सात प्रमुख रेल मार्गों पर चार ट्रैक करने की दिशा में काम तेज; ये रूट देश के सिर्फ 16 फीसदी रेल नेटवर्क में हैं, लेकिन संभालते हैं करीब 41 फीसदी रेल यातायात; यात्री और मालगाड़ियों की क्षमता बढ़ाने के साथ भीड़ और परिचालन दबाव घटाने पर जोर
राष्ट्रीय डेस्क, 🌐 tajnews.in | बुधवार, 9 सितंबर 2026, 04:28:15 PM IST

tajnews.in | नई दिल्ली। देश के सबसे व्यस्त रेलवे मार्गों पर बढ़ते यात्री और माल यातायात को देखते हुए भारतीय रेलवे ने क्षमता विस्तार की बड़ी योजना पर काम तेज किया है। रेलवे करीब 11 हजार किलोमीटर लंबे सात हाई-डेंसिटी रेल मार्गों को चार ट्रैक वाला बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक इन सात मार्गों पर देश का करीब 41 फीसदी रेल यातायात चलता है, जबकि ये पूरे रेल नेटवर्क के सिर्फ करीब 16 फीसदी हिस्से में फैले हैं। ऐसे में इन रूटों पर अतिरिक्त ट्रैक बिछाना रेलवे की क्षमता बढ़ाने की अहम योजनाओं में शामिल है।
रेल मंत्री के मुताबिक हाई-डेंसिटी नेटवर्क को चार ट्रैक करने का उद्देश्य बढ़ते यात्री और माल यातायात को संभालना, मौजूदा मार्गों पर दबाव कम करना और भविष्य में ज्यादा ट्रेनों के संचालन की गुंजाइश तैयार करना है। यानी यह केवल ट्रैक बढ़ाने की परियोजना नहीं, बल्कि देश के सबसे व्यस्त रेल गलियारों को भविष्य की यातायात जरूरतों के लिए तैयार करने की कोशिश है।
सात हाई-डेंसिटी रूट कौन से हैं?
चार-ट्रैकिंग की योजना में सात प्रमुख मार्ग शामिल हैं। इनमें दिल्ली-हावड़ा, हावड़ा-चेन्नई, चेन्नई-मुंबई, मुंबई-दिल्ली, दिल्ली-चेन्नई, मुंबई-हावड़ा और दिल्ली-गुवाहाटी रूट शामिल हैं।
इनमें दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हावड़ा यानी कोलकाता और गुवाहाटी जैसे बड़े शहर और प्रमुख आर्थिक क्षेत्र जुड़े हुए हैं। इन मार्गों पर लंबी दूरी की यात्री ट्रेनों के साथ बड़ी संख्या में मालगाड़ियां भी चलती हैं। इसलिए यहां ट्रैक क्षमता बढ़ने का असर यात्री और माल, दोनों सेवाओं पर पड़ सकता है।
गोल्डन क्वाड्रिलेटरल के साथ दोनों डायगोनल भी अहम
सात रूटों में दिल्ली-हावड़ा, हावड़ा-चेन्नई, चेन्नई-मुंबई और मुंबई-दिल्ली मिलकर देश के प्रमुख महानगरों को जोड़ने वाला गोल्डन क्वाड्रिलेटरल बनाते हैं। इसके साथ दिल्ली-चेन्नई और मुंबई-हावड़ा के दोनों डायगोनल तथा दिल्ली-गुवाहाटी मार्ग भी हाई-डेंसिटी नेटवर्क का हिस्सा हैं।
इन मार्गों का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि ये देश के बड़े औद्योगिक, कारोबारी और उपभोक्ता केंद्रों के बीच रेल संपर्क उपलब्ध कराते हैं। माल परिवहन के लिए भी ये रूट महत्वपूर्ण हैं, जिससे इनकी क्षमता बढ़ने का सीधा संबंध लॉजिस्टिक्स व्यवस्था से जुड़ता है।
16 फीसदी नेटवर्क पर 41 फीसदी रेल यातायात
इस योजना की सबसे बड़ी वजह आंकड़ों में दिखाई देती है। रेलवे के मुताबिक करीब 11 हजार किलोमीटर का यह हाई-डेंसिटी नेटवर्क पूरे रेल नेटवर्क का लगभग 16 फीसदी है, लेकिन देश के कुल रेल यातायात का करीब 41 फीसदी इन्हीं मार्गों पर चलता है।
यानी रेलवे के अपेक्षाकृत छोटे हिस्से पर यातायात का असमान रूप से बड़ा दबाव है। यही कारण है कि इन रूटों पर ट्रैक क्षमता बढ़ाने का महत्व सामान्य दोहरीकरण परियोजनाओं से कहीं अधिक है।
चार ट्रैक होने से क्या बदलेगा?
किसी व्यस्त रेल मार्ग पर ट्रैक की संख्या बढ़ने से ट्रेनों को चलाने के लिए अधिक परिचालन गुंजाइश मिलती है। मौजूदा नेटवर्क में कई बार यात्री और मालगाड़ियों को एक-दूसरे के लिए रास्ता देने, क्रॉसिंग या दूसरे परिचालन कारणों से इंतजार करना पड़ता है। अतिरिक्त ट्रैक उपलब्ध होने पर ऐसी बाधाओं को कम करने की क्षमता बढ़ती है।
रेलवे के मुताबिक अधिक ट्रैक होने से ट्रेनों के संचालन में लचीलापन बढ़ेगा और व्यस्त रूटों पर अधिक सेवाओं की गुंजाइश बनेगी। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि चार ट्रैक होते ही हर ट्रेन की यात्रा का समय अपने आप कम हो जाएगा। वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि किस खंड पर कितनी क्षमता बढ़ी, सिग्नलिंग और स्टेशन व्यवस्था कितनी सुधरी और रेलवे उस अतिरिक्त क्षमता का परिचालन में कितना प्रभावी इस्तेमाल कर पाया।
कहीं चार लाइन पहले से, कहीं काम जारी और कहीं डीपीआर
सातों हाई-डेंसिटी रूटों पर फोर-ट्रैकिंग की स्थिति एक जैसी नहीं है। रेलवे की योजना चरणबद्ध है। कुछ हिस्सों में चार लाइन पहले से मौजूद हैं, कुछ हिस्सों के लिए परियोजनाएं स्वीकृत या निर्माणाधीन हैं, जबकि अन्य हिस्सों के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार की जा रही है या मंजूरी की प्रक्रिया चल रही है।
इसलिए करीब 11 हजार किलोमीटर के पूरे नेटवर्क को एक साथ चार-ट्रैक करने की बात नहीं है। अलग-अलग खंडों पर परियोजनाएं उनकी यातायात जरूरत, तकनीकी व्यवहार्यता और मंजूरी के आधार पर आगे बढ़ेंगी।
व्यस्त खंडों पर क्षमता का दबाव पहले से
हाई-डेंसिटी नेटवर्क के कुछ हिस्सों में मौजूदा दोहरी लाइन की क्षमता पहले ही दबाव में है। उदाहरण के तौर पर गुडूर-गुम्मिडिपुंडी खंड में मौजूदा डबल लाइन की लाइन क्षमता उपयोगिता 131 फीसदी बताई गई है। इसी तरह खड़गपुर-भद्रक और भद्रक-हरिदासपुर जैसे खंडों में चौथी लाइन से क्षमता बढ़ाने की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है।
यह बताता है कि फोर-ट्रैकिंग केवल भविष्य की संभावित जरूरत के लिए नहीं, बल्कि कुछ हिस्सों में मौजूदा यातायात दबाव कम करने के लिए भी जरूरी हो गई है।
हाल में कई मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी
हाई-डेंसिटी नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने का काम पहले से ही कई हिस्सों में चल रहा है। अगस्त 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने करीब 9,450 करोड़ रुपये की लागत से चार मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी। इनमें खड़गपुर-भद्रक चौथी लाइन, भद्रक-हरिदासपुर चौथी लाइन, गुडूर-गुम्मिडिपुंडी तीसरी-चौथी लाइन और कटक-पारादीप तीसरी-चौथी लाइन शामिल हैं।
इन परियोजनाओं से लगभग 410 किलोमीटर रेल नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य है। इससे साफ है कि रेलवे केवल बड़े कॉरिडोर स्तर पर योजना बनाने के बजाय अलग-अलग व्यस्त खंडों पर भी चरणबद्ध तरीके से मल्टी-ट्रैकिंग कर रहा है।
माल ढुलाई को भी मिलेगा बड़ा फायदा
फोर-ट्रैकिंग का एक बड़ा लक्ष्य केवल यात्री ट्रेनें बढ़ाना नहीं, बल्कि माल परिवहन की क्षमता को मजबूत करना भी है। कोयला, इस्पात, सीमेंट, खाद्यान्न और दूसरे औद्योगिक सामान की बड़ी मात्रा रेल के जरिए देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचती है।
रेलवे की क्षमता बढ़ने पर मालगाड़ियों के लिए अधिक परिचालन स्लॉट उपलब्ध हो सकते हैं। इससे उद्योगों और बंदरगाहों के बीच माल की आवाजाही अधिक सुचारु बनाने में मदद मिल सकती है। ज्यादा माल सड़क से रेल की ओर आने पर लॉजिस्टिक्स लागत और सड़क परिवहन पर दबाव कम करने में भी मदद मिल सकती है।
रेल बनाम सड़क, लागत और पर्यावरण का भी तर्क
रेल मंत्री ने हाई-डेंसिटी नेटवर्क को चार-ट्रैक करने के पीछे आर्थिक और पर्यावरणीय तर्क भी बताया है। उनके मुताबिक रेल परिवहन सड़क की तुलना में कम लागत वाला और अधिक पर्यावरण अनुकूल है।
इस दृष्टि से हाई-डेंसिटी रूटों की क्षमता बढ़ाना केवल ट्रेनें बढ़ाने का मामला नहीं है। इसका उद्देश्य देश में माल और यात्रियों की बढ़ती आवाजाही को अधिक क्षमता वाले रेल नेटवर्क की ओर ले जाना भी है।
नई ट्रेनों के लिए खुलेगी ज्यादा गुंजाइश
रेलवे के सामने आने वाले वर्षों में यात्री संख्या और माल यातायात दोनों बढ़ने की संभावना है। ऐसे में केवल नई ट्रेनें घोषित करना पर्याप्त नहीं होगा। उनके लिए पर्याप्त ट्रैक, स्टेशन, सिग्नलिंग और परिचालन क्षमता भी जरूरी होगी।
चार-ट्रैकिंग का फायदा इसी स्तर पर सामने आएगा। जहां अभी ट्रैक क्षमता सीमित होने के कारण नई सेवाओं या मालगाड़ियों के संचालन में दबाव है, वहां अतिरिक्त लाइनें भविष्य में अधिक ट्रेनें चलाने की गुंजाइश पैदा कर सकती हैं।
यह हाई-स्पीड रेल से अलग योजना है
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। सात हाई-डेंसिटी रूटों को चार ट्रैक करने की योजना को सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर से अलग समझना होगा।
2026-27 के बजट में अलग से सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की घोषणा की गई है, जिनमें मुंबई-पुणे, पुणे-हैदराबाद, हैदराबाद-बेंगलुरु, हैदराबाद-चेन्नई, चेन्नई-बेंगलुरु, दिल्ली-वाराणसी और वाराणसी-सिलीगुड़ी शामिल हैं। इन प्रस्तावित हाई-स्पीड कॉरिडोर की कुल लंबाई करीब 4,000 किलोमीटर बताई गई है। यह 4,000 किलोमीटर का आंकड़ा हाई-डेंसिटी नेटवर्क के 11 हजार किलोमीटर से अलग है।
रेलवे के बड़े क्षमता विस्तार अभियान का हिस्सा
रेलवे के इस कदम को 2026-27 के व्यापक पूंजीगत निवेश और क्षमता विस्तार अभियान से भी जोड़कर देखा जा रहा है। बजट में रेलवे के लिए करीब 2.78 लाख करोड़ रुपये का सकल बजटीय समर्थन दिया गया है। इसमें नए ट्रैक निर्माण के लिए करीब 79,072 करोड़ रुपये का प्रावधान भी शामिल है।
इसके अलावा रेलवे मल्टी-ट्रैकिंग, विद्युतीकरण, सिग्नलिंग, सुरक्षा प्रणालियों, माल परिवहन और स्टेशन आधुनिकीकरण पर भी निवेश कर रहा है। ऐसे में हाई-डेंसिटी रूटों की फोर-ट्रैकिंग रेलवे की व्यापक क्षमता विस्तार रणनीति की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है।
अब असली चुनौती क्रियान्वयन की
करीब 11 हजार किलोमीटर के सात हाई-डेंसिटी रूटों को चार-ट्रैक करना लंबी अवधि की और बेहद जटिल परियोजना होगी। अलग-अलग हिस्सों में जमीन, पुल, लेवल क्रॉसिंग, स्टेशन क्षमता, सिग्नलिंग, ट्रैक निर्माण और यातायात को चालू रखते हुए काम करने जैसी चुनौतियां सामने आएंगी।
इसलिए इस योजना का वास्तविक असर केवल घोषणा से नहीं, बल्कि डीपीआर की मंजूरी, परियोजनाओं के वित्तपोषण, निर्माण की गति और चरणबद्ध तरीके से नई क्षमता को परिचालन में लाने पर निर्भर करेगा।
फिलहाल संदेश साफ है—रेलवे के जिस छोटे हिस्से पर देश का करीब 41 फीसदी रेल यातायात चलता है, उसकी क्षमता बढ़ाना अब प्राथमिकता बन गया है। सात हाई-डेंसिटी कॉरिडोर की फोर-ट्रैकिंग पूरी होने के साथ रेलवे को ज्यादा यात्री और मालगाड़ियां चलाने की गुंजाइश मिलेगी और देश के सबसे व्यस्त रेल नेटवर्क पर भविष्य के यातायात का दबाव संभालने में मदद मिल सकती है।
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Pawan Kumar Singh
Chief Editor, Taj News
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