पुतिन के दिल्ली पहुंचने के बाद आज मोदी-पुतिन की अहम मुलाकात; S-400 की अंतिम डिलीवरी, BrahMos-NG और Su-57 पर चर्चा की संभावना, रक्षा के साथ ऊर्जा, परमाणु, भुगतान व्यवस्था, व्यापार और तकनीकी सहयोग भी एजेंडे में
राष्ट्रीय डेस्क, 🌐 tajnews.in | शुक्रवार, 11 सितंबर 2026, 06:48:15 AM IST

tajnews.in | नई दिल्ली। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिल्ली पहुंच चुके हैं और आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अहम द्विपक्षीय मुलाकात होने जा रही है। इसके अगले दिन यानी 12 सितंबर से नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन शुरू होगा। ऐसे में मोदी-पुतिन बैठक को केवल द्विपक्षीय मुलाकात के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत-रूस संबंधों की अगली दिशा तय करने वाली बातचीत के रूप में भी देखा जा रहा है। दोनों नेताओं की बातचीत में रक्षा, ऊर्जा, परमाणु सहयोग, व्यापार, निवेश, भुगतान व्यवस्था और तकनीकी साझेदारी प्रमुख मुद्दे रह सकते हैं। रक्षा क्षेत्र में S-400 की लंबित डिलीवरी और BrahMos के अगले संस्करण के साथ Su-57 स्टील्थ फाइटर पर भी खास नजर है। हालांकि, बातचीत में किसी मुद्दे का शामिल होना और उस पर अंतिम समझौता होना दो अलग बातें हैं।
रक्षा सहयोग में क्या बड़ा हो सकता है?
भारत-रूस रक्षा संबंधों में इस बैठक के दौरान S-400, BrahMos और Su-57 सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल हो सकते हैं। रूस ने S-400 की लंबित डिलीवरी को लेकर अपनी प्रतिबद्धता पूरी करने की बात कही है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने भी कहा है कि रूस भारत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पूरी करेगा।
S-400 का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत पहले ही इस प्रणाली की खरीद का बड़ा सौदा कर चुका है और अब लंबित डिलीवरी को पूरा करना दोनों देशों के रक्षा सहयोग की विश्वसनीयता से जुड़ा मामला है। मार्च 2026 में भारत ने भी अपनी सैन्य आधुनिकीकरण योजनाओं के तहत रूसी S-400 प्रणालियों से संबंधित खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी थी। इससे साफ है कि एयर डिफेंस के क्षेत्र में रूस की भूमिका अभी समाप्त नहीं हुई है।
BrahMos में अगली छलांग की तैयारी
BrahMos भारत-रूस रक्षा साझेदारी की उन सफल परियोजनाओं में है, जिसने दोनों देशों के संबंधों को पारंपरिक खरीदार-विक्रेता मॉडल से आगे बढ़ाया है। अब फोकस BrahMos-NG और अगली पीढ़ी की मिसाइल क्षमताओं पर है। BrahMos-NG को मौजूदा BrahMos की तुलना में हल्का बनाने का उद्देश्य इसे ज्यादा प्लेटफॉर्म पर तैनात करने की क्षमता हासिल करना है।
रूस ने BrahMos के उन्नयन, संयुक्त उत्पादन और भविष्य में निर्यात सहयोग को आगे बढ़ाने में रुचि दिखाई है। इसलिए मोदी-पुतिन बातचीत में सवाल केवल नई मिसाइल खरीद का नहीं, बल्कि तकनीक, उत्पादन और निर्यात में भारत की भूमिका बढ़ाने का भी हो सकता है।
Su-57 पर सबसे ज्यादा नजर
बैठक का सबसे बड़ा रक्षा आकर्षण Su-57 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर हो सकता है। क्रेमलिन ने पहले ही संकेत दिया है कि Su-57 की भारत को संभावित बिक्री एजेंडे में है। रूस विमान की पेशकश के साथ उत्पादन तकनीक पर भी बातचीत के लिए तैयार है, जबकि भारत की रुचि केवल विमान खरीदने के बजाय तकनीक और स्थानीय उत्पादन में अधिक बताई जा रही है।
यहीं पर बातचीत मुश्किल भी हो सकती है। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की तकनीक किसी भी देश के लिए अत्यंत संवेदनशील होती है। इसलिए रूस कितना तकनीकी हस्तांतरण करेगा और भारत में कितना उत्पादन संभव होगा, यह किसी भी संभावित समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। इसलिए फिलहाल Su-57 को संभावित बातचीत का बड़ा मुद्दा कहना ज्यादा उचित है, इसे पक्का रक्षा सौदा मानना नहीं।
खरीदार-विक्रेता रिश्ते से आगे बढ़ने की कोशिश
भारत-रूस रक्षा संबंध अब केवल तैयार हथियार खरीदने तक सीमित नहीं रहना चाहते। नई दिल्ली की प्राथमिकता है कि बड़े रक्षा सौदों में स्थानीय उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण, रखरखाव और संयुक्त विकास की हिस्सेदारी बढ़े। रूस भी यह कह चुका है कि दोनों देशों का सैन्य सहयोग केवल खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है और संयुक्त उत्पादन आगे बढ़ाया जा रहा है।
भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश तेजी से रक्षा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। रूस के साथ पुराने रक्षा संबंधों का लाभ उठाते हुए नई तकनीक और उत्पादन क्षमता को भारतीय उद्योग से जोड़ना इस साझेदारी का अगला चरण हो सकता है।
परमाणु ऊर्जा में भी बड़ा एजेंडा
रक्षा के साथ नागरिक परमाणु ऊर्जा भारत-रूस संबंधों का दूसरा बड़ा स्तंभ है। कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना में रूस की भूमिका लंबे समय से रही है। दोनों देशों के बीच रूसी डिजाइन वाले VVER-1200 रिएक्टर, उपकरणों के स्थानीयकरण और परमाणु संयंत्र के उपकरणों के संयुक्त निर्माण पर सहयोग की दिशा पहले से तय है।
भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक के संयुक्त दस्तावेजों में परमाणु ईंधन चक्र, मौजूदा कुडनकुलम इकाइयों के लाइफ-साइकिल सपोर्ट और गैर-बिजली उपयोगों में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। इसके अलावा छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMR भी भविष्य के सहयोग का संभावित क्षेत्र बन सकते हैं। रूस ने भारत के सामने इस तकनीक में सहयोग का प्रस्ताव रखने के संकेत दिए हैं।
अब सिर्फ तेल नहीं, व्यापार में विविधता पर जोर
भारत-रूस व्यापार में ऊर्जा की भूमिका बहुत बड़ी हो गई है। लेकिन नई दिल्ली अब संबंधों को केवल तेल आयात पर आधारित नहीं रखना चाहती। 10 सितंबर को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भारत-रूस आर्थिक साझेदारी को तेज करने की बात कही। दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर और दोतरफा निवेश को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। मौजूदा व्यापार करीब 60 अरब डॉलर के स्तर पर बताया गया है।
गोयल ने फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो कंपोनेंट, ट्रैक्टर, रसायन, खाद्य उत्पाद और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों और MSME के लिए संभावनाओं पर जोर दिया है। यानी भारत का संदेश साफ है—रूस से केवल आयात नहीं, रूस को भारतीय उत्पादों का बड़ा बाजार भी बनाना होगा।
भारत का सबसे बड़ा सवाल—व्यापार घाटा कैसे घटे?
रूस से भारत का आयात भारतीय निर्यात की तुलना में काफी अधिक है। ऊर्जा आयात ने इस अंतर को और बढ़ाया है। इसलिए 100 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य को हासिल करना अपने आप में पर्याप्त नहीं होगा। भारत चाहता है कि इस बढ़ते व्यापार में भारतीय निर्यात की हिस्सेदारी भी बढ़े। फार्मा, कृषि और खाद्य उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, रसायन और ऑटो कंपोनेंट जैसे क्षेत्रों को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इस दिशा में भारतीय कंपनियों के लिए रूस में बाजार बनाने के साथ-साथ रूसी कंपनियों को भारत में उत्पादन करने के लिए आकर्षित करना भी महत्वपूर्ण होगा।
निवेश समझौते और EAEU ट्रेड डील
दोनों देशों के आर्थिक एजेंडे में द्विपक्षीय निवेश समझौता यानी BIT भी महत्वपूर्ण है। भारत चाहता है कि निवेशकों को ज्यादा स्पष्ट और भरोसेमंद ढांचा मिले, जिससे दोनों देशों के बीच निवेश बढ़ सके। इसके साथ भारत और यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (EAEU) के बीच व्यापार समझौते की बातचीत को जल्द आगे बढ़ाने पर भी जोर है। EAEU में रूस के साथ कजाखस्तान, बेलारूस, आर्मेनिया और किर्गिस्तान शामिल हैं। यदि यह समझौता आगे बढ़ता है तो भारत के लिए केवल रूसी बाजार ही नहीं, बल्कि व्यापक यूरेशियाई बाजार तक पहुंच आसान हो सकती है।
रुपया-रूबल भुगतान व्यवस्था भी अहम
भारत और रूस के सामने पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भुगतान व्यवस्था एक बड़ी चुनौती रही है। लेकिन अब दोनों देशों के बीच राष्ट्रीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था काफी आगे बढ़ चुकी है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक रूस और भारत के बीच भुगतान व्यवस्था में रुपये और रूबल का इस्तेमाल बढ़ा है और द्विपक्षीय व्यापार का बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय मुद्राओं के जरिए निपटाया जा रहा है। यह व्यवस्था दोनों देशों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे डॉलर पर निर्भरता कम करने और व्यापार को प्रतिबंधों के बीच जारी रखने में मदद मिलती है।
नए व्यापार मार्ग भी चर्चा में
भारत-रूस आर्थिक संबंधों का अगला पहलू केवल समुद्री व्यापार नहीं, बल्कि कनेक्टिविटी भी है। दोनों देशों ने पहले ही इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC), उत्तरी समुद्री मार्ग और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग के जरिए व्यापार बढ़ाने की संभावनाओं पर जोर दिया है। यदि इन मार्गों का इस्तेमाल बढ़ता है तो भारत और रूस के बीच माल ढुलाई के समय और लागत को कम करने में मदद मिल सकती है। यही कारण है कि व्यापार लक्ष्य के साथ परिवहन कनेक्टिविटी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रक्षा के अलावा तकनीक में भी नई साझेदारी
भारत-रूस संबंध अब पारंपरिक रक्षा और ऊर्जा से निकलकर AI, माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स, क्रिटिकल मिनरल्स, ड्रोन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों तक ले जाने की कोशिश हो रही है। 10 सितंबर के भारत-रूस बिजनेस फोरम में रूसी पक्ष ने भी इन क्षेत्रों को भविष्य के सहयोग के संभावित क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया। यानी आने वाले वर्षों में भारत-रूस संबंधों का असली परीक्षण इस बात से होगा कि पुरानी रणनीतिक दोस्ती को नई तकनीकी और औद्योगिक साझेदारी में कितना बदला जा सकता है।
यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी दबाव के बीच भारत की रणनीति
मोदी-पुतिन मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब रूस पश्चिमी प्रतिबंधों और यूक्रेन युद्ध के दबाव में है। दूसरी ओर भारत अमेरिका, यूरोप, फ्रांस, इजरायल और अन्य देशों के साथ भी अपने रक्षा और रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत कर रहा है। ऐसे में भारत के लिए रूस के साथ संबंध बनाए रखना केवल पुरानी दोस्ती का मामला नहीं है। यह उसकी रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय विदेश नीति का भी हिस्सा है। नई दिल्ली की कोशिश यही दिखाई देती है कि वह किसी एक शक्ति-गुट पर निर्भर हुए बिना अलग-अलग देशों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध आगे बढ़ाए।
BRICS के मंच पर भी होगी बड़ी बातचीत
पुतिन का भारत दौरा केवल द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं है। 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन होना है। ऐसे में मोदी-पुतिन की द्विपक्षीय बैठक के साथ BRICS के भीतर व्यापार, भुगतान प्रणाली और वैश्विक वित्तीय ढांचे पर भी बातचीत महत्वपूर्ण होगी। भारत BRICS के भीतर सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने और डिजिटल भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर संपर्क जैसे प्रस्तावों को भी आगे बढ़ा रहा है। इसका महत्व भारत-रूस व्यापार के संदर्भ में भी है, क्योंकि दोनों देश डॉलर-आधारित भुगतान व्यवस्था के विकल्पों पर काम करने में पहले से रुचि रखते हैं।
तो क्या इस बार कोई बड़ा रक्षा सौदा होगा?
यही इस मुलाकात का सबसे बड़ा सवाल है। S-400 की लंबित डिलीवरी पर स्पष्टता मिल सकती है। BrahMos-NG और संयुक्त उत्पादन को लेकर आगे की दिशा तय हो सकती है। Su-57 पर बातचीत निश्चित रूप से महत्वपूर्ण होगी, लेकिन तकनीक हस्तांतरण और भारत में उत्पादन जैसे मुद्दों के कारण इसे तुरंत अंतिम सौदे में बदलना आसान नहीं होगा। इसलिए मोदी-पुतिन बैठक का महत्व केवल इस बात से नहीं मापा जाना चाहिए कि कितने समझौते पर हस्ताक्षर होते हैं। असली महत्व इस बात का होगा कि भारत-रूस रक्षा संबंध अगले दशक में किस मॉडल पर चलते हैं—सिर्फ हथियार खरीदने के मॉडल पर या संयुक्त तकनीक और उत्पादन की साझेदारी पर।
रिश्ता पुराना, लेकिन अगली परीक्षा नई
भारत और रूस की साझेदारी दशकों पुरानी है, लेकिन आज दोनों देशों के सामने परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं। रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच अपनी अर्थव्यवस्था और रणनीतिक साझेदारियों को नए सिरे से व्यवस्थित कर रहा है। भारत दूसरी ओर अपनी रक्षा आत्मनिर्भरता, तकनीकी क्षमता और वैश्विक रणनीतिक भूमिका बढ़ा रहा है। इसलिए आज की मोदी-पुतिन बातचीत में S-400, BrahMos और Su-57 भले ही सुर्खियों में रहें, लेकिन असली कहानी इससे कहीं बड़ी है—क्या दोनों देश रक्षा से आगे बढ़कर ऊर्जा, परमाणु, तकनीक, निवेश, भुगतान और विनिर्माण को मिलाकर एक ऐसा आर्थिक-रणनीतिक रिश्ता बना पाएंगे, जो बदलती दुनिया में दोनों के हितों को लंबे समय तक साध सके।
फिलहाल नजर इस बात पर है कि आज मोदी-पुतिन की बातचीत के बाद क्या केवल भरोसे और दोस्ती के पुराने शब्द दोहराए जाते हैं या रक्षा और आर्थिक साझेदारी को नई दिशा देने वाले ठोस फैसले भी सामने आते हैं।
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Pawan Kumar Singh
Chief Editor, Taj News
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