अंजीर का पत्ता: क्या हम अपने इतिहास से शर्मिंदा हैं?
— बृज खंडेलवाल
देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे जैसी बड़ी विधिक व प्रशासनिक चुनौतियों से लगातार जूझ रहा है। लेकिन इसी बीच कक्षा 9 की कला शिक्षा की पुस्तक ‘मधुरिमा’ ने एक ऐसा अप्रत्याशित विवाद खड़ा कर दिया, जिसने देश की आधुनिक शिक्षा, प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक विरासत पर एक नई तीखी बहस छेड़ दी है। मामला सिंधु घाटी सभ्यता के ऐतिहासिक केंद्र मोहनजोदड़ो से प्राप्त विश्वप्रसिद्ध “डांसिंग गर्ल” (नृत्यांगना) की अद्वितीय कांस्य प्रतिमा का है। यह लगभग साढ़े चार हजार वर्ष पुरानी कलाकृति भारतीय पुरातत्व और कला इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण अमूल्य धरोहरों में से एक मानी जाती है। दशकों से यह ऐतिहासिक मूर्ति अपने वास्तविक मूल स्वरूप में विभिन्न प्रामाणिक पाठ्यपुस्तकों में बिना किसी हिचक के प्रकाशित होती रही है, लेकिन इस बार इसके धड़ पर एक संकीर्ण नैतिकता के तहत डिजिटल छाया (शैडो) डालकर उसे विकृत रूप से ढक दिया गया। इस पर देश भर के लब्धप्रतिष्ठ इतिहासकारों और गंभीर शिक्षाविदों ने तीखी आपत्ति जताते हुए इसे ऐतिहासिक तथ्यों और विधिक साक्ष्यों के साथ घोर खिलवाड़ बताया। चौतरफा बढ़ते जन-आक्रोश और अकादमिक विवाद के बाद अंततः राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) को बैकफुट पर आना पड़ा और उन्होंने पुस्तक में मूल चित्र को पुनः बहाल करने का प्रशासनिक फैसला लिया।
इस पूरे घटनाक्रम पर देश के एक शीर्ष इतिहासकार ने तीखा कटाक्ष करते हुए कहा, “यह प्राचीन इतिहास के स्थान पर एक मनगढ़ंत काल्पनिक कलाकृति बनाने जैसा आत्मघाती प्रयास है। यह ठीक वैसा ही है जैसे पुनर्जागरण काल में माइकलएंजेलो की कालजयी ‘डेविड’ प्रतिमा की नग्नता से असहज होकर तत्कालीन कट्टरपंथी गिरजाघर (चर्च) के अधिकारियों द्वारा उस पर जबरन एक अंजीर का पत्ता (फिग लीफ) चिपका दिया गया था।” यह ऐतिहासिक टिप्पणी केवल एक सामान्य उपमा नहीं थी, बल्कि इसने वर्तमान व्यवस्था के उस संकीर्ण दृष्टिकोण और पाखंड के पूरे सार को देश के सामने लाकर खड़ा कर दिया है। यह विवाद केवल स्कूल की किसी किताब में छपी एक तस्वीर मात्र का नहीं है, बल्कि यह उस रूढ़िवादी सोच और प्रशासनिक मानसिकता का सुलगता सवाल है जो हमारे समृद्ध इतिहास को उसकी असल शक्ल और वास्तविक प्रामाणिकता में देखने से बुरी तरह हिचकती है। अगर किसी साढ़े चार हजार साल पुरानी ऐतिहासिक कलाकृति को आज के संकीर्ण नैतिक चश्मे और राजनीतिक चश्मे से बदलना या संपादित करना शुरू कर दिया जाए, तो कल को किसी प्राचीन मूर्ति का हाथ, किसी भित्तिचित्र का चेहरा या किसी ऐतिहासिक शिलालेख की जरूरी पंक्तियां भी अपनी सुविधा के अनुसार बदली जा सकती हैं। तब हमारा गौरवशाली इतिहास कोई ठोस विधिक तथ्य नहीं रहेगा, बल्कि वह केवल तत्कालीन सत्ताओं की सुविधा और पसंद के अनुसार गढ़ी गई एक काल्पनिक कहानी मात्र बनकर रह जाएगा।
इस संबंध में दुनिया भर का ऐतिहासिक अनुभव भी यही कड़वा सबक सिखाता है। मध्ययुगीन यूरोप में भी कभी अनेक कालजयी मूर्तियों, चित्रों और भित्तिचित्रों को एक झूठी सामाजिक नैतिकता और पाखंड के नाम पर कपड़ों या पत्तों से ढक दिया गया था। लेकिन बाद के दौर में जब समाज में तार्किकता और वैज्ञानिक चेतना का प्रसार हुआ, तब वहां के प्रखर विद्वानों ने एकमत से यह स्वीकार किया कि नैतिकता की आड़ में किए गए उस दमन से कला, दर्शन और इतिहास दोनों के साथ बहुत भारी ऐतिहासिक अन्याय हुआ था। इसके बाद ही दुनिया भर के आधुनिक संग्रहालयों और विश्वविद्यालयों ने कलाकृतियों के मूल स्वरूप को बिना किसी लाग-लपेट के फिर से गरिमा के साथ अपनाया और यह विधिक रूप से स्वीकार किया कि इतिहास को अपनी वर्तमान प्राथमिकताओं के अनुसार बदलने या छुपाने के बजाय, उसे उसके मूल संदर्भों के साथ आने वाली पीढ़ी को समझाना ही शिक्षा का एकमात्र बेहतर और ईमानदार रास्ता है।
स्कूल की किताबों को तैयार करते समय बच्चों की उम्र, उनके बाल मन और सामाजिक संवेदनशीलता का विशेष ध्यान रखना निश्चित रूप से बेहद ज़रूरी और स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन इस प्रशासनिक संवेदनशीलता का अर्थ यह कतई नहीं होना चाहिए कि देश की प्रामाणिक ऐतिहासिक वस्तुओं, पुरातात्विक साक्ष्यों और विधिक खोजों के मूल स्वरूप को ही आधुनिक तकनीक के जरिए विकृत या सेंसर कर दिया जाए। अगर किसी प्राचीन कलाकृति की नग्नता या उसके ऐतिहासिक संदर्भों के बारे में विद्यार्थियों को कोई अतिरिक्त व्याख्या देने की आवश्यकता महसूस होती है, तो वह पाठ के नीचे एक विधिक टिप्पणी, फुटनोट या शिक्षक के माध्यम से कक्षा में संवाद स्थापित करके बहुत आसानी से दी जा सकती है। लोकतांत्रिक शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य भावी पीढ़ी को सत्य से ईमानदारी से परिचित कराना है, सत्य पर संकीर्णता का पर्दा डालना नहीं।
इस पूरे घटनाक्रम पर देश के एक प्रमुख राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अखबार ने अपने संपादकीय में अत्यंत सटीक टिप्पणी करते हुए इसे “इतिहास पर फ़ोटोशॉप” की संज्ञा दी थी। यह टिप्पणी इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल संपादन केवल कंप्यूटर की एक तस्वीर को नहीं बदलता, बल्कि उसे देखने वाले मासूम बच्चे की बुनियादी समझ, उसकी ऐतिहासिक दृष्टि और उसके तार्किक दृष्टिकोण को भी हमेशा के लिए पंगु बना देता है। किसी भी देश के विद्यार्थी शुरुआती दौर में विधिक रूप से उसी ज्ञान को पूर्ण सत्य मानते हैं जो उनकी आधिकारिक पाठ्यपुस्तकों में छपा होता है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों को तैयार करने वाले विधिक बोर्ड और विशेषज्ञों पर ऐतिहासिक तथ्यों की शुद्धता, वैज्ञानिक प्रमाणिकता और कूटनीतिक ईमानदारी की जिम्मेदारी कई गुना अधिक बढ़ जाती है।
प्राचीन भारतीय सभ्यता, दर्शन और सनातन संस्कृति ने मानव शरीर को कभी भी शर्म, हीनता या किसी अपराध का विषय नहीं माना। देश के सुप्रसिद्ध खजुराहो और कोणार्क के विश्वप्रसिद्ध मंदिर, अजंता और एलोरा की ऐतिहासिक गुफाओं की अद्भुत भित्तिचित्र कला, और प्राचीन काल की असंख्य उत्कृष्ट मूर्तियां इसी प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच की साक्षात विधिक गवाह हैं। हमारी प्राचीन कला परंपराओं में मानव शरीर को किसी संकीर्ण वासना के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के उत्सव, अप्रतिम सौंदर्य, रचनात्मक सृजन और साक्षात प्रकृति के एक अभिन्न प्रतीक के रूप में अत्यंत ऊंचे पायदान पर देखा गया। यही भारतीय सांस्कृतिक विरासत की दुनिया भर में सबसे बड़ी विशिष्ट खूबी और पहचान रही है।
परंतु वर्तमान दौर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम वैश्विक मंचों पर योग, आयुर्वेद, प्राचीन दर्शन और अपनी हजारों वर्ष पुरानी महान सभ्यता का डंका पीटते हैं, उस पर गर्व (फ़ख्र) करते हैं, लेकिन जब उसी गौरवशाली विरासत की वास्तविक कलात्मक अभिव्यक्तियों और पुरातात्विक साक्ष्यों का सामना करने की बारी आती है, तो हमारा समाज और हमारा प्रशासनिक तंत्र अचानक बुरी तरह असहज और कुंठित हो जाता है। यह गहरा सांस्कृतिक विरोधाभास हमारी वर्तमान वैचारिक समझ, हमारी शिक्षा प्रणाली और हमारे खोखले होते जा रहे आत्मविश्वास पर एक बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा करता है।
एक अंतरराष्ट्रीय हिस्टोरियन ने इस विडंबना पर बिल्कुल सही सवाल उठाते हुए कहा था, “अगर सिंधु घाटी सभ्यता की इस ऐतिहासिक नृत्यांगना को उसकी वास्तविक और मूल पुरातात्विक शक्ल में हमारी कक्षाओं में नहीं दिखाया जा सकता, तो फिर भारत की आने वाली पीढ़ियां भारतीय कला के वास्तविक उद्गम, उसके क्रमिक विकास और उसके अद्भुत इतिहास का अध्ययन आखिर कैसे कर पाएंगी?” यह मूलभूत प्रश्न केवल धातु की एक छोटी सी प्रतिमा का नहीं है, बल्कि यह देश के पूरे इतिहास बोध, हमारी विधिक शिक्षा पद्धति और हमारी लोकतांत्रिक चेतना का है।
स्कूली पाठ्यपुस्तकें केवल परीक्षा पास करने, नंबर लाने और डिग्री हासिल करने का कोई निर्जीव साधन नहीं होती हैं। वे वास्तव में आने वाली नई पीढ़ियों के मानस, उनकी सोच, उनके सामाजिक सरोकारों, उनकी समझ और उनकी वैश्विक कूटनीतिक दृष्टि का निर्माण करने वाली सबसे महत्वपूर्ण नर्सरी होती हैं। किसी भी देश का अधूरा, तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया या अनावश्यक रूप से संशोधित किया गया इतिहास अंततः समाज में एक अधूरी, संकीर्ण और हिंसक समझ ही पैदा करता है। हमारी महान भारतीय सभ्यता हजारों वर्षों के झंझावातों के बावजूद आज तक इसलिए जीवित और अक्षुण्ण रही क्योंकि हमारे पूर्वजों में एक अदम्य आत्मविश्वास था, वैज्ञानिक जिज्ञासा थी और पूरी निर्भीकता के साथ हर ऐतिहासिक सच का सामना करने का अद्भुत साहस था।
इसलिए वर्तमान समय की मांग है कि इतिहास को किसी भी प्रकार के काल्पनिक अंजीर के पत्ते से जबरन ढकने के बजाय, उसे उसकी संपूर्ण पुरातात्विक प्रामाणिकता, वैज्ञानिक गरिमा और ऐतिहासिक सच के साथ आने वाली पीढ़ी के सामने पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था में संवेदनशीलता और मर्यादा का होना अत्यंत आवश्यक है, लेकिन इतिहास और विज्ञान का अखंड सत्य उस कृत्रिम मर्यादा से भी कहीं अधिक आवश्यक और सर्वोच्च है। अपने ही अतीत के सच से आँखें चुराने वाली और उसे छुपाने वाली संकीर्ण शिक्षा कभी भी एक आत्मविश्वासी, प्रगतिशील और आधुनिक समाज का निर्माण नहीं कर सकती। यदि आज हम चुप रहे, तो सच धीरे-धीरे दम तोड़ देगा और इसका खामियाजा पूरे राष्ट्र को भुगतना पड़ेगा।