Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 19 Mar 2026, 06:25 AM IST
Taj News Environment Desk
मुख्य बिंदु
- जल जीवन मिशन की सफलता के बावजूद भूजल के बेतहाशा दोहन से सूखते शहर और खेत।
- नीति आयोग की चेतावनी: 2030 तक 82 करोड़ भारतीयों पर गहराएगा पानी का भारी संकट।
- पंजाब (156%) और राजस्थान (147%) ने तोड़ी भूजल दोहन की सीमा; 730 क्षेत्र ‘रेड ज़ोन’ में।
- बेंगलुरु ने 79% जल निकाय खोए; बिना रेन-वाटर हार्वेस्टिंग के ‘डे ज़ीरो’ बनना तय।
हमारे घरों में जब भी नल खुलता है, तो उसमें से साफ पानी गिरता है। उसे देखकर हम सब बहुत चैन की सांस लेते हैं। लेकिन क्या आपने कभी अपनी ज़मीन के नीचे झांककर देखा है? वहां आज एक भयानक सन्नाटा पसरा हुआ है। वहां की मिट्टी में सूखी और गहरी दरारें पड़ चुकी हैं। और वहां एक ऐसा खौफनाक डर छुपा है, जो धीरे-धीरे हमारे कल के भविष्य को खा रहा है। क्या हम भारतीय सचमुच किसी पानी के देश में रहते हैं? या फिर हम बस अपने एक झूठे भ्रम में ही जी रहे हैं? हम अपनी जीवनदायिनी नदियों को पूजते तो बहुत हैं। लेकिन साथ ही हम अपने भारी प्रदूषण से उनका बेरहमी से दम भी घोंटते हैं!
आगामी 22 मार्च को विश्व जल दिवस (World Water Day) पर देश भर में बड़े-बड़े भाषण होंगे। बड़े होटलों में सेमिनार आयोजित होंगे। वहां मंच से कई नए संकल्प भी लिए जाएंगे। पर आज का कड़वा सच यह है कि हमारा भारत एक बहुत भयानक पानी के संकट की दहलीज़ पर खड़ा है। और यह हमारे लिए कोई भविष्य का या दूर का खतरा बिल्कुल नहीं है। बल्कि यह हमारी आज की सबसे बड़ी और भयानक सच्चाई है। यह संकट बिल्कुल अभी हमारे सामने है। आप ज़रा विकास की इस एक तस्वीर को ध्यान से देखिए। आज हम सब ‘जल जीवन मिशन’ की बड़ी सफलता का बहुत जश्न मना रहे हैं। साल 2019 में जहाँ देश के सिर्फ़ 17 प्रतिशत ग्रामीण घरों में नल लगा था। वहीं आज 81 प्रतिशत से ज़्यादा घरों तक पाइप से साफ पानी पहुँच चुका है। यह लगभग 15.8 करोड़ परिवारों का आंकड़ा है। यह कोई छोटी-मोटी उपलब्धि बिल्कुल नहीं है। यह वर्तमान सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति और उसकी कार्य क्षमता का एक बड़ा और सीधा प्रमाण है।
लेकिन क्या आपने इस सिक्के की दूसरी तस्वीर देखी है? आज हमारे बड़े शहर प्यासे तड़प रहे हैं। हमारे किसानों के खेत सूख रहे हैं। और ‘डे ज़ीरो’ (Day Zero), यानी वह मनहूस दिन जब नलों में हमेशा के लिए पानी आना बंद हो जाए। यह दिन अब किसी दूर देश की कोई काल्पनिक कहानी नहीं रही है। आज बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली और हैदराबाद जैसे महानगर पानी के लिए तरस रहे हैं। ये सभी शहर हमारे लिए एक बहुत बड़ी और साक्षात चेतावनी हैं। देश का नीति आयोग भी साफ़ शब्दों में यह कड़वी बात कहता है। नीति आयोग का अनुमान है कि 2030 तक हमारे देश में पानी की कुल मांग, उसकी कुल उपलब्धता से बहुत आगे निकल जाएगी। इसका सीधा मतलब है कि देश के लगभग 82 करोड़ लोग भारी जल संकट में होंगे। इसके अलावा 2050 तक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटकर मात्र 1,140 क्यूबिक मीटर ही रह जाएगी।
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यह भयानक स्थिति ‘एब्सोल्यूट स्कैरसिटी’ (पूर्ण जल अभाव) की अंतिम सीमा है। और क्या आप जानते हैं कि इसका हमारी अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा? इससे हमारी कुल जीडीपी पर लगभग 6 प्रतिशत तक की भारी चोट लग सकती है। हमारे शहर आज पानी बचाने के लिए आखिर क्या कर रहे हैं? वे सिर्फ भाग-दौड़ कर रहे हैं। वे केवल तात्कालिक और कच्चे इलाज ढूंढ रहे हैं। कहीं नई लंबी पाइपलाइन बिछाई जा रही है। कहीं दूर से पानी के टैंकर मंगाए जा रहे हैं। और कहीं समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने की महंगी योजनाएँ चल रही हैं। लेकिन हमारे जल संकट की असली कहानी तो ज़मीन के नीचे लिखी जा रही है। भूजल (Groundwater) हमारा सबसे बड़ा और सबसे चुपचाप साथ देने वाला साथी है। लेकिन आज वह हमारा सबसे ज़्यादा शोषित संसाधन भी बन चुका है।
जल शक्ति मंत्रालय की 2025 की ताज़ा रिपोर्ट कुछ राहत देती है। रिपोर्ट कहती है कि देश में ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड यूनिट्स’ (अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्र) 17 प्रतिशत से घटकर 10.8 प्रतिशत हो गईं हैं। यह आंकड़ा सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है। लेकिन हमेशा याद रखिए कि आधी सच्चाई भी पूरी तरह झूठ के ही बराबर होती है। आज भी देश के लगभग 730 क्षेत्र पूरी तरह से ‘रेड ज़ोन’ (खतरे के निशान) में हैं। हमारा भारत हर साल ज़मीन से 247 बिलियन क्यूबिक मीटर भूजल बेदर्दी से निकाल रहा है। भूजल की सुरक्षित सीमा क्या है? वह इस आंकड़े से बहुत कम है। देश में भूजल का कुल दोहन 60 प्रतिशत से ऊपर जा चुका है। कुछ राज्यों ने तो दोहन की सारी सीमाएँ ही बेशर्मी से तोड़ दी हैं। पंजाब आज अपनी क्षमता का 156 प्रतिशत पानी ज़मीन से खींच रहा है। राजस्थान 147 प्रतिशत पानी निकाल रहा है। हरियाणा, कर्नाटक और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कहानी भी बिल्कुल एक जैसी ही है।
यह सब कुछ ठीक वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति बैंक से अपनी जमा मूल पूंजी ही लगातार निकालता जाए। उसमें ना तो कोई नया ब्याज जुड़े और ना ही कोई सही संतुलन बचे। अंत में वह बैंक खाता बस पूरी तरह खाली हो जाएगा। आज बड़े-बड़े जल विशेषज्ञ हमें लगातार कड़ी चेतावनी दे रहे हैं। वे कहते हैं कि अगर ज़मीन का एक्वीफर (Aquifer) अपना ‘टिपिंग पॉइंट’ पार कर गया, तो फिर उसकी वापसी लगभग नामुमकिन हो जाएगी। और ऊपर से मौसम का यह नया खेल देखिए। जलवायु परिवर्तन (Climate Change) ने तो इस भयानक आग में सीधे घी डाल दिया है। धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है। हमारा सतही पानी बहुत तेजी से भाप बनकर उड़ रहा है। हमारा मानसून भी अब बिल्कुल भरोसेमंद नहीं रहा है। कहीं अचानक भारी बाढ़ आती है। तो कहीं महीनों तक सूखा पड़ता है। इस वजह से ज़मीन के पानी को रीचार्ज करने की वह प्राकृतिक लय अब पूरी तरह टूट चुकी है।
और इस संकट में हमारे शहरों का क्या हाल है? उन्होंने तो अपने प्राकृतिक ‘स्पंज’ खुद ही हमेशा के लिए नष्ट कर दिए हैं। शहरों के पुराने तालाब, मीठे पानी की झीलें और वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि)। कभी ये सभी जल निकाय हमारे शहरों की खुली सांस हुआ करते थे। अकेले बेंगलुरु ने 1973 से 2016 के बीच अपने 79 प्रतिशत जल निकाय पूरी तरह खो दिए हैं। पंजाब ने भी अपने आधे से ज्यादा जल स्रोत हमेशा के लिए गंवा दिए हैं। और यह सब सिर्फ कंक्रीट के जंगल खड़े करने और ज्यादा खेती के लालच के नाम पर हुआ है। ये पुराने जलाशय सिर्फ़ शहर की सुंदरता बढ़ाने के लिए नहीं थे। बल्कि ये बारिश के पानी से भूजल को सीधा रिचार्ज करते थे। ये शहरों में आने वाली बाढ़ को रोकते थे। ये गंदे पानी को साफ़ करते थे। और सबसे बड़ी बात, ये पूरे शहर को भयंकर गर्मी में भी ठंडा रखते थे।
हमने अपने लालच में उन्हें हमेशा के लिए मिटा दिया। और अब हम प्यासे होकर पानी के टैंकरों के पीछे पागलों की तरह भाग रहे हैं। आज मार्च 2026 है। अभी तो असली और कड़कड़ाती गर्मी शुरू भी नहीं हुई है। फिर भी देश के 166 बड़े जलाशयों में आज सिर्फ़ 56.7 प्रतिशत पानी ही बचा है। दक्षिण और मध्य भारत में तो कई बड़े डैम आज आधे से भी कम भरे हुए हैं। इसका मतलब बिल्कुल साफ़ है। जैसे-जैसे गर्मी और करीब आएगी, वैसे-वैसे पानी का यह संकट और भी ज्यादा गहराएगा। हमारे गरीब किसान बहुत परेशान होंगे। खेतों में खड़ी फसलें बुरी तरह झुलसेंगी। पानी की कमी से फैक्ट्रियाँ भी अपना उत्पादन घटाएँगी। और शहरों में पीने के पानी के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगेंगी। पानी का यह भयानक संकट अपने साथ सिर्फ़ प्यास ही नहीं लाता है। बल्कि यह अपने साथ भुखमरी भी लाता है।
हमारा भारत आज दुनिया की कुल 18 प्रतिशत आबादी को अपना अनाज खिलाता है। लेकिन दुख की बात है कि उसके पास दुनिया के सिर्फ़ 4 प्रतिशत जल संसाधन ही मौजूद हैं। यह पानी का संतुलन तो पहले से ही बहुत नाजुक था। अब तो यह पूरी तरह टूटने के कगार पर आ गया है। इसके आर्थिक अनुमान भी अब बहुत डराने लगे हैं। जलवायु का तापमान बढ़ने से देश का गेहूं उत्पादन 50 प्रतिशत तक बुरी तरह गिर सकता है। और चावल का उत्पादन 40 प्रतिशत तक कम हो सकता है। ज़रा सोचिए। अगर पानी नहीं होगा, तो खेतों की सिंचाई बिल्कुल नहीं होगी। अगर सिंचाई नहीं होगी, तो पैदावार और अनाज नहीं होगा। और अगर अनाज नहीं होगा, तो देश में महंगाई, भूख और भयंकर कुपोषण फैलेगा। स्वास्थ्य का एक नया संकट अलग से खड़ा होगा। भारत का लगभग 70 प्रतिशत भूजल आज पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है। उसमें खतरनाक आर्सेनिक, फ्लोराइड और जानलेवा बैक्टीरिया घुले हुए हैं।
गंदे पानी से डायरिया, हैजा और टाइफॉइड जैसी बीमारियां फैलती हैं। इससे हर साल लाखों लोग गंभीर रूप से बीमार पड़ते हैं। हजारों बेकसूर लोगों की असमय जानें जाती हैं। यानी जो थोड़ा बहुत पानी आज हमारे पास बचा है, वह भी पीने के लिए बिल्कुल सुरक्षित नहीं है। तो फिर अब हमारे पास क्या रास्ता बचा है? क्या सिर्फ बारिश ही हमें इस संकट से बचा सकती है? हाँ, बिल्कुल बचा सकती है। लेकिन तभी, जब हम बारिश को बचाने के लिए सिर्फ खोखले नारे नहीं, बल्कि एक ठोस नीति बनाएं। हमें रेनवॉटर हार्वेस्टिंग (Rainwater Harvesting) को घर-घर में अपनाना होगा। हमें रूफटॉप सिस्टम और रीचार्ज पिट्स बनाने होंगे। हमें अपने पुराने और सूखे कुओं, बावड़ियों और तालाबों का तुरंत पुनर्जीवन करना होगा। चेन्नई ने इस मामले में देश को एक बहुत अच्छा रास्ता दिखाया है। वहां पानी बचाने का कड़ा कानून बना। वह कानून सख्ती से लागू भी हुआ। और अब उसका ज़मीनी असर भी वहां साफ दिखा है।
अब हमें सख्त ज़रूरत है कि इसे देश के हर शहर में तुरंत लागू किया जाए। हर नई बनने वाली बिल्डिंग में वाटर हार्वेस्टिंग को पूरी तरह अनिवार्य किया जाए। पुरानी सभी इमारतों में इसकी रेट्रोफिटिंग (Retrofitting) की जाए। इसके साथ ही हमें अपनी बची हुई झीलों और वेटलैंड्स की पूरी रक्षा करनी होगी। हमें अपने कीमती भूजल के दोहन पर एक बहुत सख्त नियंत्रण लगाना होगा। यह काम बिल्कुल भी आसान नहीं है। लेकिन यह काम नामुमकिन भी नहीं है। हमारे सामने तस्वीर बिल्कुल साफ़ है। हमारा भूजल तेजी से घट रहा है। हमारे बड़े जलाशय भारी दबाव में हैं। हमारी झीलें शहरों से गायब हैं। हमारा मौसम बहुत अनिश्चित है। और हमारी खाद्य सुरक्षा बहुत गहरे खतरे में है। ये सभी चेतावनियाँ हमारे लिए कोई नई नहीं हैं।
सरकारी रिपोर्ट्स तो पिछले कई सालों से लगातार आ रही हैं। फर्क सिर्फ इतना सा है कि अब हमारे पास समय बहुत कम बचा है। तो अब हमारा सवाल बहुत सीधा है। क्या हम भारतीयों के पास इसे बदलने की कोई सच्ची इच्छाशक्ति है? हमारी सरकारों को अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएँ तुरंत बदलनी होंगी। हमारे शहरों को विकास के नाम पर कंक्रीट बिछाने के बजाय ज़मीन के नीचे झांकना होगा। सरकारों को सिर्फ कानून बनाना नहीं होगा, बल्कि उसे डंडे के ज़ोर पर लागू भी करना होगा। और हम आम नागरिकों का क्या? हमें पानी को हमेशा के लिए ‘अनलिमिटेड’ (असीमित) समझना तुरंत बंद करना होगा। हमारे नल में बहता हुआ यह पानी, बिल्कुल भी अनंत नहीं है। जल जीवन मिशन ने यह साबित कर दिखाया है। अगर सरकार और जनता का पक्का इरादा हो तो कोई भी बदलाव संभव है। अब समय आ गया है एक बहुत बड़ी शहरी जल क्रांति का। वरना ‘डे ज़ीरो’ सिर्फ अख़बार की कोई डरावनी हेडलाइन नहीं रहेगा। बल्कि यह हमारी रोज़ाना की दिनचर्या बन जाएगा। पानी सिर्फ़ एक प्राकृतिक संसाधन नहीं है। बल्कि यह हमारी पूरी मानव सभ्यता की सबसे अहम नब्ज़ है। इसे आज ही बचाइए। इसे कल के लिए बहने दीजिए। वरना हमारी आने वाली पीढ़ियाँ एक दिन हमसे जरूर पूछेंगी: “आखिर हमारी वे कल-कल बहती नदियाँ कहाँ गईं?” और यकीन मानिए, तब हमारे पास उन्हें देने के लिए कोई भी जवाब नहीं होगा।
Pawan Singh
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