असम चुनाव परिणाम: भाजपा की जीत के राजनीतिक मायने, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और विपक्ष की विफलता का संपूर्ण विश्लेषण

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Assam Desk, Taj News | Thursday, May 21, 2026, 11:30:15 AM IST

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Isfakur Rahman
इशफ़ाकुर रहमान
सचिवमंडल सदस्य, असम माकपा
(अनुवाद: संजय पराते)
असम माकपा के सचिवमंडल सदस्य इशफ़ाकुर रहमान ने हाल ही में संपन्न हुए असम विधानसभा चुनाव के नतीजों का एक अत्यंत गहरा, निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण प्रस्तुत किया है। संजय पराते द्वारा अनुदित इस आलेख में वोट शेयर और सीटों के अंतर्विरोध, चुनाव आयोग की भूमिका, विपक्ष की रणनीतिक गलतियों तथा राज्य के आगामी राजनीतिक परिदृश्य पर बेबाक रोशनी डाली गई है।
HIGHLIGHTS
  1. असम चुनाव में भाजपा गठबंधन को 48.01% वोट मिले, लेकिन मौजूदा निर्वाचन प्रणाली के चलते वे 80% से अधिक सीटें जीतने में सफल रहे।
  2. विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस द्वारा सीटों के तालमेल और संयुक्त चुनाव प्रचार को अंतिम रूप देने में की गई रणनीतिक देरी मुख्य विफलता बनी।
  3. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में ‘मियां-विरोध’ और काल्पनिक ‘मुस्लिम खतरे’ पर केंद्रित आक्रामक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सुनियोजित उपयोग।
  4. सरकारी मशीनरी का व्यापक उपयोग, लाभार्थी योजनाओं का राजनीतिकरण और चुनाव आयोग की कथित निष्क्रियता ने लोकतांत्रिक स्वच्छता पर सवाल उठाए।

असम : क्या मायने हैं भाजपा की जीत के?

(आलेख : इशफ़ाकुर रहमान, अनुवाद : संजय पराते)

हाल ही में हुए असम विधानसभा चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में वापस ला दिया है। जीती गई सीटों के लिहाज़ से, यह जीत निस्संदेह महत्वपूर्ण है। बहरहाल, चुनाव परिणामों के गहन विश्लेषण से पता चलता है कि यह जनादेश केवल ज़बरदस्त जनसमर्थन की एक सीधी-सादी अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि यह आज असम में व्याप्त जटिल और विरोधाभासी राजनीतिक हकीकत को दर्शाता है।

ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, भाजपा को कुल वोटों का 37.81 प्रतिशत मिला है और उसने विधानसभा में 82 सीटें जीतीं हैं। अपने सहयोगियों — एजीपी और बीपीएफ — के साथ मिलकर, भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को 48.01 प्रतिशत वोट मिला है और उसने 102 सीटों पर कब्ज़ा किया है। दूसरे शब्दों में, कुल पड़े वोटों में से आधे से भी कम वोट मिलने के बावजूद, सत्ताधारी गठबंधन विधानसभा की 80 प्रतिशत से ज़्यादा सीटें हासिल करने में कामयाब रहा। दूसरी ओर, लगभग 52 प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के खिलाफ वोट दिया। इसलिए, इस नतीजे को भाजपा और उसके सहयोगियों के पक्ष में एक विशेष और ज़बरदस्त जनादेश के तौर पर देखना यथार्थवादी नहीं होगा। वोट शेयर trends और सीट शेयर के बीच का यह अंतर्विरोध एक बार फिर मौजूदा चुनाव प्रणाली में मौजूद कमियों को उजागर करता है और जनमत के सही प्रतिनिधित्व के संबंध में महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक सवाल खड़े करता है।

लेकिन, साथ ही, विपक्षी दलों के पास भी खुद को बधाई देने का कोई खास कारण सिर्फ इसलिए नहीं है कि आधे से ज़्यादा मतदाताओं ने भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन का समर्थन नहीं किया है। ऐसा रवैया अपनाना राजनीतिक रूप से खुद को धोखा देने जैसा होगा। विपक्षी ताकतों को चुनाव परिणामों की निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ समीक्षा करने की ज़रूरत है — न केवल अपने-अपने दलों के भीतर, बल्कि सहयोगी और समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर भी।

पिछली भाजपा-नीत सरकार के ख़िलाफ़ कई मुद्दों पर लोगों में भारी असंतोष था — ज़रूरी चीज़ों की बढ़ती कीमतें, बढ़ती बेरोज़गारी, मज़दूरों, किसानों और गरीबों की आजीविका पर लगातार हमले, ज़बरन बेदखली के अभियान, आक्रामक सांप्रदायिक राजनीति, अडानी और अंबानी जैसे बड़े कॉर्पोरेट समूहों से अत्यधिक नज़दीकी, मुख्यमंत्री के परिवार के सदस्यों और कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के बढ़ते आरोप आदि और इसके साथ ही, लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं पर बढ़ते हमले आदि। भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान, पूरे राज्य में सरकार-विरोधी भावनाएं साफ़ तौर पर दिखाई दे रही थीं। महंगाई, बेरोज़गारी, पर्यावरण का विनाश, ज़मीन से बेदखली, मज़दूरों के अधिकार और किसानों की मांगों जैसे मुद्दों पर आंदोलन और प्रदर्शन हुए थे। फिर भी, ये आर्थिक कठिनाइयां और लोगों के आंदोलन चुनाव परिणामों में पूरी तरह से नहीं झलक पाए। इसका एक मुख्य कारण यह था कि विपक्षी पार्टियां लोगों के व्यापक असंतोष को एक विश्वसनीय और मज़बूत वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति में बदलने में नाकाम रहीं। चुनावों से ठीक पहले बनी अस्थायी चुनावी एकता और सीटों के बंटवारे की व्यवस्था लोगों में पूरी तरह से विश्वास जगाने में असफल रही।

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विपक्षी एकता में अनावश्यक विलंब
दरअसल, असम की जनता के एक बड़े तबके को यह उम्मीद थी कि यह चुनाव भाजपा के तानाशाही और सांप्रदायिक कुशासन को परास्त करने तथा एक लोकतांत्रिक एवं जनोन्मुखी वैकल्पिक सरकार स्थापित करने का अवसर प्रदान करेगा। स्वतंत्र बुद्धिजीवियों और धर्मनिरपेक्ष तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित नागरिक समाज के विभिन्न तबकों ने भी भाजपा-विरोधी एक व्यापक मंच तैयार करने का प्रयास किया। बहरहाल, विपक्षी दल समय रहते, जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप आवश्यक एकता कायम करने में विफल रहे।

खास तौर पर नुकसानदायक बात यह रही कि विपक्षी पार्टियों के बीच सीटों के बँटवारे को अंतिम रूप देने में देरी हुई, जिससे पूरे राज्य में तालमेल के साथ चुनाव प्रचार, संयुक्त रैलियों और एकजुट राजनीतिक लामबंदी की संभावना कमज़ोर पड़ गई। असम में मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते, विपक्षी एकता बनाने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी कांग्रेस पर थी। बहरहाल, वह इस ज़िम्मेदारी को समय पर और असरदार तरीके से निभाने में नाकाम रही। साथ ही, विपक्षी एकता और सीटों के तालमेल की प्रक्रिया में क्षेत्रीय पार्टी “रायजोर दल” (आरडी) के नेतृत्व ने जो भूमिका निभाई, वह भी पूरी तरह से रचनात्मक नहीं थी। आखिरी चरण तक, इसके अध्यक्ष के अड़ियल और गैर-लचीलेपन के रवैये ने व्यापक एकता के निर्माण की कोशिशों में रुकावट डाली। नतीजन, लोगों में एक व्यावहारिक वैकल्पिक सरकार बनने को लेकर ज़रूरी भरोसा पैदा नहीं हो पाया। इस स्थिति का फ़ायदा उठाते हुए, भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन एक बार फिर सत्ता में लौटने में कामयाब रहा। बहरहाल, इस जीत को सत्ताधारी गठबंधन के लिए भी अपनी जीत पर बहुत ज़्यादा इतराने की वजह के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह दावा करना गलत होगा कि भाजपा को असम के ज़्यादातर लोगों का स्वतः स्फूर्त और ज़बरदस्त समर्थन हासिल है।

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और तेज़ हुआ
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, भाजपा की चुनावी राजनीति का मुख्य हथियार बनता जा रहा है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में, “मियां-विरोध” पर केंद्रित एक आक्रामक विमर्श — जो असल में मुस्लिम-विरोधी दुष्प्रचार ही था — को सुनियोजित ढंग से प्रचारित किया गया। इसके साथ ही, एक काल्पनिक “मुस्लिम खतरे” को सामने रखकर डर का माहौल भी बनाया गया। आम जनता का एक बड़ा तबका इस लगातार चलने वाले अभियान से प्रभावित हुआ, और उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि अगर भाजपा सत्ता में वापस नहीं आई, तो असम जल्द ही मुसलमानों से भर जाएगा। इस तरह के सांप्रदायिक आख्यान को फैलाने में आरएसएस ने भी अहम भूमिका निभाई।

इसके साथ ही, भाजपा ने एक ‘आश्रित वोट बैंक’ को मज़बूत करने के लिए लाभार्थी-केंद्रित कल्याणकारी योजनाओं का बड़ी कुशलता से विस्तार किया। कई इलाकों में, कथित तौर पर लोगों में यह डर पैदा किया गया कि अगर उन्होंने भाजपा का समर्थन नहीं किया, तो लाभार्थियों की सूची से उनके नाम हटाए जा सकते हैं। फिर भी, ये कल्याणकारी योजनाएँ सरकारी कार्यक्रम थे, जिनका वित्त-पोषण जनता के पैसे से होता था — न कि भाजपा द्वारा वितरित किसी दान से। ये योजनाएँ गरीब लोगों के वैध अधिकारों का प्रतिनिधित्व करती थीं, न कि किसी राजनीतिक उदारता के काम का।

सत्ताधारी दल ने चुनाव प्रचार के दौरान जटिल सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों को सांप्रदायिक सवालों में बदलने का सुनियोजित प्रयास किया। बेरोज़गारी, महँगाई, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, कृषि और पर्यावरण विनाश जैसे मुद्दों पर सार्थक चर्चा करने के बजाय, सार्वजनिक विमर्श को बार-बार विभाजनकारी और पहचान-आधारित दुष्प्रचार की ओर मोड़ा गया। इस तरह के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने मुद्दों पर आधारित लोकतांत्रिक राजनीति को कमज़ोर किया और मतदाताओं के एक तबके के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर दी।

चुनाव आयोग की पक्षपातपूर्ण भूमिका
इस बीच, भारतीय चुनाव आयोग की भूमिका ने भी गंभीर चिंताएँ खड़ी कर दीं। व्यवहार में, ऐसा लगा कि आयोग ने सत्ताधारी दल द्वारा आचार संहिता के बार-बार किए जा रहे उल्लंघनों को रोकने के लिए बहुत कम प्रयास किए। असम में, 2023 के परिसीमन की कवायद के दौरान निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ पहले ही जिस तरह से निर्धारित की गई थीं, उसकी व्यापक रूप से इस आधार पर आलोचना की गई थी कि यह सांप्रदायिक रूप से प्रेरित और राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण था। 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले, मतदाता सूचियों के ‘विशेष संशोधन’ (एसआर) की आड़ में, कथित तौर पर कई वास्तविक नागरिकों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और उनके नाम मतदाता सूचियों से हटा दिए गए।

इसके अलावा, सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग, भारी वित्तीय खर्च, नफ़रत भरे सांप्रदायिक अभियान और भाजपा नेताओं द्वारा आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के बार-बार लगाए गए आरोपों के बावजूद, चुनाव आयोग ज़्यादातर निष्क्रिय ही रहा। विपक्षी दलों के साथ असमान व्यवहार, चुनिंदा मामलों में प्रशासनिक दबाव और पुलिस प्रशासन के कुछ हिस्सों के पक्षपातपूर्ण कामकाज को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए। कई जगहों पर, यहाँ तक कि उस समय भी जब आदर्श आचार संहिता लागू थी, पुलिस भाजपा नेताओं और मंत्रियों के निर्देशों के अनुसार काम करती हुई दिखाई दी। इन घटनाओं ने चुनावी प्रक्रिया की स्वच्छता और निष्पक्षता को लेकर जनता के संदेह को और भी मज़बूत कर दिया।

कुछ जातीय और समुदाय-आधारित संगठनों के नेतृत्व में मौजूद अवसरवादी तबकों ने भी अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए सत्ताधारी व्यवस्था के साथ गुपचुप समझौते कर लिए। इस प्रक्रिया में, उन समुदायों से जुड़े आम लोगों को राजनीतिक रूप से गुमराह किया गया, जिससे चुनावी तौर पर भाजपा को और भी मदद मिली।

वामपंथ की कमज़ोरियाँ और सीमाएँ
इस चुनाव ने असम में वामपंथी और लोकतांत्रिक ताकतों की कमज़ोरियों और सीमाओं को भी उजागर कर दिया है। विधानसभा में वामपंथ का एक भी प्रतिनिधि चुनकर नहीं आ सका। फिर भी, एक महत्वपूर्ण सच्चाई जस की तस बनी हुई है : मज़दूरों, किसानों, गरीबों और हाशिए पर पड़े तबकों के संघर्षों, तकलीफ़ों और आकांक्षाओं को वामपंथी और प्रगतिशील राजनीति में ही सबसे ज़्यादा मुखर अभिव्यक्ति मिलती है। कम्युनिस्ट पार्टियाँ संसदीय और गैर-संसदीय संघर्षों का मेल करती हैं और सामाजिक बदलाव के आंदोलनों में सक्रिय बनी रहती हैं। वे केवल संसदीय हिसाब-किताब तक ही सीमित नहीं रहतीं। बहरहाल, मौजूदा हालात में, संसदीय राजनीति भी लोकतांत्रिक संघर्ष का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनी हुई है। इसलिए, वामपंथ को चुनाव में जो मौजूदा झटका लगा है, उसे ईमानदारी से स्वीकार किया जाना चाहिए।

साथ ही, मौजूदा हालात वामपंथी और लोकतांत्रिक ताकतों से इस बात की भी मांग करते हैं कि वे जमीनी स्तर पर अपनी सांगठनिक कमजोरियों, युवा पीढ़ियों तक पहुँचने में अपनी सीमाओं और लगातार चलने वाले स्वतंत्र राजनीतिक लामबंदी में आई गिरावट को लेकर गंभीरता से आत्म-मंथन करें। आने वाले समय में लोकतांत्रिक प्रतिरोध को फिर से खड़ा करने के लिए ट्रेड यूनियन संघर्षों, किसान आंदोलनों, छात्र-युवा संगठनों और मुद्दों पर आधारित लोकतांत्रिक अभियानों को मजबूत बनाना बेहद ज़रूरी होगा।

आगे की चुनौतियाँ
भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन लगातार तीसरी बार भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटा है, जिससे असम में सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक एकता के भविष्य को लेकर चिंताएँ भी बढ़ गई हैं। विभाजन और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर आधारित राजनीति, लोगों का ध्यान रोज़मर्रा की ज़िंदगी की असली समस्याओं से भटका देती है। इस बात की भी पूरी संभावना है कि नई सरकार आने वाले सालों में शासन के ज़्यादा केंद्रीकृत और तानाशाही मॉडल को मज़बूत करने की कोशिश कर सकती है। लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की आज़ादी और विरोध की आवाज़ों पर हमले बढ़ सकते हैं। संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के लिए सांप्रदायिक विभाजन का इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति और भी ज़्यादा आक्रामक हो सकती है।

इसके साथ ही, इस बात की भी प्रबल संभावना है कि बड़े पूँजीवादी समूहों के पक्ष में कॉर्पोरेट-उन्मुख आर्थिक नीतियों को और अधिक आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाया जाएगा। परिणामस्वरूप, मजदूरों, किसानों, मध्यम-वर्ग के तबकों और आम नागरिकों को और अधिक आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ेगा, तथा उनकी आजीविका और जीवन-स्थितियों में असुरक्षा बढ़ेगी।

विपक्षी ताकतों को इस चुनाव से एक अहम सबक सीखना चाहिए : केवल सरकार की आलोचना करना ही कोई विकल्प खड़ा करने के लिए काफी नहीं है। इसके लिए एक स्पष्ट राजनीतिक दृष्टिकोण, जनता के साथ ज़मीनी स्तर पर निरंतर जुड़ाव, सांगठनिक मज़बूती और लोगों के मुद्दों पर लगातार संघर्ष की आवश्यकता है।

इसलिए, आने वाले समय को केवल चुनावी राजनीति के एक और दौर के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक अधिकारों, आजीविका और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए मज़बूत लोकतांत्रिक आंदोलनों को खड़ा करने का दौर बनाना होगा। लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों को इस सच्चाई को पहचानना होगा और व्यापक एकता तथा निरंतर संघर्षों के लिए खुद को तैयार करना होगा। असम की राजनीति की भविष्य की दिशा काफी हद तक जन आंदोलनों और लोकतांत्रिक संघर्षों की ताकत और जीवंतता पर निर्भर करेगी।

(लेखक असम माकपा के सचिवमंडल सदस्य हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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