मनरेगा खत्म, मजदूर बेहाल: ग्रामीण रोजगार पर गहराता संकट! विक्रम सिंह का विशेष आलेख

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आर्टिकल Desk, tajnews.in | Tuesday, May 05, 2026, 02:15:17 AM IST

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Vikram Singh Writer
विक्रम सिंह
संयुक्त सचिव
अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन
अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन के संयुक्त सचिव विक्रम सिंह ने मनरेगा (MGNREGA) के खात्मे और नई ‘वीबी-ग्राम (जी)’ योजना के लागू होने से ग्रामीण भारत में पैदा हुए रोजगार संकट पर एक बेहद गंभीर और तथ्यपरक आलेख लिखा है। यह आलेख स्पष्ट करता है कि कैसे ‘काम के अधिकार’ को छीनकर मजदूरों को अनिश्चितता के भंवर में धकेल दिया गया है, और लंबित मजदूरी का क्या भविष्य है।
HIGHLIGHTS
  1. मनरेगा को खत्म कर लागू की गई ‘वीबी ग्राम (जी)’ योजना ने ग्रामीण मज़दूरों से 100 दिनों के रोजगार की ‘कानूनी गारंटी’ छीन ली है।
  2. नई व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के बीच लागत का बंटवारा 60:40 हो गया है, जिससे राज्यों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ रहा है और योजना का क्रियान्वयन अधर में है।
  3. अप्रैल 2026 तक लगभग 10,000 करोड़ रुपये की मजदूरी लंबित है, और केवल उत्तर प्रदेश में ही 12 लाख से अधिक मनरेगा कार्य अधूरे पड़े हैं।
  4. खेत मज़दूर यूनियनों ने नई योजना को वापस लेने, 200 दिनों का रोजगार सुनिश्चित करने और 700 रुपये न्यूनतम मजदूरी की मांग को लेकर 15 मई को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है।

मनरेगा खत्म, मजदूर बेहाल : ग्रामीण रोजगार पर गहराता संकट
(आलेख : विक्रम सिंह)

भारत में ग्रामीण रोजगार का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार-आधारित कार्यक्रम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) लंबे समय से ग्रामीण गरीबों के लिए जीवन रेखा रहा है। यह कानून प्रत्येक ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिनों का वैधानिक रोजगार देने की गारंटी करता है। भाजपा सरकार ने मनरेगा को ख़त्म कर ग्रामीण मज़दूरों के जीवन को अनिश्चितताओं के भंवर में धकेल दिया है।

जैसा कि हम जानते हैं कि मानक आबंटन के कारण वीबी ग्राम (जी) सिद्धांत रूप में मांग-आधारित नहीं रह जाता, बल्कि बजट आबंटन से बंधी एक पारंपरिक केंद्र प्रायोजित योजना जैसा ही है। इससे राज्य सरकारों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा, और उत्तर पूर्वी राज्यों को छोड़कर केंद्र और राज्यों के बीच लागत का बंटवारा 60:40 के अनुपात में होगा। मनरेगा में यह अनुपात व्यावहारिक रूप से 90:10 था। इस अधिनियम में मजदूरी के समय-समय पर संशोधन या सूचकांकीकरण का कोई प्रावधान नहीं है। यह कृषि के चरम मौसमों के दौरान 60 दिनों के लिए काम बंद करने का प्रावधान करता है। कार्यक्रम की सार्वभौमिकता उन प्रावधानों के कारण कमजोर हो जाती है, जो इसके कार्यान्वयन को अधिसूचित क्षेत्रों तक सीमित कर देते हैं, और अन्य क्षेत्रों को शामिल करने या बाहर करने के संबंध में कोई स्पष्टता नहीं है। इसका अर्थ है कि खेत मज़दूरों और ग्रामीण कामगारों के ‘काम के अधिकार’ की कानूनी गारंटी छीन ली जाती है, जिससे उनके जीवन में अनिश्चितताएं और बढ़ गई हैं。

एक तो बिना किसी से चर्चा किये मांग पर आधारित काम के अधिकार (मनरेगा), जिसमें मांग के अनुसार बजट उपलब्ध करवाना केंद्र सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी थी, को ख़त्म कर वीबी ग्राम (जी) को संसद में पास कर दिया। दूसरी तरफ, इसके लिए भी संसद में नाकाफी बजट आबंटन किया, जिससे साफ़ हो गया कि सरकार ग्रामीण मेहनतकशों के लिए गंभीर नहीं है और न ही ग्रामीण आर्थिकी के लिए संजीदा है。

केंद्रीय बजट में वीबी-ग्राम (जी) योजना के लिए 2026-27 में 95,000 करोड़ रुपये रखे गए हैं। यह राशि कम है, और इसके साथ एक और समस्या है कि यह साफ नहीं है कि नई व्यवस्था में राज्यों के लिए अलग-अलग बजट तय (मानक राज्य-वार बजट) किए गए हैं या नहीं। यह बात इसलिए चिंता की है क्योंकि ज़्यादातर राज्यों ने अपना बजट पहले ही बना लिया था, जब तक उनके हिस्से का पैसा तय नहीं हुआ था। इससे बजट का बंटवारा साफ नहीं दिखता और कुछ हद तक मनमाना लगता है। अब राज्यों को 40% पैसा खुद देना है, लेकिन उन्हें यह पता ही नहीं है कि केंद्र से उनके राज्य को कितना पैसा मिलेगा। ऐसे में वे अपना हिस्सा भी ठीक से तय नहीं कर पा रहे हैं, जिससे योजना को लागू करने में और दिक्कतें आ रही हैं。

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इस पूरी प्रक्रिया में घाटे में मज़दूर ही रहे हैं। चाहे कम ही बढ़ौतरी हो, परन्तु प्रत्येक वर्ष मनरेगा के तहत संशोधित मजदूरी दरों की अधिसूचनाएं सामान्यतः मार्च में जारी की जाती हैं। 2024 और 2025 में, अधिसूचनाएं 27 मार्च को जारी की गई थीं। इसी तरह सरकार ने 2023 में 24 मार्च, 2022 में 28 मार्च, 2021 में 15 मार्च और 2020 में 24 मार्च को संशोधित दरों की अधिसूचना जारी की थी। संशोधित वेतन दर प्रत्येक वित्तीय वर्ष की 1 अप्रैल से लागू होती है। हालत ऐसी है कि लगभग दस वर्षों में पहली बार, इस वित्तीय वर्ष के प्रारंभ से पहले मनरेगा में मजदूरी दरों को अधिसूचित नहीं किया गया है。

पूरे देश में ग्रामीण मज़दूरों में असमंजस की स्थिति है। मांगने के बावजूद काम नहीं मिल रहा है। मज़दूर काम मांग रहे हैं, लेकिन अधिकारी साफ़ कह रहे हैं कि मनरेगा में काम नहीं मिलेगा। अगर मनरेगा में नहीं मिलेगा, तो क्या ग्राम जी में काम मिलेगा? इस प्रश्न का उत्तर तो राज्यों के आला अधिकारियों के पास भी नहीं। गौरतलब है कि मनरेगा के ख़त्म होने के बाद एक अप्रैल से ‘वीबी-ग्राम-जी’ लागू हो जाना था। विडंबना यह है कि सरकार ने इस कानून को लाने में तो बहुत तत्परता दिखाई, लेकिन इसके लिए अभी तक नियम नहीं बनाए गए हैं। इसका मतलब है कि अप्रैल 2026 में मज़दूरों के पास मनरेगा रुपी कानून का अधिकार नहीं है और वीबी-ग्राम-जी के नियम नहीं आएं है, मतलब कि मज़दूरों के पास काम मांगने का कोई अधिकार ही नहीं हैं। उनको कोई काम मिल ही नहीं रहा है। अधिकारी तो मान रहे हैं कि उनको मनरेगा में काम देने के लिए मना किया गया है。

हालाँकि देश के प्रमुख मीडिया संस्थानों को तो सरकार के खिलाफ कुछ दिखाना नहीं, फिर चाहे आम जनता संकट में ही क्यों न हो! इसके बावजूद भी स्थानीय स्तर पर अखबार मनरेगा मज़दूरों से संबंधित खबरों से भरे पड़े है। ‘डाउन टू अर्थ’ के अनुसार 15 अप्रैल 2026 तक मनरेगा के तहत केवल 95 लाख कार्य दिवस ही उत्पन्न हुए हैं — जो अप्रैल 2025 के मात्र 4 प्रतिशत के बराबर है। वर्ष 2025 में ठीक इसी समय तक 26 करोड़ कार्य दिवस सृजित हुए थे। इसके अतिरिक्त, वित्त वर्ष 25-26 की अंतिम तिमाही में, वीबी ग्राम जी अधिनियम पारित होने के बाद, देश भर में केवल 21 करोड़ कार्य दिवस सृजित हुए, जो वित्त वर्ष 24-25 की इसी अवधि की तुलना में 31 प्रतिशत कम है। मनरेगा की स्थिति के बारे में स्पष्टता की कमी के चलते मजदूरी भुगतान में भी बड़ी देरी देखी गई है। संसद में नया कानून आने के बाद (21 जनवरी, 2026) से लगभग सभी राज्यों में किसी भी मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया है। कुल मिलाकर, लगभग 10,000 करोड़ रुपये की मजदूरी लंबित है।

एक बड़ी समस्या यह है कि मनरेगा में जो लंबित काम हैं, उनका क्या होगा? हालाँकि इस बजट में मनरेगा के लिए 30,000 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है लेकिन जमीनी स्तर पर कोई स्पष्टता नहीं है। एक तो यह बजट नाकाफी है, क्योंकि इसका एक बड़ा हिस्सा तो केवल पिछली देनदारियों के भुगतान में खर्च हो जायेगा। दूसरा अधिकारियों ने सारे काम लगभग रोक दिए हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी सार्वजनिक रूप से दावा कर रहे हैं कि मनरेगा के तहत चल रहे कार्यों को पूरा होने तक जारी रखने की अनुमति दी जाएगी, जिसके बाद नए प्रतिस्थापित कार्यक्रम को लागू किया जाएगा। लेकिन असल में कोई काम नहीं मिल रहा है और स्थानीय स्तर पर खुद अधिकारी भी सकते में है। उदाहरण के लिए मनरेगा के तहत केवल उत्तर प्रदेश में 1227670 कार्य अधूरे पड़े हैं। उत्तर प्रदेश में मनरेगा के तहत सामग्री के मद में करीब चार हजार करोड़ रुपये की उधारी है। भुगतान न होने से कार्य अधूरे हैं。

हालाँकि सरकार के रवैये का पता तो वर्ष 2025-26 में मनरेगा के कार्यान्वयन की दुर्दशा से चलता है। दिल्ली स्थित लिबटेक इंडिया द्वारा आंध्र प्रदेश पर जारी नवीनतम मनरेगा ट्रैकर के अनुसार, कुल कार्य दिवसों में वार्षिक आधार पर 23.2 प्रतिशत की गिरावट आई है, जो 2,422.84 लाख से घटकर 1,859.77 लाख रह गए हैं। यह गिरावट व्यापक स्तर पर देखी गई, क्योंकि मनरेगा में पंजीकृत परिवारों की संख्या में 6.1 प्रतिशत, काम पाने वाले परिवारों की संख्या में 8.6 प्रतिशत, कुल मजदूरों की संख्या में 10.1 प्रतिशत और प्रति परिवार औसत कार्यदिवसों में 16 प्रतिशत की कमी आई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 100 दिन का रोजगार पूरा करने वाले परिवारों की संख्या में 57.6 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है, जो 5.1 लाख से घटकर 2.16 लाख रह गई है। इससे ऐसे परिवारों का हिस्सा लगभग आधा होकर 10.9 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत हो गया है। तिमाहीवार आंकड़ों से पता चलता है कि संकुचन योजना के निरस्त होने से काफी पहले ही शुरू हो गया था, हालांकि अंतिम तिमाही (जनवरी-मार्च 2026) में यह तेजी से बढ़ा, जो नए ग्राम जी ढांचे में संक्रमण के साथ मेल खाता था。

अखिल भारतीय स्तर पर भी कमोबेश यही स्थिति है। वित्तीय वर्ष 2024-25 की तुलना में 2025-26 में मनरेगा के तहत रोजगार सृजन में स्पष्ट गिरावट दर्ज की गई है। 2024-25 में कुल 286.16 करोड़ कार्य दिवस सृजित हुए थे, जो 2025-26 में घटकर 228.19 करोड़ रह गए। इससे स्पष्ट है कि काम की मांग को पूरा नहीं किया गया। मनरेगा का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, प्रति परिवार मिलने वाले औसत रोजगार के दिन। 2024-25 में यह 50.24 दिन था जो 2025-26 में घटकर 43.2 दिन रह गया। यह गिरावट दर्शाती है कि ग्रामीण परिवारों को पहले की तुलना में कम काम मिल रहा है, जिससे उनकी आय पर सीधा असर पड़ता है। मनरेगा की मूल भावना 100 दिनों का रोजगार सुनिश्चित करना है, लेकिन 2024-25 में 40.69 लाख परिवारों को 100 दिन का रोजगार मिला जबकि 2025-26 में यह संख्या घटकर केवल 23.43 लाख रह गई। यह लगभग 40% की गिरावट है, जो बताती है कि रोजगार की कानूनी गारंटी व्यवहार में कमजोर हो रही है। पिछले वर्ष मनरेगा के दायरे में आने वाले परिवारों और व्यक्तियों की संख्या भी कम हुई। मनरेगा में कुल काम करने वाले परिवार 5.78 करोड़ से कम होकर केवल 5.34 करोड़ रह गए हैं वहीं सक्रिय मज़दूरों की संख्या 7.88 करोड़ से कम होकर 7.2 करोड़ रह गई है। यह बताता है कि सरकार के नीतिगत हमलों से मनरेगा की पहुँच पहले से ही सिकुड़ रही है, जबकि ग्रामीण बेरोजगारी और संकट के हालात बरकरार हैं। मनरेगा का एक उद्देश्य हाशिए के वर्गों को रोजगार उपलब्ध कराना भी है, लेकिन अनुसूचित जाति की भागीदारी वर्ष 2024-25 के 18.63% से घटकर वर्ष 2025-26 में 16.8% हो गई है। इसी तरह महिलाओं की भागीदारी में भी हल्की गिरावट दर्ज की गई है। 2024-25 में मनरेगा में मज़दूरों की कुल संख्या का 58.08% महिलाएं थीं, जो 2025-26 में 57.25% है। उपरोक्त तुलना स्पष्ट रूप से दिखाती है कि 2025-26 में मनरेगा का प्रदर्शन 2024-25 की तुलना में कमजोर रहा है। प्रशासनिक बाधाएँ और तकनीकी जटिलताएँ (जैसे ऑनलाइन उपस्थिति) काम में रुकावट बन रही हैं ।

अंततः, यह स्पष्ट है कि मनरेगा जैसे अधिकार-आधारित कानून को कमजोर कर या समाप्त कर देने से ग्रामीण भारत की आजीविका पर गंभीर असर पड़ा है। नई वीबी-ग्राम (जी) व्यवस्था न तो रोजगार की कानूनी गारंटी देती है और न ही मांग के अनुरूप काम उपलब्ध कराने में सक्षम दिखती है। बजट की कमी, नीतिगत अस्पष्टता और क्रियान्वयन में अव्यवस्था के कारण ग्रामीण मजदूरों की स्थिति और असुरक्षित होती जा रही है। ऐसे समय में जब ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले से संकट में है, जरूरी है कि सरकार रोजगार के अधिकार को बहाल करे, पर्याप्त बजट सुनिश्चित करे और ऐसी नीतियां बनाए, जो मजदूरों को स्थिर और सम्मानजनक आजीविका दे सकें।

खेत मज़दूरों के संगठनों और नरेगा संघर्ष मोर्चा ने वीबी-ग्राम (जी) कानून को तुरंत वापस लेने और मजबूत मनरेगा को बहाल करने की मांग को लेकर 15 मई को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। उनकी मांग है कि हर ग्रामीण परिवार को कम से कम 200 दिनों का रोजगार सुनिश्चित किया जाए और न्यूनतम मजदूरी 700 रुपये प्रतिदिन तय की जाए, जिसे हर साल महंगाई के अनुसार बढ़ाया जाए。

(लेखक अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94184 84418)

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण

विक्रम सिंह जी का यह आलेख ग्रामीण भारत की उस जमीनी और खौफनाक सच्चाई को उजागर करता है, जिसे अक्सर सत्ता के गलियारों और मुख्यधारा की मीडिया में नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। मनरेगा (MGNREGA) महज़ एक योजना नहीं थी; यह 2005 में संसद द्वारा पारित एक ऐसा ‘कानूनी अधिकार’ था, जिसने करोड़ों ग्रामीण परिवारों को भुखमरी और पलायन से बचाया। कोविड-19 महामारी के दौरान जब शहर बंद थे, तब मनरेगा ही वह इकलौता सहारा था जिसने वापस लौटे प्रवासियों की थाली में रोटी सुनिश्चित की थी। लेकिन अब, इसे खत्म कर नई ‘वीबी ग्राम (जी)’ योजना लागू करने से वह ‘अधिकार’ एक ‘दया’ (Charity) में बदल गया है, जो पूरी तरह से बजट के आबंटन पर निर्भर है।

आंकड़े झूठ नहीं बोलते। अप्रैल 2026 तक केवल 95 लाख कार्य दिवसों का सृजन होना (जो पिछले वर्ष का मात्र 4% है) और लगभग 10,000 करोड़ रुपये की मजदूरी का अटका होना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक “साइलेंट इमरजेंसी” (खामोश आपातकाल) है। उत्तर प्रदेश में 12 लाख से अधिक कार्यों का अधूरा पड़ा होना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक अनिश्चितता ने विकास कार्यों को पंगु बना दिया है। नई योजना के तहत राज्यों पर 40% वित्तीय बोझ डालना उन गरीब राज्यों के लिए विनाशकारी होगा जो पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे हैं। जब ग्रामीण मजदूर के हाथ में पैसा नहीं होगा, तो वह बाज़ार से खरीदारी कैसे करेगा? इसका सीधा असर ग्रामीण मांग (Rural Demand) और देश के समग्र मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ेगा। 15 मई की देशव्यापी हड़ताल केवल मज़दूरों की नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बचाने की एक जायज़ पुकार है। सरकार को इसे गंभीरता से लेते हुए तुरंत संवाद का रास्ता चुनना चाहिए।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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