ट्रंप की हुंकार: ईरान साथ दे या न दे, होर्मुज खोलेंगे

International Desk, tajnews.in | Saturday, April 11, 2026, 08:30:15 AM IST

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वाशिंगटन/इस्लामाबाद: वैश्विक कूटनीति के पटल पर इस वक्त सबसे बड़ा और हाई-वोल्टेज ड्रामा पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में खेला जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे भयंकर सैन्य तनाव को खत्म करने के लिए दोनों देशों के उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल शांति वार्ता की मेज पर बैठ चुके हैं। लेकिन इस ऐतिहासिक वार्ता के शुरू होने से ठीक पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वाशिंगटन से एक ऐसी हुंकार भरी है, जिसने तेहरान से लेकर बीजिंग तक खलबली मचा दी है। ट्रंप ने अपने चिर-परिचित आक्रामक और बेखौफ अंदाज में स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन माने जाने वाले ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को हर हाल में खोलेगा। उन्होंने साफ लहजे में कहा कि इस काम में ईरान उनका साथ दे या न दे, अमेरिका अपनी नौसैनिक ताकत के दम पर इस जलमार्ग को व्यापार के लिए बहाल कर देगा। ट्रंप का यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि यह ईरान के लिए एक बहुत बड़ी सैन्य चेतावनी है। जॉइंट बेस एंड्रयूज से अपने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को पाकिस्तान रवाना करते वक्त ट्रंप ने यह तक दावा कर दिया कि ईरानी सेना पूरी तरह से पराजित हो चुकी है। ट्रंप के इस रुख ने इस्लामाबाद में चल रही इस शांति वार्ता के नतीजों को लेकर एक बड़ा सस्पेंस खड़ा कर दिया है।

HIGHLIGHTS
  1. ट्रंप का अल्टीमेटम: डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ा संदेश दिया है कि शांति वार्ता का नतीजा चाहे जो हो, अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य को हर हाल में खोलेगा।
  2. ईरानी सेना की हार का दावा: अमेरिकी राष्ट्रपति ने जॉइंट बेस एंड्रयूज पर कहा कि ईरान सैन्य रूप से बुरी तरह पराजित हो चुका है।
  3. इस्लामाबाद में महा-मंथन: अमेरिका से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान से मोहम्मद बाकेर गालिबाफ शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान पहुंच चुके हैं।
  4. ईरान की कड़ी पूर्व-शर्तें: तेहरान ने लेबनान में तत्काल युद्धविराम और अपनी फ्रीज संपत्तियों पर से प्रतिबंध हटाने की मांग वार्ता से पहले ही रख दी है।

ट्रंप की आक्रामकता और होर्मुज जलडमरूमध्य का भू-राजनीतिक महत्व

डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान कि ‘हम होर्मुज खोलेंगे, चाहे ईरान साथ दे या नहीं’, वैश्विक तेल बाजार और कूटनीति के जानकारों के लिए एक बहुत बड़ा संकेत है। होर्मुज जलडमरूमध्य कोई साधारण समुद्री रास्ता नहीं है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला यह संकरा जलमार्ग दुनिया के कुल कच्चे तेल (Crude Oil) व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है। जब से अमेरिका और ईरान के बीच फरवरी 2026 से सैन्य संघर्ष तेज हुआ है, तब से ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने इस मार्ग पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और महंगाई का एक नया वैश्विक संकट खड़ा हो गया है।

ट्रंप ने जॉइंट बेस एंड्रयूज (JBA) पर मीडिया को संबोधित करते हुए कहा, “मैं पता लगाऊंगा कि इस्लामाबाद में क्या हो रहा है। वे (ईरान) सैन्य रूप से पराजित हो गए हैं। अब हम होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने जा रहे हैं, चाहे शांति का कोई सौदा हो या न हो। वह खुला रहेगा और हम वहां मौजूद रहेंगे।” ट्रंप का यह बयान उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे की तस्दीक करता है। वह दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि अमेरिका किसी भी देश के दबाव में आकर अपनी आर्थिक धमनियों को बंद नहीं होने देगा। ट्रंप की इस हुंकार ने इस्लामाबाद में बैठे अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का पलड़ा वार्ता की मेज पर काफी भारी कर दिया है।

इस्लामाबाद में जमा हुए दोनों देशों के दिग्गज रणनीतिकार

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद इस सप्ताहांत वैश्विक कूटनीति का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुकी है। शनिवार सुबह से स्थानीय समयानुसार शांति वार्ता का पहला और सबसे अहम दौर शुरू हो गया है। अमेरिका की तरफ से इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं। उनके साथ कोई साधारण राजनयिक नहीं, बल्कि मध्य पूर्व मामलों के विशेष अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ और राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद एवं उनके सबसे खास रणनीतिकार जेरेड कुशनर भी मौजूद हैं। जेरेड कुशनर की मौजूदगी यह दर्शाती है कि ट्रंप इस शांति समझौते को कितनी गंभीरता से ले रहे हैं और वह इस मामले पर सीधे व्हाइट हाउस से पल-पल की नजर बनाए हुए हैं।

दूसरी तरफ, ईरान ने भी अपने कूटनीतिक हथियारों का सबसे भारी जखीरा इस्लामाबाद में उतार दिया है। ईरानी संसदीय अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ के नेतृत्व में एक बेहद ताकतवर ईरानी प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार देर रात ही पाकिस्तान पहुंच चुका था। इस दल में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची, रक्षा परिषद के सचिव अली अकबर अहमदियान और ईरान के केंद्रीय बैंक के गवर्नर अब्दोलनासेर हेममती शामिल हैं। इस टीम की बनावट बता रही है कि ईरान सिर्फ सैन्य युद्धविराम पर ही बात नहीं करना चाहता, बल्कि वह प्रतिबंधों के चलते तबाह हो रही अपनी अर्थव्यवस्था को भी वापस पटरी पर लाने की पुरजोर कोशिश करेगा।

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जेडी वेंस की दो टूक और ईरान की पूर्व-शर्तों का पेच

पाकिस्तान की जमीन पर पैर रखते ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी अपने इरादे बिल्कुल साफ कर दिए थे। उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि अमेरिका रचनात्मक बातचीत के लिए पूरी तरह से तैयार है, लेकिन यह सब ईरान के व्यवहार पर निर्भर करेगा। वेंस ने सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा, “अगर ईरान इस्लामाबाद में बातचीत की मेज पर बेईमानी या कोई कूटनीतिक चाल चलने की कोशिश करता है, तो उसे वाशिंगटन से बिल्कुल भी सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलेगी।” अमेरिका यह भली-भांति जानता है कि ईरान अक्सर समय खरीदने के लिए वार्ता का नाटक करता है। माइक फ्लिन के हालिया खुलासे (कि ईरान ने चीनी मिसाइलों का इस्तेमाल किया) ने पहले ही अमेरिका के भीतर एक भारी अविश्वास का माहौल पैदा कर रखा है।

वहीं दूसरी ओर, ईरान ने भी इस वार्ता से पहले अपनी आस्तीनें चढ़ा ली हैं। ईरानी संसदीय अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने मेज पर बैठने से पहले ही अमेरिका के सामने कुछ बेहद कड़ी पूर्व-शर्तें (Pre-conditions) रख दी हैं। तेहरान का स्पष्ट कहना है कि लेबनान में चल रहे संघर्ष में तत्काल युद्धविराम होना चाहिए और दुनिया भर के बैंकों में फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों पर से सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाने चाहिए। ईरान का तर्क है कि अगर ये शर्तें नहीं मानी गईं, तो यह शांति वार्ता विफल हो जाएगी। अब देखना यह होगा कि अमेरिका के धुरंधर कूटनीतिज्ञ जेरेड कुशनर और जेडी वेंस ईरान की इन मांगों का किस तरह से जवाब देते हैं।

मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की अग्निपरीक्षा

इस पूरी वैश्विक कूटनीतिक बिसात में पाकिस्तान की भूमिका एक दोधारी तलवार पर चलने जैसी है। एक तरफ इस्लामाबाद खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक जिम्मेदार ‘शांतिदूत’ (Peacemaker) के रूप में स्थापित करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है, ताकि उसे आईएमएफ और विश्व बैंक से भारी-भरकम आर्थिक मदद मिल सके। लेकिन दूसरी तरफ, उस पर अमेरिका और चीन के बीच चल रहे छद्म युद्ध (Proxy War) में हथियार तस्कर के रूप में काम करने के बेहद गंभीर आरोप भी लग रहे हैं। पूर्व अमेरिकी एनएसए के दावों के बाद पाकिस्तान इस वक्त जबरदस्त दबाव में है।

अगर इस्लामाबाद में यह शांति वार्ता किसी ठोस और अंतिम युद्धविराम समझौते पर पहुंचती है, तो पाकिस्तान की वैश्विक कूटनीति में एक बड़ी जीत मानी जाएगी। लेकिन अगर ईरान अपनी पूर्व-शर्तों पर अड़ा रहता है और ट्रंप प्रशासन होर्मुज जलडमरूमध्य को सैन्य ताकत के दम पर खोलने के अपने फैसले पर आगे बढ़ता है, तो मध्य पूर्व में एक बार फिर बमवर्षक विमानों और क्रूज मिसाइलों की गड़गड़ाहट सुनाई देगी। ट्रंप का यह बयान कि ‘ईरान हार गया है’, इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका अब इस संघर्ष को लंबा खींचने के मूड में नहीं है। दुनिया भर के शेयर बाजार, तेल कंपनियां और वैश्विक नेता अब इस्लामाबाद के बंद कमरों में हो रही इस महा-वार्ता के हर एक पल पर अपनी सांसें रोके हुए नजर रखे हुए हैं।

Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

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