नारी सशक्तिकरण, एआई और सोशल मीडिया के प्रभाव पर गोष्ठी में हुआ मंथन
Agra Desk, 🌐 tajnews.in | Thursday, 13 August, 2026, 8:45:00 PM IST.

tajnews.in | आगरा: जेन-जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सोशल मीडिया और नारी सशक्तिकरण जैसे समसामयिक विषयों पर सेठ पदम चंद जैन संस्थान के सभागार में गोष्ठी आयोजित की गई। इसमें वक्ताओं ने नई पीढ़ी के बदलते व्यवहार, तकनीक के बढ़ते प्रभाव और समाज में महिलाओं की भूमिका पर विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक तकनीक और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच नई पीढ़ी को अधिकारों के साथ जिम्मेदारियों, संस्कार और सामाजिक सरोकारों से जोड़ना भी जरूरी है।
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए शिक्षाविद डॉ. महेश शर्मा ने कहा कि जिम्मेदारियों से भागकर किसी नई और नकली दुनिया का निर्माण करने से मौजूदा दुनिया को नहीं बदला जा सकता। उन्होंने कहा कि नारी सृजक है और परिवार तथा समाज को दिशा देने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। उनके अनुसार परिवार में नारी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि बच्चे की पहली शिक्षक मां होती है। यदि मां बच्चे को अच्छे संस्कार और सही दिशा देती है तो वह आगे चलकर बेहतर नागरिक बन सकता है। डॉ. शर्मा ने कहा कि देश और समाज के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए परिवार में संस्कार और जिम्मेदारी की भूमिका मजबूत करना जरूरी है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ भाषा और व्यवहार की मर्यादा जरूरी
जंतर-मंतर पर हाल में हुए छात्र आंदोलन का संदर्भ देते हुए डॉ. महेश शर्मा ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ भाषा और व्यवहार की मर्यादा भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि गाली-गलौज और अभद्र व्यवहार को न तो आदर्श माना जा सकता है और न ही इसे नारी सशक्तिकरण या युवा शक्ति का प्रतीक कहा जा सकता है। उनके अनुसार समाज को संस्कारवान और जिम्मेदार भारतीय चरित्र की आवश्यकता है।
एआई के बढ़ते प्रभाव पर भी जताई चिंता
डॉ. महेश शर्मा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि तकनीक सुविधाएं उपलब्ध कराती है, लेकिन इसके अत्यधिक इस्तेमाल के संभावित दुष्प्रभावों पर भी विचार करना जरूरी है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह कैलकुलेटर के अत्यधिक इस्तेमाल से गणितीय क्षमताओं पर असर पड़ा, उसी तरह एआई के अनियंत्रित इस्तेमाल का मानव जीवन और सोच पर प्रभाव पड़ सकता है।
इसी अवसर पर डॉ. शशि तिवारी द्वारा अपनी मां जीया के जीवन पर लिखी पुस्तक ‘मां जैसा कोई नहीं जीया : एक युग’ का विमोचन भी किया गया। डॉ. महेश शर्मा ने पुस्तक का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संयोग है कि जीया का जन्म और 95 वर्ष की आयु में उनका निधन दोनों 30 जून को हुआ। उन्होंने पुस्तक को मां के जीवन, व्यक्तित्व और परिवार के प्रति उनके योगदान को शब्दों में सहेजने का प्रयास बताया।

नारी सशक्तिकरण की चुनौतियों को स्वीकार करना होगा : डॉ. गिरधर शर्मा
मुख्य अतिथि डॉ. गिरधर शर्मा ने कहा कि भारतीय परंपरा में नारी को शक्ति और देवी के स्वरूप में सम्मान दिया गया है। समय के साथ सामाजिक मान्यताएं बदली हैं और आज की नारी के सामने सशक्तिकरण की नई चुनौतियां हैं। उन्होंने कहा कि बदलते समय के अनुरूप महिलाओं को इन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना होगा।
उन्होंने कवयित्री डॉ. शशि तिवारी द्वारा अपनी मां के व्यक्तित्व और कृतित्व को पुस्तक के माध्यम से सामने रखने के प्रयास की सराहना की। उन्होंने कहा कि अपने पुरखों और परिवार की महत्वपूर्ण शख्सियतों को याद रखने की परंपरा समाज को अपनी जड़ों से जोड़ती है।
सड़क पर अभद्र व्यवहार नारी सशक्तिकरण नहीं : प्रो. कमलेश नागर
मुख्य वक्ता प्रो. कमलेश नागर ने जेन-जी के संदर्भ में कहा कि नई पीढ़ी को अपनी बात रखने और सवाल पूछने का पूरा अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भाषा और व्यवहार की मर्यादा भी महत्वपूर्ण है।
जंतर-मंतर पर हुए हालिया घटनाक्रम का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि सड़क पर अभद्र या उच्छृंखल व्यवहार को नारी सशक्तिकरण का नाम नहीं दिया जा सकता। उनके अनुसार सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ शिक्षा, आत्मनिर्भरता, निर्णय लेने की क्षमता, सम्मान और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ना है।

नई पीढ़ी से सीखने की जरूरत : दिलीप रघुवंशी
गोष्ठी का संचालन कर रहे दिलीप रघुवंशी ने नई और पुरानी पीढ़ी के बीच विचारों के अंतर पर बात रखी। उन्होंने कहा कि पुरानी पीढ़ी अक्सर नई पीढ़ी में कमियां तलाशती रही है, लेकिन आज की जेन-जी कई मामलों में पुरानी पीढ़ी से आगे की सोच लेकर चल रही है।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी से केवल अपेक्षाएं रखने के बजाय उससे सीखने की जरूरत भी है। उनके अनुसार तकनीक और बदलती परिस्थितियों को समझे बिना नई पीढ़ी के विचारों को पूरी तरह खारिज करना उचित नहीं होगा।
आभासी दुनिया के प्रभाव को समझना जरूरी : डॉ. कुसुम चतुर्वेदी
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कुसुम चतुर्वेदी ने कहा कि जंतर-मंतर के हालिया घटनाक्रम को देखकर उन्हें लगा कि आंदोलन अपनी मर्यादित और व्यवस्थित शैली में नहीं हो पाया। उन्होंने इसके पीछे आभासी दुनिया और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को भी एक कारण बताया।
जीया को याद करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं, जिन्हें यादों में ठहर जाने का हुनर आता है। उन्होंने कविता के माध्यम से मां के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त कीं।
एआई महिला सुरक्षा और स्वास्थ्य में भी उपयोगी : डॉ. ज्योत्सना रघुवंशी
डॉ. ज्योत्सना रघुवंशी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सकारात्मक पहलुओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि एआई जीवन में बदलाव ला रहा है और इसका इस्तेमाल महिला सुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि नई तकनीक के साथ कदमताल नहीं करने पर पीछे रह जाने का खतरा है। सोशल मीडिया की उपयोगिता को स्वीकार करते हुए उन्होंने इसके दुष्प्रभावों से सावधान रहने की जरूरत बताई। बढ़ते साइबर अपराधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने डिजिटल दुनिया में अधिक जागरूक और सतर्क रहने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि लक्ष्य ऐसा समाज बनाना होना चाहिए, जिसमें तकनीक के साथ मानवीय संवेदनाएं, सुरक्षा और समान अवसर भी सुनिश्चित हों।
शिक्षा के साथ संस्कार भी जरूरी : राज बहादुर राज
वरिष्ठ साहित्यकार राज बहादुर राज ने कहा कि आज के दौर में शिक्षा के साथ संस्कार भी बेहद जरूरी हैं। उन्होंने भारतीय परंपरा में नारी की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव के साथ महिलाओं की स्थिति में भी परिवर्तन आया है।
उन्होंने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कृति ‘यशोधरा’ के संदर्भ में नारी जीवन की परिस्थितियों पर चर्चा की और डॉ. शशि तिवारी की कविताओं के माध्यम से नारी के आत्मविश्वास और सशक्त स्वर को रेखांकित किया।

मां को समर्पित पुस्तक के बारे में भावुक हुईं डॉ. शशि तिवारी
कवयित्री डॉ. शशि तिवारी ने अपनी मां जीया के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करते हुए कहा कि ‘मां जैसा कोई नहीं जीया : एक युग’ केवल उनकी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह पुस्तक दुनिया भर की माताओं को समर्पित है।
उन्होंने कहा कि मां परिवार की बुनियाद होती है। मां का त्याग, स्नेह, अनुशासन और संस्कार आने वाली पीढ़ियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कविता और गीतों ने बांधा समां
कार्यक्रम में गायिका-कवयित्री शिवरंजिनी तिवारी ने मां को समर्पित अपनी भावपूर्ण रचना प्रस्तुत की। इसके बाद उन्होंने डॉ. शशि तिवारी द्वारा रचित मां को समर्पित गीत भी प्रस्तुत किया। गीत में मां के स्नेह, त्याग और वात्सल्य को केंद्र में रखा गया।
गायक परमानंद ने हिंडोला गायकी में मल्हार प्रस्तुत की, जबकि भगवान स्वरूप ने ढपली पर संगत की। पारंपरिक लोक-संगीत की प्रस्तुति ने कार्यक्रम को सांस्कृतिक रंग दिया।
दो लघु फिल्मों का भी प्रदर्शन
कार्यक्रम के दौरान दो लघु फिल्मों का प्रदर्शन भी किया गया। इन फिल्मों का लेखन, निर्देशन और निर्माण शिवरंजिनी तिवारी और मेजर शेखर ने किया था। फिल्मों के माध्यम से सामाजिक और समसामयिक विषयों को प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि प्रो. ब्रजेश रावत रहे। वक्ताओं में संजय तिवारी, पं. योगेश शर्मा योगी, अनिल जैन और डॉ. महेश धाकड़ सहित अन्य लोग शामिल रहे।
इस अवसर पर ब्रिगेडियर सौरभ तिवारी, कर्नल राजीव तिवारी, रजनी पांडेय, रश्मि शांडिल्य, शिप्रा तिवारी, रूपम, भावना, डॉ. विशाल, ममता, कुमकुम रघुवंशी, संजय शर्मा, विनोद दीक्षित, सुधांशु पांडेय, डॉ. नीलम भटनागर, संजय गुप्त, शरद गुप्त, राजकुमार दीक्षित, राजेंद्र शर्मा, डॉ. रुचिरा प्रसाद, स्वाति माथुर, श्वेता, जितेंद्र दीक्षित, आचार्य उमा शंकर और अनिल अरोड़ा संघर्ष सहित अनेक साहित्यकार, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।
कार्यक्रम के अंत में तिवारी परिवार के सदस्यों ने अतिथियों, वक्ताओं और उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया।
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Pawan Kumar Singh
Chief Editor, Taj News
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