Chief Editor Desk, 🌐 tajnews.in | Monday, 10 August, 2026, 11:15:00 PM IST.


Gen Z: सिर्फ रील देखने वाली पीढ़ी नहीं, भारत का अगला बड़ा सवाल; राजनीति, बाजार और संस्कृति क्यों बदल रही है?
सवाल यह नहीं कि Gen Z क्या देखती है, सवाल यह है कि Gen Z क्या चाहती है?
भारत की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक शब्द लगातार चर्चा में है—Gen Z।
यह वही पीढ़ी है जिसे कभी मोबाइल में डूबी हुई पीढ़ी कहा जाता है, कभी ‘रील वाली पीढ़ी’, कभी संस्कारों से दूर और कभी पुरानी पीढ़ी के लिए चुनौती।
लेकिन 2026 में तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है।
सवाल अब यह नहीं रह गया है कि Gen Z क्या देखती है।
सवाल यह है कि Gen Z क्या चाहती है?
वह किस तरह का भारत चाहती है?
वह राजनीति से क्या उम्मीद करती है?
वह धर्म और संस्कृति को किस नजर से देखती है?
वह परिवार, नौकरी, पैसा, पर्यावरण और तकनीक को किस तरह समझती है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या भारत की राजनीति को आने वाले वर्षों में इस पीढ़ी की भाषा में बात करना सीखना पड़ेगा?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Gen Z केवल एक युवा आयु-समूह नहीं है। यह देश के भविष्य के मतदाताओं, उपभोक्ताओं, कर्मचारियों, उद्यमियों और डिजिटल नागरिकों का बड़ा हिस्सा है。
हाल के वर्षों में युवाओं की डिजिटल सक्रियता और राजनीतिक भागीदारी ने यह स्पष्ट किया है कि सोशल मीडिया अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया। यह मुद्दों को राष्ट्रीय बहस में लाने, राजनीतिक संदेश फैलाने और नेताओं से सवाल पूछने का प्रभावी माध्यम बन चुका है।
शायद यही वह समय है जब भारत को गंभीरता से समझना होगा कि Gen Z आखिर है क्या?
पहले समझिए—Gen Z कौन है?
आम तौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्म लेने वाले लोगों को Generation Z यानी Gen Z कहा जाता है।
इसका मतलब है कि 2026 में इस पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा किशोरावस्था से निकलकर कॉलेज, नौकरी, व्यवसाय और सामाजिक जीवन के महत्वपूर्ण चरण में पहुंच चुका है।
लेकिन Gen Z को एक ही तरह का समूह समझना पहली बड़ी गलती होगी।
इसमें गांव का युवा भी है और महानगर का युवा भी।
सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाला छात्र भी है और स्टार्टअप शुरू करने वाला युवा भी।
कंटेंट क्रिएटर भी है और खेत में काम करने वाला युवा भी।
इंजीनियरिंग का छात्र भी है और कला या पत्रकारिता पढ़ने वाला विद्यार्थी भी।
इसलिए Gen Z को किसी एक विचारधारा, धर्म, जाति या जीवनशैली से जोड़कर देखना संभव नहीं है।
फिर भी इस पीढ़ी में कुछ साझा विशेषताएं जरूर दिखाई देती हैं।
इनमें सबसे बड़ी है—डिजिटल दुनिया के साथ उसका गहरा रिश्ता।
जिस दुनिया में इंटरनेट बाद में आया, Gen Z उसमें इंटरनेट के साथ बड़ी हुई
पिछली पीढ़ियों के लिए इंटरनेट एक तकनीकी बदलाव था।
Gen Z के लिए इंटरनेट जीवन की सामान्य स्थिति है।
उसके लिए स्मार्टफोन केवल फोन नहीं है।
वही स्कूल है।
वही कॉलेज है।
वही बैंक है।
वही बाजार है।
वही मनोरंजन है।
वही दोस्ती का माध्यम है।
वही नौकरी खोजने की जगह है।
वही समाचार का माध्यम है।
और कई युवाओं के लिए वही ऑफिस भी है।
इसलिए जब पुरानी पीढ़ी पूछती है कि “ये बच्चे हर समय फोन में क्यों लगे रहते हैं?”, तो शायद सवाल को थोड़ा बदलने की जरूरत है।
क्या आज की दुनिया में फोन से बाहर रहकर जिंदगी पूरी तरह चल सकती है?
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है।
डिजिटल दुनिया अवसर देती है तो दबाव भी पैदा करती है।
लगातार नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया पर तुलना, ऑनलाइन पहचान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI के बढ़ते प्रभाव ने डिजिटल थकान को भी वास्तविक समस्या बना दिया है।
इसलिए Gen Z तकनीक की सबसे बड़ी उपयोगकर्ता होने के साथ-साथ तकनीक के दबाव को महसूस करने वाली पीढ़ी भी है。
राजनीति की स्क्रीन भी बदल गई
भारत में राजनीति का पारंपरिक मॉडल लंबे समय तक भाषण, रैली, अखबार और टेलीविजन बहसों पर टिका रहा।
अब राजनीति की एक नई स्क्रीन सामने है।
मोबाइल की वर्टिकल स्क्रीन।
रील्स।
शॉर्ट वीडियो।
मीम्स।
यूट्यूब शॉर्ट्स।
इंस्टाग्राम।
लाइव स्ट्रीम।
और कुछ सेकंड में वायरल हो जाने वाला राजनीतिक संदेश।
यह केवल सोशल मीडिया रणनीति का बदलाव नहीं है।
यह राजनीतिक संवाद की प्रकृति में बदलाव है।
पहले नेता बोलता था और जनता सुनती थी।
अब नेता बोलता है और जनता तुरंत प्रतिक्रिया देती है।
वह कमेंट करती है।
वीडियो बनाती है。发起
मीम बनाती है।
तथ्यों की जांच करती है。发起
समर्थन करती है।
विरोध करती है।
और कई बार नेता के संदेश से ज्यादा तेजी से अपना संदेश फैला देती है।
राजनीति अब केवल मंच से नहीं चलती। वह स्क्रीन से भी चलती है。
क्या Gen Z के पास 2029 में 40 करोड़ वोट होंगे?
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है।
भारत में लगभग 40 करोड़ Gen Z मतदाताओं की चर्चा 2029 के संदर्भ में की जाती रही है। लेकिन Gen Z की पूरी आबादी और उसके वास्तविक मतदाताओं की संख्या को एक मान लेना सही नहीं होगा।
Gen Z में ऐसे किशोर भी शामिल हैं जिनकी उम्र अभी 18 वर्ष नहीं हुई है और जो मतदान के पात्र नहीं हैं।
इसलिए 40 करोड़ को सीधे 2029 के पंजीकृत मतदाताओं की संख्या मानना उचित नहीं होगा।
लेकिन इससे Gen Z का राजनीतिक महत्व कम नहीं होता।
जो सदस्य मतदान की उम्र में हैं, वे आने वाले वर्षों में लगातार चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे।
और उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि Gen Z केवल मतदान नहीं करती।
वह राजनीतिक माहौल बनाती है।
वह मुद्दों को सोशल मीडिया पर उठाती है।
वह राजनीतिक नेताओं की छवि को प्रभावित करती है。
वह अपने परिवार और सामाजिक दायरे तक डिजिटल माध्यम से राजनीतिक संदेश पहुंचाती है。
इसलिए 2029 तक Gen Z का प्रभाव केवल मतदान केंद्र तक सीमित नहीं रहेगा। वह पूरे political communication ecosystem को प्रभावित कर सकती है。
क्या Gen Z धर्म और जाति की राजनीति खत्म कर देगी?
यह दावा करना जल्दबाजी होगी।
भारत में जाति, धर्म, क्षेत्र और समुदाय आज भी मजबूत सामाजिक और राजनीतिक पहचान हैं।
Gen Z भी इन्हीं सामाजिक संरचनाओं के बीच बड़ी हुई है。
इसलिए यह कहना कि Gen Z के आते ही जाति और धर्म की राजनीति समाप्त हो जाएगी, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
लेकिन बदलाव कहीं और दिखाई दे सकता है।
Gen Z एक साथ कई पहचानें लेकर चल सकती है।
वह धार्मिक हो सकती है, लेकिन धार्मिक राजनीति की आलोचक भी।
वह अपने समुदाय से जुड़ी हो सकती है, लेकिन दूसरे समुदायों के लोगों से डिजिटल संवाद भी कर सकती है。
वह अपनी संस्कृति पर गर्व कर सकती है, लेकिन संस्कृति के नाम पर थोपी गई किसी बात पर सवाल भी उठा सकती है。
यही जटिलता इस पीढ़ी को समझना कठिन बनाती है。
धर्म चाहिए, लेकिन सवालों के साथ
Gen Z को संस्कृति से दूर मान लेना भी एक आसान लेकिन अधूरा निष्कर्ष है。
आज का युवा मंदिर जा सकता है。
भजन सुन सकता है。
कृष्ण या शिव से जुड़े गीतों और कार्यक्रमों में भाग ले सकता है。
योग कर सकता है。
और उसी समय सोशल मीडिया पर किसी धार्मिक या राजनीतिक मुद्दे पर तीखा सवाल भी पूछ सकता है。
यानी आधुनिकता और धार्मिक आस्था को हमेशा एक-दूसरे का विरोधी मानना जरूरी नहीं है。
कई मामलों में Gen Z परंपरा को छोड़ नहीं रही, बल्कि उसे अपने तरीके से समझने और दोबारा परिभाषित करने की कोशिश कर रही है。
‘संस्कार’ कपड़ों से तय नहीं होते
Gen Z को लेकर सबसे आसान आरोप है—इसके कपड़े बदल गए, भाषा बदल गई, संगीत बदल गया, इसलिए संस्कार भी बदल गए。
लेकिन संस्कारों को केवल पहनावे से मापना शायद गलत पैमाना है。
किसी युवा के कपड़े क्या हैं, इससे यह तय नहीं होता कि वह अपने माता-पिता की कितनी चिंता करता है。
किसी के सोशल मीडिया फॉलोअर्स से यह तय नहीं होता कि वह समाज के लिए कितना संवेदनशील है。
और किसी की भाषा से यह तय नहीं होता कि वह अपनी संस्कृति को कितना समझता है。
Gen Z के भीतर एक साथ कई विरोधाभास दिखाई देते हैं。
परिवार भी चाहिए और स्वतंत्रता भी。
करियर भी चाहिए और जीवन भी。
पैसा भी चाहिए और मानसिक शांति भी。
आस्था भी चाहिए और सवाल पूछने का अधिकार भी。
यही विरोधाभास शायद इस पीढ़ी की सबसे बड़ी पहचान है。
पर्यावरण: Gen Z के लिए भविष्य नहीं, वर्तमान का सवाल
जलवायु परिवर्तन Gen Z के लिए कोई दूर की समस्या नहीं है。
गर्मी बढ़ रही है。
शहरों में प्रदूषण है。
पानी का संकट है。
मौसम का स्वरूप बदल रहा है。
बाढ़ और सूखे जैसी घटनाएं चिंता पैदा कर रही हैं。
युवा समझता है कि यदि आज पर्यावरण की कीमत पर विकास हुआ तो उसका असर सबसे लंबे समय तक उसी की पीढ़ी को झेलना पड़ेगा。
इसलिए पर्यावरण अब केवल पेड़ बचाने का मुद्दा नहीं रहा。
यह नौकरी का मुद्दा है。
स्वास्थ्य का मुद्दा है。
शहरों के रहने योग्य बने रहने का मुद्दा है。
और भविष्य की अर्थव्यवस्था का मुद्दा भी है。
‘आज की पीढ़ी नशे में डूबी है’—आंकड़े क्या कहते हैं?
यह भी ऐसा विषय है जहां भावनाओं से ज्यादा आंकड़ों की जरूरत है。
भारत में युवाओं के तंबाकू सेवन से जुड़े उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि 13 से 15 वर्ष आयु वर्ग के विद्यार्थियों में तंबाकू के वर्तमान उपयोग में समय के साथ गिरावट आई है。
इसका अर्थ यह नहीं है कि युवा तंबाकू या नशे से पूरी तरह मुक्त हो गए हैं。
ऐसा दावा गलत होगा。
लेकिन यह जरूर बताता है कि पूरी Gen Z को नशे और गैर-जिम्मेदार जीवनशैली की पीढ़ी मान लेना भी तथ्यों के अनुरूप नहीं है。
युवा स्वास्थ्य को लेकर जागरूक भी हो रहे हैं。
फिटनेस。
रनिंग。
जिम。
मानसिक स्वास्थ्य。
पोषण。
नींद。
ये सभी विषय आज की युवा बातचीत का हिस्सा हैं。
इसलिए Gen Z को समझने के लिए केवल उसके खिलाफ बनाए गए पुराने आरोपों को दोहराना पर्याप्त नहीं है。
शराब के मामले में भी ‘पूरी पीढ़ी’ का निष्कर्ष गलत होगा
Gen Z के बारे में अलग-अलग देशों में शराब के सेवन से जुड़ी अलग-अलग प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं。
लेकिन किसी दूसरे देश के आंकड़े को सीधे भारतीय Gen Z पर लागू नहीं किया जा सकता。
भारत में शराब का सेवन क्षेत्र, आयु, लिंग, आय, संस्कृति और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार काफी बदलता है。
इसलिए भारतीय Gen Z को न तो पूरी तरह नशे से दूर पीढ़ी कहा जा सकता है और न नशे में डूबी पीढ़ी。
यह पीढ़ी भी बाकी भारतीय समाज की तरह विविध है。
असली सवाल—Gen Z काम और करियर को कैसे देखती है?
यहां तस्वीर बेहद दिलचस्प है。
भारतीय Gen Z में नेतृत्व की महत्वाकांक्षा दिखाई देती है, लेकिन केवल ऊंचा पद हासिल करना ही उसका अंतिम लक्ष्य नहीं है。
वर्क-लाइफ बैलेंस और आर्थिक स्वतंत्रता युवा प्राथमिकताओं में महत्वपूर्ण बने हुए हैं。
इसके साथ आर्थिक दबाव भी वास्तविक है。
कई युवा नौकरी, शिक्षा, विवाह और अन्य बड़े जीवन निर्णयों को अपनी आर्थिक स्थिति के कारण टालने पर मजबूर हैं。
यह एक महत्वपूर्ण कहानी बताता है。
बाहर से Gen Z महत्वाकांक्षी दिखाई देती है。
अंदर से वह आर्थिक दबाव से भी जूझ रही है。
उसे नौकरी चाहिए。
लेकिन नौकरी मिलना ही पर्याप्त नहीं。
उसे ऐसी आय चाहिए जिससे वह घर चला सके。
परिवार की मदद कर सके。
भविष्य के लिए बचत कर सके。
और अपने लिए भी जीवन बचा सके。
यानी Gen Z सफलता चाहती है, लेकिन सफलता की परिभाषा बदल रही है。
AI: Gen Z का सबसे बड़ा अवसर या सबसे बड़ा खतरा?
अब इस कहानी में AI को शामिल करना अनिवार्य है。
जिस पीढ़ी ने स्मार्टफोन के साथ जीवन सीखा, वही पीढ़ी अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ काम करना सीख रही है。
भारत में Gen Z के बीच AI को काम में इस्तेमाल करने को लेकर आत्मविश्वास का स्तर ऊंचा दिखाई देता है。
AI Gen Z को बहुत कुछ दे सकता है。
कम लागत में सीखने की क्षमता。
तेजी से रिसर्च。
कंटेंट निर्माण。
कोडिंग。
डिजाइन。
अनुवाद。
बिजनेस प्लानिंग。
और नई तरह की उद्यमिता。
लेकिन AI खतरा भी है。
अगर मशीन कुछ शुरुआती स्तर के काम करने लगे तो entry-level jobs का स्वरूप बदल सकता है。
इसलिए Gen Z का अगला बड़ा संघर्ष शायद केवल नौकरी पाने का नहीं होगा。
बदलती दुनिया में खुद को लगातार उपयोगी बनाए रखने का होगा。
परिवार से दूर नहीं है Gen Z, लेकिन परिवार की परिभाषा बदल रही है
यह धारणा भी पूरी तरह सही नहीं है कि आधुनिक युवा परिवार से दूर भागना चाहता है。
भारतीय Gen Z की तस्वीर कहीं अधिक जटिल है。
भारत में परिवार भावनात्मक संस्था होने के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा का नेटवर्क भी है。
इसलिए युवा माता-पिता से जुड़ा रह सकता है और साथ ही यह भी कह सकता है—
“मेरी नौकरी का फैसला मैं करूंगा。”
“मेरी शादी का फैसला मेरी सहमति से होगा。”
“मेरे करियर का रास्ता अलग हो सकता है。”
यह परिवार का अंत नहीं है。
यह परिवार के भीतर individual choice के बढ़ने की प्रक्रिया है。
बाजार ने Gen Z को राजनीति से पहले पहचान लिया
राजनीतिक दल शायद अभी Gen Z को समझने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बाजार ने बहुत पहले इस पीढ़ी की शक्ति पहचान ली थी。
भारत में Gen Z उपभोक्ता खर्च को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रही है। एक प्रमुख अध्ययन के अनुसार, Gen Z भारत में लगभग 46 प्रतिशत consumer spending को प्रभावित करती है, जिसका अनुमानित मूल्य करीब 860 अरब डॉलर है。
यह आंकड़ा सीधे यह नहीं कहता कि Gen Z खुद 860 अरब डॉलर खर्च करती है। इसका अर्थ है कि उसके प्रभाव का दायरा उपभोक्ता खर्च में बहुत बड़ा है。
यह अंतर समझना जरूरी है。
Gen Z केवल उत्पाद नहीं खरीदती。
वह ब्रांड की कहानी देखती है。
उसकी authenticity देखती है。
उसकी social values देखती है。
ऑनलाइन reviews देखती है。
Influencers को देखती है。
और सबसे महत्वपूर्ण—दूसरे consumers की राय देखती है。
एक खराब product review कुछ ही घंटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है。
यानी बाजार में भी शक्ति का संतुलन बदल रहा है。
लेकिन Gen Z को ‘एक जैसा’ समझना सबसे बड़ी गलती होगी
यहां सबसे जरूरी सावधानी है。
Gen Z कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है。
यह कोई ideology नहीं है。
यह कोई religion नहीं है。
यह कोई caste group नहीं है。
और यह कोई uniform consumer category भी नहीं है。
Generation labels उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन उनके आधार पर हर युवा के व्यवहार का एक जैसा निष्कर्ष निकालना गलत होगा。
इसलिए “Gen Z ऐसा सोचती है” कहने से पहले यह पूछना जरूरी है—
कौन सी Gen Z?
शहरी या ग्रामीण?
कॉलेज शिक्षित या स्कूल शिक्षित?
नौकरी वाला या बेरोजगार?
मध्यम वर्ग या निम्न आय वर्ग?
महानगर या छोटा शहर?
महिला या पुरुष?
भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाला युवा एक जैसा नहीं हो सकता。
यही पत्रकारिता की सबसे जरूरी सावधानी है。
फिर Gen Z की असली पहचान क्या है?
शायद इसका जवाब एक शब्द में नहीं दिया जा सकता。
लेकिन एक चीज जरूर दिखाई देती है—
यह पीढ़ी सवाल पूछती है。
वह पूछती है—
क्यों?
किसलिए?
किस आधार पर?
इसका फायदा किसे मिलेगा?
इसका नुकसान किसे होगा?
मुझे आपकी बात क्यों माननी चाहिए?
और यही सवाल कई बार पुरानी पीढ़ी को असहज कर देता है。
लेकिन सवाल पूछना किसी समाज की कमजोरी नहीं。
लोकतंत्र में यह उसकी ताकत है。
Gen Z के लिए राजनीति का मतलब भी बदल सकता है
अगर कोई राजनीतिक दल यह समझता है कि Gen Z को केवल अच्छी रील दिखाकर प्रभावित किया जा सकता है, तो शायद वह इस पीढ़ी को कम समझ रहा है。
रील attention ला सकती है。
लेकिन विश्वास नहीं。
एक मीम वायरल हो सकता है。
लेकिन रोजगार की समस्या हल नहीं कर सकता。
एक सेल्फी लोकप्रिय हो सकती है。
लेकिन महंगाई का समाधान नहीं है。
एक भाषण तालियां ला सकता है。
लेकिन शिक्षा व्यवस्था की समस्या खत्म नहीं करता。
Gen Z को अंततः results चाहिए。
रोजगार。
बेहतर शिक्षा。
सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं。
बेहतर शहर。
सुरक्षित सार्वजनिक स्थान。
डिजिटल स्वतंत्रता。
उचित अवसर。
और ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें पढ़ाई के बाद सम्मानजनक नौकरी मिल सके。
इसलिए 2029 की राजनीति के लिए शायद सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि कौन सबसे अच्छी reel बनाता है。
सवाल होगा—
कौन Gen Z की वास्तविक जिंदगी की समस्याओं को सबसे बेहतर समझता है?
क्या Gen Z भारत की राजनीति बदल देगी?
शायद पूरी राजनीति एक झटके में नहीं बदलेगी。
जाति खत्म नहीं होगी。
धर्म खत्म नहीं होगा。
क्षेत्रीय पहचान खत्म नहीं होगी。
पुरानी राजनीतिक निष्ठाएं भी खत्म नहीं होंगी。
लेकिन इनके ऊपर एक नई परत जरूर जुड़ रही है。
Digital identity。
Career identity。
Environmental consciousness。
Individual choice。
Financial anxiety。
और questioning mindset。
यही नई परत आने वाले वर्षों में राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर सकती है。
असली चुनौती नेताओं के लिए है
Gen Z को खुश करना आसान नहीं होगा。
क्योंकि यह पीढ़ी केवल वादा सुनना नहीं चाहती。
यह पूछेगी—
वादा कब पूरा होगा?
डेटा क्या कहता है?
पैसा कहां से आएगा?
नौकरी कितनी बनेगी?
मेरे शहर में क्या बदलेगा?
मेरे कॉलेज के बाद मेरा भविष्य क्या होगा?
और अगर नेता का जवाब कमजोर हुआ तो Gen Z के पास एक और हथियार है—
उसका कैमरा。
वह खुद वीडियो बना सकती है。
अपनी कहानी बता सकती है。
और लाखों लोगों तक पहुंच सकती है。
यही डिजिटल युग में नागरिक शक्ति का नया रूप है。
Gen Z को बदलने की नहीं, समझने की जरूरत है
हर नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को असहज करती है。
आज की Gen Z भी वही कर रही है。
लेकिन इतिहास बताता है कि नई पीढ़ी पुरानी दुनिया को पूरी तरह नष्ट नहीं करती。
वह उसमें से कुछ चुनती है。
कुछ बदलती है。
कुछ छोड़ती है。
और कुछ नया बनाती है。
Gen Z भी शायद यही कर रही है。
उसे परिवार चाहिए—लेकिन अपनी आवाज के साथ。
उसे करियर चाहिए—लेकिन जिंदगी की कीमत पर नहीं。
उसे पैसा चाहिए—लेकिन केवल पैसा नहीं。
उसे धर्म चाहिए—लेकिन सवालों के साथ。
उसे संस्कृति चाहिए—लेकिन जड़ता के बिना。
उसे तकनीक चाहिए—लेकिन तकनीक की गुलामी नहीं。
और उसे राजनीति चाहिए—लेकिन ऐसी राजनीति जो उसे केवल चुनावी आंकड़ा न समझे。
Gen Z का सबसे बड़ा सवाल शायद यही है—
जिस भारत में हमें जीना है, वह भारत कैसा होगा?
यही सवाल आने वाले दशक में भारत की राजनीति से लेकर अर्थव्यवस्था, शिक्षा, रोजगार, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था तक को प्रभावित कर सकता है。
क्योंकि यह पीढ़ी केवल भविष्य की पीढ़ी नहीं है。
यह वर्तमान की शक्ति बन चुकी है。
और शायद यही कारण है कि अब नेताओं को केवल यह नहीं सोचना पड़ेगा कि अगला भाषण क्या होगा。
उन्हें यह भी सोचना पड़ेगा—
अगली पीढ़ी क्या पूछेगी?
और उस सवाल का जवाब क्या होगा?
संपादकीय निष्कर्ष
Gen Z को समझने का सबसे आसान तरीका उसके कपड़े, मोबाइल या भाषा को देखना नहीं है。
उसे समझने के लिए उसकी चिंताओं, आकांक्षाओं, सवालों और चुनावों को समझना होगा。
क्योंकि यह वही पीढ़ी है जो एक हाथ में स्मार्टफोन लेकर दुनिया से जुड़ी है और दूसरे हाथ से अपने भविष्य को पकड़ने की कोशिश कर रही है。
और भारत जैसे युवा देश में इसका अर्थ साफ है—
Gen Z को नजरअंदाज करना अब केवल युवा पीढ़ी को नजरअंदाज करना नहीं होगा। यह भारत के आने वाले कल को समझने से इनकार करना होगा。
आखिरी सवाल
शायद 2029 की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि Gen Z किस पार्टी के साथ जाएगी。
शायद उससे पहले एक और बड़ा सवाल खड़ा होगा—
क्या राजनीतिक दल Gen Z को केवल वोटर मानेंगे, या उसे भारत के भविष्य के साझेदार के रूप में समझेंगे?
क्योंकि जिस पीढ़ी ने सवाल पूछना सीख लिया है, उसे केवल भाषणों से लंबे समय तक संतुष्ट रखना आसान नहीं होगा。
उसे जवाब चाहिए। परिणाम चाहिए। अवसर चाहिए। और अपने भविष्य में अपनी हिस्सेदारी चाहिए。
यही Gen Z का असली सवाल है。
और शायद यही भारत का अगला बड़ा सवाल भी。
यह भी पढ़ें

Thakur Pawan Singh
7579990777




