Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 18 Mar 2026, 11:35 PM IST
Taj News Opinion Desk
मुख्य बिंदु
- ईरान युद्ध में नेताओं का भारी अहंकार बन रहा है लाखों बेगुनाह लोगों की मौत का सबसे बड़ा कारण।
- अफगानिस्तान और इराक युद्ध की तरह ही यह नया युद्ध सिर्फ मौत और तबाही ला रहा है।
- बंदूक उठाना बहुत आसान है, लेकिन शांति के लिए अपना हाथ बढ़ाना हमेशा बहुत मुश्किल होता है।
- महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला के विचारों से ही इस पूरी दुनिया में सच्ची शांति आ सकती है।
दरअसल, ईरान कितने दिन टिकेगा? पंद्रह दिन? या फिर एक महीना? या लंबी और थकी हुई सांसों में यह सिलसिला सालों तक खिंचेगा? हरीश राणा की तरह ही हर कोई आज यही सोच रहा है। यह सवाल बिल्कुल सीधा है। लेकिन इसका जवाब बहुत उलझा हुआ है। क्योंकि कोई भी मुल्क ताश के पत्ते नहीं होता। हवा चली और वे ढह गए। वास्तव में सभ्यताएं इतनी सस्ती कभी नहीं होती हैं। उनकी मिट्टी में सदियों का पुराना इतिहास गड़ा होता है। लोगों की रगों में एक अजीब सी जिद दौड़ती है। हालांकि, उनके दिल में एक गहरा डर भी पलता है। और इन सबके ऊपर हमेशा इंसान होते हैं। दुर्भाग्य से, युद्ध में यही इंसान हर बार कुचले जाते हैं。
आज सीमा पर तोपें गरज रही हैं। टीवी स्टूडियो के एंकर जोर-जोर से दहाड़ते हैं। वे नक्शों पर लाल-पीले तीर चलाते हैं। वास्तव में, उन एंकरों की आवाज़ में बहुत सारा बारूद घुला होता है। पर इस युद्ध की असली कहानी क्या है? वह कहानी अस्पताल के बाहर रोती हुई एक बेबस माँ लिखती है। इसके अलावा, मलबे में दबा हुआ एक मासूम बच्चा चीखकर वह कहानी सुनाता है। इसलिए, हम बार-बार पूछते हैं। आखिर ईरान यह खूनी ईरान युद्ध क्यों लड़ रहा है? क्या यह अपनी सुरक्षा के लिए है? या फिर सिर्फ अपनी सत्ता बचाने के लिए? या शायद सिर्फ इसलिए कि अब पीछे हटना उनकी “हार” कहलाएगा? सच हमेशा बहुत कड़वा होता है। दरअसल, यह ईरान युद्ध किसी ठोस तर्क से नहीं चल रहा है। बल्कि यह नेताओं के भारी अहंकार से ज्यादा चल रहा है。
अब आप दूसरी तरफ भी देखिए। वहां अमेरिका और इजराइल खड़े हैं। उनके पास असीमित ताकत है। उनके पास सबसे आधुनिक तकनीक है। उनकी एक बहुत आक्रामक रणनीति है। वे एक चलते हुए भारी बुलडोज़र की तरह हैं। इसलिए दुनिया उन्हें “सुपरपावर” कहती है। लेकिन उनकी नैतिकता बिल्कुल जीरो है। उनके लिए यह कहना बहुत आसान है। वे कहते हैं कि हम दुश्मनों को बुरी तरह कुचल देंगे। लेकिन इतिहास उनकी इस बात पर हल्की सी मुस्कान देता है। क्या आपको अफगानिस्तान का भयानक युद्ध याद है? क्या आपको इराक की वह भारी तबाही याद है?
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हमेशा याद रखिए कि आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते हैं। साल 2001 से लेकर 2023 तक का समय देखिए। अफगानिस्तान, इराक और 9/11 के बाद के कई युद्धों में भारी तबाही हुई। वहां 9 लाख 40 हजार से ज्यादा मासूम लोग मारे गए। इनमें 4 लाख 32 हजार तो बिल्कुल आम नागरिक थे। अगर हम अप्रत्यक्ष मौतों की बात करें, तो वह आंकड़ा और भी डरावना है। लगभग 36 से 38 लाख लोग भूख और बीमारी से मरे। नतीजतन, कुल मिलाकर 45 से 47 लाख जिंदगियां हमेशा के लिए राख हो गईं। अमेरिका ने वहां पूरे 20 साल बिताए। उसने 2.3 ट्रिलियन डॉलर का भारी खर्च किया। और आखिर में इसका नतीजा क्या निकला? वहां सच्ची शांति आज भी पूरी तरह लापता है। ताकत हमेशा किसी देश की जमीन तो आसानी से जीत लेती है। लेकिन वह ताकत वहां के लोगों का दिल कभी नहीं जीत पाती है。
फिर हम बहुत गुस्से में पूछते हैं। आज के ये स्वार्थी नेता क्या कर रहे हैं? आखिर किसके लिए ये मासूम लोग रोज़ाना मर रहे हैं? चाहे वह वालोडीमयर जिलेन्स्की हो या फिर डोनाल्ड ट्रंप। नेताओं के नाम हमेशा बदलते रहते हैं। लेकिन यह खूनी कहानी बिल्कुल वही रहती है। ऊंची कुर्सी पर बैठा एक इंसान युद्ध का फैसला करता है। लेकिन जमीन पर खड़ा एक आम इंसान उसकी भारी कीमत चुकाता है। यह बिल्कुल सीधी सी बात है। कोई भी नेता किसी इंसान से बड़ा नहीं होता। कोई भी विचारधारा आम आदमी की जान से ज्यादा कीमती नहीं हो सकती। चाहे वह तानाशाह हिटलर हो या फिर क्रूर स्टालिन! उन सबने इंसानियत का खून बहाया。
पर हम इंसान इस कड़वे सच को मानते नहीं हैं। हम अक्सर कहते हैं। यह हमारी इज्जत का बड़ा सवाल है। हम किसी के आगे झुकेंगे नहीं। हम खुशी से मर जाएंगे, पर हम अपनी हार नहीं मानेंगे। ठीक है, आप अपनी जिद पर अड़े रहिए। आप शौक से लड़िए। पर आप यह बात हमेशा याद रखिए। बंदूक से निकली गोली कभी किसी की इज्जत नहीं देखती है। वह सिर्फ आम इंसानों का जिस्म बेदर्दी से चीरती है। हमारा पूरा इतिहास हमेशा निर्दोषों के खून से ही लिखा गया है। यह बहुत ही भयानक सच्चाई है。
महान कलिंगा वार के बाद सम्राट अशोक को सच्चा ज्ञान मिला था। पर क्या हमें हमेशा ऐसा ही करना होगा? क्या हर बार पहले खून की एक बड़ी नदी बहेगी? और क्या उसके बाद ही हमारी सोई हुई बुद्धि जागेगी? आखिर यह कैसी अक्ल है? पहले अपना पूरा घर जलाओ। और फिर आग बुझाने की कोई नई किताब पढ़ो। इस दुनिया का सबसे बड़ा झूठ आखिर क्या है? नेता कहते हैं कि “यह हमारी आखिरी जंग होगी।” लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। दरअसल, हर एक जंग हमेशा अगली जंग को जन्म देती है। इस बीच में असल में क्या होता है? मासूमों का बचपन बुरी तरह टूटता है। लोगों के घर हमेशा के लिए उजड़ जाते हैं। और उनका भविष्य पूरी तरह राख बन जाता है。
तो फिर शांति का सही रास्ता क्या है? वह रास्ता समझौता है। वह रास्ता आपसी बातचीत है। वह रास्ता थोड़ा सा झुकना है। यह सचमुच बहुत कड़वा है। पर यह किसी भी जंग से बहुत कम कड़वा है। यहीं पर हमें महान महात्मा गांधी बहुत याद आते हैं। उनके पास न तो कोई हथियार था। उनके पास न ही कोई बड़ी सेना थी। फिर भी उन्होंने एक बहुत बड़े साम्राज्य को झुका दिया था। उन्होंने यह सब सिर्फ अपने सत्याग्रह से किया। उन्होंने अपनी नैतिक ताकत से यह सब कर दिखाया। उनकी वह कड़ी चेतावनी आज भी दुनिया में गूंजती है। उन्होंने कहा था कि “आँख के बदले आँख, पूरी दुनिया को हमेशा के लिए अंधा कर देगी।” इसलिए, हमें यह सबक हमेशा याद रखना चाहिए。
फिर हमें मार्टिन लूथर किंग जूनियर की याद आती है। उन्होंने भी एक बहुत बड़ी बात कही थी। उन्होंने कहा था कि युद्ध कभी किसी समस्या का हल नहीं होता है। बल्कि वह उस समस्या का सिर्फ एक बड़ा विस्तार है। और फिर नेल्सन मंडेला को याद कीजिए। वे पूरे 27 साल तक एक अंधेरी जेल में रहे। जब वे बाहर आए, तो उन्होंने बदला बिल्कुल नहीं लिया। इसके बजाय उन्होंने शांति का मेल-मिलाप चुना। उन्होंने दुनिया से कहा कि नफरत हमेशा एक राष्ट्र को तोड़ती है। जबकि माफी हमेशा एक मजबूत राष्ट्र को बनाती है। यह सोच बहुत बड़ी है。
यही इंसान की सबसे असली बहादुरी है। हाथ में बंदूक उठाना बहुत आसान काम है। लेकिन दोस्ती के लिए हाथ बढ़ाना बहुत मुश्किल है। आप खुद ही सोचिए। भारत के नक्सलियों ने हिंसा से आखिर क्या हासिल किया? यह सच बिल्कुल साफ है। अगर इंसान की जिंदगी बची रहे, तो सब कुछ फिर से खड़ा हो सकता है। एक टूटा हुआ देश भी फिर से बन सकता है। खोई हुई इज्जत भी वापस मिल सकती है। और एक नया विचार भी पनप सकता है। पर किसी भी कब्र से कोई भी राष्ट्र कभी नहीं उठता है। युद्ध सिर्फ विनाश लाता है。
आप यह कड़वा सच ध्यान से सुनिए। कोई भी जंग कभी बहादुरी नहीं होती है। यह अक्सर हमारी बेबसी की आखिरी चीख होती है। और हमारी जिंदगी? वह हमें सिर्फ एक ही बार मिलती है। “जिंदगी न मिले दोबारा”, यह सिर्फ कोई फिल्मी लाइन नहीं है। वास्तव में यह हम सबके लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी है। फिर भी हम इंसान बार-बार वही पुरानी गलती दोहराते हैं। आज मासूम बच्चों के स्कूलों पर भारी बम गिरते हैं। मरीजों के अस्पताल बमबारी में जलते हैं। और इन सबके बीच इंसानियत अपना दम तोड़ती है। यह इंसानियत की बहुत बड़ी हार है。
इस ईरान युद्ध में न तो इधर वाले पूरी तरह सही हैं। और न ही उधर वाले पूरी तरह सही हैं। बीच में सिर्फ ताकत और अथाह दौलत का एक गंदा खेल चल रहा है। आज दुनिया के बड़े-बड़े ज्ञानी लोग आखिर कहां छुप गए हैं? आज दुनिया के वे तथाकथित शांति के दूत कहां हैं? उनकी आवाज आज क्यों नहीं उठती है? क्या आज नोबेल शांति पुरस्कार सिर्फ एक दिखावटी तमगा बनकर रह गया है? और इस दुनिया की असली सच्चाई क्या है? आज हमारे पास एक बिल्कुल मूर्ख नेतृत्व है। उनके पास पत्थर युग की एक बहुत सड़ी हुई सोच है। इसलिए इस 21वीं सदी में भी वही पुराना खून-खराबा चल रहा है। दुनिया आज भी वहीं खड़ी है。
चाहे वह तबाह होता यूक्रेन हो या फिर जलता हुआ ईरान। इस ईरान युद्ध में मरता सिर्फ आम आदमी ही है। हमेशा उजड़ता उसी का अपना घर है। हमेशा जलता उसी का अपना भविष्य है। आखिर इस सब से हमें हासिल क्या होता है? अगर हर बड़ी समस्या का हल सिर्फ एक भयंकर युद्ध है। तो फिर हमारा यह आधुनिक विकास आखिर कैसा है? यह हमारी कैसी महान सभ्यता है? हमारा इतिहास हमारे कानों में बार-बार फुसफुसाता है। वह कहता है कि किसी की अंधी जिद कभी नहीं जीतती है। अंत में सिर्फ इंसान की समझदारी ही जीतती है। अब यह बड़ा फैसला सीधे हमारे सामने खड़ा है। क्या हम जंग की इस खूनी जिद को चुनेंगे? या फिर हम इंसानियत और जिंदगी की जीत को चुनेंगे? हमें यह ईरान युद्ध तुरंत रोकना ही होगा。
Pawan Singh
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