ज़िंदाबाद असहमति, सवाल पूछना जरूरी है! आलोचना लोकतंत्र का पोषण है

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Saturday, 11 July, 2026, 11:22:14 AM IST.

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘इंडिया टुडे’, ‘इंडिया एब्रॉड’, and अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं।

ज़िंदाबाद असहमति, सवाल पूछना जरूरी है! आलोचना लोकतंत्र का पोषण है

— बृज खंडेलवाल

ज़रा एक पल के लिए ऐसे भारत की कल्पना कीजिए, जहाँ हर नागरिक सरकार की हर बात पर “जी हुज़ूर” कहे। संसद की बहसें कुछ मिनटों में खत्म हो जाएँ। टीवी चैनलों पर बहस की जगह केवल सरकारी प्रेस नोट पढ़े जाएँ। अख़बारों के संपादकों का काम सिर्फ़ अल्पविराम और पूर्णविराम ठीक करना रह जाए। सोशल मीडिया पर हर तरफ़ एक ही नारा गूँजे; “वाह सरकार, कमाल कर दिया!” सब कुछ शांत दिखाई देगा। कोई विवाद नहीं, कोई बहस नहीं, कोई सवाल नहीं। लेकिन उसी ख़ामोशी में लोकतंत्र धीरे-धीरे पिछले दरवाज़े से बाहर निकल जाएगा। ख़ुशकिस्मती से भारत कभी अंधी आज्ञाकारिता पर नहीं बना। भारत बहस, तर्क और मतभेद की ज़मीन पर खड़ा हुआ है।

यूरोप में ज्ञानोदय की हवा चलने से बहुत पहले भारत में जंगलों, आश्रमों, मंदिरों, बौद्ध विहारों और गाँव की चौपालों में विचारों की खुली बहस होती थी। यहाँ तलवारें कम, विचार ज़्यादा टकराते थे। गौतम बुद्ध ने कर्मकांड, ऊँच-नीच और अंधविश्वास पर सवाल उठाए। महावीर ने अहिंसा और समानता का रास्ता दिखाया। चार्वाक ने वेदों की सत्ता तक को चुनौती दे दी। उन्होंने कहा कि बिना प्रमाण किसी बात को मत मानो। उनके अपने ग्रंथ भले न बचे हों, लेकिन उनके विरोधियों ने भी उनके विचारों को दर्ज किया। यही किसी आत्मविश्वासी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान है कि वह अपने विरोधी की आवाज़ भी मिटाती नहीं। बाद में कबीर ने मंदिर और मस्जिद दोनों में फैले पाखंड पर बराबर चोट की। रैदास ने जाति के घमंड को ललकारा। गुरु नानक ने इंसानों की बराबरी का संदेश दिया। मीराबाई ने राजसत्ता के आगे अपनी अंतरात्मा नहीं बेची। तुकाराम ने सामाजिक अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाई।

आधुनिक भारत में राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया। ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों और वंचित समाज की शिक्षा का बिगुल बजाया। पेरियार ने अंधविश्वास और जातीय वर्चस्व पर करारा हमला किया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सदियों पुरानी भेदभाव की दीवारों को चुनौती दी और हमें ऐसा संविधान दिया जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की रक्षा करता है। इनमें से कोई भी अपने समय की सत्ता का लाड़ला नहीं था। कई लोगों का मज़ाक उड़ाया गया। उन्हें समाज से अलग किया गया। जेल भेजा गया। देशद्रोही, विधर्मी या ख़तरनाक तक कहा गया। लेकिन इतिहास ने आख़िरकार सम्मान उन्हीं लोगों को दिया जिन्होंने सवाल पूछे, न कि उन्हें जिन्होंने सवाल दबाए।

भारत की आज़ादी की लड़ाई भी असहमति की मिसाल है। भगत सिंह ने कहा कि क्रांति विचारों से आती है। सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेज़ी हुकूमत को सीधी चुनौती दी। टीपू सुल्तान और छत्रपति शिवाजी महाराज ने विदेशी और दमनकारी सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया। इन सबका संदेश एक था; अन्याय के सामने ख़ामोश रहना सबसे बड़ी ग़लती है। आज लोकतंत्र उसी विरासत को आगे बढ़ाता है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संविधान स्थायी है। इसी कारण संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। लोकतंत्र में नागरिक प्रजा नहीं होता और सरकार कोई ऐसी संस्था नहीं, जिससे सवाल न पूछा जा सके।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में अपने एक ऐतिहासिक विधिक हस्तक्षेप में साफ़ कहा कि सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का मूल अधिकार है, कोई आपराधिक कृत्य नहीं। अदालत ने केवल राजनीतिक विरोध के आधार पर पुलिस द्वारा दर्ज की जाने वाली एफआईआर (FIR) और नागरिकों के निर्वासन (तड़ीपार) के दमनकारी प्रशासनिक आदेशों को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया। इस बड़े फैसले ने देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बुनियादी नागरिक अधिकारों की रक्षा पर विशेष जोर दिया है, हालांकि यह विविड कड़वी हकीकत भी है कि ऐसे न्यायिक संरक्षण का लाभ अभी सभी असहमत नागरिकों और विधिक कार्यकर्ताओं को समान रूप से धरातल पर नहीं मिल रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय भी बार-बार इसी विधिक सिद्धांत को दोहराता रहा है। ‘केदारनाथ सिंह’ मामले में अदालत ने साफ़ कहा कि सरकार की तीखी आलोचना तब तक देशद्रोह के दायरे में नहीं आती, जब तक वह समाज में हिंसा भड़काने की प्रत्यक्ष कोशिश न करे। ‘श्रेय सिंघल’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इंटरनेट पर अभिव्यक्ति को दबाने वाले कठोर दमनकारी कानून को असंवैधानिक करार देकर रद्द करते हुए कहा कि केवल चर्चा करना या किसी विशिष्ट राजनीतिक विचार का समर्थन करना अपराध नहीं हो सकता। हाल के वर्षों में भी सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण विधिक टिप्पणी करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण असहमति लोकतंत्र का ‘सेफ़्टी वाल्व’ है; यदि इस वाल्व को कार्यपालिका द्वारा जबरन बंद कर दिया जाए, तो एक दिन पूरा लोकतांत्रिक तंत्र फट सकता है। यह ऐतिहासिक विधिक स्थापना देश के हर सरकारी दफ़्तर और पुलिस थाने की दीवार पर लिखी जानी चाहिए।

फिर भी हर कुछ साल बाद कुछ लोग यह नई खोज निकालते हैं कि चुनी हुई सरकार से सवाल पूछना देशविरोध है। मानो तार्किक सवाल पूछने से हमारा देश कमज़ोर हो जाता है और सत्ता के पक्ष में बिना सोचे-समझे ताली बजाने से देश मज़बूत हो जाता है। अगर यही विकृत तर्क सही है, तो सबसे अच्छा डॉक्टर वह होगा जो कभी मरीज की बीमारी न बताए। सबसे अच्छा पत्रकार वह होगा जो कभी व्यवस्था की कमियों की बुरी ख़बर न छापे। और सबसे अच्छा न्यायाधीश वह होगा जो हर मुक़दमे में स्थापित विधिक प्रक्रियाओं को भूलकर सरकार के पक्ष में फ़ैसला सुना दे। सच्ची देशभक्ति केवल ताली बजाने में नहीं, बल्कि जागरूक और चौकन्ना रहने में निहित है। जो नागरिक ग़लत शासकीय नीतियों पर सवाल उठाते हैं, वे अक्सर कूटनीतिक रूप से लोकतंत्र की रक्षा कर रहे होते हैं। लोकतंत्र प्रखर आलोचना से बेहतर और परिपक्व होता है, जबकि तानाशाही सिर्फ़ झूठी तारीफ़ पर पलती है।

भारत में व्यंग्य और हास्य भी हमेशा सत्ता को आईना दिखाने का विधिक व सामाजिक ज़रिया रहे हैं। पुराने राजाओं के दरबार में विदूषक हँसते-हँसते वह कड़वा सच कह देता था, जिसे बड़े-बड़े मंत्री भी कहने से डरते थे। जब समाज में विदूषक और व्यंग्यकार ख़ामोश करा दिए जाएँ, तब राजा को हर प्रायोजित ताली सच्ची लगने लगती है। भारत की सबसे बड़ी ताक़त एक जैसी थोपी हुई सोच नहीं, बल्कि हमारी अद्वितीय सांस्कृतिक विविधता है। यहाँ आस्तिक भी रहे, नास्तिक भी। संत भी हुए, संशयवादी भी। कवि भी हुए, क्रांतिकारी भी। तीन हज़ार साल से हम निरंतर बहस करते आए हैं, फिर भी एक अखंड सभ्यता बने हुए हैं। यही हमारी असली पहचान है।

शांतिपूर्ण असहमति को पुलिसिया दमन से दबाने से देश मज़बूत नहीं होता, केवल इतना होता है कि शासन की बड़ी ग़लतियाँ समय पर दिखाई नहीं देतीं। आत्मविश्वास से भरी लोकतांत्रिक सरकार सवालों का जवाब हमेशा ठोस तथ्यों से देती है। असुरक्षित सरकार कानून का डर और एजेंसियों का खौफ दिखाती है। इतिहास का फ़ैसला हमेशा दिलचस्प रहा है; हर पीढ़ी पहले अपने असहमत लोगों को गालियाँ देती है, फिर कुछ दशक बाद उन्हीं की मूर्तियाँ बनवाती है। शायद समझदारी इसी में है कि मूर्ति बनाने से पहले उनकी बात सुन ली जाए। असहमति ज़िंदाबाद, क्योंकि असहमति लोकतंत्र की दुश्मन नहीं, उसकी सबसे पुरानी, सबसे बहादुर और सबसे वफ़ादार साथी है। याद रहे—”कमजोर लोकतंत्र शक्तिशाली तानाशाही से हमेशा बेहतर होता है।” सच से आंखें चुराना अब बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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