आगरा: DPS में छात्र पर जानलेवा हमला, कानून भूलने पर दरोगा समेत 3 सस्पेंड

Agra Desk, tajnews.in | Wednesday, April 29, 2026, 04:45:30 PM IST

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Agra Desk | Crime & Legal Investigation

आगरा: ताजनगरी आगरा के थाना सिकंदरा क्षेत्र स्थित डीपीएस (DPS) शास्त्रीपुरम में 10वीं कक्षा के छात्र पर हुए जानलेवा हमले का मामला अब केवल स्कूल प्रशासन की घोर लापरवाही तक ही सीमित नहीं रह गया है। इस पूरे संवेदनशील प्रकरण में आगरा पुलिस की कार्यप्रणाली और कानूनी ज्ञान भी गंभीर रूप से सवालों के घेरे में आ गया है। जिस पुलिस पर कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी है, वही पुलिस इस हाई-प्रोफाइल मामले में देश के अहम ‘किशोर न्याय अधिनियम’ (Juvenile Justice Act) के बुनियादी नियम ही भूल गई। घटना के तीन दिन बाद पुलिस ने आनन-फानन में एक नाबालिग आरोपी छात्र के खिलाफ सीधे एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली, जो कि कानूनन पूरी तरह से गलत है। इस भारी कानूनी चूक और विभागीय लापरवाही का संज्ञान लेते हुए पुलिस कमिश्नरेट ने कड़ा एक्शन लिया है। मामले में बाल कल्याण अधिकारी के रूप में तैनात एक दरोगा सहित तीन पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। साथ ही, सिकंदरा थाने के एसएचओ (SHO) की भूमिका को संदिग्ध मानते हुए उनके खिलाफ भी विभागीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं। नाबालिग पर दर्ज की गई अवैध एफआईआर को निरस्त कर दिया गया है।

HIGHLIGHTS
  1. DPS शास्त्रीपुरम में मारपीट: 10वीं के छात्र पर क्लासरूम में हुआ था हमला, चेहरे पर मुक्का लगने से टूट गए थे तीन दांत और फटा था जबड़ा।
  2. पुलिस की बड़ी कानूनी चूक: सिकंदरा पुलिस ने किशोर न्याय अधिनियम की अनदेखी कर सीधे नाबालिग आरोपी के खिलाफ दर्ज कर ली FIR।
  3. कमिश्नरेट का कड़ा एक्शन: डीसीपी सिटी ने दरोगा मनीपाल सिंह, मुंशी कमल चंदेल और सिपाही सनी धामा को तत्काल प्रभाव से किया निलंबित।
  4. एसएचओ पर बैठी जांच: थाना प्रभारी प्रदीप कुमार त्रिपाठी के खिलाफ भी विभागीय जांच के आदेश, नाबालिग पर दर्ज FIR की गई निरस्त।

क्लासरूम में खूनी खेल और स्कूल प्रशासन की संवेदनहीनता

इस पूरे विवाद की जड़ 25 अप्रैल की सुबह हुई वह भयानक घटना है, जिसने एक DPS Agra स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी। पीड़ित छात्र डीपीएस शास्त्रीपुरम का 10वीं का विद्यार्थी है। वह रोज की तरह उस दिन भी पढ़ाई करने के लिए स्कूल पहुंचा था। आरोप है कि क्लासरूम के अंदर ही एक दूसरे छात्र ने बिना किसी गंभीर कारण के उसके चेहरे पर पूरी ताकत से एक जोरदार पंच (मुक्का) जड़ दिया। यह हमला इतना अप्रत्याशित और हिंसक था कि पीड़ित छात्र के मुंह से तुरंत खून का फव्वारा फूट पड़ा। हमले में छात्र के आगे के तीन दांत पूरी तरह से टूट कर गिर गए और उसके जबड़े में भी गंभीर अंदरूनी चोट आई।

ऐसी गंभीर स्थिति में किसी भी स्कूल प्रशासन से यह उम्मीद की जाती है कि वह घायल छात्र को तुरंत पास के किसी अच्छे अस्पताल में ले जाए और उसके परिजनों को स्थिति की गंभीरता से अवगत कराए। लेकिन डीपीएस प्रशासन ने यहां संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर दीं। घायल छात्र के पिता पीयूष मल्होत्रा ने स्कूल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि स्कूल की तरफ से उन्हें फोन पर केवल “हल्की चोट” लगने की सूचना दी गई थी। जब वह बदहवास हालत में स्कूल पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उनके बेटे की हालत बेहद खराब थी। स्कूल के स्टाफ ने इलाज करने के बजाय बच्चे के मुंह से बहते खून को रोकने के लिए सिर्फ उसके मुंह में रूई ठूंस रखी थी। स्कूल की इस भारी लापरवाही ने एक पिता को अंदर तक झकझोर कर रख दिया।

पिता की गुहार और जिलाधिकारी का कड़ा संज्ञान

अपने बेटे की इस दर्दनाक हालत को देखकर पीयूष मल्होत्रा का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने अपने घायल बेटे का वीडियो रिकॉर्ड किया और उसे सोशल मीडिया पर साझा करते हुए स्कूल प्रशासन की लापरवाही और आरोपी छात्र के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गुहार लगाई। वीडियो वायरल होते ही शहर भर में डीपीएस प्रबंधन के खिलाफ भारी आक्रोश फैल गया। जब स्कूल और स्थानीय पुलिस की तरफ से कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई, तो इंसाफ की आस में पीयूष मल्होत्रा ने सोमवार को आगरा के जिलाधिकारी मनीष बंसल से उनके कार्यालय में जाकर मुलाकात की।

जिलाधिकारी मनीष बंसल ने एक 10वीं के छात्र के साथ हुई इस बर्बरता और स्कूल प्रशासन की कथित लापरवाही के मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया। उन्होंने पीड़ित पिता को पूरा आश्वासन दिया कि इस मामले में किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। जिलाधिकारी मनीष बंसल ने तुरंत प्रभाव से स्कूल की कार्यप्रणाली, सुरक्षा मानकों और घटना के दिन बरती गई लापरवाही की विस्तृत जांच के लिए एक विशेष कमेटी गठित करने के निर्देश दे दिए। यह कमेटी इस बात की भी जांच करेगी कि क्या स्कूल में छात्रों के बीच बढ़ रही आक्रामकता को रोकने के लिए कोई काउंसलिंग सेल मौजूद है या नहीं।

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पुलिस की अज्ञानता: तीन दिन बाद FIR और किशोर न्याय कानून की धज्जियां

इस मामले में पुलिस का रवैया शुरुआत से ही सुस्त था। घटना के पूरे तीन दिन बीत जाने के बाद, जब मीडिया और प्रशासन का दबाव बढ़ा, तो सिकंदरा पुलिस ने आनन-फानन में आरोपी छात्र के खिलाफ नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली। लेकिन अपनी इसी जल्दबाजी और कानूनी अज्ञानता में पुलिस एक बहुत बड़ी चूक कर बैठी। सिकंदरा पुलिस यह भूल गई कि जिस आरोपी छात्र के खिलाफ वे आपराधिक मुकदमा दर्ज कर रहे हैं, वह एक नाबालिग (Minor) है, और देश में नाबालिगों के लिए ‘किशोर न्याय अधिनियम’ (Juvenile Justice Act) लागू होता है।

कानून के जानकारों के अनुसार, किशोर न्याय अधिनियम के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि जिन मामलों में सजा का प्रावधान सात साल से कम है (जैसे मारपीट या साधारण चोट), उनमें किसी भी नाबालिग के खिलाफ सीधे एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। इसके लिए पुलिस को सबसे पहले एक सामाजिक जांच रिपोर्ट (Social Investigation Report) तैयार करनी होती है। इस रिपोर्ट को बाल कल्याण पुलिस अधिकारी के माध्यम से किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) के सामने प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद किशोर न्याय बोर्ड ही सभी तथ्यों को देखते हुए यह तय करता है कि मामले में एफआईआर दर्ज की जाएगी, बच्चे को मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग (Counseling) की जरूरत है, या केस को वहीं समाप्त कर दिया जाएगा। सिकंदरा पुलिस ने इन सभी वैधानिक प्रक्रियाओं को पूरी तरह दरकिनार करते हुए सीधे मुकदमा दर्ज कर लिया, जो एक गंभीर विभागीय अपराध है।

कमिश्नरेट का एक्शन: दरोगा, मुंशी और सिपाही सस्पेंड

जैसे ही पुलिस की इस बड़ी कानूनी चूक की भनक पुलिस कमिश्नरेट के उच्च अधिकारियों को लगी, विभाग में हड़कंप मच गया। डीसीपी (DCP) सिटी सैयद अली अब्बास ने मामले की फाइल मंगवाई और जांच में पाया कि सिकंदरा पुलिस ने कानून का घोर उल्लंघन किया है। सैयद अली अब्बास ने इस लापरवाही पर कड़ा एक्शन लेते हुए तुरंत प्रभाव से थाने में तैनात बाल कल्याण पुलिस अधिकारी (दरोगा) मनीपाल सिंह, मुंशी कमल चंदेल और सिपाही सनी धामा को निलंबित (Suspend) कर दिया है।

दरोगा मनीपाल सिंह की जिम्मेदारी थी कि वह बाल कल्याण अधिकारी होने के नाते किशोर न्याय कानून का पालन सुनिश्चित कराएं, लेकिन उन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया। इसके अलावा, थाने के प्रभारी निरीक्षक (SHO) प्रदीप कुमार त्रिपाठी की भूमिका भी इस पूरे प्रकरण में संदिग्ध पाई गई है, क्योंकि कोई भी एफआईआर उनके संज्ञान के बिना दर्ज नहीं होती। डीसीपी सैयद अली अब्बास ने एसएचओ प्रदीप कुमार त्रिपाठी के खिलाफ भी विभागीय जांच के सख्त आदेश दे दिए हैं। साथ ही, पुलिस ने अपनी गलती सुधारते हुए नाबालिग पर दर्ज की गई उस अवैध एफआईआर को भी निरस्त (Expunge) कर दिया है। अब यह पूरा मामला कानूनी प्रक्रिया के तहत किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। यह घटना आगरा पुलिस के लिए एक बड़ा सबक है कि कानून की रक्षा करने वालों को स्वयं कानून का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। वहीं दूसरी ओर, स्कूल प्रशासन पर भी जिलाधिकारी की जांच के बाद बड़ी कार्रवाई की तलवार लटक रही है。

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Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

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