संपादकीय डेस्क, 🌐 tajnews.in | बुधवार, 9 सितंबर 2026, 07:15:00 PM IST

संपादक की कलम से
हर चौराहे पर झूठ नहीं, भारत का सच भी है
प्रधानमंत्री मोदी का ‘झूठ की गूंज’ वाला तंज राहुल गांधी पर था, लेकिन सवाल यह है कि लोकतंत्र में विपक्ष की हर आवाज को झूठ कह देने से क्या सच बदल जाता है?
प्रमुख अंश (Highlights):
- विपक्ष लोकतंत्र का नाराज फूफा: सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियां गिनाए, लेकिन विपक्ष की निगरानी और सवालों को खारिज करने के बजाय लोकतंत्र की सेहत के लिए जरूरी समझना होगा।
- युवाओं से संवाद या मंच से भाषण: भव्य मंचों और एकतरफा भाषणों से इतर बेरोजगार युवा, पेपर लीक और शिक्षा की बदहाली पर सीधे संवाद की आवश्यकता।
- विकास की कीमत और आजीविका: फ्रेट कॉरिडोर और आधुनिक रेल के साथ-साथ करोड़ों कामगारों, ट्रक ड्राइवरों और रेलवे के खाली पदों की जवाबदेही का सवाल।
- आत्मनिर्भरता और विकसित भारत: मोबाइल व सोलर असेंबली से आगे बढ़कर कोर तकनीक और अंतिम नागरिक की आर्थिक स्वतंत्रता ही 2047 का वास्तविक पैमाना।

Thakur Pawan Singh
राजनीति में विरोध स्वाभाविक है। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियां गिनाता है और विपक्ष सरकार से सवाल करता है। यही लोकतंत्र का सामान्य ढांचा है। लेकिन जब सवाल पूछने वाले को ही समस्या मान लिया जाए और हर असहमति को ‘झूठ’ कहकर खारिज कर दिया जाए, तब बहस सरकार की उपलब्धियों से निकलकर लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर आ जाती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में वड़ोदरा में ‘मोदी फॉर विकसित भारत’ कार्यक्रम में पहुंचे। बड़ी संख्या में युवाओं की मौजूदगी वाला यह कार्यक्रम युवाओं से संवाद की उम्मीद जगाता था। लेकिन मंच से युवाओं के सवाल सुनने के बजाय प्रधानमंत्री का भाषण मुख्य रूप से सरकार की उपलब्धियों और विपक्ष पर निशाने के बीच बंटा रहा।
राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि ‘झूठ की गूंज से भरमाने वाले हर चौराहे पर मिल जाएंगे।’
सवाल यह नहीं है कि प्रधानमंत्री राहुल गांधी की आलोचना क्यों कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी या किसी भी विपक्षी नेता की कही हर बात को सिर्फ इसलिए झूठ मान लिया जाए क्योंकि वह सत्ता के खिलाफ है?
विपक्ष लोकतंत्र का ‘नाराज फूफा’ है
भारतीय परिवारों में फूफा का रिश्ता बड़ा दिलचस्प होता है। नाराज हों तो भी उनकी बात सुनी जाती है। शादी में कोई व्यवस्था बिगड़ रही हो तो अक्सर वही टोकते हैं। उनकी भूमिका कभी-कभी असुविधाजनक जरूर लगती है, लेकिन जरूरी भी होती है।
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका कुछ ऐसी ही है।
जनता सरकार चुनती है, लेकिन सरकार की निगरानी की जिम्मेदारी विपक्ष निभाता है। वह सवाल पूछता है, कमियां गिनाता है और सरकार को उसके फैसलों का हिसाब देने के लिए मजबूर करता है।
इसलिए विपक्ष का सवाल सरकार के लिए परेशानी जरूर हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र के लिए वह जरूरी है।
विपक्ष की हर बात सही नहीं होती। उसमें राजनीति भी हो सकती है, अतिशयोक्ति भी हो सकती है। लेकिन उसमें कही गई हर बात झूठ भी नहीं हो सकती।
आज देश के अलग-अलग हिस्सों से जो तस्वीरें सामने आती हैं, उन्हें सिर्फ राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। कहीं बारिश में सड़कें डूबी हैं, कहीं गड्ढों में एंबुलेंस फंस रही हैं, कहीं स्कूल तक पहुंचने के लिए बच्चों को सड़क नहीं मिल रही, कहीं एयरपोर्ट जलभराव से जूझ रहे हैं। कहीं छात्र रोजगार और पेपर लीक को लेकर सड़कों पर हैं और कहीं हॉस्टल की इमारतें गिर रही हैं।
इन सवालों को उठाना ‘झूठ की गूंज’ है या व्यवस्था से जवाब मांगना?
युवाओं से संवाद या मंच से भाषण?
प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों में भीड़ होती है, मंच भव्य होता है और प्रस्तुति बेहद व्यवस्थित। वड़ोदरा में भी ऐसा ही हुआ। प्रधानमंत्री रैंप से मंच तक पहुंचे, संगीत बजा, तालियां बजीं और कार्यक्रम आगे बढ़ा।
लेकिन सवाल यह है कि युवाओं को वहां अपने सवाल पूछने का कितना अवसर मिला?
यही वह जगह है जहां राहुल गांधी के कार्यक्रमों का तरीका अलग दिखाई देता है। वह छात्रों, ट्रक ड्राइवरों, ऑटो चालकों, कामगारों या दूसरे वर्गों के लोगों को सामने बैठाकर उनसे सीधे बात करने की कोशिश करते हैं।
इस शैली से सहमत होना जरूरी नहीं है। इसे राजनीतिक रणनीति भी कहा जा सकता है। लेकिन कम से कम वहां संवाद का दावा तो सवाल-जवाब के रूप में सामने आता है।
प्रधानमंत्री चाहें तो सरकार की उपलब्धियां बताएं, लेकिन युवाओं के सवाल भी सुनें। दो दिन पहले दिल्ली के सत्यनिकेतन में हुई घटना जैसे मुद्दों पर युवाओं को भरोसा दें। नौकरी, पेपर लीक, शिक्षा और रोजगार के सवालों पर सरकार की योजना बताएं।
लोकतंत्र में संवाद सिर्फ बोलने का नाम नहीं है। सुनना भी संवाद का हिस्सा है।
‘नाराज फूफा’ के पीछे छिपा बड़ा सवाल
वड़ोदरा के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने मुंबई से वड़ोदरा तक डबल डेकर मालगाड़ी का उदाहरण देते हुए ‘नाराज फूफा’ का जिक्र किया। सवाल उठाया कि अगर माल ढुलाई का बड़ा हिस्सा रेलवे ले जाएगा तो ट्रक वालों का क्या होगा?
यह सवाल मजाक में कहा गया हो सकता है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर आर्थिक चिंता छिपी है।
देश में लाखों ट्रक ड्राइवर और हेल्पर माल ढुलाई की व्यवस्था से जुड़े हैं। उनके पीछे करोड़ों लोगों के परिवार हैं। रेलवे का फ्रेट कॉरिडोर बनना जरूरी है। इससे परिवहन की क्षमता बढ़ेगी, लागत घट सकती है और अर्थव्यवस्था को फायदा होगा।
लेकिन विकास का मतलब यह भी है कि तकनीकी बदलाव से जिन लोगों की रोजी प्रभावित हो सकती है, उनके लिए वैकल्पिक रोजगार और प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।
सवाल ट्रक बनाम रेलवे का नहीं है।
सवाल यह है कि विकास की रफ्तार में पीछे छूटने वाले लोगों को कौन संभालेगा?
रोजगार के सवाल पर आंकड़े भी बोलते हैं
प्रधानमंत्री ने फ्रेट कॉरिडोर और दूसरे बुनियादी ढांचे के विस्तार को रोजगार के अवसरों से जोड़ा। लेकिन रोजगार का सवाल केवल नई परियोजनाएं गिनाने से खत्म नहीं होता।
सरकारी विभागों में खाली पदों का मुद्दा लगातार उठता रहा है। रेलवे जैसे बड़े नियोक्ता विभाग में अगर काम और सेवाओं का विस्तार हो रहा है तो उसके अनुपात में भर्ती का सवाल भी उठना स्वाभाविक है।
युवा सिर्फ यह नहीं पूछ रहा कि देश में कितने किलोमीटर नई रेल लाइन बनी।
वह पूछ रहा है—मेरी नौकरी कहां है?
वह यह भी पूछ रहा है कि मेरी पढ़ाई के बाद मेरे पास कौन-सा अवसर है, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के बाद भर्ती कब होगी और भर्ती प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होगी?
यही वे सवाल हैं जिन्हें किसी भी सरकार को सुनना होगा।
मोदी और राहुल के बीच बदलता राजनीतिक मुकाबला
राहुल गांधी को लंबे समय तक बीजेपी की राजनीति में ‘पप्पू’ कहकर निशाना बनाया गया। लेकिन भारत जोड़ो यात्रा के बाद उनकी सार्वजनिक छवि में बदलाव की बात राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर आम राजनीतिक चर्चा तक में होती रही है।
अब राहुल गांधी लगातार युवाओं, छात्रों और रोजगार से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं। उनके कार्यक्रमों में भीड़ दिखाई दे रही है। यही बदलाव शायद बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
इंडिया टुडे के ‘मूड ऑफ द नेशन’ से जुड़े आंकड़ों में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में पहले की तुलना में कमी और राहुल गांधी की स्वीकार्यता में बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया है।
लेकिन लोकतंत्र में लोकप्रियता का कोई भी सर्वे अंतिम फैसला नहीं होता।
अंतिम फैसला जनता करती है।
और जनता सिर्फ भाषण नहीं सुनती। वह अपने आसपास की सड़क, स्कूल, अस्पताल, नौकरी, महंगाई और प्रशासन को भी देखती है।
यहीं से आंकड़ों की राजनीति शुरू होती है।
मैन्युफैक्चरिंग की कहानी में असली सवाल
प्रधानमंत्री भारत में बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग क्षमता की बात करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत में कई क्षेत्रों में उत्पादन और असेंबली क्षमता बढ़ी है।
मोबाइल फोन इसका बड़ा उदाहरण है। भारत आज मोबाइल फोन निर्माण में दुनिया के प्रमुख देशों में है। लेकिन उत्पादन और असेंबली में अंतर समझना भी जरूरी है।
अगर फोन भारत में असेंबल हो रहा है, लेकिन उसके महत्वपूर्ण पुर्जे दूसरे देशों से आ रहे हैं, तो आत्मनिर्भरता की कहानी अभी अधूरी है।
सोलर पैनल के मामले में भी यही सवाल है। भारत में फोटोवोल्टिक मॉड्यूल का उत्पादन बढ़ा है, लेकिन पॉलीसिलिकॉन और वेफर जैसे महत्वपूर्ण चरणों में आयात पर निर्भरता बनी हुई है।
इसलिए आत्मनिर्भरता को सिर्फ तैयार उत्पाद की गिनती से नहीं मापा जा सकता।
असली आत्मनिर्भरता तब होगी जब कच्चे माल से लेकर तकनीक, डिजाइन, पुर्जे और अंतिम उत्पाद तक पूरी मूल्य श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़े।
विकसित भारत की मंजिल और 2047 की समयसीमा
विकसित भारत का सपना बड़ा है। 2047 की समयसीमा भी महत्वाकांक्षी है।
लेकिन विकसित भारत का अर्थ केवल एक्सप्रेसवे, बुलेट ट्रेन, बड़े एयरपोर्ट और आधुनिक शहर नहीं हो सकता।
उस भारत में किसान की आय, मजदूर की सुरक्षा, युवाओं का रोजगार, बच्चों की शिक्षा और गरीब परिवारों की आर्थिक स्वतंत्रता भी शामिल होनी चाहिए।
आज भी करोड़ों लोग सरकारी खाद्यान्न सहायता पर निर्भर हैं। इसका मतलब यह नहीं कि देश में विकास नहीं हुआ। विकास हुआ है और कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण काम भी हुआ है।
लेकिन विकास की रफ्तार और उसकी गुणवत्ता पर सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है।
क्योंकि विकास का असली पैमाना वह नहीं है जो मंच से दिखाई देता है।
असली पैमाना वह है जो आम आदमी की जिंदगी में दिखाई देता है।
बुलेट ट्रेन और प्राथमिकताएं
बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाएं तकनीकी क्षमता और आधुनिक बुनियादी ढांचे की प्रतीक हो सकती हैं। लेकिन हर बड़ी परियोजना के साथ एक सवाल जुड़ा होता है—उसकी लागत और उसका आर्थिक लाभ क्या है?
अगर किसी परियोजना की लागत लगातार बढ़ती है और समयसीमा भी आगे खिसकती है तो सरकार से सवाल पूछना विरोध नहीं, सार्वजनिक जवाबदेही है।
क्या हाई-स्पीड रेल के साथ सामान्य रेल नेटवर्क, यात्री सुविधाओं, सुरक्षा और रोजगार पर भी उतना ही जोर है?
क्या देश के सरकारी स्कूलों, अस्पतालों और बुनियादी सुविधाओं को उसी प्राथमिकता से आधुनिक बनाया जा रहा है?
इन सवालों का जवाब आंकड़ों से होना चाहिए, नाराजगी से नहीं।
महिला अधिकारों पर भी सवाल जरूरी हैं
राजनीति में महिला अधिकारों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप लंबे समय से चलते रहे हैं। लेकिन किसी भी दल के लिए महिला सशक्तीकरण का असली पैमाना उसके भाषण नहीं, उसकी नीतियां और प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
अगर महिला अधिकारों की बात होती है तो राजनीतिक दलों को अपने संगठन और सरकार में महिलाओं की भागीदारी का भी हिसाब देना चाहिए।
राहुल गांधी महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं तो बीजेपी उस पर सवाल उठाती है। बीजेपी महिला सशक्तीकरण की बात करती है तो विपक्ष उसकी नीतियों और प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाता है।
यह राजनीतिक बहस है।
लेकिन महिला अधिकार किसी पार्टी की जागीर नहीं हैं।
फ्रांस की घटना ने बढ़ाया एक और सवाल
पेरिस के पास स्वामीनारायण मंदिर के उद्घाटन के बाद आईफिल टावर से जुड़ी एक घटना को लेकर विवाद सामने आया। रिपोर्टों के मुताबिक, मंदिर से जुड़े पुरुषों के एक समूह के आने के दौरान महिला कर्मचारियों को वहां से हटाने की व्यवस्था की गई।
घटना के विरोध में आईफिल टावर की महिला कर्मचारियों ने विरोध किया और प्रबंधन को माफी मांगनी पड़ी।
यह मामला केवल एक धार्मिक संस्था का नहीं है। यह सवाल इस बात का है कि भारतीय धार्मिक परंपराओं और दूसरे देशों के सामाजिक नियमों के बीच व्यवहार करते समय संवेदनशीलता कितनी जरूरी है।
अगर किसी व्यवस्था से महिलाओं के साथ भेदभाव का संदेश जाता है तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रधानमंत्री ने इस मंदिर से जुड़े कार्यक्रम पर खुशी जाहिर की थी। ऐसे में उनसे यह उम्मीद भी की जा सकती थी कि भारत की छवि से जुड़े किसी विवाद पर वह अपनी बात रखें।
लेकिन राजनीति में हर सवाल का जवाब देना सुविधाजनक नहीं होता।
और यहीं लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है।
सच का फैसला सत्ता नहीं, तथ्य करें
इस पूरे विवाद को केवल मोदी बनाम राहुल गांधी के चश्मे से देखना सबसे आसान रास्ता है।
लेकिन असली सवाल इससे बड़ा है।
क्या बेरोजगार युवा का सवाल झूठ है?
क्या पेपर लीक पर सवाल झूठ है?
क्या सड़क, अस्पताल और शिक्षा की बदहाली पर सवाल झूठ है?
क्या सरकारी भर्तियों में देरी पर सवाल झूठ है?
क्या आयात पर निर्भरता कम करने की मांग झूठ है?
क्या विकास परियोजनाओं की लागत और समयसीमा पर सवाल करना झूठ है?
नहीं।
सवाल लोकतंत्र की बीमारी नहीं हैं। सवाल लोकतंत्र की सेहत का संकेत हैं।
सत्ता के पास बहुमत है तो विपक्ष के पास सवाल हैं। सरकार के पास उपलब्धियां हैं तो जनता के पास अनुभव हैं। भाषणों में भारत की तस्वीर उजली हो सकती है, लेकिन जमीन पर दिखाई देने वाली तस्वीर को भी उसी गंभीरता से देखना होगा।
इसलिए हर चौराहे पर ‘झूठ की गूंज’ नहीं है।
हर चौराहे पर भारत का सच भी है।
कहीं वह सच विकास के रूप में दिखाई देता है, कहीं बेरोजगारी के रूप में।
कहीं वह नई सड़क है, कहीं टूटी हुई सड़क।
कहीं नया कारखाना है, तो कहीं नौकरी की तलाश में भटकता युवा।
कहीं आधुनिक रेल है, तो कहीं टिकट के लिए लंबी कतार में खड़ा यात्री।
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि इन सभी तस्वीरों को एक साथ देखने की क्षमता बनी रहे।
पत्रकार का पक्ष किसी नेता के साथ नहीं होना चाहिए।
उसका गठबंधन तथ्यों के साथ होना चाहिए।
सत्ता से सवाल करना सरकार विरोध नहीं है और विपक्ष की आलोचना करना लोकतंत्र विरोध नहीं।
जरूरत सिर्फ इतनी है कि ‘झूठ’ और ‘सच’ का फैसला नारों से नहीं, तथ्यों से हो।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं है जब कोई सवाल पूछता है।
सबसे खतरनाक स्थिति वह है जब सवाल पूछना ही अपराध समझ लिया जाए।
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