जब पहरेदार ही राग दरबारी गाने लगे!! क्यों मुख्यधारा का मीडिया हाशिये पर जा रहा है और सोशल मीडिया नई चौपाल बन गया है

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Saturday, 1 August, 2026, 09:20:00 PM IST.

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘INDIA TODAY’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं।

जब पहरेदार ही राग दरबारी गाने लगे!! क्यों मुख्यधारा का मीडिया हाशिये पर जा रहा है और सोशल मीडिया नई चौपाल बन गया है

आज के दौर में भारत की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण खबर वह बिल्कुल नहीं है जो हर रात टीवी समाचार चैनलों के प्राइम-टाइम न्यूज़ स्टूडियो में एंकरों द्वारा चीख-चीखकर दिखाई और सुनाई जाती है। देश की सबसे बड़ी असली खबर तो दरअसल वह है, जिसे मुख्यधारा का मीडिया सत्ता के भय या लालच में दिखाने से बहुत ही चालाकी और खामोशी से बचा जाता है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता और पत्रकारिता के गिरते स्तर पर सवाल उठना पूरी तरह लाजमी है।

लोकतंत्र केवल उसी स्थिति में कमजोर या असहाय नहीं होता, जब निरंकुश सरकारें मीडिया पर सीधा प्रशासनिक सेंसर लगा दें। लोकतंत्र वास्तव में उस वक्त सबसे ज्यादा कमजोर और खोखला होता है, जब खुद निष्पक्ष पत्रकार ही सत्ता से कड़े सवाल पूछना छोड़ दें और चाटुकारिता का मार्ग चुन लें। आज हमारे देश के एक बहुत बड़े हिस्से का मुख्यधारा का प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सत्ता के शीर्ष गलियारों से बुनियादी जवाब मांगने के बजाय केवल उसकी राजनीतिक आवाज़ को तोते की तरह दोहराता हुआ दिखाई देता है।

कभी हमारे भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को ‘चौथा स्तंभ’ (Fourth Estate) कहा जाता था। उसका प्राथमिक और पवित्र कर्तव्य था—प्रशासनिक स्तर पर छिपे भ्रष्टाचार को बेनकाब करना, सरकार से तीखे सवाल पूछना और देश के सबसे अंतिम व असहाय आम आदमी की बुलंद आवाज़ बनना। लेकिन आज दुर्भाग्य से उसकी बड़ी और मुख्य भूमिका केवल सत्ता पक्ष का बचाव करती ही नज़र आती है। स्थिति ऐसी भयावह हो चुकी है कि लोकतंत्र का जो पहरेदार कभी जनता के अधिकारों के लिए भौंकता और काटता था, वह पहरेदार अब सत्ता की ही गोदी में आराम से बैठा हुआ लगता है।

पत्रकारिता की साख में आया यह खतरनाक गिरावट भरा बदलाव अचानक एक दिन में नहीं आया है। देश के बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों का मालिकाना हक़ (Media Ownership) अब देश के कुछ गिने-चुने कद्दावर कॉरपोरेट घरानों और पूंजीपतियों के हाथों में पूरी तरह सिमट कर रह गया है। व्यापारिक रूप से उनके अरबों-खरबों के मुख्य कारोबार केवल मीडिया तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे रियल एस्टेट, खनन, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बड़े क्षेत्रों में फैले हैं जहाँ वे पूरी तरह सरकारी अनुमतियों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे विषैले कॉरपोरेट माहौल में संपादकीय आज़ादी और निष्पक्षता अक्सर व्यावसायिक मुनाफ़े और राजनीतिक रिश्तों की बलि चढ़कर बहुत पीछे छूट जाती है।

सरकारी और कॉरपोरेट विज्ञापनों (Advertisements) के भारी खेल ने भी मीडिया के इस गंभीर अस्तित्वगत संकट को और अधिक गहरा बना दिया है। अधिकांश बड़े मीडिया संस्थानों की कमाई का मुख्य जरिया केंद्र व राज्य सरकारों और कॉरपोरेट घरानों से मिलने वाले विज्ञापनों का विशाल बजट होता है। जिनसे करोड़ों-अरबों की नियमित कमाई और मुनाफा होता हो, उनके विधिक खिलाफ जांच करना या उनके भ्रष्टाचार पर सवाल उठाना किसी भी मीडिया हाउस के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में सत्ताधीशों के सामने खामोशी फ़ायदेमंद सौदा बन जाती है और जनता के पक्ष में खड़े होकर सवाल पूछना आर्थिक रूप से बेहद महंगे पड़ने लगते हैं।

टीवी चैनलों की शाम की प्राइम-टाइम बहसें भी अब पूरी तरह से एक जैसी और पूरी तरह से स्क्रिप्टेड लगती हैं। वही घिसे-पिटे चिर-परिचित चेहरे, वही आक्रामक राजनीतिक प्रवक्ता और वही पहले से तयशुदा सांप्रदायिक व निरर्थक बहसें। देश के असली निर्माता—हमारे किसान, खेत-मजदूर, शिक्षक, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और आम पीड़ित नागरिक शायद ही कभी इन राष्ट्रीय चर्चाओं का हिस्सा बन पाते हैं। प्राइम-टाइम का एजेंडा सत्ताधारी और ताकतवर लोग तय करते हैं और देश के बाकी बेबस लोग उसे केवल दर्शक बनकर देखते रहने को मजबूर हैं।

जो निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकार इस कॉरपोरेट चाटुकारिता से अलग हटकर अपनी रीढ़ सीधी रखते हुए स्वतंत्र पत्रकारिता का रास्ता चुनते हैं, उन्हें पुलिसिया मुकदमों, आईटी सेल द्वारा संगठित ट्रोलिंग, आर्थिक दबावों और ऑनलाइन गालियों की बौछार का लगातार सामना करना पड़ता है। सत्ता का यह खौफ धीरे-धीरे पत्रकारों के अवचेतन में आत्म-सेंसरशिप (Self-Censorship) में बदल जाता है। और जब डर पत्रकारों के भीतर ही काम करने लगे, तब किसी तानाशाह सरकार को बाहर से कोई औपचारिक सेंसरशिप लगाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

हर शाम टीवी स्क्रीन पर एंकरों का शोर और चीखना-चिल्लाना तो लगातार बढ़ता जाता है, लेकिन उससे जमीनी सच पूरी तरह गायब होता जाता है। गंभीर वैचारिक बहस की जगह केवल उन्मादी हंगामा और नूरा-कुश्ती ले लेती है। ठोस आंकड़ों और तथ्यों की जगह खोखले नारे और प्रायोजित प्रोपेगैंडा आ जाते हैं। देश की वास्तविक समस्याएं—जैसे विकराल होती बेरोज़गारी, बेकाबू महँगाई, ध्वस्त होती प्राथमिक शिक्षा, जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था, किसानों की भयानक परेशानियाँ और पर्यावरण का विनाश जैसे सुलगते राष्ट्रीय मुद्दे टीवी स्टूडियो की इस प्रायोजित राजनीति में कहीं पूरी तरह खो जाते हैं।

विश्वविख्यात समाजशास्त्रियों और विद्वानों एडवर्ड हरमन और नोम चॉम्स्की ने अपनी ऐतिहासिक पुस्तक में वर्षों पहले ‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’ का सिद्धांत देते हुए लिखा था कि मीडिया पर मालिकाना हक़, विज्ञापन की निर्भरता और राजनीतिक दबाव ही मिलकर यह तय करते हैं कि देश की जनता को टीवी पर क्या दिखाया जाएगा और उसकी नजरों से क्या छिपाया जाएगा। टीवी पर हमेशा सीधा-सीधा झूठ नहीं दिखाया जाता, बल्कि उससे भी ज्यादा खतरनाक यह होता है कि जनता से ‘पूरा सच’ और जमीनी हकीकत जानबूझकर छिपा ली जाती है।

इसीलिए आज आम जनमानस के भीतर “गोदी मीडिया” (Godi Media) जैसा तीखा और अपमानजनक शब्द पूरी तरह से घुल-मिल गया है और आम बोलचाल का हिस्सा बन चुका है। कोई इस शब्द से व्यक्तिगत रूप से सहमत हो या असहमत, लेकिन देश की कड़वी सच्चाई यही है कि भारत के करोड़ों जागरूक नागरिकों का टीवी समाचारों और मुख्यधारा की पत्रकारिता पर से भरोसा अब लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है।

यह स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना है कि जो मुख्यधारा का मीडिया कभी स्वतंत्रता आंदोलन और लोकतंत्र में आम जनता की बुलंद आवाज़ हुआ करता था, वह आज केवल और केवल सरकारों, भारी विज्ञापनदाताओं और कॉरपोरेट निवेशकों की चिंताओं में ही दुबका दिखाई देता है। आज हमारे गोदी मीडिया की सबसे बड़ी समस्या टीआरपी (TRP) का गिरना नहीं, बल्कि जनता के बीच उसकी लगातार घटती और रसातल में जाती विश्वसनीयता (Credibility) है। पत्रकारिता में जनता का भरोसा एक बार पूरी तरह टूट जाए, तो उसे वापस जीतना कतई आसान नहीं होता।

मुख्यधारा के मीडिया द्वारा छोड़ी गई इसी विशाल और खाली जगह को अब देश के सोशल मीडिया (Social Media) ने पूरी तरह से भर दिया है।

हाल ही में दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर घटित हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का अनूठा और अभूतपूर्व जन-आंदोलन इसका एक बहुत बड़ा और जीवंत राष्ट्रीय उदाहरण है। इंटरनेट पर युवाओं द्वारा शुरू किया गया एक तीखा व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान देखते ही देखते भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रव्यापी छात्र आंदोलन बन गया। देश की नई ‘जेन ज़ी’ (Gen Z) पीढ़ी के युवाओं ने टीवी चैनलों की ओबी वैन या बड़े अखबारों के संवाददाताओं का इंतज़ार बिल्कुल नहीं किया। उन्होंने अपनी पीड़ा और अपने अधिकारों की बात खुद अपनी डिजिटल उंगलियों से पूरी दुनिया तक पलक झपकते पहुँचा दी।

इंसटाग्राम रील्स (Instagram Reels), यूट्यूब शॉर्ट्स (YouTube Shorts) और एक्स (X) पर युवा छात्रों के वास्तविक वीडियो, व्यंग्यात्मक मीम्स, ओजस्वी भाषण और प्लेकार्ड्स की तस्वीरें कुछ ही मिनटों में देश भर के करोड़ों मोबाइलों तक सीधे पहुँच गईं। अब अपनी आवाज़ उठाने के लिए किसी मीडिया हाउस के पक्षपाती संपादक की मंजूरी या सेंसर की कोई ज़रूरत नहीं रही। आज हर युवा का हाथ में मौजूद साधारण स्मार्टफोन ही उसका खुद का कैमरा भी है, उसका स्वतंत्र न्यूज़रूम भी है और उसका सीधा प्रसारण केंद्र भी है।

इस ऐतिहासिक युवा आंदोलन का हास्य, व्यंग्य, रील्स और तीखे मीम्स पारंपरिक गोदी पत्रकारिता के उबाऊ बुलेटिनों से कहीं ज्यादा तेज़ रफ़्तार से पूरे देश में फैले। देश का युवा वर्ग किसी एंकर के भारी-भरकम और प्रायोजित संपादकीय से जुड़ने के बजाय साथी छात्रों की चुटीली पोस्ट्स और छोटे-छोटे मारक वीडियो से सीधे जुड़ता चला गया।

बेशक, निष्पक्ष रूप से देखें तो सोशल मीडिया की अपनी भी कई बड़ी कमियाँ और गंभीर खतरे मौजूद हैं। यहाँ अफवाहें और भ्रामक खबरें बेहद तेज़ी से फैलती हैं, सोशल मीडिया के कमर्शियल एल्गोरिद्म सनसनीखेज और नफरती कंटेंट को बढ़ावा देते हैं, और तथ्यों की विधिक जांच (Fact Check) हमेशा सही समय पर नहीं हो पाती। परंतु इन तमाम कमियों के बावजूद, इसने देश के उन करोड़ों आम और बेबस नागरिकों को अपनी बात खुलकर रखने का एक बड़ा और लोकतांत्रिक मंच जरूर दे दिया है, जिनकी आवाज़ को मुख्यधारा के मीडिया ने दबा दिया था।

अब भारतीय समाज में आया यह ऐतिहासिक और तकनीकी बदलाव कभी पीछे लौटने वाला नहीं है। भारत की यह नई और बेखौफ पीढ़ी अब हर रात नौ बजे के उबाऊ टीवी बुलेटिन का या अगली सुबह के छपे हुए अखबार का इंतज़ार कतई नहीं करती। वह खुद अपनी नागरिक पत्रकारिता से खबर बनाती है, उसे सोशल मीडिया पर साझा करती है और उस पर खुलकर लोकतांत्रिक बहस करती है।

यही मुख्य कारण है कि मुख्यधारा का बिक चुका मीडिया आज धीरे-धीरे जनता की नजरों में हाशिये पर जा रहा है, जबकि इंटरनेट का सोशल मीडिया हमारे विशाल लोकतंत्र की नई ‘जन-चौपाल’ बन चुका है। आज देश की वास्तविक राजनीति, बड़े सामाजिक आंदोलन और पारदर्शी जनमत का सबसे बड़ा हिस्सा अब टीवी स्टूडियो में नहीं, बल्कि इसी डिजिटल जन-चौपाल में अपना वास्तविक आकार ले रहा है।

एक आज़ाद और सच्चे मीडिया का पवित्र काम सत्ता के गलियारों की जय-जयकार करना नहीं, बल्कि सत्ता की आँखों में आँखें डालकर तीखे सवाल पूछना है। अगर हमारे देश का मुख्यधारा का मीडिया अपनी इस संवैधानिक और नैतिक भूमिका को निभाने में पूरी तरह विफल रहेगा, तो भारत की यह जागरूक जनता अपनी आवाज़ और अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए हमेशा ऐसे ही नए-नए मंच खोजती रहेगी। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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