शिक्षाविदों, पूर्व सैन्य अधिकारियों और सामाजिक चिंतकों ने युवाओं के मुद्दों, राजनीतिक हस्तक्षेप और सुरक्षा बलों की भूमिका पर रखे विचार
Agra Desk, 🌐 tajnews.in | Wednesday, 12 August, 2026, 5:20:00 PM IST.

tajnews.in | आगरा: जेन-जी आंदोलन को लेकर अपर्णा अपार्टमेंट स्थित कार्यालय में सप्तऋषि की वैचारिक बैठक आयोजित की गई। बैठक में नीट पेपर लीक, युवाओं में बढ़ते असंतोष, राजनीतिक हस्तक्षेप, आंदोलन के दौरान सुरक्षा बलों की भूमिका और पैलेट गन के इस्तेमाल जैसे मुद्दों पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ। शिक्षाविदों, पूर्व सैन्य अधिकारियों और सामाजिक चिंतकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण रखते हुए युवाओं की समस्याओं और आंदोलन के पीछे के कारणों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता बताई।
पेपर लीक से व्यवस्था पर उठे सवाल
केएनआईटी सुल्तानपुर के निदेशक एवं वरिष्ठ शिक्षाविद प्रोफेसर (डॉ.) राजीव उपाध्याय ने कहा कि एनटीए द्वारा नियुक्त विषय विशेषज्ञों के स्तर से ही पेपर लीक जैसी स्थिति सामने आना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यदि पेपर सेट सीमित हों और विषय विशेषज्ञों को यह पता हो कि उनके द्वारा तैयार किए गए प्रश्न ही परीक्षा में पूछे जाने हैं, तो व्यवस्था में गंभीर खामी पैदा हो सकती है।
उन्होंने आईआईटी की परीक्षा प्रणाली का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां विषय विशेषज्ञों को अलग व्यवस्था में रखकर आपसी चर्चा के माध्यम से प्रश्न तैयार कराए जाते हैं, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि उनके बनाए प्रश्नों में से कौन-से प्रश्न किस सेट में शामिल होंगे। उनके अनुसार, ऐसी व्यवस्था में प्रश्नपत्र के शीर्ष स्तर से लीक होने की संभावना कम हो सकती है।
प्रो. राजीव उपाध्याय ने आंदोलन के दौरान देश के शीर्ष नेता के खिलाफ बच्चों द्वारा की गई कथित अभद्र टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने इसे संस्कारों के क्षरण से जोड़ते हुए कहा कि सभ्य समाज ऐसी भाषा को स्वीकार नहीं कर सकता।
पैलेट गन के इस्तेमाल पर भी चर्चा
बैठक में कर्नल जी.एम. खान से आंदोलन के दौरान बच्चों पर पैलेट गन चलाने को लेकर सुरक्षा बलों के मनोभाव और निर्णय संबंधी पहलुओं पर चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि देश के पढ़ने-लिखने वाले युवाओं पर कोई भी सुरक्षा बल गोली, गोला या पैलेट गन चलाने से पहले कई बार सोचता है और ऐसा किया भी जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि देश की सर्वोच्च धरोहरों की सुरक्षा पर कोई आंच आती है तो बल प्रयोग करना उचित हो सकता है। उन्होंने कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सेना वर्षों से ऐसी परिस्थितियों का सामना करती आई है और उनसे निपटने का उसका तरीका पेशेवर रहा है।
हालांकि, कर्नल जी.एम. खान ने कहा कि पैलेट गन के इस्तेमाल की परिस्थितियां जांच का विषय हैं। उनके अनुसार, मौके के हालात को देखते हुए यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन परिस्थितियों में इसका प्रयोग किया गया और क्या वास्तव में ऐसा करना अनिवार्य था।
युवाओं के मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता: ब्रिगेडियर मनोज कुमार
बैठक में ब्रिगेडियर मनोज कुमार ने कहा कि जेन-जी आंदोलन इस बात की केस स्टडी है कि युवा पीढ़ी और उसके मुद्दों को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि आंदोलन में नेताओं या संविधान को लेकर की गई अभद्र टिप्पणियां निंदनीय हो सकती हैं, लेकिन आंदोलन के मूल मुद्दों, जिनमें नीट पेपर लीक भी शामिल है, उन्हें सुनना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि कोई भी सरकार युवाओं के मूल सवालों से लंबे समय तक बच नहीं सकती। आंदोलन के पीछे मौजूद वास्तविक समस्याओं पर गंभीरता से विचार किया जाना जरूरी है।
आंदोलन का स्वरूप बिगाड़ने का आरोप
वरिष्ठ सामाजिक चिंतक गौरीशंकर सिकरवार ने आरोप लगाया कि आंदोलन की आड़ में देश विरोधी ताकतों ने प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को अस्थिर करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि जब भी कोई सरकार देशहित में मजबूत कदम उठाती है, तब बाहरी शक्तियों द्वारा उसे कमजोर करने के प्रयास किए जाते हैं।
उन्होंने विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में सरकार की कमियों के बावजूद समाज के सामने स्पष्ट विकल्प का अभाव है। उन्होंने कहा कि सरकार को यूजीसी एक्ट के विरोध के समय से ही अधिक सतर्क रहना चाहिए था।
गौरीशंकर सिकरवार ने यह भी आरोप लगाया कि आंदोलन के दौरान देश विरोधी और हिंदू विरोधी टिप्पणियां सामने आईं तथा आंदोलन की आड़ में देश को संकट में डालने की तैयारी की गई। उन्होंने कहा कि सरकार को देश में मौजूद बेरोजगार युवाओं और उनके मुद्दों को गंभीरता से लेना होगा।
राजनीतिक भाषा और युवाओं पर प्रभाव की चर्चा
आगरा विश्वविद्यालय के पूर्व असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. दिवाकर तिवारी ने कहा कि जेन-जी पीढ़ी ने अपने जीवनकाल में राजनीतिक विचारों को लगातार कड़वाहट के साथ देखा है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप और भाषा की गिरती शैली का प्रभाव नई पीढ़ी पर भी पड़ रहा है।
उन्होंने ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित वेब सीरीज में अश्लील भाषा, दृश्य, रेप, छेड़छाड़ और द्विअर्थी संवादों की बढ़ती मौजूदगी पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, नई पीढ़ी जिस तरह की सामग्री देखेगी, उसका प्रभाव उसकी भाषा और व्यवहार पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, डॉ. दिवाकर तिवारी ने कहा कि आंदोलन में शामिल भीड़ को एक ही नजरिये से देखना उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि इसी भीड़ में ऐसे बच्चे भी हैं जो रात-दिन मेहनत करते हैं और जिनके माता-पिता उनकी सफलता के लिए त्याग करते हैं। पेपर लीक जैसी घटनाओं से ऐसे विद्यार्थियों में व्यथा और असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।
उन्होंने कहा कि व्यवस्था को कुछ युवाओं के कथित अनुचित आचरण की आड़ में आंदोलन से जुड़े मूल मुद्दों को खारिज नहीं करना चाहिए। उनके अनुसार, बड़ी संख्या में युवा आंदोलन से जुड़े, इसलिए सरकार को इसके पीछे मौजूद कारणों को गंभीरता से समझना होगा।
डॉ. दिवाकर तिवारी ने कहा कि यूजीसी एक्ट जैसे मुद्दों को लेकर पैदा हुआ असंतोष भी युवाओं के बीच मौजूद था और बाद में विपक्षी दलों के समर्थकों के शामिल होने से आंदोलन का स्वरूप प्रभावित हुआ। उन्होंने कहा कि सरकार को अब अधिक सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि देश में बड़ी संख्या में बेरोजगार युवा हैं और उनके अपने मुद्दे हैं। विपक्ष भी लगातार सरकार के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी कर रहा है।
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Pawan Kumar Singh
Chief Editor, Taj News
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