क्या 1947 का विभाजन एक सही निर्णय था?
एक दर्दनाक फैसले ने भारत की सभ्यतागत धारा को बचाए रखा
— बृज खंडेलवाल
1947 का विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ज़ख्म है। लाखों लोग बेघर हुए। अनगिनत परिवार बिछड़ गए। नफ़रत की आग में पूरा उपमहाद्वीप झुलस गया। आज भी उस दौर की कहानियाँ सुनकर रूह काँप उठती है। लेकिन इतिहास केवल आँसुओं से नहीं लिखा जाता। कभी-कभी मुल्कों को दिल नहीं, दिमाग से फैसले लेने पड़ते हैं। कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि चुनना अच्छे और बुरे के बीच नहीं, बल्कि बुरे और उससे भी बुरे के बीच पड़ता है। 1947 का विभाजन ऐसा ही फैसला था।
आज, लगभग अस्सी साल बाद, यह सवाल फिर उठता है कि अगर भारत अखंड रहता, तो क्या वह एक स्थिर और मजबूत राष्ट्र बन पाता? क्या वह अपनी सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत विरासत को सुरक्षित रख पाता? या फिर वह लगातार सांप्रदायिक टकराव, राजनीतिक खींचतान और संवैधानिक गतिरोध में उलझा रहता? सच यह है कि विभाजन किसी जश्न का नतीजा नहीं था। यह राजनीतिक हक़ीक़त को स्वीकार करने का फैसला था।
जून 1947 में कांग्रेस ने माउंटबेटन योजना को मंजूरी दी। तब तक हालात हाथ से निकल चुके थे। मुस्लिम लीग अलग देश की मांग पर अड़ी थी। उसने बार-बार साफ कर दिया था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग राजनीतिक क़ौमें हैं। साझा सत्ता, संघीय ढाँचे और समझौते के कई प्रस्ताव सामने आए, लेकिन बात नहीं बनी। 1946 के “डायरेक्ट एक्शन डे” के बाद भड़की हिंसा ने साफ संकेत दे दिया कि सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण नहीं होगा। बंगाल से पंजाब तक दंगे फैल गए। खून-खराबा बढ़ता गया। कांग्रेस नेतृत्व के सामने सवाल था—क्या देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया जाए या एक कड़वा फैसला लेकर आगे बढ़ा जाए? कहावत है, “नासूर बन चुके घाव का इलाज कभी-कभी सर्जरी ही होती है।” विभाजन उसी सर्जरी जैसा था।
साझा शासन की विफलता और संवैधानिक गतिरोध
1941 की जनगणना के मुताबिक, ब्रिटिश भारत की लगभग एक-चौथाई आबादी मुस्लिम थी और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उनका बहुमत था। ऐसे में अखंड भारत में सत्ता साझेदारी, प्रांतीय अधिकार और धार्मिक पहचान के मुद्दे लगातार टकराव का कारण बन सकते थे। यह कहना मुश्किल है कि ऐसा भारत कितना स्थिर रहता। लेकिन आज़ादी से पहले के हालात देखकर इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि साझा शासन की राह दिन-ब-दिन कठिन होती जा रही थी।
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, विभाजन के बाद भारत एक स्पष्ट बहुसंख्यक जनसंख्या और मजबूत राजनीतिक केंद्र के साथ उभरा। नए गणराज्य ने धर्मनिरपेक्ष संविधान अपनाया, लेकिन उसकी सांस्कृतिक जड़ें हजारों साल पुरानी भारतीय परंपराओं में गहराई से जुड़ी रहीं। आलोचक कह सकते हैं कि यह केवल एक अनुमान है, लेकिन यह भी सच है कि अखंड भारत में पहचान आधारित राजनीति और ज़्यादा तीखी हो सकती थी। संवैधानिक सौदेबाज़ी, क्षेत्रीय असंतोष और अलगाववादी दबाव लोकतंत्र को लगातार अस्थिर कर सकते थे। दूसरे शब्दों में कहें तो विभाजन ने एक बड़ा संघर्ष पैदा किया, लेकिन शायद कई और बड़े संघर्षों को टाल भी दिया।
जनसांख्यिकीय संतुलन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण
पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश में हिंदू और सिख आबादी में आई तेज़ गिरावट भी इस बहस को नया आयाम देती है। कई इतिहासकार मानते हैं कि किसी भी सभ्यता की निरंतरता के लिए जनसांख्यिकीय संतुलन अहम भूमिका निभाता है। उधर भारत ने अपनी विविधता को बनाए रखते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया। यही स्थिरता आगे चलकर हरित क्रांति, आर्थिक उदारीकरण, तकनीकी प्रगति और मजबूत लोकतंत्र की नींव बनी।
रिपोर्ट के अनुसार, यह भी एक विचारधारा का पक्ष है कि आज जिस तरह हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की चर्चा होती है, उसका स्वरूप अखंड भारत में अलग हो सकता था। इतना जरूर कहा जा सकता है कि विभाजन कोई जीत नहीं था। वह एक सुरक्षा कवच था। उसने उस राजनीतिक हक़ीक़त को स्वीकार किया, जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ करना मुमकिन नहीं रह गया था।
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, जो लोग भारत को हिंदू सभ्यता की ऐतिहासिक मातृभूमि मानते हैं, उनके लिए विभाजन ने यह सुनिश्चित किया कि बहुसंख्यक समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए निरंतर राजनीतिक संघर्ष न करना पड़े। विभाजन के घाव आज भी हरे हैं। उसकी पीड़ा कभी भुलाई नहीं जा सकती। लेकिन इतिहास का एक कठोर सच यह भी हो सकता है कि उस दौर में उपलब्ध विकल्पों में विभाजन सबसे कम विनाशकारी फैसला था। कभी-कभी मुल्कों को ज़िंदा रहने के लिए अपने दिल पर पत्थर रखना पड़ता है।
(लेखक आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसाइटी के संस्थापक हैं।)