आर्टिकल Desk, Taj News | Tuesday, April 21, 2026, 02:15:00 PM IST


एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार
ईरान युद्ध में भारत की खामोशी की क्या है वजह!
(डॉ. अनिल दीक्षित)
देश-विदेश के राजनीतिक और कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा सबसे गर्म है कि अमेरिका और ईरान के युद्ध में भारत मध्यस्थ क्यों नहीं बना! दुनिया के तमाम नेताओं से बड़े कद के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामने क्यों नहीं आए! अपने देश के चुनावी शोर में छिपे क्यों हुए हैं! भारतीय कूटनीति की इस कथित मजबूरी को मौजूदा हालात के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। समय ऐसा है ही नहीं कि भारत या चीन जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देशों की पक्ष या विपक्ष बनने की गलती हल्के में ले ली जाए。
बातचीत के पहले दौर को देखिए। इस्लामाबाद में ईरान के विदेश मंत्री और संसद के स्पीकर वार्ता के लिए पहुंचते हैं। वार्ता बेनतीजा रहती है क्योंकि इजरायल बीच में कूद पड़ता है। इजरायल से हमारी दोस्ती तो बड़ी चर्चित है ही, चुनाव में बिन्यामिन नेतन्याहू ने इंडियन पीएम के साथ अपनी तस्वीरें पोस्टरों पर छपवाई थीं। तो, इस दोस्त की नाराज़गी का डर था, जबकि पीएम ईरान पर हमले के ठीक पहले ही इजरायल होकर आए थे। फिर ऐसी बू भी खबरें आती हैं ईरानी नेताओं को सुरक्षित गलियारे से चुपचाप निकाला गया… कहीं सनकी ट्रंप की सनक के शिकार हो जाते तो? डोनाल्ड ट्रंप की दोस्ती भी तो कांटों से भरी है, पागल कब किसके दोस्त हुए हैं भला! जो क्यों अमीरी कि राष्ट्रपति ईरान के नेताओं को ईरान में ढूंढ ढूंढ कर मार रहा हो उसे पाकिस्तान में थाली में परोसे मिल जाते तो कितना आसान हो सकता था। और शुरुआत में ऐसा लगता भी नहीं था कि ईरान का शीर्ष नेतृत्व जैसे राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान, विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची या संसद मजलिस के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ इस बैठक में सक्रिय भागीदारी निभाकर अपनी जान को जोखिम में डालना चाहेंगे। यह सवाल काल्पनिक इसलिए भी नहीं हैं क्योंकि ट्रंप दुनिया के सबसे अप्रत्याशित नेता माने जाते हैं जो हर पल अपना बयान बदल लेते हैं। डगर इतनी आसान इसलिए भी नहीं थी, कि कहीं वार्ता के आयोजन में चूक हो जाती और ईरान को समस्या हो या न हो, ट्रंप जरूर रूठ सकते थे। ऐसी बैठक जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें हों, उसमें जरा सी भी चूक कूटनीतिक असंतुलन का बड़ा सिर दर्द बन सकती थी, जो गुटनिरपेक्षता की हमारी नीति को चूर-चूर कर देती。
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अब जबकि इस्लामाबाद में ही वार्ता के दूसरे दौर के अटकलें हैं, भारत की समझदारी परिपक्वता के रूप में समझ में आ रही है। ईरान में सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदल चुका है। वहां ये सवाल अब लोगों के मन में बवंडर बन चुका है कि लड़ाई में मारे गए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के 56 वर्षीय पुत्र मोजतबा खामेनेई जिंदा हैं भी, या नहीं। यदि जिंदा हैं तो क्या स्वस्थ हैं? फिर सामने क्यों नहीं आ रहे? राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और संसद के स्पीकर के हाथ से बाजी निकलकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के हाथ आ गई है जो अमेरिका से या तो बातचीत नहीं चाहता या अपनी शर्तों पर चाहता है। और साफ संकेत ये है कि विदेश मंत्री अब्बास अराघची की होर्मुज जलडमरूमध्य को व्यावसायिक जहाजों के लिए खोलने की घोषणा के बावजूद, ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड ने इसे फिर से बंद कर दिया। ताज़ा स्थितियों और रिपोर्टों के अनुसार, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ईरान में सबसे ताकतवर संस्था बन गई है, जो राष्ट्रपति और संसद से भी अधिक प्रभावशाली है। यह न केवल देश की सर्वोच्च सैन्य शक्ति है, बल्कि ईरान की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर भी अब इसका पूरा नियंत्रण है। इसी साल की शुरुआत में प्रॉमिस टू अभियान शुरू हुआ था जिसके तहत कोर ने नारा दिया था कि ईरान को नशे से मिटा देंगे। अमेरिका को घुटने पर ला देंगे, ये कोर का सबसे पसंदीदा नारा रहा है और युद्ध इन्हीं दो नारों की शैली में लड़ा जा रहा है。
खबरें हैं कि कोर के चीफ कमांडर मेजर जनरल अहमद वाहिदी ने अपने चार विश्वासपात्र लोगों के साथ पूरी अमेरिकी वार्ता को हाईजैक कर लिया है। और पिछले दिनों इस्लामाबाद आए नेता कुछ चाहेंगे, तो भी नहीं कर पाएंगे। उनकी बात मानी जाएगी, इसमें भी संशय है। और अगर बातचीत के लिए इस्लामाबाद वो आ বন্দর भी गए, और वार्ता में ईरानी पक्ष कमजोर हुआ तो लौटने पर उनका क्या हश्र होगा, यह सोचकर भी शायद वह डर रहे होंगे। असल में, पूरी लड़ाई अब ईरान वर्सेस बाकी देशों की हो रही है। पाकिस्तान सहित तमाम इस्लामी देशों को यह डर सता रहा है कि वह अपने धर्म के साथ रहें या अमेरिका जैसे किसी ताकतवर का पिछलग्गू बनकर। अगर वार्ता का दूसरा दौर भी असफल रहा और लड़ाई चलती रही, फिर अमेरिका तो कमजोर होगा ही, इधर इस्लामी देशों के सामने यह मुश्किल और बढ़ती जाएगी। पाकिस्तान पर सऊदी अरब और अपने देश में रह रहे शिया समुदाय का दबाव भी बढ़ेगा。
कूटनीति का सीधा सा सिद्धांत है कि जब आप प्रभावशाली भूमिका में ना हों, तो या तो चुपचाप बैठ जाइए, और अपने हित सुरक्षित रखने पर ध्यान दीजिए। भारत इसी नीति पर चल रहा है। डेढ़ सौ करोड़ जनसंख्या के भारी भरकम बोझ का यह देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी भी तरह का जोखिम लेने की स्थिति में नहीं है। अमेरिका के पक्ष में ज्यादा बोला गया तो इस्लामी देशों से जो मित्रता के प्रयास हो रहे हैं, वह अधर में लटक जाएंगे, और यदि ईरान के पक्ष में गए तो अमेरिका और इजरायल नाराज हो जाएंगे। दोनों ताकतवर देश की नाराजगी का जोखिम खतरनाक साबित हो सकता है। वैश्विक तेल संकट की वजह से अर्थव्यवस्था दबाव में हो तो ऐसा खतरा मोल लेने से बचना भी चाहिए。
तो बेहतर है कि अभी चुप बैठकर इंतजार किया जाए, अंतर्राष्ट्रीय समीकरण कब लगातार बदलते रहेंगे इसलिए किसी भी पक्ष में खड़ा होना देश के ‘बैठ’ जाने की वजह बन सकता है。
(लेखक शिक्षाविद और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Pawan Singh
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