वायरल बुखार और सांस के मरीजों की बाढ़ से इमरजेंसी और मेडिसिन वार्ड फुल; फर्श और बेंच पर इलाज कराने को मजबूर हुए तीमारदार, 20 अतिरिक्त बेड लगाए गए, फीवर ओपीडी शुरू
फिरोजाबाद डेस्क, 🌐 tajnews.in | शनिवार, 12 सितंबर 2026, 11:02:15 AM IST

tajnews.in | फिरोजाबाद। मौसम बदलते ही वायरल बुखार, सांस संबंधी परेशानी और हादसों के मरीज बढ़े तो फिरोजाबाद मेडिकल कॉलेज की स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव खुलकर सामने आ गया। शुक्रवार को इमरजेंसी, मेडिसिन और सर्जरी वार्ड के बेड पूरी तरह भर गए। जगह की कमी के चलते कुछ मरीजों को फर्श और बेंच पर उपचार कराना पड़ा। अस्पताल के अनुसार करीब 30 गंभीर मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं। एक तरफ मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में करीब 1800 मरीज पहुंचे, दूसरी तरफ भर्ती मरीजों के लिए बेड कम पड़ गए। प्रशासन ने तत्काल 20 अतिरिक्त बेड लगाने की व्यवस्था की है और वायरल बुखार के मरीजों के लिए अलग फीवर ओपीडी भी शुरू की गई है। लेकिन मौजूदा भीड़ को देखते हुए सवाल उठ रहा है कि क्या यह व्यवस्था आने वाले दिनों का दबाव संभाल पाएगी? यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पिछले कुछ दिनों में इसी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर मरीजों और तीमारदारों की शिकायतें लगातार सामने आई हैं। 7 सितंबर को 200 शैया अस्पताल में एक मरीज की मौत के बाद पर्चा बनवाने की व्यवस्था पर सवाल उठे थे और 11 सितंबर को सरकारी ट्रॉमा सेंटर में बिजली गुल होने के बाद डॉक्टरों को करीब 15 मिनट तक मोबाइल की रोशनी में मरीज देखने पड़े।
बेड नहीं मिला तो फर्श पर शुरू हुआ इलाज
शुक्रवार को ईडी-3 वार्ड में कृष्णा नगर निवासी 50 वर्षीय प्रेमदास सांस लेने की परेशानी के साथ पहुंचे। बेड उपलब्ध नहीं होने पर उन्हें जमीन पर लिटाकर उपचार दिया गया। खैरगढ़ क्षेत्र के 15 वर्षीय कन्हैया को सड़क हादसे के बाद सीएचसी से मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था। उसे भी तत्काल बेड उपलब्ध नहीं हो सका और फर्श पर ही उपचार करना पड़ा। जनरल वार्ड में भी स्थिति सामान्य नहीं रही। सम्राट नगर की 24 वर्षीय मुस्कान और हाजीपुरा की 12 वर्षीय अफसा को एक ही बेड पर भर्ती किए जाने की स्थिति सामने आई। ये घटनाएं बताती हैं कि दबाव सिर्फ ओपीडी तक सीमित नहीं है, बल्कि भर्ती मरीजों के लिए उपलब्ध बुनियादी क्षमता भी चुनौती में है।
1800 मरीजों की ओपीडी ने बढ़ाया दबाव
मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार के अनुसार वायरल संक्रमण के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं। सांस फूलने और ऑक्सीजन की जरूरत वाले मरीज भी अस्पताल पहुंच रहे हैं। शुक्रवार को मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में करीब 1800 मरीज पहुंचे। इतनी बड़ी संख्या में मरीज आने से इमरजेंसी, जांच और वार्डों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन जब ओपीडी का दबाव भर्ती क्षमता तक पहुंच जाता है और मरीजों को फर्श पर उपचार देना पड़ता है, तब यह केवल भीड़ का मामला नहीं रह जाता—यह अस्पताल की क्षमता और आपातकालीन प्रबंधन की भी परीक्षा बन जाता है।
30 मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट पर
अस्पताल में शुक्रवार की स्थिति का अंदाजा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है—
30 इमरजेंसी बेड: पूरी तरह भरे
110 मेडिसिन वार्ड बेड: फुल
करीब 30 मरीज: ऑक्सीजन सपोर्ट पर
20 अतिरिक्त बेड: तत्काल लगाए गए
करीब 1800 मरीज: ओपीडी में पहुंचे
सबसे बड़ी चिंता उन मरीजों को लेकर है जिन्हें ऑक्सीजन या लगातार निगरानी की जरूरत है। ऐसे मरीजों के लिए केवल अतिरिक्त बेड पर्याप्त नहीं होते; ऑक्सीजन सपोर्ट, नर्सिंग स्टाफ, मॉनिटरिंग और डॉक्टरों की उपलब्धता भी उतनी ही जरूरी है।
वायरल मरीजों के लिए अलग फीवर ओपीडी शुरू
बढ़ती भीड़ को नियंत्रित करने के लिए 10 सितंबर को जिला अस्पताल परिसर में फीवर ओपीडी शुरू की गई। इसका उद्देश्य बुखार से पीड़ित मरीजों को अलग व्यवस्था के तहत चिकित्सकीय परामर्श उपलब्ध कराना और मुख्य ओपीडी तथा इमरजेंसी पर अनावश्यक दबाव कम करना है। इससे एक बात स्पष्ट है कि प्रशासन ने वायरल मरीजों की बढ़ती संख्या को अलग से मैनेज करने की जरूरत महसूस की है।
डीएम ने 9 सितंबर को दिए थे अलग व्यवस्था के निर्देश
मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए जिलाधिकारी संतोष कुमार शर्मा ने 9 सितंबर को मेडिकल कॉलेज, ट्रॉमा सेंटर और सरकारी अस्पतालों में मरीजों को तत्काल उपचार उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। वायरल बुखार के मरीजों के लिए अलग ओपीडी और विशेष काउंटर बनाने पर भी जोर दिया गया था। स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक प्रशासन ने स्वास्थ्य विभाग और मेडिकल कॉलेज प्रशासन को व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद अगले दिन बेड के लिए मरीजों को फर्श पर उपचार कराना पड़ा। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि निर्देश और जमीनी व्यवस्था के बीच कितना अंतर है।
कुछ ही दिनों में सामने आईं कई शिकायतें
मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़े अस्पतालों की व्यवस्था को लेकर पिछले एक सप्ताह में कई शिकायतें सामने आई हैं। 7 सितंबर को 200 शैया अस्पताल में एक गंभीर मरीज की मौत के बाद परिजनों ने आरोप लगाया कि नए पर्चे की प्रक्रिया के कारण उपचार में देरी हुई। अस्पताल प्रशासन ने मामले में रिपोर्ट मांगी और जिम्मेदारी तय करने की बात कही। उसी दिन ट्रॉमा सेंटर में एक मरीज के परिजनों ने गंदी चादर, जरूरी दवाओं की उपलब्धता और स्टाफ की मौजूदगी को लेकर हंगामा किया था। सीएमएस ने मामले की जांच और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई का आश्वासन दिया था। फिर 11 सितंबर को ट्रॉमा सेंटर में करीब 15 मिनट बिजली गुल रहने के दौरान डॉक्टरों और कर्मचारियों को मोबाइल की रोशनी में मरीजों की जांच और पर्चे लिखने पड़े। अलग-अलग घटनाओं को जोड़कर देखें तो सवाल सिर्फ बेड की कमी का नहीं, बल्कि पूरी मरीज प्रबंधन व्यवस्था की क्षमता का बन जाता है।
संक्रमण नियंत्रण भी बड़ी चुनौती
एक ही जगह पर अलग-अलग बीमारियों से पीड़ित मरीजों की बढ़ती संख्या संक्रमण नियंत्रण के लिए भी चुनौती है। वायरल बुखार के मरीजों के साथ सांस संबंधी समस्या वाले मरीज, टीबी जैसे संक्रामक रोगों के मरीज और हादसों में घायल लोग भी अस्पताल पहुंचते हैं। ऐसे में आइसोलेशन, पर्याप्त वेंटिलेशन, मास्क, स्वच्छता और मरीजों की श्रेणी के अनुसार अलग व्यवस्था जरूरी हो जाती है। हालांकि, हर बुखार को किसी गंभीर संक्रामक बीमारी से जोड़ना सही नहीं होगा। मौजूदा स्थिति में प्रशासन के सामने प्राथमिक चुनौती बढ़े हुए मरीज भार को सुरक्षित तरीके से संभालने की है।
ट्रॉमा सेंटर में बिजली गुल होने से भी उठे सवाल
11 सितंबर की घटना ने अस्पताल की बुनियादी सुविधाओं पर भी सवाल खड़े किए। सरकारी ट्रॉमा सेंटर में बिजली आपूर्ति करीब 15 मिनट बाधित रही और वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध न होने के कारण डॉक्टरों को मोबाइल फोन की रोशनी में मरीजों की जांच करनी पड़ी। यह घटना ऐसे समय सामने आई जब अस्पताल पहले से ही मरीजों की भारी भीड़ का सामना कर रहा है। आपातकालीन और ट्रॉमा सेवाओं में बैकअप बिजली व्यवस्था महज सुविधा नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा बुनियादी इंतजाम है।
डॉक्टरों और स्टाफ पर भी बढ़ा दबाव
मेडिकल कॉलेज प्रशासन का कहना है कि मौसम बदलने के साथ बुखार, उल्टी-दस्त और सांस संबंधी समस्या वाले मरीजों की संख्या बढ़ी है। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. नवीन जैन के अनुसार मरीजों की सुविधा के लिए 20 अतिरिक्त बेड तत्काल लगाए गए हैं। उनका कहना है कि किसी मरीज को बिना उपचार लौटाना उद्देश्य नहीं है, इसलिए बेड उपलब्ध न होने की स्थिति में वैकल्पिक स्थानों पर भी उपचार किया जा रहा है। लेकिन यहां भी सवाल यही है कि यदि मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती है तो अतिरिक्त बेड के साथ अतिरिक्त डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, ऑक्सीजन, जांच सुविधाएं और दवाओं की व्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ाई जा सकती है।
क्षमता बढ़ाने की जरूरत पहले से रही है
फिरोजाबाद मेडिकल कॉलेज में मरीजों की संख्या को देखते हुए पहले भी बेड क्षमता बढ़ाई जा चुकी है। 2023 में मेडिकल कॉलेज के विभिन्न विभागों में 108 अतिरिक्त बेड बढ़ाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बावजूद मौसमी बीमारी के बढ़ते दबाव में यदि वार्डों के बेड पूरी तरह भर जाते हैं और मरीजों को फर्श पर उपचार देना पड़ता है, तो यह संकेत है कि मांग और उपलब्ध क्षमता के बीच अंतर अभी भी बना हुआ है।
क्या 20 अतिरिक्त बेड काफी होंगे?
यही इस समय सबसे बड़ा व्यावहारिक सवाल है। यदि मरीजों की संख्या अगले कुछ दिनों में और बढ़ती है तो केवल 20 बेड जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा। अस्पताल को एक साथ कई मोर्चों पर तैयारी करनी होगी— बेड क्षमता + ऑक्सीजन + नर्सिंग स्टाफ + डॉक्टर + दवाएं + जांच सुविधा + संक्रमण नियंत्रण + बैकअप बिजली। इनमें से किसी एक व्यवस्था पर अत्यधिक दबाव आने पर पूरी स्वास्थ्य सेवा प्रभावित हो सकती है।
सवाल सिर्फ फर्श पर इलाज का नहीं
फर्श पर मरीज का इलाज होते दिखना निश्चित रूप से परेशान करने वाली तस्वीर है, लेकिन इसके पीछे का बड़ा सवाल अस्पताल की मरीज प्रबंधन क्षमता का है। क्या अस्पताल के पास मौसमी बीमारी के अचानक बढ़ने की स्थिति के लिए पर्याप्त रिजर्व बेड हैं? क्या गंभीर मरीजों के लिए अलग ट्रायेज और प्राथमिकता व्यवस्था प्रभावी है? क्या ऑक्सीजन की जरूरत वाले मरीजों के लिए पर्याप्त सपोर्ट उपलब्ध है? क्या फीवर ओपीडी मुख्य इमरजेंसी पर दबाव वास्तव में कम कर पाएगी? और क्या अतिरिक्त बेड के साथ उन्हें संचालित करने के लिए पर्याप्त स्टाफ भी उपलब्ध है?
आने वाले दिनों में होगी असली परीक्षा
फिरोजाबाद मेडिकल कॉलेज में फिलहाल प्रशासन ने फीवर ओपीडी, अलग काउंटर और 20 अतिरिक्त बेड जैसे तत्काल कदम उठाए हैं। लेकिन मरीजों की संख्या अगर इसी तरह बढ़ती रही तो इन व्यवस्थाओं की वास्तविक परीक्षा आने वाले दिनों में होगी। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि अस्पताल में कितने बेड हैं। असली कसौटी यह है कि गंभीर मरीज को समय पर बेड मिले, उसे सुरक्षित उपचार मिले और अस्पताल की भीड़ के बीच संक्रमण या व्यवस्था की कमी उसके इलाज में बाधा न बने। फिरोजाबाद की मौजूदा तस्वीर इसी सवाल को सामने ला रही है—क्या 1800 मरीजों की भीड़ के बीच सरकारी अस्पताल की व्यवस्था हर मरीज को फर्श नहीं, बल्कि समय पर सुरक्षित और सम्मानजनक इलाज देने की क्षमता रखती है?
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Pawan Kumar Singh
Chief Editor, Taj News
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