्तियां न निकालना तथा नियमित प्रवेश व भर्ती परीक्षाओं का आयोजन न होना मुख्य रूप से शामिल है।
भारतीय सशस्त्र बलों में मिलने वाली स्थायी, पेंशनयुक्त और सुरक्षित नौकरी की जगह ‘अग्निवीर’ योजना जबरन लागू किए जाने के बाद, जिसे देश का ग्रामीण युवा अपने स्वर्णिम भविष्य के एक सबसे भरोसेमंद विकल्प के रूप में देखता था, शिक्षा और रोजगार का सवाल, जो पहले से ही बारूद का ढेर बना हुआ था, अब व्यापक और उग्र जन-असंतोष का एक मुख्य राष्ट्रीय मुद्दा बन गया।
धर्मेंद्र प्रधान के अचानक हुए इस्तीफे और दिल्ली की सड़कों पर उमड़े अभूतपूर्व युवा जनसैलाब के बाद अब आरएसएस के सामने सबसे बड़ा और अस्तित्वगत खतरा यह खड़ा हो गया है कि भारत में शिक्षा को लेकर उसकी दशकों पुरानी पूरी परियोजना और आने वाली नई पीढ़ियों को नीतिगत बदलावों के ज़रिये अपने कट्टर वैचारिक ढांचे में ढालने की उसकी योजना ही पूरी तरह पटरी से उतर सकती है। आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व के लिए धर्मेंद्र प्रधान का वास्तविक महत्व यही था, इसीलिए उनके विवादित कार्यकाल और उनके फैसलों का खुलकर बचाव करने के लिए आरएसएस और भाजपा के शीर्ष नेता लगातार उनके समर्थन में बयानबाजी करते दिख रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 का हवाला देते हुए संघ के नेताओं के घबराहट भरे बयान और सोशल मीडिया पोस्ट इसी हताश कोशिश का हिस्सा हैं कि किसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में संघ की इस ‘हिंदुत्व परियोजना’ को ध्वस्त होने से बचाया जा सके, इससे पहले कि नीट प्रश्नपत्र लीक का जिन्न और मौजूदा राष्ट्रव्यापी जनआक्रोश इस पूरी वैचारिक संरचना को हमेशा के लिए मटियामेट कर दे। संघ परिवार को आज सबसे बड़ा डर यह सता रहा है कि देश की नई ‘जेन-ज़ी’ (Gen-Z) पीढ़ी हिंदुत्व की उसकी इस संकीर्ण वैचारिक परियोजना को ही सिरे से खारिज कर रही है। यह आधुनिक पीढ़ी उन तमाम राजनीतिक कोशिशों को ठुकरा रही है, जिनके ज़रिये उसे बिना किसी स्वतंत्र सोच, तर्क और अपनी मौलिक भूमिका के, केवल अतीत के मिथकों का आज्ञाकारी वाहक बनाकर गढ़ने की कोशिश की जा रही है।
देश भर की सड़कों पर उमड़े इस व्यापक और अप्रत्याशित जनाक्रोश के बीच मोदी सरकार को अपूरणीय राजनीतिक नुकसान से बचाने के लिए मजबूरन धर्मेंद्र प्रधान की बलि देनी पड़ी। लेकिन उनके पद से हटने के बाद अब आरएसएस की समूची शिक्षा परियोजना पर ही गंभीर और असहज करने वाले सवाल खड़े हो गए हैं। धर्मेंद्र प्रधान का यह इस्तीफा आरएसएस की दूरगामी योजनाओं के लिए एक बहुत बड़े झटके की केवल शुरुआत साबित हो सकता है। यही वजह है कि संघ और भाजपा के नेता संकट प्रबंधन के तहत उनके कार्यकाल के कामकाज की खुलकर झूठी प्रशंसा कर रहे हैं, जबकि उनकी तमाम ऐतिहासिक विफलताओं और पेपर लीक घोटालों को केवल ‘प्रशासनिक चूक’ बताकर खारिज करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन अब दिल्ली से लेकर देश के दूर-दराज के इलाकों तक ज़मीनी हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। आरएसएस और भाजपा जिस डरावनी स्थिति से पिछले कई दशकों से सबसे अधिक डरते रहे हैं, वह अब सड़कों पर मूर्त रूप लेती दिखाई दे रही है—एक ऐसा अनुशासित और बेखौफ युवा आंदोलन, जिसे एक दंभी केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे ने और अधिक नैतिक शक्ति और आत्मविश्वास प्रदान कर दिया है। अब यह पूरा अंदेशा है कि देश का यह आंदोलित युवा वर्ग केवल किसी मंत्री के इस्तीफे या मामूली प्रशासनिक सुधारों से कतई संतुष्ट नहीं होगा, बल्कि भारत की समूची ध्वस्त हो चुकी शिक्षा व्यवस्था में एक निर्णायक ‘संपूर्ण क्रांति’ की बुलंद मांग करने लगा है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।
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Pawan Singh
7579990777




