आर्टिकल Desk, Taj News | Saturday, April 18, 2026, 02:20:00 PM IST


एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार
जीतने के लिए हर रास्ता जानने वाली भाजपा की हार का सच क्या है!
डॉ अनिल दीक्षित
संसद में मोदी सरकार की हार हुई, महिला आरक्षण बिल गिर गया। पर क्या ये हार सच्ची है, गढ़ी हुई या खुद मोल ली नहीं है! जिस सरकार का कोई बिल कल तक नहीं गिरा था, उसका यह बिल आसानी से गिर गया। माजरा है क्या? कहीं यही तो नहीं चाहती थी भारतीय जनता पार्टी, कि गिरने पर जितना जश्न मनाया जाएगा, उतना ही फायदा उसी को होगा जिस पर हार का ठप्पा लगाया जा रहा है, वो असल में कहीं जीत की जुगत तो नहीं?
राजनीतिक गलियारों में कल से यह सवाल जरूर तैर रहे होंगे। तो समझने की कोशिश करते हैं। कई बार ऐसा लगा है कि भाजपा की नजर महिलाओं के एकमुश्त वोटों पर है क्योंकि, यह रास्ता सीधा सत्ता तक जाता है। राजनीति में जब कोई वर्ग निर्णायक बन जाता है, तो उसके इर्द-गिर्द पूरी रणनीति खड़ी की जाती है, और यहां वही होता दिख रहा है। यकीन करना मुश्किल लगे तो ज़रा पीछे देखिए। मध्य प्रदेश में लाड़ली बहना योजना के सहारे मिली जीत कोई साधारण राजनीतिक घटना नहीं थी, वह एक संकेत था कि महिलाओं को सीधे जोड़कर चुनावी समीकरण बदले जा सकते हैं। इसी तरह तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं के बीच बनी पकड़ भले सीमित रही हो, लेकिन उसने यह दिखा दिया कि सही मुद्दे के साथ सही समय पर पंहुचा जाए तो नए वोट बैंक तैयार किए जा सकते हैं। राजनीति के किसी भी पंडित की किताब उठा लीजिए कहीं ना कहीं यह जरूर लिखा मिलेगा कि हर बार जीत ही फायदेमंद हो, ऐसा नहीं होता। कभी-कभी हार भी प्लान का हिस्सा होती है। राजनीति में कई बार ऐसी स्थिति बनाई जाती हैं, जहां परिणाम से ज्यादा महत्वपूर्ण वह संदेश होता है जो जनता तक पहुंचता है। और जो राजनीति में जीतने के तरीके जानता हो, जो लंबे खेल को समझता हो, जिसके पास केंद्र ही नहीं बल्कि कई राज्यों की सत्ता हो, जो साम दाम दंड भेद सब जानता हो, वो यूं ही बिना सोचे-समझे हार जाए, क्या यह बात आसानी से मानी जा सकती है?
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पश्चिम बंगाल जैसे चुनावी माहौल के बीच अचानक ऐसा कदम उठाना! यह समय भी अपने পুনরায় में बहुत कुछ कहता है। चुनाव के पहले ऐसे मुद्दों को सामने लाना, उन्हें बहस का केंद्र बनाना और फिर एक खास तरीके से उसका परिणाम सामने आना, यह सब संयोग कम और रणनीति ज्यादा लगता है। बंगाल में लड़ाई एक महिला ममता बनर्जी से है। राजनीतिक रूप से सबसे जागरूक यह राज्य नेताओं की जनसभाओं की भीड़ देखकर बता देता है कि अन्य राज्यों की अपेक्षा उसे राजनीति की समझ ज्यादा है। यानी इस बिल से दो दिन संसद का मंच मिला, और उस मंच का इस्तेमाल सिर्फ कानून बनाने के लिए नहीं, बल्कि एक संदेश देने के लिए किया गया। संदेश यह कि महिलाओं के मुद्दे पर पहल किसने की और विरोध किस तरफ से आया। राजनीति में कई बार असली लड़ाई संसद के भीतर नहीं, बल्कि उसके जरिए जनता के मन में लड़ी जाती है। अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने से लेकर आज तक भाजपा ऐसा कमाल बार-बार दिखा चुकी है। चन्द दिनों की अटल सरकार जब गिर रही थी, तब उस मंच का इस्तेमाल किस तरह बखूबी किया गया, आगे के चुनावों में इस देश की जनता ने यह खूब देखा है。
बिना तैयारी, बिना रणनीति कोई मैदान में उतरता नहीं, और यहां तो मामला एक बड़े राष्ट्रीय मुद्दे का था। ऐसे में यह मान लेना कि सब कुछ जल्दबाजी में हुआ, शायद वास्तविकता को बहुत सरल बना देना होगा। इसके पीछे की परतें समझने की जरूरत है। ध्यान से देखिए, मुद्दा सिर्फ बिल का पास या फेल होना नहीं थ। मुद्दा था नैरेटिव सेट करना। महिलाओं के बीच यह धारणा बनाना कि कोशिश किसने की और रुकावट कहां से आई। जब यह धारणा बनती है, तो उसका असर तुरंत नहीं, लेकिन चुनाव के समय साफ दिखाई देता है。
विपक्ष जितना इस ‘हार’ को अपनी जीत बताकर उत्सव मनाएगा, उतना ही यह कहानी मजबूत होगी कि मैदान में कौन उतरा और किसने रास्ता रोका। और राजनीति में कहानी ही अंततः सच बन जाती है, क्योंकि वही वोट में बदलती है। जब चुनाव नजदीक हों, तब हर कदम कई मतलब लेकर चलता है, हर बयान, हर फैसला, यहां तक कि हर असफलता भी। इसलिए इसे केवल एक हार मान लेना शायद उस बड़े खेल को नजरअंदाज करना होगा जो इसके पीछे चल रहा है। यार यह कहना भी शायद सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा कि मोदी सरकार इस समय लोकप्रियता के गिरावट के दौर में है। और। जब लोकप्रियता सवालों में हो, तब ऐसे ही मोड़ बनाए जाते है। ऐसे ही मुद्दे उठाए जाते हैं जो बहस को दिशा दें और ध्यान को फिर से केंद्र में ले आएं। यह भी वैसा ही एक मोड़ हो सकता है, जहां हार दिख रही है, लेकिन लक्ष्य कहीं आगे रखा गया है। मन में निश्चित रूप से अगले साल में यूपी सहित कुछ और राज्यों के चुनाव भी हैं। देखते हैं, इंतजार करते हैं。
(लेखक शिक्षाविद एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Pawan Singh
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