बलिया के शेर चंद्रशेखर: जब संसद में कांपने लगे थे बड़े-बड़े दबंग नेता! डॉ. के.के. सिंघल का विशेष आलेख

आर्टिकल Desk, Taj News | Saturday, April 18, 2026, 05:41:00 PM IST

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Dr KK Singhal Writer
डॉ. के.के. सिंघल
प्रख्यात चिकित्सक
एवं समाजसेवी, आगरा
आगरा के सुखदेवी हॉस्पिटल (मदिया कटरा) के प्रख्यात चिकित्सक और समाजसेवी डॉ. के.के. सिंघल ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री और ‘बलिया के शेर’ कहे जाने वाले चंद्रशेखर की जयंती पर उनके फौलादी जिगर और बेदाग राजनीतिक जीवन का एक बेहद शानदार संस्मरण साझा किया है। दरअसल, उन्होंने संसद के उस ऐतिहासिक पल का ज़िक्र किया है, जब चंद्रशेखर के रौद्र रूप को देखकर उस ज़माने के सबसे बड़े दबंग नेताओं के भी पसीने छूट गए थे। इसके अलावा, उन्होंने पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उनकी गहरी दोस्ती और ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ (UCC) पर उनके प्रखर विचारों की भी याद दिलाई है। इसलिए, बिना किसी देरी के पढ़िए यह शानदार आलेख:
HIGHLIGHTS
  1. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भारतीय राजनीति के वह ‘फौलादी’ नेता थे, जिन्होंने सत्ता के लिए कभी किसी की मेहरबानी या शर्तों को कुबूल नहीं किया।
  2. दरअसल, बाबरी विध्वंस के बाद जब संसद में शरद यादव और रामविलास पासवान ने अटल जी के सामने उद्दंडता की, तो चंद्रशेखर ने उन्हें अपनी दहाड़ से कंपा दिया था।
  3. इसके अलावा, उन्होंने देश के सबसे मशहूर वकील राम जेठमलानी को भी उनकी बददिमागी पर ऐसा सबक सिखाया था कि वे जीवन भर उनके सामने आँख उठाने की हिम्मत नहीं कर पाए।
  4. हकीकत में, चंद्रशेखर ही वह नेता थे जिन्होंने उस दौर में डंके की चोट पर कहा था कि अगर फौजदारी कानून समान हैं, तो देश में ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ (UCC) क्यों नहीं होना चाहिए?

संपादकीय संदर्भ: बलिया का वह ‘यंग तुर्क’ जिसने कभी समझौता नहीं किया

भारतीय राजनीति के पन्नों को जब भी पलटा जाएगा, तो उसमें एक ऐसा अध्याय हमेशा स्वर्ण अक्षरों में चमकता हुआ मिलेगा, जो किसी की दया, खैरात या चापलूसी से नहीं, बल्कि अपनी शर्तों, उसूलों और फौलादी इरादों से लिखा गया था। वह अध्याय है—देश के आठवें प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी जैसे छोटे से गांव में 17 अप्रैल 1927 को जन्मे चंद्रशेखर भारतीय राजनीति के ऐसे इकलौते ‘शेर’ थे, जिनकी दहाड़ से दिल्ली के तख्त हमेशा खौफ खाते थे। समाजवादी विचारधारा के पुरोधा आचार्य नरेंद्र देव के शिष्य रहे चंद्रशेखर ने अपने जीवन में जो भी मुकाम हासिल किया, वह अपने बागी तेवर और ज़मीनी संघर्ष के दम पर किया। आज जब राजनीति में अवसरवादिता और विचारधाराओं के पतन का दौर चल रहा है, तब डॉ. के.के. सिंघल द्वारा लिखा गया यह आलेख हमें उस दौर की याद दिलाता है जब राजनीति में ‘सम्मान’ और ‘सिद्धांत’ ही सबसे बड़ी पूंजी हुआ करते थे।

Former PM Chandra Shekhar Portrait
भारतीय राजनीति के ‘फौलादी पुरुष’ और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर।

चंद्रशेखर की राजनीतिक यात्रा किसी भी आम नेता से बहुत अलग थी। उन्हें कांग्रेस के भीतर ‘यंग तुर्क’ (Young Turk) कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने उस दौर में इंदिरा गांधी जैसी शक्तिशाली नेत्री की नीतियों का मुखर विरोध करने का साहस दिखाया था। 1975 में जब देश पर आपातकाल (Emergency) थोपा गया, तो चंद्रशेखर कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) के सदस्य होने के बावजूद इंदिरा गांधी के इस तानाशाही कदम के खिलाफ खड़े हो गए। नतीजा यह हुआ कि उन्हें अपनी ही पार्टी की सरकार द्वारा मीसा (MISA) कानून के तहत गिरफ्तार कर पटियाला जेल में डाल दिया गया। जेल में बिताए उन दिनों ने उनके फौलादी जिगर को और मजबूत कर दिया।

इसके बाद 1983 का वह ऐतिहासिक वर्ष आया, जब देश को समझने और आम जनता के दर्द को करीब से महसूस करने के लिए चंद्रशेखर ने कन्याकुमारी से लेकर दिल्ली के राजघाट तक 4260 किलोमीटर लंबी ऐतिहासिक ‘भारत यात्रा’ (पदयात्रा) की। इस यात्रा ने पूरे देश की राजनीति में एक भूचाल ला दिया था। उनके पैरों के छालों ने देश के बुनियादी मुद्दों को सड़क से लेकर संसद तक गूंजने पर मजबूर कर दिया था।

Chandra Shekhar Political Legacy
अपने उसूलों और बागी तेवरों के लिए मशहूर चंद्रशेखर का ऐतिहासिक राजनीतिक सफर।

1990 में जब वे देश के प्रधानमंत्री बने, तो वह दौर भारत के लिए आर्थिक रूप से सबसे चुनौतीपूर्ण था। देश का खजाना खाली था और दिवालिया होने का खतरा मंडरा रहा था। ऐसे संकट के समय में चंद्रशेखर ने देश की साख बचाने के लिए सोना (Gold) गिरवी रखने का कड़वा लेकिन बेहद साहसिक फैसला लिया था। यह फैसला कोई आम नेता नहीं ले सकता था। उनकी सरकार कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चल रही थी, लेकिन जब कांग्रेस नेता राजीव गांधी ने उन पर जासूसी कराने का बेबुनियाद आरोप लगाकर दबाव बनाने की कोशिश की, तो इस ‘बलिया के शेर’ ने बिना एक पल की देरी किए सत्ता को ठोकर मार दी। उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी को इस तरह त्याग दिया जैसे पैर की धूल हो, क्योंकि उन्होंने साफ कह दिया था कि “मैं किसी की दया या ब्लैकमेलिंग पर देश नहीं चला सकता।”

वैचारिक मतभेदों के बावजूद चंद्रशेखर के राजनीतिक रिश्ते कितने गहरे और मर्यादित थे, इसका सबसे बड़ा उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उनकी गहरी मित्रता थी। संसद के भीतर भले ही वे अलग-अलग खेमों में बैठते हों, लेकिन एक-दूसरे के प्रति उनका सम्मान अद्वितीय था। इसी पृष्ठभूमि में, प्रख्यात चिकित्सक डॉ. के.के. सिंघल ने नीचे अपने आलेख में संसद का वह किस्सा बयां किया है, जब अटल जी का अपमान करने वाले युवा नेताओं को चंद्रशेखर ने ऐसा सबक सिखाया था कि उनकी रूह कांप उठी थी। पढ़िए डॉ. के.के. सिंघल का यह 100% मूल और प्रामाणिक आलेख:

तुम्हारे आने वाली पीढ़ियों में भी कोई गुंडा पैदा नहीं होगा :-

बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद का समय । स्थान – देश की संसद । अटल बिहारी संसद में अकेले सभी ‘सिक्युलरों’ से लोहा ले रहे थे । उस समय दो युवा नेता सबसे बड़े दबंग और उद्दंड माने जाते थे । ये दो जने थे शरद यादव और राम बिलास पासवान ।

एक दिन संसद में चर्चा के दौरान अटल जी के सामने ये दोनों उद्दंडता करने लगे । तब वरिष्ठ नेता और जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर जी ने कहा – “शरद, राम बिलाश तुम्हारे पिछले जन्म के कुछ पुण्य कर्म है जिसके कारन तुम्हे अटल जी को सुनने का मौका मिला है ,इन्हे ध्यान से सुनो । ये राजनीती के महाग्रंथ है ।”

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तब शरद यादव ने अपनी दबंगई दिखाते हुए चंद्रशेखर जी को टोका और कहा “अध्यक्ष जी आप बीच में मत बोलिये ।”

बस फिर क्या था !

Atal Bihari Vajpayee with Chandra Shekhar
वैचारिक मतभेदों के बावजूद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर के बीच एक गहरी और सम्मानजनक मित्रता थी।

चंद्रशेखर जी ने भरी संसद में अपना जो रौद्र रूप दिखाया तो इन तथाकथित उस जमाने के इन युवा नेताओं की धूजणी छूटने लगी । चंद्रशेखर जी ने उस समय कड़कती आवाज में कहा था :

“मुझसे ऐसे भाषा में बात करते हो । संसद भवन के बाहर ऐसे भाषा बोलो शरद । मैं तुम दोनों को यकीन दिलाता हूँ , तुम्हारे आने वाली पीढ़ियों में भी कोई गुंडा पैदा नहीं हो पायेगा .” यह सुनते ही दोनों को सांप सूंघ गया और वे भयभीत नजर आने लगे । दोनो ने सदन से बाहर निकलते ही चंद्रशेखर के पैर पकड़ लिए और दया की भीख मांगने लगे ।

चंद्रशेखर दबंगों के भी दबंग थे ।

कहते हैं चंद्रशेखर के मौन रहने के दौरान भारत के सबसे बडे बददिमाग वकील राम जेठमलानी ने उनके खिलाफ कोई टिप्पणी कर दी । इसके बाद उनके समर्थको ने जेठमलानी की हाथो और लातो से जमकर पूजा की थी । उसके बाद जब तक चंद्रशेखर जिन्दा रहे इस जेठमलानी ने उनकी तरफ आँख भी नहीं उठायी ।

चन्द्रशेखर जी ने सभी के लिए सामान कानून के लिए कहा था कि “अगर हमारे फौजदारी के मामले और शादी विवाह समान हैं तो यूनिफार्म सिविल कोड क्यों नहीं?”

एक अक्खड़, मनमौजी, गंभीर, फौलादी जिगर वाला नेता जिसने राजनीती अपने शर्तो पे की। किसी की मेहरबानी को कबूल नहीं किया। देश का प्रधानमंत्री बना और कांग्रेस के दुष्चरित्र को भांप कर उस कुर्सी को ठोकर मार दी। ऐसी शख्सियत तो राजाओं की राजा ही कहलायेगी。

उस बलिया के शेर ,महान तेजस्वी नेता चंद्रशेखर जी की आज जन्म जयंती पर कोटि कोटि नमन !!💐💐🙏🙏 डॉ के के सिंघल, सुखदेवी हॉस्पिटल मदिया कटरा, आगरा, उत्तर प्रदेश (लेखक प्रख्यात चिकित्सक व समाजसेवी है )

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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