International Desk, tajnews.in | Friday, April 10, 2026, 06:15:30 PM IST

वाशिंगटन/तेहरान: मध्य पूर्व की धधकती आग में अब एक ऐसा बारूद गिर चुका है, जो पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की भयंकर लपटों में झोंक सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे भारी सैन्य तनाव के बीच एक बेहद सनसनीखेज और झकझोर देने वाला खुलासा हुआ है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) जनरल माइक फ्लिन ने एक ऐसा दावा किया है जिसने व्हाइट हाउस से लेकर बीजिंग और इस्लामाबाद तक हड़कंप मचा दिया है। माइक फ्लिन ने खुले तौर पर आरोप लगाया है कि ईरान ने हाल ही में अमेरिकी नौसेना की शान माने जाने वाले विमानवाहक पोत ‘यूएसएस अब्राहम लिंकन’ (USS Abraham Lincoln) पर हमला करने के लिए जिन घातक क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया था, वे दरअसल चीन की बनी हुई थीं। सबसे बड़ा और खतरनाक खुलासा यह है कि ड्रैगन की ये विनाशकारी मिसाइलें पाकिस्तान के खुफिया रास्तों से होते हुए तेहरान तक पहुंची थीं। पूर्व एनएसए ने इस पूरी साजिश को अमेरिका के खिलाफ सीधा ‘युद्ध का ऐलान’ (Act of War) करार दिया है और जो बाइडेन तथा ट्रंप प्रशासन के रणनीतिकारों से चीन और पाकिस्तान के खिलाफ तत्काल और सबसे कठोर सैन्य कार्रवाई करने की मांग की है। इस खुलासे ने उन 14 दिनों के युद्धविराम पर भी गहरे काले बादल ला दिए हैं, जिसे हाल ही में पाकिस्तान की ही मध्यस्थता से लागू किया गया था।
माइक फ्लिन का सनसनीखेज दावा: यह सीधे तौर पर ‘युद्ध की कार्रवाई’ है
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, अमेरिका के कूटनीतिक और रक्षा हलकों में इस समय पूर्व एनएसए जनरल माइक फ्लिन का यह बयान किसी परमाणु बम से कम नहीं आंका जा रहा है। माइक फ्लिन ने ‘मोसाद कमेंट्री’ की एक खुफिया रिपोर्ट का बहुत ही प्रमुखता से हवाला देते हुए सोशल मीडिया पर चीन और पाकिस्तान के खिलाफ एक सीधा मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अमेरिका के एक महाकाय एयरक्राफ्ट कैरियर (विमानवाहक पोत) पर विदेशी मिसाइलों से हमला होना कोई मामूली सैन्य झड़प नहीं है। यह दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के सीने पर सीधे तौर पर किया गया एक दुस्साहसिक प्रहार है। ‘यूएसएस अब्राहम लिंकन’ अमेरिकी नौसेना का वह तैरता हुआ किला है जो पूरे मध्य पूर्व में अमेरिका की बादशाहत का प्रतीक माना जाता है।
जनरल फ्लिन ने रक्षा विभाग (पेंटागन) को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर जांच में यह पूरी तरह से साबित हो जाता है कि चीन ने अपनी अत्याधुनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइलें पाकिस्तान के जरिए ईरान को सौंपी हैं, तो अमेरिका को इसे एक ‘ओपन प्रॉक्सी वॉर’ मानना चाहिए। इसका सीधा मतलब यह है कि बीजिंग अब पर्दे के पीछे छिपकर वाशिंगटन के साथ सीधा युद्ध लड़ रहा है। फ्लिन ने मांग की है कि अमेरिकी सरकार को बिना एक पल की भी देरी किए चीन और पाकिस्तान को रेड नोटिस (Red Notice) पर रख देना चाहिए। उनके इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका के अंदरूनी रक्षा हलकों में अब कूटनीति से ज्यादा हथियारों की भाषा में जवाब देने की सुगबुगाहट बहुत तेज हो चुकी है। अगर अमेरिका ने इस ‘एक्ट ऑफ वार’ का सैन्य जवाब दिया, तो फारस की खाड़ी से लेकर दक्षिण चीन सागर तक युद्ध की भयंकर लपटें उठनी तय हैं।
शांतिदूत या हथियारों का तस्कर? पाकिस्तान के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश
इस पूरे अंतरराष्ट्रीय ड्रामे में सबसे ज्यादा किरकिरी अगर किसी देश की हो रही है, तो वह पाकिस्तान है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पन्नों को पलटकर देखें तो महज कुछ दिन पहले ही दुनिया इस बात पर हैरान थी कि अमेरिका और ईरान के बीच भयंकर युद्ध टालने के लिए पाकिस्तान ने एक बहुत बड़े मध्यस्थ (Mediator) की भूमिका निभाई थी। इसी मध्यस्थता के चलते ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर अपने विनाशकारी सैन्य हमलों को दो सप्ताह के लिए स्थगित करने का बड़ा ऐलान किया था। लेकिन माइक फ्लिन के इस नए खुलासे ने इस्लामाबाद के चेहरे से शांतिदूत का वह मुखौटा पूरी तरह से नोच कर फेंक दिया है। अब पाकिस्तान दुनिया के सामने एक ऐसे देश के रूप में खड़ा है जो एक तरफ शांति की मेज पर बैठा है, और दूसरी तरफ पीठ पीछे अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन को हथियार सप्लाई कर रहा है।
माइक फ्लिन ने पाकिस्तान के इसी पाखंड पर करारा तंज कसते हुए पूछा है कि जो मुल्क पर्दे के पीछे से अत्याधुनिक हथियारों की तस्करी का एक सुरक्षित कॉरिडोर बना हुआ हो, वह मुल्क दुनिया के सामने एक ईमानदार मध्यस्थ कैसे हो सकता है? कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान हमेशा से ही चीन का एक ‘सदाबहार दोस्त’ रहा है और अपनी जर्जर अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए वह बीजिंग के किसी भी आदेश को मानने के लिए मजबूर है। चीन अच्छी तरह से जानता था कि वह सीधे तौर पर ईरान को हथियार नहीं दे सकता, इसलिए उसने पाकिस्तान की जमीन और उसके खुफिया नेटवर्क्स का बखूबी इस्तेमाल किया। अमेरिका के रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस पाकिस्तानी रूट की आधिकारिक पुष्टि हो जाती है, तो आईएमएफ (IMF) बेलआउट पैकेज का इंतजार कर रहे पाकिस्तान पर अमेरिका ऐसे कड़े आर्थिक और सैन्य प्रतिबंध लगाएगा, जिससे वह दशकों पीछे चला जाएगा।
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ड्रैगन की चाल और अमेरिका का पलटवार: 5 लाख चीनी छात्रों को निकालने की मांग
चीन की कूटनीति हमेशा से ‘बिना लड़े युद्ध जीतने’ की रही है। बीजिंग यह भली-भांति जानता है कि अगर मध्य पूर्व में अमेरिका उलझा रहता है, तो ताइवान और दक्षिण चीन सागर में उसे अपनी विस्तारवादी नीतियों को अंजाम देने का खुला वक्त मिल जाएगा। यही वजह है कि ड्रैगन ने ईरान को अपनी खतरनाक एंटी-शिप क्रूज मिसाइलों की तकनीक सौंपने का यह दुस्साहसिक दांव खेला। रक्षा जानकारों का मानना है कि चीन दरअसल अपनी नई मिसाइल तकनीक का परीक्षण (Testing) अमेरिकी नौसेना के सबसे उन्नत विमानवाहक पोतों पर करना चाहता था, और इसके लिए उसने ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बखूबी इस्तेमाल किया है।
लेकिन चीन की इस खतरनाक चाल का जवाब देने के लिए अमेरिका भी अब एक बड़े पलटवार की तैयारी कर रहा है। माइक फ्लिन ने अमेरिकी प्रशासन को एक बेहद आक्रामक और कड़ा सुझाव दिया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका को चीन को आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर तगड़ी चोट देनी चाहिए। फ्लिन ने मांग की है कि जवाबी कार्रवाई के रूप में अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थानों में पढ़ रहे लगभग 5 लाख चीनी छात्रों को तुरंत उनके देश वापस (Deport) भेज दिया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि ये छात्र भविष्य में चीन की तकनीकी ताकत बनते हैं और अमेरिका की धरती पर रहकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था का फायदा उठाते हैं। अगर ऐसा कोई कदम उठाया जाता है, तो यह अमेरिका और चीन के कूटनीतिक रिश्तों में एक ऐसा भूचाल ला देगा जिसकी कल्पना शायद बीजिंग ने भी नहीं की होगी।
युद्धविराम पर मंडराते काले बादल: जेडी वेंस का दौरा और आगे का कूटनीतिक रास्ता
फरवरी 2026 से ही अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा यह भीषण सैन्य संघर्ष मध्य पूर्व को एक ज्वालामुखी के मुहाने पर ले आया है। हाल ही में दोनों देशों ने दुनिया की गुहार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के दबाव के चलते दो हफ्ते के एक बेहद नाजुक युद्धविराम (Ceasefire) पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन यूएसएस अब्राहम लिंकन पर इस चीनी मिसाइल हमले के दावे ने इस शांति प्रक्रिया को पूरी तरह से पटरी से उतार दिया है। अमेरिकी सीनेटर जेडी वेंस वर्तमान में मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान रवाना हुए हैं, जबकि ईरान के विदेश मंत्री और संसद अध्यक्ष दोनों इस वक्त तेहरान में एक अहम आपातकालीन बैठक कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) आधिकारिक तौर पर यह पुष्टि कर देता है कि हमले में चीनी तकनीक और पाकिस्तानी रूट का इस्तेमाल हुआ है, तो यह युद्धविराम उसी पल खत्म हो जाएगा। अमेरिका इस ‘धोखेबाजी’ का जवाब सिर्फ कूटनीतिक बयानों से नहीं देगा, बल्कि ईरान के रणनीतिक और सैन्य ठिकानों पर ‘कारपेट बॉम्बिंग’ (Carpet Bombing) का एक नया दौर शुरू हो जाएगा। इसके अलावा, इज़राइल जो पहले से ही ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम से बौखलाया हुआ है, उसे भी अपनी मनमानी एयरस्ट्राइक करने का पूरा मौका मिल जाएगा। दुनिया भर के शेयर बाजारों और कच्चा तेल (Crude Oil) की कीमतों पर इस खबर का भारी असर पड़ना शुरू हो गया है। अब सारी दुनिया की नजरें व्हाइट हाउस के अगले आधिकारिक बयान पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि दुनिया शांति की तरफ बढ़ेगी या फिर तीसरे विश्व युद्ध के एक बेहद खौफनाक और अंतिम अध्याय की शुरुआत होगी।

Thakur Pawan Singh
Editor in Chief, Taj News
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