कहा—युवाओं के मुद्दों को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय उनकी वास्तविक समस्याओं और भविष्य पर गंभीरता से विचार जरूरी
Agra Desk, 🌐 tajnews.in | Tuesday, 11 August, 2026, 10:25:00 PM IST.

tajnews.in | आगरा: जेन-जी के पीछे सियासत का सवाल दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र एवं युवाओं के प्रदर्शनों और देश में ‘जेन-जी’ (Gen-Z) को लेकर चल रही बहस के बीच हिंदुस्तानी बिरादरी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं कबीर पुरस्कार से सम्मानित डॉ. सिराज कुरैशी ने उठाया है। उन्होंने सवाल किया कि क्या जंतर-मंतर पर दिखाई देने वाली युवाओं की भीड़ के पीछे विभिन्न राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव है। साथ ही उन्होंने युवाओं के मुद्दों को केवल राजनीतिक नजरिये से देखने के बजाय उनकी वास्तविक समस्याओं और भविष्य पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत बताई।
‘जेन-जी’ को लेकर अलग-अलग नजरिया
डॉ. सिराज कुरैशी ने अपने लेख में कहा कि आम आदमी के सामने आज यह सवाल मौजूद है कि आखिर ‘जेन-जी’ क्या है और इसका वास्तविक मतलब क्या है। उनका कहना है कि नौकरी, व्यवसाय, खेती या रोजमर्रा के काम में व्यस्त रहने वाला आम नागरिक भी पढ़े-लिखे युवाओं और उनके आंदोलनों को लेकर अपने स्तर पर सवाल कर रहा है।
उनके अनुसार, समाज में ‘जेन-जी’ को लेकर अलग-अलग धारणाएं दिखाई देती हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आज के नौजवानों को केवल इस आधार पर देखा जाना चाहिए कि वे अपने काम और कर्तव्य से दूरी बना रहे हैं या किसी राजनीतिक दल के प्रभाव में काम कर रहे हैं।
जंतर-मंतर के युवा आंदोलन पर सियासी सवाल
डॉ. सिराज कुरैशी ने राजनीतिक दलों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह जानने की जरूरत बताई कि युवाओं के आंदोलनों और उनकी ऊर्जा का कहीं राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा। उन्होंने कहा कि इस सवाल का जवाब बिना पूर्वाग्रह के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तलाशा जाना चाहिए।
उन्होंने युवाओं को देश की महत्वपूर्ण शक्ति बताते हुए कहा कि उनकी ऊर्जा को राजनीतिक विवादों में इस्तेमाल करने के बजाय शिक्षा, रोजगार, कौशल और सामाजिक विकास की दिशा में लगाया जाना चाहिए।
मीडिया की भूमिका पर भी उठाए सवाल
अपने लेख में डॉ. सिराज कुरैशी ने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि युवाओं की गतिविधियों को अलग-अलग नजरिये से प्रस्तुत किए जाने के कारण आम जनता तक पहुंचने वाली तस्वीर कई बार वास्तविक स्थिति से अलग दिखाई दे सकती है।
उनके मुताबिक, युवाओं के मुद्दों को जिस तरह से ‘गर्म-मसाले’ के साथ प्रस्तुत किया जाता है, उससे मूल समस्याओं पर गंभीर चर्चा प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि युवा आंदोलनों को प्रस्तुत करते समय उनके वास्तविक मुद्दों और सामाजिक परिस्थितियों को भी सामने रखना जरूरी है।
शहरी और ग्रामीण युवाओं की परिस्थितियां अलग
लेख में डॉ. सिराज कुरैशी ने शहरी और ग्रामीण युवाओं के बीच अंतर का भी उल्लेख किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ग्रामीण क्षेत्र का युवा भी ‘जेन-जी’ की पूरी बहस और कथित संस्कृति से उसी तरह जुड़ा है, जैसा शहरी युवा दिखाई देता है।
उनका मानना है कि ग्रामीण युवाओं की परिस्थितियां, प्राथमिकताएं और समस्याएं अलग हैं। इसलिए युवाओं को एक ही श्रेणी में रखकर देखने के बजाय उनके सामाजिक और आर्थिक परिवेश को समझना आवश्यक है।
‘मिलेनियल’ और ‘जेन-जेड’ की भारतीय परिस्थितियों में प्रासंगिकता
डॉ. सिराज कुरैशी ने दुनिया के विभिन्न देशों में युवाओं के लिए प्रचलित ‘मिलेनियल’ और ‘जेन-जेड’ जैसे वर्गीकरणों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दूसरे देशों में इन पीढ़ियों को जिस तरह परिभाषित किया जाता है, भारत की सामाजिक परिस्थितियां उससे अलग हैं।
उनके अनुसार, भारतीय विद्यार्थियों और युवाओं की दुनिया को केवल पश्चिमी परिभाषाओं के आधार पर नहीं समझा जा सकता। भारतीय समाज में परिवार, माता-पिता, खानदान और सामाजिक जिम्मेदारियों का प्रभाव आज भी महत्वपूर्ण है।
‘नौकरी की जगह इन्फ्लुएंसर बनना चाहती है युवा पीढ़ी’
हिंदुस्तानी बिरादरी के वाइस चेयरमैन विशाल शर्मा के हवाले से लेख में कहा गया है कि आज की युवा पीढ़ी में एक वर्ग नौकरी करने के बजाय ‘इन्फ्लुएंसर’ बनने की ओर अधिक आकर्षित दिखाई देता है।
लेख में युवाओं को केवल आलोचना का विषय बनाने के बजाय उन्हें उचित दिशा, अवसर और कौशल उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने की जरूरत
डॉ. सिराज कुरैशी ने प्रदेश और शहर के बुद्धिजीवी वर्ग से आह्वान किया कि वह युवा वर्ग को आगे बढ़ाने, उनकी प्रतिभा को सही दिशा देने और सामाजिक मूल्यों को मजबूत रखते हुए विकास के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे।
उन्होंने कहा कि युवाओं की ऊर्जा को शिक्षा, रोजगार, कौशल, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्र निर्माण से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
युवाओं के मुद्दों पर गंभीर बहस जरूरी
डॉ. सिराज कुरैशी के लेख का मूल सवाल यही है कि ‘जेन-जी’ के नाम पर दिखाई दे रहे युवा आंदोलनों को केवल राजनीतिक नजरिये से देखा जाए या उनके पीछे छिपी वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और पीढ़ीगत परिस्थितियों को भी समझा जाए।
लेख में युवाओं, मीडिया और राजनीतिक दलों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह विचार सामने रखा गया है कि देश की युवा पीढ़ी को किसी राजनीतिक खांचे में बांटने के बजाय उसकी ऊर्जा को शिक्षा, रोजगार, कौशल, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्र निर्माण की दिशा में उपयोग किया जाना चाहिए।
यह भी पढ़ें

Pawan Kumar Singh
Chief Editor, Taj News
7579990777




