सूर सरोवर से विलायती बबूल हटाने को सुप्रीम कोर्ट में गुहार

खबर शेयर कीजिए

Agra Desk, tajnews.in | Wednesday, May 20, 2026, 07:15:00 AM IST

Taj News Logo
Taj News
Agra Desk | Environment, Wildlife & Judicial Alerts

आगरा के पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीव पारिस्थितिकी तंत्र को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत से एक बहुत ही बड़ी और बेहद महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। जिले में आठ सौ हेक्टेयर के विशाल भूभाग में फैले विश्व प्रसिद्ध ‘सूर सरोवर पक्षी विहार’ (कीठम झील) से घातक और गैर-स्थानीय विदेशी ‘विलायती बबूल’ (प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा) को पूरी तरह से हटाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। आगरा के सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य द्वारा दाखिल इस विशेष याचिका पर देश की सबसे बड़ी अदालत आगामी 22 मई 2026 को सुनवाई करने के लिए पूरी तरह सहमत हो गई है। याचिका में सूर सरोवर सेंचुरी के जैविक वातावरण को बचाने के लिए विलायती बबूल को चरणबद्ध तरीके से काटकर हटाने और उनकी जगह भारत की पारंपरिक देसी प्रजातियों के फलदार और छायादार पौधों को रोपने की पुरजोर गुहार लगाई गई है। पर्यावरणविदों का साफ कहना है कि इस विदेशी कांटेदार झाड़ी के कारण आगरा की स्थानीय जैव विविधता पूरी तरह नष्ट हो रही है और यहां आने वाले हजारों विदेशी प्रवासी पक्षियों के अस्तित्व पर भी एक बहुत बड़ा संकट मंडरा रहा है।

याचिका और विवाद के मुख्य बिंदु
  • 22 मई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: देश के जाने-माने पर्यावरणविद डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य की जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय आगामी शुक्रवार को सुनवाई करेगा।
  • स्थानीय जैव विविधता पर संकट: विलायती बबूल की गहरी जड़ें आगरा के भूजल को सोख रही हैं, जिससे कीठम झील के आसपास गंभीर जल संकट पैदा हो गया है।
  • मथुरा की तर्ज पर राहत की मांग: याचिकाकर्ता के वकील अजीत शर्मा ने कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) का हवाला देकर आगरा के साथ हो रहे भेदभाव पर सवाल उठाए हैं।
  • देसी पौधों को लगाने की पैरवी: पर्यावरण को बचाने के लिए विलायती बबूल की जगह बरगद, पीपल, अर्जुन और जामुन जैसे पारंपरिक छायादार पेड़ लगाने की वकालत।

मेक्सिको की प्रजाति ने आगरा के कीठम अभ्यारण्य को बनाया रेगिस्तान

आगरा का सूर सरोवर पक्षी विहार अपनी प्राकृतिक सुंदरता, विशाल झील और दुर्लभ प्रवासी पक्षियों के कलरव के लिए पूरी दुनिया में एक विशेष मुकाम रखता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस आठ सौ हेक्टेयर के आरक्षित वन क्षेत्र पर एक अदृश्य और बेहद खतरनाक जैविक हमला हुआ है। यह हमला किसी और ने नहीं, बल्कि ‘विलायती बबूल’ नाम के एक विदेशी पौधे ने किया है। डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने अपनी याचिका में वैज्ञानिक तथ्यों को रखते हुए बताया है कि विलायती बबूल मूल रूप से मेक्सिको और मध्य अमेरिका की एक बेहद आक्रामक वनस्पति प्रजाति है।

इस विदेशी बबूल की जड़ें जमीन के बहुत गहरे स्तर तक जाकर आगरा के सीमित भूजल (Groundwater) को बहुत तेजी से सोख लेती हैं। इसकी इसी अत्यधिक पानी पीने की क्षमता के कारण सूर सरोवर पक्षी विहार के आसपास का जलस्तर लगातार नीचे गिर रहा है, जिससे गंभीर जल संकट पैदा हो गया है। सबसे खतरनाक बात यह है कि विलायती बबूल के पत्तों और छाल में कुछ ऐसे जहरीले रासायनिक तत्व (एलीलोपैथिक प्रभाव) पाए जाते हैं, जो इसके आसपास उगने वाली भारत की अन्य किसी भी स्थानीय वनस्पति या घास के बीजों को अंकुरित होने ही नहीं देते। इसके चलते कीठम झील के द्वीपों और किनारों पर मौजूद अन्य सभी पारंपरिक पेड़-पौधे धीरे-धीरे पूरी तरह सूखकर नष्ट हो रहे हैं।

प्रवासी पक्षियों का आशियाना उजड़ा, आगरा में बढ़ रहा बंदर-मानव संघर्ष

इस विदेशी वनस्पति के जहरीले प्रभावों का सबसे बुरा और सीधा असर सूर सरोवर पक्षी विहार की मुख्य साख, यानी यहां आने वाले मेहमान प्रवासी पक्षियों पर पड़ रहा है। हर साल सर्दियों के मौसम में साइबेरिया, यूरोप और मध्य एशिया से हजारों मील की दूरी तय करके दुर्लभ प्रजातियों के पक्षी कीठम झील के टापुओं पर अपने घोंसले बनाने और प्रजनन के लिए आते हैं। इन पक्षियों को अपने आशियाने के लिए चौड़ी पत्ती वाले और मजबूत देसी पेड़ों की आवश्यकता होती है। लेकिन विलायती बबूल के कटीले और कमजोर ढांचे पर ये पक्षी अपने घोंसले बिल्कुल नहीं बना पाते, जिससे उनका प्राकृतिक आवास पूरी तरह खत्म हो रहा है।

इसके अतिरिक्त, सूर सरोवर अभ्यारण्य में फलदार पेड़ों के पूरी तरह समाप्त हो जाने के कारण वन्यजीवों के भोजन का संकट भी खड़ा हो गया है। अभ्यारण्य के भीतर रहने वाले हजारों बंदरों और अन्य शाकाहारी जीवों को अब जंगलों में खाने के लिए कोई फल या कंदमूल बिल्कुल नहीं मिल पा रहा है। इसी भोजन की तलाश में ये जीव अब जंगलों की सीमा को लांघकर आगरा-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग और आसपास की ग्रामीण मानव बस्तियों की तरफ रुख कर रहे हैं। इस स्थिति के कारण आगरा के ग्रामीण अंचलों में ‘बंदर-मानव संघर्ष’ (Monkey-Human Conflict) बहुत ज्यादा बढ़ गया है, जिससे आए दिन निर्दोष लोग और मवेशी घायल हो रहे हैं।

यह भी पढ़ें (आगरा और राष्ट्रीय कानून की बड़ी खबरें)

वकील अजीत शर्मा ने उठाया कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) का कड़ा मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट में इस जनहित याचिका की पैरवी कर रहे प्रसिद्ध और वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत शर्मा ने इस पूरे मामले में एक बहुत ही कड़ा और अकाट्य संवैधानिक तर्क प्रस्तुत किया है। उन्होंने देश के संविधान के अनुच्छेद 14 यानी ‘कानून के समक्ष समानता’ का हवाला देते हुए आगरा के साथ हो रहे प्रशासनिक भेदभाव को न्यायालय के सामने रेखांकित किया है। एडवोकेट अजीत शर्मा ने बताया कि 12 दिसंबर 2023 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की ही एक विशेष अर्जी पर सुनवाई करते हुए सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की आधिकारिक रिपोर्ट के आधार पर पड़ोसी जिले मथुरा के वनों से इस हानिकारक विलायती बबूल को पूरी तरह काटने और वहां ‘इको-रेस्टोरेशन’ यानी पर्यावरण सुधार करने की कानूनी मंजूरी दे दी थी।

याचिकाकर्ता का सीधा और कड़ा तर्क है कि जब समान भौगोलिक, पर्यावरणीय और पारिस्थितिकी स्थिति वाले मथुरा क्षेत्र को विलायती बबूल के जहर से मुक्ति दिलाने के लिए इतनी बड़ी न्यायिक राहत मिल सकती है, तो फिर आगरा के सूर सरोवर पक्षी विहार के साथ ऐसा प्रशासनिक भेदभाव और सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है? आगरा के इस अभ अभ्यारण्य को भी उसी तर्ज पर तुरंत राहत मिलनी चाहिए। उन्होंने अदालत से मांग की है कि आगरा कलेक्ट्रेट और वन विभाग को आदेश देकर कीठम झील के द्वीपों से इस कांटेदार झाड़ी को साफ कराया जाए और उसकी जगह चौड़ी पत्ती तथा मीठे फलों वाले देसी प्रजाति के पौधों को लगाने का वैधानिक आदेश पारित किया जाए।

चंबल प्रोजेक्ट के उप वन संरक्षक ने झाड़ा पल्ला, वन्यजीव अधिनियम का खुला उल्लंघन

इस पूरे मामले में स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों की सुस्ती और उदासीनता भी पूरी तरह से उजागर हो गई है। डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने बताया कि इस याचिका को दायर करने से पहले उन्होंने स्थानीय स्तर पर बहुत प्रयास किए थे। उन्होंने चंबल प्रोजेक्ट के उप वन संरक्षक (DFO) के समक्ष लिखित प्रतिवेदन देकर सूर सरोवर पक्षी विहार से इस विदेशी प्रजाति को हटाने की मांग की थी। लेकिन उप वन संरक्षक ने एक अजीब और गैर-जिम्मेदाराना तर्क देते हुए इस पर कोई भी कार्रवाई करने से साफ इनकार कर दिया था। वन विभाग के अधिकारियों का कहना था कि अभ्यारण्य के भीतर पेड़ों को काटना प्रतिबंधित है, इसलिए वे विलायती बबूल को नहीं छू सकते।

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, वन विभाग का यह तर्क पूरी तरह से हास्यास्पद और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की मूल भावना के खिलाफ है। याचिका में साफ किया गया है कि किसी गैर-स्थानीय, आक्रामक और पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करने वाली हानिकारक प्रजाति को वन क्षेत्र से हटाना किसी भी दृष्टिकोण से ‘वानिकी कार्य’ या अवैध ‘पेड़ काटना’ नहीं माना जाता। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 33 के तहत मुख्य वन्यजीव वार्डन (Chief Wildlife Warden) को यह पूरा वैधानिक और कानूनी अधिकार प्राप्त है कि वह अभ्यारण्य के प्राकृतिक आवास में सुधार करने के लिए ऐसे सभी आवश्यक सुधारात्मक कदम उठा सकता है। इसके बावजूद स्थानीय अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया, जिसके कारण पर्यावरणविदों को विवश होकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

उत्तर प्रदेश सरकार के अपने ही ‘मैनेजमेंट प्लान’ में हटाने की है सिफारिश

इस पूरे कानूनी विवाद का सबसे बड़ा और कड़ा पहलू यह है कि खुद उत्तर प्रदेश सरकार और वन विभाग के अपने आधिकारिक दस्तावेजों में इस विलायती बबूल को पर्यावरण के लिए एक टाइम बम माना गया है। राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए सूर सरोवर ‘साइट मैनेजमेंट प्लान’ (2020-2030) और आगरा वन प्रभाग के ‘वर्किंग प्लान’ (2024-2034) में बहुत ही स्पष्ट और कड़े शब्दों में यह स्वीकार किया गया है कि विलायती बबूल इस सेंचुरी के पर्यावरण और स्थानीय वन्यजीवों के स्वास्थ्य के लिए एक अत्यंत गंभीर खतरा बन चुका है।

इन सरकारी विजन दस्तावेजों में खुद विशेषज्ञों ने यह कड़ा सुझाव दिया है कि सूर सरोवर पक्षी विहार की प्राकृतिक सुंदरता और इसके जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए विलायती बबूल को चरणबद्ध तरीके से पूर्ण रूप से हटा देना चाहिए। इसकी जगह भारत के पारंपरिक, पवित्र और दीर्घायु पेड़ जैसे बरगद, पीपल, अर्जुन, पाकड़ और जामुन जैसे फलदार तथा घनी छाया वाले पेड़ लगाने की पुरजोर सिफारिश की गई है। सरकारी नीतियों और कलेक्ट्रेट के वर्किंग प्लान में दर्ज इन्हीं सिफारिशों को आधार बनाकर अब सुप्रीम कोर्ट में कड़ा कानूनी शिकंजा कसा गया है। आगामी 22 मई को होने वाली इस ऐतिहासिक सुनवाई पर आगरा के सभी प्रकृति प्रेमियों, पक्षी वैज्ञानिकों और आम जनता की निगाहें पूरी मजबूती से टिक गई हैं।

Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

Thakur Pawan Singh

Chief Editor, Taj News


खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment