न पत्थर का बनेगा, न रबड़ का बनेगा;
वायदों से बना है, हवाई बांध बनेगा
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शिलान्यास पर शिलान्यास, बैराज अब भी लापता !!
ताज के साए में यमुना सूखती रही, फाइलें चलती रहीं, वादे हर बार हुए, लेकिन काम हर बार अटक गया。
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बृज खंडेलवाल द्वारा
7 मई, 2026
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एक बैराज बनाने के लिए कितने शिलान्यास पत्थर चाहिए?
और कोई दरिया कितनी देर तक इंतज़ार कर सकता है, इससे पहले कि वह बहना ही भूल जाए?
आगरा में इन सवालों के जवाब गर्मियों की धूल की तरह हवा में तैर रहे हैं। तीन शिलान्यास। बरसों की घोषणाएँ। अनगिनत भरोसे। लेकिन ताजमहल के नीचे यमुना पर अब तक एक भी चालू बैराज नहीं।
नदी आज भी लाचार-सी बह रही है। ताज आज भी खामोश तमाशबीन बना खड़ा है। और वादों और हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है。
बरसों से यमुना बैराज परियोजना एक अजीब दोहरी ज़िंदगी जी रही है। कागज़ों में यह फाइलों, प्रस्तावों और सियासी भाषणों में ज़िंदा है। ज़मीन पर इसका कहीं कोई वजूद नहीं है。
यह उस ट्रेन की तरह है जिसकी अनाउंसमेंट तो बार-बार होती है, मगर जो कभी प्लेटफॉर्म पर पहुँचती ही नहीं。
यह सिर्फ देरी नहीं है। यह ढीलापन है। सुस्त रफ्तार, जिद्दी ठहराव, और हैरत की बात यह कि सब इसे सामान्य मान बैठे हैं।
भारत रिकॉर्ड समय में एक्सप्रेसवे बना सकता है। जहाँ कभी नदियाँ दूरी बनाती थीं, वहाँ पुल खड़े हो जाते हैं। जहाँ खेत थे, वहाँ एयरपोर्ट उग आते हैं。
लेकिन दुनिया के सबसे मशहूर स्मारक ताजमहल के पास एक अहम और अपेक्षाकृत सीधी नदी परियोजना आज भी न्यूट्रल गियर में अटकी है।
क्यों?
क्योंकि हमारे निज़ाम को अक्सर काम पूरा करने से ज्यादा रस्म-अदायगी पसंद है। पहले ऐलान करो। जोरदार तालियाँ बटोर लो। बाद में सफाई देते रहो। और जब सवाल उठें तो कह दो: “प्रक्रिया चल रही है।”
ताज के पास बैराज से कई उम्मीदें जुड़ी हैं। यमुना को फिर से जिंदा करना। ताज के आसपास का माहौल बेहतर बनाना। भूजल (groundwater) को रिचार्ज करना। पर्यावरणीय दबाव कम करना। शहर को कुछ राहत देना。
जहाँ नदी कई बार किसी सुस्त नाले जैसी लगती है, वहाँ यह कोई शौकिया परियोजना नहीं, बल्कि ज़रूरत है。
लेकिन खयाल से अमल तक का सफर बेहद ऊबड़-खाबड़ रहा है।फाइलें चलीं। फिर रुक गईं। डिज़ाइन बदले। फिर दोबारा बदले। विभागों ने हामी भरी। फिर एतराज़ जता दिया। और वही पुराना हिंदुस्तानी राग गूँजता रहा; “यह मेरी फाइल नहीं है।” सो, परियोजना इंतज़ार करती रही। और करती रही।
एक दौर में रबर चेक डैम (अस्थायी लचीला बाँध) का प्रस्ताव आया। इसे तेज़ और लचीला हल बताया गया। सुनने में यह मुनासिब लगा। उम्मीद भी जगी。
लेकिन अब इसे चुपचाप किनारे रखकर चिनाई वाले पक्के बाँध पर जोर दिया जा रहा है。
कागज़ों पर यह तरक्की लगती है। हकीकत में यह घड़ी की सुई फिर शून्य पर ले आई है। नया डिज़ाइन मतलब नई स्टडी। नई स्टडी मतलब नई मंज़ूरियाँ। नई मंज़ूरियाँ मतलब नई देरी। चक्र फिर वहीं से शुरू। जैसे कीचड़ में फँसा पहिया, घूम तो रहा हो मगर आगे न बढ़ रहा हो।
इस बीच यमुना लगातार पीछे हट रही है। कुछ हिस्सों में वह इतनी पतली हो जाती है कि लगता है जैसे अफसर और जनता अलग-अलग नदियाँ देख रहे हों। दाँव पर क्या लगा है, इस पर कोई बहस नहीं।
ताजमहल सिर्फ संगमरमर और यादों का ढांचा नहीं है। यह एक जीवित परिदृश्य (living landscape) है। इसकी खूबसूरती सिर्फ इसकी इमारत में नहीं, बल्कि उसके आसपास की नदी, हवा, रोशनी और पर्यावरणीय संतुलन में भी बसती है。
मरती हुई यमुना सिर्फ बदनुमा दाग नहीं। यह चेतावनी है。
कमज़ोर पड़ती नदी स्थानीय मौसम पर असर डालती है। भूजल को प्रभावित करती है। पूरे इलाके की पारिस्थितिकी की लय बिगाड़ देती है। और धीरे-धीरे स्मारक के प्राकृतिक परिवेश को भी खतरे में डालती है。
इसीलिए सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद् और जागरूक नागरिक वर्षों से आवाज़ उठा रहे हैं。
रिवर कनेक्ट कैंपेन जैसे अभियान मुद्दे को जिंदा रखने की कोशिश करते रहे हैं।
आवाज़ें उठीं। रिपोर्टें लिखी गईं। अपीलें की गईं। लेकिन चिंता और प्रतिबद्धता के बीच कहीं रफ्तार गुम हो जाती है। अब एक नया मोड़ आया है। चिनाई वाले बाँध के फैसले के बाद परियोजना को फिर नई जांचों से गुजरना होगा。
पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment)। प्रदूषण नियंत्रण मंज़ूरी। भूजल मूल्यांकन। ताज की नज़दीकी के कारण विरासत संरक्षण मंज़ूरी। इनमें से कोई भी गैरज़रूरी नहीं। बल्कि सब बेहद ज़रूरी हैं。
ताज जैसे वैश्विक धरोहर (heritage) के पास कोई भी परियोजना शॉर्टकट नहीं अपना सकती。
मगर असली मसला सुरक्षा उपाय नहीं, उनकी रफ्तार है। भारत में अक्सर सुरक्षा उपाय स्पीड ब्रेकर बन जाते हैं। जो प्रक्रिया समयबद्ध और समन्वित होनी चाहिए, वह ऐसी रिले रेस बन जाती है जिसमें बैटन बार-बार गिरती रहती है। ऐसी परियोजना को साफ समयसीमा चाहिए。
एक सशक्त प्राधिकरण (authority)।स्पष्ट जवाबदेही। और जनता को नियमित जानकारी。
लेकिन यहाँ यह फाइल किसी धूल भरी मेज़ पर पड़ी भूली हुई याद की तरह विभागों में भटकती रहती है。
असल मसला तकनीकी नहीं। सियासी है। जब ताज सुर्खियों में आता है, यमुना याद आ जाती है। जब खबरें बदलती हैं, फोकस भी बदल जाता है। नतीजा वही पुराना पैटर्न: घोषणा करो। देरी करो। दिलासा दो।दोहराओ। यह गूँजती हुई हुकूमत है。
और फिर आती है सबसे कड़वी विडंबना । शिलान्यास हो चुके हैं। एक बार नहीं, कई बार। फीते कटे। फोटो खिंचे। भाषण हुए। लेकिन बैराज औपचारिक फावड़ों से नहीं बनता। वह लगातार मेहनत, अनुशासन और फॉलो-थ्रू से बनता है। वही बेजान मगर असरदार प्रशासनिक मशक्कत , जो सुर्खियाँ भले न बटोरे, मगर नतीजे देती है。
साफ कहें: यह कोई दिखावटी परियोजना नहीं। एक चालू बैराज जलस्तर स्थिर कर सकता है। ताज के पास नदी की मौजूदगी को बेहतर बना सकता है। भूजल को सहारा दे सकता है。
क्या इससे आगरा की हर पर्यावरणीय समस्या हल हो जाएगी? नहीं。
लेकिन यह एक अहम कदम होगा। और कई बार सही दिशा में उठाया गया छोटा कदम किसी बड़े ख्वाब से ज्यादा मायने रखता है。
इंतज़ार की भी कीमत होती है। हर साल की देरी जनता के भरोसे को थोड़ा और खोखला करती है। यह खामोश संदेश देती है कि अहम परियोजनाएँ भी बिना किसी जवाबदेही के अनंतकाल तक लटक सकती हैं。
और नदी? वह लगातार सिमटती रहती है। चुपचाप। सब्र के साथ।बेरहम ढंग से।
तो आगरा कहाँ खड़ा है? एक और दोराहे पर। शहर को अब नई घोषणा नहीं चाहिए। न नया शिलान्यास।न उम्मीदों में लिपटा कोई और वादा। उसे अमल चाहिए। ऐसी परियोजना चाहिए जो भाषणों से आगे निकले।फोटो-ऑप्स से बचे। सियासी मौसमों से ऊपर उठे। क्योंकि आखिर में यमुना फाइलें नहीं पढ़ती। बैठकों में शामिल नहीं होती। मंज़ूरियों का अनंत इंतज़ार नहीं करती। वह बस बहती है। या फिर रुक जाती है。
ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: फाइलों के बोझ तले दबी आगरा की जीवनदायिनी
बृज खंडेलवाल जी का यह व्यंग्यात्मक और मार्मिक आलेख आगरा के उस दर्द को बयां करता है जो पिछले कई दशकों से फाइलों और नेताओं के बयानों में दफन है। यमुना बैराज मात्र एक ‘इंफ्रास्ट्रक्चर’ (Infrastructure) प्रोजेक्ट नहीं है; यह आगरा के पर्यावरण, ताज महल की नींव और इस शहर के करोड़ों लोगों के पीने के पानी से जुड़ा हुआ जीवन-मरण का प्रश्न है। जब दिल्ली से आगरा तक एक्सप्रेसवे 22 महीनों में बनकर तैयार हो सकता है और शहर में रातों-रात मेट्रो दौड़ सकती है, तो ताज के पीछे एक सीधा सा ‘वाटर रिटेंशन’ (जल संचयन) ढांचा 30 सालों से क्यों अटका हुआ है? यह सवाल हमारी राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक ‘संवेदनहीनता’ (Apathy) पर एक बड़ा तमाचा है।
ताज की नींव और लकड़ी के कुएं का संकट:
यह कोई रहस्य नहीं है कि ताज महल की नींव कुओं के ऊपर टिकी है, जिनमें ‘महोगनी’ और ‘साल’ जैसी विशेष लकड़ियों का इस्तेमाल हुआ है। इस लकड़ी की खूबी यह है कि यह पानी की नमी (Moisture) मिलने पर ही मजबूत रहती है। जब यमुना सूखती है, तो ताज की नींव में नमी कम हो जाती है, जिससे इस विश्व धरोहर के भविष्य पर गंभीर खतरा मंडराने लगता है। बैराज का मुख्य उद्देश्य ताज के पीछे यमुना में साल भर पानी का एक स्थिर स्तर बनाए रखना था, ताकि नींव सुरक्षित रहे। लेकिन रबर डैम से लेकर पक्के डैम तक के इस अंतहीन सफर (Endless Loop) ने ताज को भी खतरे में डाल दिया है। जब विदेशी सैलानी ताज देखने आते हैं, तो संगमरमर की खूबसूरती के पीछे उन्हें एक काला, बदबूदार नाला नज़र आता है। यह केवल आगरा की नहीं, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि (Global Image) का भी नुकसान है।
लालफीताशाही (Red Tapism) और विभागों की कुश्ती:
आगरा में किसी भी प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा दुश्मन यहाँ के अनगिनत विभाग हैं—सिंचाई विभाग, जल निगम, वन विभाग, आगरा विकास प्राधिकरण (ADA), आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI), और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड। यमुना बैराज की फाइल इन विभागों के बीच एक ‘टेबल टेनिस’ की गेंद की तरह घूमती रही है। जब एक विभाग ‘NOC’ (No Objection Certificate) देता है, तो दूसरा विभाग कोई नई तकनीकी अड़चन निकाल देता है। ‘सिंगल विंडो क्लियरेंस’ (Single Window Clearance) जैसे भारी-भरकम शब्द आगरा के बैराज प्रोजेक्ट के सामने आकर दम तोड़ देते हैं। अब जब पक्के बांध का प्रस्ताव आया है, तो ‘ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन’ (TTZ) और सुप्रीम कोर्ट की अनुमतियों का जो नया चक्र शुरू होगा, वह कम से कम 5 साल और खा जाएगा। क्या तब तक यमुना इंतज़ार करेगी?
भविष्य की चेतावनी: ‘डे जीरो’ (Day Zero) की ओर आगरा:
बैराज का न बनना केवल नदी का सूखना नहीं है; यह आगरा के भूजल स्तर (Groundwater Level) के रसातल में जाने का मुख्य कारण है। शहर के कई हिस्सों में पानी ‘खारा’ (Saline) और पीने अयोग्य हो चुका है। जिस तरह से हम यमुना की अनदेखी कर रहे हैं, वह दिन दूर नहीं जब आगरा भी केपटाउन या बेंगलुरु की तरह पानी के संकट से जूझता हुआ ‘डे जीरो’ का सामना करेगा। सरकार को अब यह समझना होगा कि शिलान्यास के पत्थर प्यास नहीं बुझाते। आगरा को अब भाषण नहीं, एक सशक्त अथॉरिटी और टाइम-बाउंड (Time-bound) ‘एक्शन’ चाहिए। ‘रिवर कनेक्ट कैंपेन’ जैसे जन-आंदोलनों को अब और अधिक मुखर होना होगा, ताकि सत्ता के बहरे कानों तक यमुना की सूखती हुई सिसकियां पहुंच सकें। बैराज आगरा का हक है, कोई एहसान नहीं!