लुप्त हुए ट्रंक और कनस्तर: जब घरों में यादें ताला लगाकर रखी जाती थीं! बृज खंडेलवाल का नॉस्टैल्जिक आलेख

आर्टिकल Desk, Taj News | Thursday, April 16, 2026, 09:30:00 AM IST

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Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं सामाजिक विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद भावुक और नॉस्टैल्जिक आलेख में उन बीते हुए सुनहरे दिनों को याद किया है, जब घरों में लोहे के भारी-भरकम ‘ट्रंक’, चमकते हुए ‘कनस्तर’ और ‘होल्डॉल’ हुआ करते थे। दरअसल, उन्होंने बताया है कि कैसे ये चीज़ें सिर्फ सामान रखने के डिब्बे नहीं, बल्कि संयुक्त परिवार की धड़कन और यादों के खजाने हुआ करते थे। इसके अलावा, उन्होंने आधुनिकता के कारण छोटे होते घरों और सिकुड़ते दिलों पर भी बहुत मार्मिक प्रहार किया है। इसलिए, बिना किसी देरी के पढ़िए यह दिल को छू लेने वाला आलेख:
HIGHLIGHTS
  1. एक ज़माना था जब घरों में लोहे के भारी-भरकम हरे या नीले रंग के ट्रंक हुआ करते थे, जिन पर सफेद पेंट से शान के साथ परिवार का नाम लिखा होता था।
  2. दरअसल, सर्दियों की रजाइयों से लेकर दादी की पुरानी चिट्ठियों तक, ये ट्रंक सिर्फ सामान के डिब्बे नहीं बल्कि संयुक्त परिवार की यादों का एक चलता-फिरता गोदाम थे।
  3. इसके अलावा, रसोई का सम्राट ‘टीन का कनस्तर’ होता था, जिसमें महीनों का राशन और दादी के हाथ के बनाए मठरी-लड्डू चूहों से बचाकर रखे जाते थे।
  4. हकीकत में, आधुनिक सूटकेस और छोटी अलमारियों ने इन ट्रंकों और ‘होल्डॉल’ को तो बेदखल किया ही है, लेकिन साथ ही हमारे दिलों को भी बहुत छोटा कर दिया है।

लुप्त हुए ट्रंक और कनस्तर: जब घरों में यादें ताला लगाकर रखी जाती थीं
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बृज खंडेलवाल
16 अप्रैल 2026
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कभी घर सिर्फ ईंट और छत नहीं होते थे, यादों के गोदाम होते थे। उन यादों की रखवाली करते थे: कई भारी-भरकम ट्रंक और खनखनाते कनस्तर。
दिल की गहराइयों में आज भी वो पुराना ट्रंक चुपके से साँस लेता है। भारी, जिसके ऊपर पेंट से परिवार का नाम लिखा होता था “शर्मा परिवार, आगरा”। उसकी सलवटें, उसकी जंग लगी कुंडियाँ और वो मीठी-सी पुरानी खुशबू… हर बार ढक्कन खोलते ही बचपन की गर्मियाँ लौट आती थीं। फौजी और रेलवही के गार्ड बाबू अभी भी काले चद्दर के बक्से उपयोग करते हैं。
घर के अंदर बड़े संदूकों में कपूर की सफेद गोलियाँ नीम के पत्तों के साथ सोई रहतीं। गर्मियों के हल्के सूती कपड़े एक तरफ, सर्दियों की ऊनी रजाइयाँ और गद्दे दूसरी तरफ। शादी-ब्याह के मौके पर वो ट्रंक जादू की तरह खुलता; चादरें, गद्दे, रजाइयाँ निकलतीं और पूरा संयुक्त परिवार एक साथ हँसता-बोलता सज जाता। ट्रंक कभी पढ़ने की मेज बन जाता, कभी सोफा, कभी रेडियो का सिंहासन。
एक होता थे बिस्तरबंद, होलडोल, लेदर बेल्ट से कसकर बांधना, चादरें, रजाई, गद्दे कायदे से ज़माना, फिर खींच के टाइट करना, ये एक आर्ट थी जिसमें हर कोई माहिर नहीं होता था। आजकल तो ये प्रथा समाप्त हो चुकी है。
ट्रेन की छुट्टियों में जब पूरा कुनबा स्टेशन पहुँचता, कुली सिर पर होल्डॉल और ट्रंक रखे, कंधे पर बैग, हाथ में सुराही लिए आगे-आगे चलता। सीट न मिलने पर बच्चे ट्रंक पर ही बैठकर खिड़की से बाहर उड़ते बादलों को गिनते। दादी माँ उसी ट्रंक में खोया-पाया, पुरानी चिट्ठियाँ, थैले और हर जुगाड़ संभाल कर रखतीं। हर बच्चे का अपना छोटा ट्रंक; लड़कियों के अंदर गुड़िया, चूड़ियाँ और गुप्त डायरी。
फिर आता कनस्तर। चमकता हुआ टिन का, जिसमें दादी छिपाकर लड्डू-मठरी रखतीं। चूहे डर के मारे भागते। गेहूँ, आटा, गुड़, चीनी… कई महीनों का वारदाना उसमें सोया रहता। इमरतबान में आम का मीठा आचार और नींबू की खट्टी खुशबू घर भर में फैलती।

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आज अलमारी और पहिए वाले सूटकेस आ गए। दिल छोटे हो गए। न ट्रंक की वो गरिमा बची, न कनस्तर की वो मासूमियत। बच्चे अब बिस्तरबंद और होल्डॉल का नाम भी नहीं जानते。
ट्रंक… लोहे का, हरे या नीले रंग का, ऊपर सफेद पेंट से लिखा नाम। जैसे कोई पहचान पत्र। हर घर में एक नहीं, कई ट्रंक। छोटा, बड़ा, दहेज वाला, बच्चों वाला। खोलते ही खुशबू उड़ती थी। सर्दियों के स्वेटर, गर्मियों की मलमल, तह करके रखी साड़ियाँ, जैसे मौसम भी उनमें सांस लेता हो。
पुराने ज़माने के सख्त मास्साब रघुनाथ प्रसाद यादों के समंदर में खो जाते हैं: “संयुक्त परिवार की धड़कन थे ये ट्रंक। शादी-ब्याह का मौसम आता, तो वही ट्रंक गद्दे, रजाई, चादरों से भर उठते। मेहमान आते, तो वही ट्रंक मेज बन जाता। रेडियो उस पर सजता, बच्चे उस पर उछलते, और बड़े उस पर बैठकर किस्से बुनते। ट्रंक कोई चीज़ नहीं था, घर का चुपचाप खड़ा बुजुर्ग था।”
सुशीला ताई कहती हैं: “छुट्टियाँ आतीं, तो ट्रंक का असली सफर शुरू होता। ट्रेन की सीट कम पड़ जाए, तो बच्चे उसी पर बैठ जाते। साथ में होल्डोल, कसकर बांधा हुआ बिस्तरबंद, और एक सुराही, जिसका पानी रास्ते भर मीठा लगता था। स्टेशन पर कुली सिर पर ट्रंक, कंधे গান্ধे पर बैग, हाथ में सुराही, और पीछे हमारा भरपूर परिवार, जैसे कोई चलता-फिरता जुलूस हो।”
दादी का ट्रंक तो जैसे खजाना था। खोया-पाया, पुराने खत, टूटे खिलौने, और अचानक जरूरत पड़ने पर निकल आने वाले थैले: सब उसी में। हर सवाल का जवाब, हर कमी का जुगाड़, उसी ट्रंक के भीतर छिपा होता था。
और उधर, रसोई का सम्राट था: कनस्तर। टीन का, मोटा, ढक्कन पर कुंडी लगी हुई। उसमें घी की खुशबू बसती थी, तेल की चमक झलकती थी। चूहों से बचाने का किला था वह। लड्डू, मठरी, सेव, सब उसमें छिपाकर रखे जाते, दादी की गुप्त तिजोरी。
कनस्तर में महीनों का राशन सांस लेता था। गेहूं, आटा, दाल, चीनी, गुड़, सब। इमरतबान में आम और नींबू का अचार धूप में पकता था। कुछ घरों में टेंटी और लिसौड़े का भी स्वाद बसता था। बड़े बच्चे का साइकिल पर कनस्तर रखकर चक्की जाना, वह भी एक छोटा सा उत्सव था。
आज घर बड़े हैं, पर जगह छोटी। अलमारी और कपबोर्ड ने ट्रंक को बेदखल कर दिया। पहियों वाले सूटकेस और बैकपैक ने सफर का रोमांस चुरा लिया है। बच्चों को पता भी नहीं कि बिस्तरबंद कैसे कसते हैं, होल्डोल क्या होता है。
और कनस्तर? वह तो जैसे कहानी बन गया। अब सब कुछ छोटे पैकेट में आता है। जरूरत जितनी, खरीद उतनी। न भंडारण, न इंतजार, न वो धैर्य。
कभी-कभी लगता है, उन ट्रंकों में सिर्फ कपड़े नहीं, रिश्ते तह करके रखे जाते थे। कनस्तर में सिर्फ अनाज नहीं, घर की खुशहाली बंद होती थी। आज सब खुला है, सब उपलब्ध है, फिर भी कुछ कमी सी है。
शायद सच यही है: घर सिकुड़ गए, सामान सिमट गया, और दिल भी थोड़े छोटे हो गए。
ट्रंक , कनस्तर और इमरतबान चले गए… और साथ ले गए एक पूरा जमाना, जो अब सिर्फ यादों में धीरे-धीरे खनकता है。

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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