Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 18 Mar 2026, 11:35 AM IST
Taj News Political Desk
मुख्य बिंदु
- प्रधानमंत्री के चुनाव-पूर्व प्रचार दौरे खत्म होते ही चुनाव आयोग द्वारा तारीखों के ऐलान पर उठे गंभीर सवाल।
- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव: एक जरूरी नैतिक आवाज।
- मतदान और मतगणना के बीच लंबे अंतराल और ईवीएम में डाले गए व गिने गए वोटों के ‘बेमेल’ आंकड़ों पर सवाल।
- पश्चिम बंगाल और असम में ‘घुसपैठियों’ के नाम पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और मतदाता सूची से काटे गए 50 लाख नाम।
भारत के चुनाव आयोग ने 15 मार्च को विधानसभा चुनावों के अगले महत्वपूर्ण चरण की तारीखों की आधिकारिक घोषणा कर दी है। लेकिन यह कहने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है कि चुनाव आयोग ने इन तारीखों की घोषणा करने के लिए बहुत सोच-समझकर इंतजार किया। आयोग ने चुनाव में जाने वाले सभी राज्यों के प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव से ऐन पहले के दौरे के पूरी तरह खत्म हो जाने का इंतजार किया। इस मैराथन दौरे में प्रधानमंत्री ने हरेक चुनावी राज्य में एक ओर बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के उद्घाटनों से लेकर नई घोषणाओं तक का पूरा सरकारी काम-काज किया। और दूसरी ओर, उन्होंने अपनी पार्टी के पक्ष में धुआंधार राजनीतिक और चुनावी प्रचार भी किया। अपने चुनाव-पूर्व चुनाव प्रचार के दौरों के इस चक्र में प्रधानमंत्री मोदी ने 11 मार्च को केरल का सघन दौरा किया। 12 मार्च को प्रधानमंत्री तमिलनाडु के एक अहम दौरे पर रहे। 13 मार्च को असम में प्रधानमंत्री का घोषणाओं से भरा प्रचार दौरा हुआ। और अंत में 14 मार्च को प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल के दौरे पर पहुंचे। वहां उन्होंने मुश्किल से आधे भरे हुए ब्रिगेड मैदान में एक रैली के साथ अपने इस लंबे दौरे का समापन किया। और इसके ठीक अगले ही दिन चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनाव की तारीखों की आधिकारिक घोषणा कर दी।
बेशक, भारतीय राजनीति में यह कोई पहली बार नहीं हुआ है, जब चुनाव की तारीखों की घोषणा और प्रधानमंत्री के चुनाव-पूर्व प्रचार कार्यक्रम की तारीखों में ऐसा सटीक और हैरान करने वाला तालमेल हुआ हो। उल्टे, साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी राज की पूर्ण स्थापना के बाद से जितने भी महत्वपूर्ण चुनाव हुए हैं, उन सभी में यह सचेत और स्पष्ट तालमेल देखने को मिला है। वास्तव में अब तो हमारे देश में यह इस हद तक पूरी तरह सामान्य बनाया जा चुका है कि शुरू में कुछ चुनावों के मामले में इस पर सवाल उठाए जाने के बाद, धीरे-धीरे न सिर्फ मुख्यधारा के मीडिया तथा राजनीतिक टीकाकारों ने, बल्कि कई विरोधी राजनीतिक पार्टियों तक ने इस पर सवाल उठाना ही पूरी तरह बंद कर दिया है। इसलिए यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि इस बार भी, सोशल मीडिया पर बस कुछ छुटपुट टिप्पणियों को छोड़कर, चुनाव आयोग की इस स्पष्ट कारगुजारी को शायद ही किसी ने ध्यान देने लायक समझा हो।
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लेकिन, ऐसा बार-बार होने से चुनाव आयोग के इस कूटनीतिक खेल में निहित बेईमानी, किसी भी तरह से छोटी या महत्वहीन बिल्कुल नहीं हो जाती है। उल्टे यह स्थिति तो सीधे इसी बात का इशारा करती है कि किस तरह, चुनाव आयोग से एक स्वायत्त और संवैधानिक निकाय के रूप में स्वतंत्र तथा पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से काम करने की जो अपेक्षाएं थीं, वे अब समाप्तप्राय: (खत्म होने के कगार पर) हैं। देश के इस माहौल को देखते हुए कोई हैरानी की बात नहीं है कि स्वतंत्र भारत के लंबे इतिहास में पहली बार, वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग के खिलाफ, लगभग समूचा विपक्ष आज एक साथ खड़ा है। विपक्ष औपचारिक रूप से अपना ‘अविश्वास’ जताने के लिए पूरी तरह तैयार हो गया है। और उन्हें पद से हटाने के लिए संसद के सामने विधिवत रूप से एक प्रस्ताव भी लाया गया है।
यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह बिल्कुल नहीं है कि विपक्ष के चुनाव आयोग के खिलाफ उठाए गए इस तरह के कड़े कदम के सफल होने की कोई वास्तविक संभावनाएं हैं भी हैं या नहीं? भारत के महान संविधान निर्माताओं ने, इस देश के जनतंत्र के लिए स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव की सबसे बड़ी अहमियत को समझा था। और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के लिए, हर प्रकार के राजनीतिक दबावों से सुरक्षित चुनाव आयोग सुनिश्चित करने की अपनी गहरी मंशा से, उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को पद से हटाए जाने की कानूनी प्रक्रिया को, पर्याप्त रूप से बहुत अधिक कठिन बनाया है। हालांकि, इस देश की संसद के हाथों में ही यह बड़ा अधिकार सौंपा गया है। लेकिन संसद भी अपने किसी साधारण बहुमत से चुनाव आयुक्तों को आसानी से नहीं हटा सकती है। इसकी संवैधानिक प्रक्रिया वैसी ही बहुत जटिल तथा अर्द्घ-न्यायिक (क्वासी-ज्यूडिशियल) है, जैसी कि देश के उच्चतर न्यायालय के न्यायाधीशों के मामले में ‘इंपीचमेंट’ (महाभियोग) की प्रक्रिया होती है।
वर्तमान ताज़ा मामले में तो मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव पर पर्याप्त संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर जमा होने के बाद भी कई बाधाएं हैं। इसके किसी सदन में विचार के लिए आधिकारिक रूप से स्वीकार किए जाने समेत, अनेकानेक कठिन चरणों से इसे क्रमवार आगे बढ़ना अभी बाकी है। इसलिए, इस अविश्वास प्रस्ताव का अंतिम हश्र क्या होगा, इस पर आज अटकल लगाने का कोई ठोस उपयोग नहीं है। वैसे भी जब वर्तमान चुनाव आयोग पर सबसे असली और संगीन आरोप सत्ताधारी भाजपा के साथ सीधा पक्षपात करने का है। संसद के दोनों अहम सदनों में सत्तापक्ष की भारी संख्या को देखते हुए, किसी बड़े चमत्कार से ही इस प्रस्ताव को कामयाबी मिल सकती है। अन्यथा इसका पूरी तरह विफल होना तो तय ही माना जा रहा है। इसके बावजूद, जिसमें इस प्रस्ताव का विफल होना तयशुदा होना भी शामिल है, इस ऐतिहासिक प्रस्ताव का रखा जाना बिल्कुल निरर्थक नहीं है। इस प्रस्ताव का रखा जाना, देश के मौजूदा हालात पर आलोचना की एक बहुत मजबूत नैतिक आवाज है। जहां सत्ताधारी भाजपा और उसकी ‘मोदीशाही’ ने, इस महान जनतंत्र को चलाने वाली लगभग सभी संवैधानिक संस्थाओं को इस तरह भीतर से पूरी तरह खोखला कर दिया है कि, आज उनकी साख ही खत्म हो गयी है। वर्तमान समय की इन विद्रूपताओं की ऐसी नैतिक और तीखी आलोचना पेश करना ही, लोकतंत्र में विपक्ष का असली काम है। वैसे तो समाज में जनमत निर्माता के रूप में मीडिया का भी यही मुख्य काम है। लेकिन मोदीशाही ने एक संस्था के रूप में इस देश के मीडिया को पहले ही इस कदर डराकर खोखला कर दिया है कि वह वर्तमान सत्ता की आलोचना करना ही भूल गया है। और वह सिर्फ सत्ताधारियों की दिन-रात खुशामद करने के लायक ही रह गया है।
प्रसंगवश यह बात भी कहते चलें कि ऐसी ही एक कूटनीतिक और नैतिक आलोचना प्रस्तुत करने का काम, संसद के चालू सत्र में भी हुआ था। लोकसभा स्पीकर, ओम बिड़ला के खिलाफ आए एक अविश्वास प्रस्ताव ने भी यही काम किया था। जो कि स्वतंत्र भारत के लंबे इतिहास का इस तरह का सिर्फ तीसरा ही प्रस्ताव था। बेशक, वह अविश्वास प्रस्ताव संसद में विफल हो गया और ओम बिड़ला आज भी लोकसभा स्पीकर के पद पर ज्यों के त्यों बने हुए हैं। याद रहे कि इससे कुछ समय पहले, राज्यसभा में सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ भी सदन में उनके कथित पक्षपातपूर्ण आचरण के लिए, एक अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन, उस प्रस्ताव को सदन में विचार के लिए तकनीकी कारणों से स्वीकार ही नहीं किया गया। हालांकि इसके कुछ ही समय बाद जगदीप धनखड़ ने अचानक राज्यसभा के सभापति तथा भारत के उपराष्ट्रपति के पद से अपना इस्तीफा दे दिया। जिसके असली कारणों को लेकर आज तक देश में एक गहरा रहस्य बना ही हुआ है। अगर अविश्वास की इस तरह की खुली अभिव्यक्तियां, देश की वर्तमान व्यवस्था की जनतांत्रिक आलोचना का एक बहुत ही जरूरी हिस्सा हैं। तो बार-बार इस तरह अविश्वास जताए जाने की नौबत का आना, बेशक इस वर्तमान जनतांत्रिक व्यवस्था के संकट की असली गहराई को दिखाता है। और अविश्वास की ऐसी गंभीर अभिव्यक्तियों को भी अनसुना कर के मौजूदा व्यवस्था का उसी पुराने रास्ते पर चलते रहना बहुत खतरनाक है। मिसाल के तौर पर ओम बिड़ला का या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का, अपने ऊंचे ओहदे का पहले जितना ही पक्षपातपूर्ण तरीके से लगातार उपयोग करते रहना। यह सब वर्तमान शासन द्वारा रचे गए इस संकट के वर्तमान शासन के रहते हुए ‘असाध्य’ (लाइलाज) होने को ही दिखाता है।
खैर! अब हम विधानसभा चुनावों के आगामी चक्र पर लौटें, जिसकी तारीखों की 15 मार्च को चुनाव आयोग ने घोषणा की है। इन अहम तारीखों को तय करने में भी चुनाव आयोग की एक अतार्किक और स्पष्ट मनमानी की ओर अनेक टिप्पणीकारों ने देश का ध्यान खींचा है। मिसाल के तौर पर असम, केरल तथा पुडुचेरी के चुनाव, सिर्फ एक ही चरण में 9 अप्रैल को संपन्न हो जाएंगे। इसके पूरे 14 दिन बाद, 23 अप्रैल को तमिलनाडु के सभी चुनाव होंगे और पश्चिम बंगाल के पहले चरण के चुनाव होंगे। पश्चिम बंगाल के दूसरे चरण के चुनाव 29 अप्रैल को होंगे। और इसके पूरे पांच दिन बाद, 4 मई को सभी राज्यों के वोटों की एक साथ गिनती की जाएगी। इसका सीधा और स्पष्ट नतीजा यह है कि असम, केरल तथा पुडुचेरी की जनता को मतदान के बाद, अपने नतीजों के लिए पूरे 25 दिन तक लंबा इंतजार करना पड़ेगा। ऐसा आखिर क्यों? अनेक टिप्पणीकारों ने इस बात पर भी बड़े सवाल उठाए हैं कि आखिरी चरण के मतदान और मतगणना के बीच पूरे पांच दिन का अनावश्यक अंतर क्यों रखा गया है? जब पुराने जमाने में (ईवीएम से पहले के जमाने में) बैलेट पेपर से, मतदान के एक-डेढ़ दिन में ही मतगणना शुरू हो जाती थी। तो आज ईवीएम (EVM) जैसी तेज़ मशीनों के जमाने में मतदान और मतगणना में इतना लंबा अंतराल क्यों जरूरी है? यह बात भी हम आपको याद दिला दें कि विशेष रूप से 2024 के आम चुनाव के बाद से, चुनाव आयोग ने एक नई परंपरा शुरू की है। वह मतदान की शाम के बाद, मतगणना के दिन तक कुल मत फीसद (Voter Turnout) का आंकड़ा बहुत रहस्यमयी तरीके से बढ़ाने को जैसे अपना नियम ही बना लिया है। जिसका कोई भी विश्वसनीय और तार्किक स्पष्टीकरण चुनाव आयोग द्वारा अब तक नहीं दिया गया है। इसी प्रकार का कोई भी विश्वसनीय स्पष्टीकरण, कुल डाले गए वोटों और ईवीएम में गिने गए वोटों की संख्या के ‘बेमेल’ (Mismatch) होने की समस्या का भी नहीं दिया गया है। यह समस्या देश के अधिकांश चुनाव क्षेत्रों में सामने आ रही है। चुनाव आयोग के इस आम पक्षपातीपन के साथ जुड़कर यह सब, देश की चुनाव की पूरी प्रक्रिया को ही गहरे और खतरनाक संदेहों के घेरे में ले आता है।
और अंत में एक सबसे जरूरी बात और। खासतौर पर पश्चिम बंगाल और असम में प्रधानमंत्री के 13-14 मार्च के धुआंधार दौरे हुए। और उसके ठीक पहले गृहमंत्री अमित शाह के उन राज्यों के दौरों से एक बात साफ हो गई है। यह साफ हो गया है कि भाजपा, कम से कम इन दोनों राज्यों में यह चुनाव सबसे बढ़कर तथाकथित ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ के ज्वलंत मुद्दे पर ही लड़ने जा रही है। जो असल में मुस्लिमविरोधी दुष्प्रचार और बहुसंख्यक लामबंदी का ही दूसरा नाम है। प्रधानमंत्री ने तो वहां खुलेआम ‘रोटी, माटी, बेटी पर खतरे’ का एक आक्रामक नारा भी दे दिया है। 2024 के आम चुनाव के समय से ही खुद प्रधानमंत्री के प्रत्यक्ष नेतृत्व में भाजपा, इस खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक मंच का लगातार और बेखौफ सहारा ले रही है। हाल ही में बिहार के विधानसभा चुनाव में भी मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए खासतौर पर इसी हथकंडे का सहारा लिया गया था। लेकिन, जो चुनाव आयोग आम चुनाव के बाद से ही केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को इस नंगी सांप्रदायिक दुहाई का बेरोक-टोक इस्तेमाल करने दे रहा है। क्या वह अब अचानक अपनी इस गहरी कुंभकर्णी नींद से जागेगा? और क्या वह सत्ताधारी पार्टी की इस बढ़ती और खतरनाक प्रवृत्ति को रोकेगा? यह हमेशा याद रहे कि चुनाव में सांप्रदायिक दुहाई का सहारा लेना, भारत के कानून में एक दंडनीय चुनावी अपराध है।
यह भी याद रहे कि पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की एसआईआर (SIR) की भारी मनमानी ने एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। जिसे केंद्र की सत्ताधारी पार्टी का ही पूरा आशीर्वाद हासिल है। (जिसका घुसपैठिया राग ही असल में इस मनमानी के पूरे केंद्र में है), और जिसे दुखद रूप से सुप्रीम कोर्ट का भी अनुमोदन हासिल है। इस मनमानी ने वहां पचास लाख से ज्यादा मतदाताओं के मूल मताधिकार पर ही एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिए हैं। ‘न्यायाधीन’ (Sub-judice) होने के नाम पर संदेह की सूची में धकेले गए ये पचास लाख से ज्यादा नाम कोई छोटी बात नहीं हैं। ये 2024 के आम चुनाव की मतदाता सूचियों में पहले ही काटे गए पचास लाख से ज्यादा नामों के ऊपर से काटे गए हैं। मतदाता सूचियों की इस तरह की बेखौफ चीर-फाड़ के बाद, क्या जनता की सच्ची इच्छा की अभिव्यक्ति के रूप में, इस देश में ‘चुनाव’ का कोई अर्थ भी रह जाएगा? यह एक ऐसा ज्वलंत सवाल है, जिसका जवाब आज देश के हर नागरिक को खोजना चाहिए।
Pawan Singh
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