Uttar Pradesh Desk, Taj News | Monday, April 13, 2026, 03:20:30 PM IST

कानपुर: धरती पर भगवान का दूसरा रूप कहे जाने वाले चिकित्सा पेशे को जब लालच और जघन्य अपराध का ग्रहण लग जाता है, तो इंसानियत भी शर्मसार हो उठती है। उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर में पिछले कुछ हफ्तों से गूंज रहे बहुचर्चित और रूह कंपा देने वाले ‘अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट’ (Illegal Kidney Transplant Racket) में पुलिस ने अब तक की सबसे बड़ी और अहम कामयाबी हासिल की है। इस पूरे अंतरराष्ट्रीय स्तर के गिरोह के मास्टरमाइंड और 25 हजार रुपये के इनामी सरगना रोहित को पुलिस ने गाजियाबाद-दिल्ली बॉर्डर से एक नाटकीय और खुफिया ऑपरेशन के तहत गिरफ्तार कर लिया है। इस खूंखार अपराधी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस पूछताछ में जो खौफनाक और चौंकाने वाला सच सामने आया है, उसने पुलिस विभाग से लेकर स्वास्थ्य महकमे के आला अधिकारियों तक के होश उड़ा दिए हैं। ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, खुद को एक बड़ा ‘एनेस्थीसिया स्पेशलिस्ट’ (Anesthesia Specialist) और सर्जन बताने वाला यह शातिर मास्टरमाइंड रोहित कोई एमबीबीएस या एमडी डॉक्टर नहीं, बल्कि महज 12वीं (इंटरमीडिएट) पास एक अनपढ़ महाठग है। यह जालसाज ऑपरेशन थियेटर (OT) के अंदर बकायदा एप्रन पहनकर न सिर्फ मरीजों को बेहोशी का इंजेक्शन देता था, बल्कि लोगों के शरीर चीरकर उनकी किडनी निकालने जैसे अत्यंत जटिल और जानलेवा ऑपरेशनों को भी बेखौफ अंजाम देता था। इस बड़े खुलासे ने पूरे देश के स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर एक बहुत गंभीर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है कि आखिर कैसे एक 12वीं पास युवक इतने लंबे समय तक महानगरों के बड़े निजी अस्पतालों में इंसानी जिंदगियों से खिलवाड़ कर रहा था।
ऑपरेशन थियेटर का ‘शैतान’ और पुलिस का खुफिया जाल
कानपुर पुलिस कमिश्नरेट की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) पिछले कई दिनों से इस सरगना की सरगर्मी से तलाश कर रही थी। 30 मार्च को जब केशवपुरम के अहूजा अस्पताल से इस किडनी कांड का पहली बार भंडाफोड़ हुआ था, तब से ही मास्टरमाइंड रोहित अंडरग्राउंड हो गया था। पुलिस की कई टीमें उसकी गिरफ्तारी के लिए दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और मेरठ के कई ठिकानों पर लगातार ताबड़तोड़ दबिश दे रही थीं। अपनी असली पहचान छिपाने और पुलिस को चकमा देने में माहिर रोहित लगातार अपनी लोकेशन और मोबाइल नंबर बदल रहा था। लेकिन कानपुर पुलिस की सर्विलांस और क्राइम ब्रांच की टीम ने हार नहीं मानी। रविवार देर रात एक सटीक और पुख्ता खुफिया इनपुट के आधार पर पुलिस ने गाजियाबाद के पास घेराबंदी की और इस 25 हजारी इनामी बदमाश को धर दबोचा। सोमवार की सुबह कड़ी सुरक्षा के बीच उसे कानपुर लाया गया, जहां डीसीपी वेस्ट एसएम कासिम आबिदी और अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने उससे लंबी और कड़ाई से पूछताछ शुरू की। इसी पूछताछ में उसने अपने फर्जीवाड़े और 12वीं पास होने का वह सनसनीखेज राज उगला, जिसने पूरे मामले में एक नया और खतरनाक मोड़ ला दिया है। पुलिस को रोहित के फोन से कई ऐसी तस्वीरें और वीडियो भी मिले हैं जिनमें वह ऑपरेशन थियेटर (OT) के भीतर अन्य डॉक्टरों के साथ मरीजों की सर्जरी करता हुआ दिखाई दे रहा है।
गरीबी और मजबूरी का फायदा: कैसे काम करता था यह खौफनाक नेटवर्क
इस ‘ब्लड मनी’ और अंगों की तस्करी के खौफनाक नेटवर्क का काम करने का तरीका इतना शातिराना और व्यवस्थित था कि किसी भी आम इंसान का दिमाग चकरा जाए। पुलिस जांच में यह बात पूरी तरह से साफ हो चुकी है कि यह गिरोह समाज के सबसे गरीब, लाचार और आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों को अपना आसान शिकार बनाता था। इस गिरोह में कई एजेंट और दलाल सक्रिय थे, जिनमें से एक मुख्य दलाल शिवम काना पहले ही पुलिस की गिरफ्त में आ चुका है। ये दलाल बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के पिछड़े गांवों में जाकर ऐसे युवाओं की तलाश करते थे जिन पर भारी कर्ज हो या जिन्हें पैसों की सख्त जरूरत हो। इस मामले में भी गिरोह ने बिहार के बेगूसराय के रहने वाले एक बेहद गरीब और लाचार युवक आयुष कुमार को अपने जाल में फंसाया था। एजेंटों ने आयुष को उसकी किडनी के बदले तीन से चार लाख रुपये देने का एक बड़ा और झूठा लालच दिया था। रुपयों की सख्त जरूरत के चलते आयुष इस खौफनाक सौदे के लिए तैयार हो गया और उसे गुमराह करके कानपुर लाया गया।
कानपुर लाने के बाद इन गरीब डोनर्स को कल्याणपुर के मेडलाइफ हॉस्पिटल और अन्य गुप्त ठिकानों पर छिपा कर रखा जाता था। इसके बाद इस सिंडिकेट का दूसरा सबसे अहम और शातिर चरण शुरू होता था—फर्जी दस्तावेजों (Fake Documents) का निर्माण। भारतीय कानून के अनुसार, कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से किसी अनजान व्यक्ति को अपनी किडनी या कोई अन्य अंग नहीं बेच सकता। अंगदान केवल सगे संबंधियों या परिवार के सदस्यों के बीच ही किया जा सकता है। इस सख्त कानून को धता बताने के लिए यह गिरोह फर्जी आधार कार्ड, वोटर आईडी और विवाह प्रमाण पत्र तैयार करवाता था, ताकि कागजों पर डोनर (किडनी देने वाले) और रिसीवर (किडनी लेने वाले) के बीच खून का या पति-पत्नी का झूठा रिश्ता साबित किया जा सके। इस मामले में रिसीवर मुजफ्फरनगर की रहने वाली एक अमीर महिला पारुल तोमर थी, जिसे किडनी की सख्त जरूरत थी। गिरोह ने पारुल के परिवार से किडनी ट्रांसप्लांट के नाम पर 30 से 40 लाख रुपये की एक बहुत मोटी और अवैध रकम वसूली थी। सारे फर्जी कागजात तैयार होने के बाद 29 मार्च को केशवपुरम स्थित अहूजा अस्पताल में इस अवैध ट्रांसप्लांट को अंजाम दिया गया, जहां इसी 12वीं पास फर्जी डॉक्टर रोहित ने एनेस्थीसिया देने और सर्जरी में मुख्य भूमिका निभाई थी।
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डॉ. अफजाल का वायरल वीडियो और नोटों की गड्डियों का काला सच
इस अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट की जांच ज्यों-ज्यों आगे बढ़ रही है, त्यों-त्यों पुलिस के हाथ नए और रोंगटे खड़े कर देने वाले सुराग लग रहे हैं। इस पूरे खूनी खेल में रोहित अकेला नहीं था। उसके साथ मेरठ का रहने वाला एक तथाकथित डॉक्टर अफजाल और दिल्ली निवासी ओटी टेक्निशियन मुदस्सर अली उर्फ डॉ. अली भी बराबर के हिस्सेदार थे। पुलिस ने इन दोनों फरार आरोपियों पर भी 25-25 हजार रुपये का भारी इनाम घोषित कर रखा है। इसी बीच सोशल मीडिया पर एक ऐसा वीडियो वायरल हुआ है जिसने जांच एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। इस वायरल वीडियो में फरार आरोपी डॉ. अफजाल एक आलीशान कमरे में बैठा हुआ है और उसके सामने 500-500 के नोटों की कई गड्डियों का एक बड़ा पहाड़ लगा हुआ है। वह बड़ी ही बेशर्मी से उन रुपयों की गड्डियों को गिनता हुआ नजर आ रहा है।
पुलिस सूत्रों का पुख्ता मानना है कि यह वही ‘काली कमाई’ और ‘ब्लड मनी’ है जो इन्होंने मासूम लोगों की किडनी निकालकर और अमीर मरीजों को बेचकर जुटाई थी। इस वीडियो के सामने आने के बाद पुलिस की टीमें अब डॉ. अफजाल और मुदस्सर अली की गिरफ्तारी के लिए मेरठ, मुजफ्फरनगर और दिल्ली के कई ठिकानों पर लगातार और आक्रामक तरीके से छापेमारी कर रही हैं। इन दोनों की गिरफ्तारी के बाद इस सिंडिकेट के कई और सफेदपोश चेहरों से नकाब उठना तय है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि इस पूरे गोरखधंधे में हवाला के जरिए पैसा कैसे ट्रांसफर किया जाता था और इसमें कौन-कौन से बड़े कारोबारी शामिल हैं।
अब तक 10 आरोपी गिरफ्तार, रसूखदार अस्पताल संचालकों पर कसी नकेल
कानपुर पुलिस कमिश्नरेट ने इस मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए एक के बाद एक कई बड़ी और सख्त कार्रवाइयां की हैं। अब तक इस महाघोटाले में कुल 10 गुनाहगारों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है। गिरफ्तार किए गए लोगों में केवल छोटे दलाल ही नहीं, बल्कि बड़े और रसूखदार अस्पताल संचालक भी शामिल हैं। मुख्य रूप से केशवपुरम स्थित अहूजा हॉस्पिटल के मालिक डॉ. सुरजीत अहूजा और उनकी पत्नी प्रीति अहूजा को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। आरोप है कि इन्हीं के अस्पताल में यह सारा अवैध धंधा फलता-फूलता था। इसके अलावा मेडलाइफ अस्पताल के मालिक राजेश कुमार और राम प्रकाश कुशवाहा, प्रिया अस्पताल के संचालक नरेंद्र सिंह, ओटी मैनेजर राजेश कुमार और ओटी संचालक कुलदीप सिंह राघव को भी पुलिस अपनी गिरफ्त में ले चुकी है।
पुलिस की विशेष टीमों ने इन सभी दागी अस्पतालों पर सीलिंग की कठोर कार्रवाई भी की है और वहां से ऑपरेशन रजिस्टर, कंप्यूटर हार्ड डिस्क, और कई अहम सीसीटीवी फुटेज भी जब्त किए हैं। हालांकि, शुरुआत में अस्पताल मालिकों ने पुलिस को गुमराह करने और सबूतों को मिटाने की भरपूर कोशिश की थी, लेकिन पुलिस की वैज्ञानिक और डिजिटल जांच ने उनके सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया। इस घिनौने अपराध का शिकार हुए गरीब डोनर्स की शारीरिक और मानसिक स्थिति बेहद खराब है, जिन्हें अब पुलिस की देखरेख में चिकित्सा और मानसिक काउंसलिंग (Mental Counseling) प्रदान की जा रही है।
आगे की जांच: डिजिटल सुबूतों का जखीरा और सिस्टम पर उठते गंभीर सवाल
मुख्य सरगना रोहित की गिरफ्तारी पुलिस के लिए एक मास्टरस्ट्रोक साबित हो रही है। डीसीपी वेस्ट एसएम कासिम आबिदी ने बताया कि रोहित के पास से पुलिस ने कई महंगे स्मार्टफोन्स और पेन ड्राइव्स बरामद किए हैं। पुलिस अब रोहित के मोबाइल की कॉल डिटेल्स (CDR), व्हाट्सएप चैट्स और बैंक खातों की पूरी हिस्ट्री खंगाल रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस गिरोह ने अब तक कितने गरीब लोगों की किडनियां निकाली हैं और इस रैकेट के तार किन-किन अन्य राज्यों या अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट्स से जुड़े हुए हैं। पूछताछ पूरी होने के बाद पुलिस एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस पूरे नेक्सस का विस्तृत और आधिकारिक खुलासा करेगी।
इस खौफनाक घटनाक्रम ने हमारे स्वास्थ्य विभाग (Health Department) और चिकित्सा नियामक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर भी एक बहुत बड़ा और तीखा सवाल खड़ा कर दिया है। सोचने वाली बात यह है कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) के कार्यालय और स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे, शहर के बीचों-बीच स्थित बड़े-बड़े अस्पतालों में एक 12वीं पास युवक ‘सर्जन’ और एनेस्थीसिया विशेषज्ञ बनकर इतने दिनों तक कैसे मरीजों की जिंदगी से खेलता रहा? क्या स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने कभी इन अस्पतालों के ऑपरेशन थियेटर और वहां काम करने वाले डॉक्टरों की डिग्रियों का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) नहीं किया? यह घटना स्पष्ट रूप से इस बात की ओर इशारा करती है कि कहीं न कहीं सिस्टम के भीतर बैठे कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और अस्पताल माफियाओं की गहरी मिलीभगत के बिना इतना बड़ा संगठित अपराध संभव ही नहीं है। समाज के सबसे गरीब और बेबस तबके को चंद रुपयों का लालच देकर उनके शरीर के अंग निकाल लेना, मानव अधिकारों का सबसे क्रूर और जघन्य हनन है। सरकार को अब ऐसे मेडिकल माफियाओं के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) और गैंगेस्टर एक्ट जैसी कठोरतम कार्रवाई करनी होगी, ताकि भविष्य में कोई भी इंसानियत का सौदा करने की हिम्मत न कर सके।
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Thakur Pawan Singh
Editor in Chief, Taj News
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