यमुना नदी में सीवेज, मलबा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक दर्शक बना खड़ा है: यमुना छठ पर बृज खंडेलवाल की विशेष रिपोर्ट

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Article Desk, Taj News | Thursday, May 21, 2026, 09:30:15 AM IST

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं पर्यावरण विशेषज्ञ
वरिष्ठ पर्यावरण पत्रकार बृज खंडेलवाल ने यमुना छठ के पावन अवसर पर ब्रजमंडल की जीवनरेखा यमुना नदी की दुर्दशा, प्रशासनिक संवेदनहीनता, अवैध बालू खनन और घाटों पर हो रहे खौफनाक हादसों पर यह विशेष खोजी रपट तैयार की है। यह आलेख अरबों रुपये के सरकारी बजट के बाद भी नदी के नाले में तब्दील होने की कड़वी हकीकत को उजागर करता है।
HIGHLIGHTS
  1. 12 मई 2026 को आगरा घाट पर चार मासूमों की डूबने से मौत; वृंदावन केशी घाट पर भी नाव पलटने से गई थी 15 से अधिक जानें।
  2. हजारों करोड़ रुपये के यमुना एक्शन प्लान के बाद भी प्रतिदिन करोड़ों लीटर अन-ट्रीटेड सीवेज और इंडस्ट्रियल कचरा सीधे नदी में प्रवाहित।
  3. बाढ़ पट्टी (Floodplain) पर कंक्रीट का अवैध कब्जा और बालू माफियाओं द्वारा किए गए गहरे गड्ढे घाटों को ‘डेथ ट्रैप’ बना रहे हैं।
  4. प्रशासनिक विफलता: विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय की भारी कमी के कारण निर्देश केवल कागज़ों और सरकारी फाइलों तक ही सीमित।

यमुना नदी में सीवेज, मलबा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक दर्शक बना खड़ा है

यमुना छठ पर विशेष रिपोर्ट

— बृज खंडेलवाल

12 मई 2026 की शाम आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह कोई संयोग या महज़ दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा यमुना में उतरे। दो घंटे तक उन्हें बचाने की कोशिशें चलती रहीं, लेकिन अंततः चार बच्चों के शव बाहर निकाले गए। आए दिन ये दुर्घटनाएं हो रही हैं। पुलिस ने घाटों पर होर्डिंग्स लगाए हैं, सावधान किया है, पर लोग हैं कि मानते नहीं। वाकई, परिवारों का दुख शब्दों से परे है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी आस्था, इतिहास और सभ्यता सांस लेती आई है, आज मौत की गवाह बनती जा रही है।

इस घटना से कुछ ही सप्ताह पहले वृंदावन के केशी घाट पर नाव पलटने से 15 से अधिक तीर्थयात्रियों की मौत हुई थी। नाव में क्षमता से अधिक सवारियाँ थीं। लाइफ जैकेट नहीं थीं। निगरानी लगभग नदारद थी। सवाल यह है कि आखिर हर हादसे के बाद केवल शोक और मुआवज़े की रस्म क्यों निभाई जाती है?

इन घटनाओं को केवल “दुर्घटना” कहना सच्चाई से आँख चुराना होगा। यह प्रशासनिक विफलता, सरकारी लापरवाही और टूटी हुई व्यवस्था का नतीजा है। जब नदी जहरीली हो, उसका प्राकृतिक बहाव सिकुड़ चुका हो, सुरक्षा इंतज़ाम कागज़ों में सिमट जाएँ और निगरानी तंत्र सोया रहे, तब मौतें केवल समय का इंतज़ार बन जाती हैं। अरबों रुपये खर्च होने के दावों के बावजूद ज़मीनी हालात जस के तस हैं।

यमुना की हालत किसी से छिपी नहीं। लगभग 1,376 किलोमीटर लंबी यह नदी हिमालय से निकलकर हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से गुजरती है। लेकिन दिल्ली के बाद इसका बड़ा हिस्सा एक बहती हुई नाली में बदल जाता है। करोड़ों लीटर बिना शोधन का सीवेज प्रतिदिन नदी में गिरता है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या उनकी क्षमता कम है, या फिर वे ठीक से चल ही नहीं रहे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य पर्यावरणीय रिपोर्टें बार-बार बता चुकी हैं कि नदी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और फीकल कॉलिफॉर्म का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर है। कई जगह पानी नहाने लायक भी नहीं बचा।

दिल्ली का प्रदूषण मथुरा, वृंदावन और आगरा तक पहुँचता है। धार्मिक नगरी होने के कारण इन शहरों के घाटों पर हर दिन भारी भीड़ उमड़ती है, लेकिन दूसरी ओर नाले सीधे नदी में गिरते रहते हैं। आगरा में ताजमहल के पीछे बहती यमुना अक्सर झाग, काले पानी और बदबू के कारण चर्चा में रहती है। यह केवल सौंदर्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय आपदा का संकेत है।

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समस्या यहीं खत्म नहीं होती। यमुना की बाढ़ पट्टी पर तेजी से अतिक्रमण हुआ है। वृंदावन और मथुरा क्षेत्र में ड्रोन सर्वेक्षणों में सैकड़ों अवैध निर्माण सामने आए। नदी का प्राकृतिक फैलाव सिकुड़ता गया। जहाँ पानी फैलकर खुद को साफ करता था, वहाँ अब कंक्रीट और अवैध कॉलोनियाँ खड़ी हैं। नतीजा साफ है : जल ठहराव बढ़ा, प्रदूषण जमा हुआ और नदी का दम घुटने लगा। दुखद यह है कि ऐसे अतिक्रमण अक्सर प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में पनपते हैं。

तीन दशक से योजनाएँ बन रही हैं। यमुना एक्शन प्लान आया। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत परियोजनाएँ चलीं। हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के दावे किए गए। लेकिन सवाल वही है : अगर इतना पैसा लगा, तो नदी अब भी ज़हरीली क्यों है? अधूरी पाइपलाइनें, बंद पड़े प्लांट, कमजोर निगरानी और भ्रष्ट तंत्र ने योजनाओं को कागज़ी सफलता में बदल दिया। जनता को यह जानने का अधिकार है कि पैसा कहाँ गया, किसने निगरानी की और जवाबदेही किसकी तय हुई。

घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कमजोर है। आगरा के बल्केश्वर घाट सहित कई स्थानों पर न तो पर्याप्त लाइफगार्ड हैं, न गहराई के स्पष्ट संकेत, न मजबूत बैरियर और न ही आपातकालीन बचाव तंत्र। नाव संचालन में भी भारी लापरवाही है। क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाना आम बात है। फिटनेस सर्टिफिकेट और लाइफ जैकेट जैसे नियम केवल औपचारिकता बन चुके हैं。

रेत खनन ने स्थिति को और खतरनाक बना दिया है। अवैध खनन से नदी तल में गहरे गड्ढे और अदृश्य भंवर बन गए हैं। ऊपर से शांत दिखने वाला पानी अचानक किसी को निगल लेता है। यह केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मानव जीवन से खिलवाड़ है। सबसे बड़ी विफलता विभागों के बीच तालमेल की कमी है। जल शक्ति मंत्रालय, नगर निगम, विकास प्राधिकरण, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य सरकार : सबकी जिम्मेदारियाँ अलग-अलग बंटी हैं, लेकिन समन्वय लगभग गायब है। हर हादसे के बाद फाइलें चलती हैं, बैठकें होती हैं, बयान दिए जाते हैं, फिर सब ठंडा पड़ जाता है。

न्यायालयों और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समय-समय पर सख्त निर्देश दिए हैं। सीवेज रोकने, अतिक्रमण हटाने और नदी संरक्षण के आदेश जारी हुए। लेकिन अधिकतर आदेश कागज़ों तक सीमित रह गए। बिना सख्त निगरानी और जवाबदेही के आदेश केवल सरकारी फाइलों की शोभा बन जाते हैं। अब केवल भाषणों से काम नहीं चलेगा। ठोस और तत्काल कार्रवाई की जरूरत है品质

सबसे पहले, नदी में गिरने वाले सभी नालों को तत्काल ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए और बंद पड़े प्लांट 30 दिनों के भीतर चालू किए जाएँ। घाटों पर प्रशिक्षित लाइफगार्ड, गहराई संकेतक, चेतावनी बोर्ड और आपातकालीन बचाव व्यवस्था अनिवार्य हो। नाव संचालन पर सख्ती से नियम लागू किए जाएँ और हर नाव में लाइफ जैकेट अनिवार्य हो। वृंदावन, मथुरा और आगरा की बाढ़ पट्टी में बने अवैध निर्माणों को चिन्हित कर पारदर्शी तरीके से हटाया जाए। अवैध रेत खनन पर तत्काल रोक लगे और दोषी अधिकारियों तथा माफिया पर आपराधिक कार्रवाई हो। यमुना में न्यूनतम जल प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए जल प्रबंधन नीतियों की समीक्षा जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण, हर परियोजना का सार्वजनिक ऑडिट हो और उसकी प्रगति रिपोर्ट जनता के सामने रखी जाए。

ये माँगें कठोर जरूर हैं, लेकिन हालात उससे कहीं अधिक भयावह हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई बदलाव संभव नहीं। जब तक प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक योजनाएँ केवल घोषणाओं में ही जीवित रहेंगी। यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह ब्रज की स्मृति, संस्कृति और जनजीवन की धड़कन है। इसके किनारे पीढ़ियाँ पली हैं। अगर यह नदी मरती है, तो केवल पर्यावरण नहीं मरता : समाज, संस्कृति और भविष्य भी घायल होते हैं。

कन्हा, महक, रिया और विक्की केवल चार नाम नहीं हैं। वे हमारी सामूहिक उदासीनता की कीमत हैं। केशी घाट और आगरा के हादसे चेतावनी हैं कि अब भी अगर हमने आँखें बंद रखीं, तो आने वाले वर्षों में ऐसी त्रासदियाँ और बढ़ेंगी। सरकार के पास अभी भी अवसर है। पारदर्शिता दिखाई जाए, जवाबदेही तय की जाए और जनता को साझेदार बनाकर यमुना को पुनर्जीवित करने की गंभीर शुरुआत की जाए। नागरिकों को भी जागना होगा। सवाल पूछने होंगे। रपट माँगनी होगी। स्थानीय निगरानी में भाग लेना होगा। क्योंकि जब नदियाँ मरती हैं, तब सभ्यताएँ भी धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती हैं। यमुना को बचाना केवल एक नदी को बचाना नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी स्मृतियों और आने वाली पीढ़ियों को बचाना है। आज भी समय है। फैसला हमें करना है : क्या हम यमुना को किस्मत के हवाले छोड़ देंगे, या समझदारी, संवेदनशीलता और कार्रवाई से उसका भविष्य बचाएँगे?

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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