Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 17 Mar 2026, 10:15 PM IST
Taj News Satire Desk
मुख्य बिंदु
- ईरान पर अमेरिका और इस्राइल के भयानक हमले पर ‘विश्व गुरु’ की चुप्पी और विदेशी अखबारों के ताने।
- क्या डोनाल्ड ट्रंप के डर से भारत ने अपनी संप्रभु विदेश नीति और ‘डंका बजवाने’ की कला खो दी है?
- रूस से तेल खरीदने के लिए ट्रंप की ‘इजाज़त’ मांगना: यह फ्रैंडशिप है या भारत की खुली बेइज़्ज़ती?
- भारत-पाक ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से लेकर ट्रेड डील तक, कैसे ट्रंप ने बार-बार ‘विश्व गुरु’ को नीचा दिखाया।
एक बात हमारी समझ में बिल्कुल तो नहीं आती है। जब से अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप साहब दोबारा गद्दी पर आए हैं, तब से न जाने क्यों मोदी जी के विरोधियों ने एक नया ही राग छेड़ दिया है– वह है ‘राग बेइज़्ज़ती’। परदेस की कूटनीति के मामले में मोदी जी कुछ भी करें, बल्कि सच कहें तो अगर वे कुछ भी नहीं करें, पर भाई लोग उसमें से भारत की बेइज़्ज़ती जरूर ढूंढ निकालते हैं। और फिर पूरे देश में इसका ज़ोरदार शोर मचाने लगते हैं कि देखो, दुनिया में देश की बेइज़्ज़ती करा दी। बेचारे मोदी भक्तों ने तो विरोधियों की इसी ‘कांय-कांय’ के डर से अब दुनिया में मोदी जी के भारत का डंका बजवाने की चर्चा ही पूरी तरह बंद कर दी है। उन्होंने सोच लिया है कि न डंका बजने का जिक्र निकलेगा और न ही बेइज़्ज़ती के डंकों के ये कड़वे ताने सुनने पड़ेंगे। फिर भी ये विरोधी हैं कि मानते ही नहीं हैं। बात-बात पर बेइज़्ज़ती का रोना रोते हैं।
अब आप ही बताइए, ईरान पर अमेरिका और इस्राइल ने एक साथ भयंकर हमला किया। पर क्या हमारे मोदी जी ने इस पर कुछ भी कहा? हमले के ठीक पहले वे दौड़े-दौड़े इस्राइल तक गए थे। वहां जाकर उन्होंने नेतन्याहू को गले भी लगाया था। उन्हें इस्राइलियों का हमेशा साथ देने का पूरा भरोसा भी दिलाया था। वहां होलोकॉस्ट म्युजियम में जाकर उन्होंने दुनिया के सामने इमोशनल होकर भी दिखाया था। पर क्या सिर पर मंडराते इस भयानक युद्ध के संबंध में उन्होंने वहां एक शब्द तक कहा? जी नहीं, बिल्कुल नहीं कहा। एक शब्द तक इस्राइल में नहीं कहा तो नहीं कहा, लेकिन अपने देश में लौट आने के बाद भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। और तो और, ईरान पर अमेरिका का सीधा हमला हो जाने के बाद भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। न पक्ष में बोले, न विपक्ष में बोले, एक शब्द तक नहीं कहा। आखिर किसलिए? सिर्फ इन्हीं विरोधियों के फालतू मुंह बंद रखने के लिए। मगर इन विरोधियों की जुबान तो मोदी जी के एक शब्द तक न कहने के बावजूद कैंची की तरह चल ही रही है। उल्टे अब तो मोदी जी को कुछ ‘नहीं’ कहने के लिए ही ताने दिए जा रहे हैं।
अब हुआ यूं कि एक बड़े विदेशी अखबार ने अपने पन्ने पर लिख दिया कि — ‘नरेंद्र मोदी ईरान के खिलाफ युद्ध के मामले में आखिर चुप क्यों हैं? डोनाल्ड ट्रंप के डर से!’ बस, इतना छपना था कि हमारे देश के भाई लोग डोनाल्ड ट्रंप के डर की यही बात कौवे की तरह ले उड़े। और चारों तरफ लगे शोर मचाने कि देखो, ट्रंप के डर से भारत की बेइज़्ज़ती करा दी! बेचारे मोदी जी ने तो अपना मुंह तक नहीं खोला था और बैठे-बिठाए भारत की बेइज़्ज़ती भी हो गयी? और जब अपने देश वाले ही विदेशी जुबान के और विदेश के अखबारों की इन उकसाने वाली बातों में आ जाएंगे। और अपनी गुलामी के उन पुराने अवशेषों से लड़ रही मोदी जी की महान लड़ाई को कमजोर करने लग जाएंगे, तो फिर बाहर वालों से तो मोदी जी उम्मीद ही क्या कर सकते हैं? आप खुद बताइए, अब तो ईरान वाले भी मोदी जी पर तानाकशी पर उतर आए हैं।
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भले ही ईरान को अमेरिका और इस्राइल के भयंकर हवाई हमलों ने पूरी तरह से अधमरा कर रखा है। ईरान के सुप्रीम लीडर समेत, वहां के बीसियों बड़े सैन्य नेता पहले ही झटके में दूसरी दुनिया में पहुंचाए जा चुके हैं। फिर भी वे अगले मोदी जी को ताना मारने से बाज बिल्कुल नहीं आये। पूरे बारहवें दिन मोदी जी ने खुद अपनी तरफ से ईरान के नए राष्ट्रपति को फोन किया था। यह बताने के लिए कि “भारत भगवान बुद्ध का देश है, इसलिए भारत कभी युद्ध नहीं चाहता है।” तो ऐसे में ईरान को विश्व गुरु से शांति की यह सीख लेनी चाहिए थी। लेकिन शांति की सीख लेना तो बहुत दूर रहा, उस अगले ईरान के राष्ट्रपति से इतना भी नहीं हुआ कि वह अपने हाथों से बंद की हुई हार्मुज की खाड़ी से भारत के फंसे हुए तेल और गैस के टैंकरों को ही चुपचाप निकलवा देता। उल्टे उसने अपने विदेश मंत्री के ज़रिए हमारे जयशंकर जी को इसी बात की याद दिलवा दी कि ईरान पर हुए अमेरिकी हमले की भारत ने आज तक निंदा तक नहीं की है। विश्व गुरु की बात तो छोड़ ही दीजिए, इस साल ब्रिक्स (BRICS) का अध्यक्ष होकर भी, भारत ने उस हमले की निंदा तक नहीं की। यानी भगवान बुद्ध के देश से सीधी-सीधी सौदेबाजी — “पहले अमेरिकी हमले की निंदा करो, और फिर हमसे अपना तेल लो!” और ऊपर से विदेशी अखबार अपनी सुर्खियां लगा रहे हैं कि मोदी जी ट्रंप के भारी डर से चुप बैठे हैं! और अपने देश वाले तो जैसे बस ट्रंप का नाम आने का ही बेसब्री से इंतजार करते रहते हैं। उधर विदेशी अखबार में छपा और इधर देश में शोर मच गया — कि मोदी जी ने भारत की बेइज़्ज़ती करा दी है।
अब आप ही सोचिए, क्या मोदी जी भारत की इस बेइज़्ज़ती के झूठे शोर के डर से, ट्रंप और नेतन्याहू जैसे अपने ‘डियर फ्रेंडों’ की इन कारगुजारियों की कभी निंदा तो नहीं ही कर देंगे। कूटनीति की पक्की दोस्ती में, नो सॉरी, और नो निंदा! पर बात-बात में भारत की बेइज़्ज़ती खोजने वाले ये विरोधी, मोदी जी की सिर्फ इस चुप्पी पर ही कहां रुकने वाले थे। इसी लड़ाई के बीच में ईरान ने दुनिया का तेल और गैस का बहाव पूरी तरह रोक कर, तेल के चढ़ते दाम को ही एक मिसाइल बनाकर अमेरिका पर दाग दिया। ऐसे में ट्रंप को तुरंत अपने डियर फ्रैंड मोदी की याद आ गयी। ट्रंप बोले, “जा मेरे फ्रैंड, तू ले ले रूस से तेल, अगले महीने भर तक। जा, मैंने तुझे इसकी इजाजत दी! मैंने ही तुझे रोका था, अब मैं ही तुझे इसकी इजाजत दे रहा हूं, जा ले ले तू रूसी तेल।” पर जब तक हमारे राष्टभक्त रूस से अपना सस्ता तेल भरवाने के लिए अपने पीपे, खाली ड्रम वगैरह बाहर निकालते, तब तक इन विरोधियों ने ट्रंप की उस ‘‘इजाज़त’’ शब्द पर ही भारी हंगामा खड़ा कर दिया। वे ज़ोर-ज़ोर से कहने लगे कि आखिर ट्रंप होता कौन है, हमें इजाजत देने वाला? हम किस से तेल लें और किस से नहीं लें, यह एक संप्रभु देश तय करेगा या कोई अमेरिकी राष्ट्रपति? यह तो भारत की खुली बेइज़्ज़ती है। मोदी जी अपने इन विदेशी दोस्तों से भारत की बेइज़्ज़ती बार-बार क्यों करा रहे हैं?
और इस बेइज़्ज़ती की हद्द तो तब हो गयी जब इसके ठीक चार दिन बाद ही ट्रंप ने अपनी मनमर्जी से सारी दुनिया को ही खुली छूट दे दी। ट्रंप ने कह दिया — “जाओ ले लो, सभी रूसी तेल ले लो, जब तक मैं तुम्हें रुकने को न कहूं!” अब हमारे विरोधियों को ट्रंप के इस बयान में भी भारत की बेइज़्ज़ती दिखाई दे रही है। वे कह रहे हैं कि अब तो अमेरिका और भारत की फ्रैंडशिप के धोखे का वह पर्दा भी पूरी तरह हट गया है। अब काहे का फ्रैंड और काहे की यह फ्रैंडशिप और काहे की यह इजाज़त! सच पूछिए तो, इस ट्रंप-मोदी की दोस्ती के दुश्मनों ने, मोदी जी के इस दोस्ती के चक्कर में भारत को बेइज़्ज़त कराने का शोर मचाना तो तभी से शुरू कर दिया था। जब हमारे विदेश मंत्री के कई दिन अमेरिका में जाकर धरना देने के बाद भी, मोदी जी को ट्रंप के राज्याभिषेक का न्योता ही नहीं मिला था। न्यौता न मिलने की बेइज़्ज़ती का वह मामला अभी पूरी तरह से शांत भी नहीं हुआ था, तब तक मोदी जी ने पाकिस्तान पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ छेड़ दिया। और उस ऑपरेशन के चौथे ही दिन, जब ट्रंप ने अपनी चौधराहट दिखाते हुए लड़ाई रुकने का एलान कर दिया, तो मोदी जी के विरोधियों ने फिर से शोर मचाना शुरू कर दिया। वे पूछने लगे कि ट्रंप कैसे भारत के लड़ाई रोकने का फैसला कर सकता है? क्या भारत अमेरिका का गुलाम है?
फिर उसके बाद ट्रंप ने दुनिया के सामने बार-बार यह दावा भी करना शुरू कर दिया कि भारत-पाकिस्तान की वह लड़ाई उसी ने रुकवायी थी। ट्रंप ने कहा कि उसने दोनों देशों को व्यापार की गाजर और अपने टैरिफ का डंडा दिखाकर वह लड़ाई रुकवायी थी। और मोदी जी अपनी फ्रैंडशिप का ख्याल कर के इस बेइज़्ज़ती पर भी चुप लगा गए। तभी से ये विपक्षी उनके पीछे पड़ गए हैं कि मोदी जी बार-बार भारत की बेइज़्ज़ती करा रहे हैं। फिर मोदी जी ने जब ट्रेड डील में ट्रंप की वह डिमांड मान ली कि भारत रूसी तेल खरीदना बंद करेगा, उसके बाद से तो भारत की बेइज़्ज़ती कराने का जो शोर शुरू हुआ, वह आज तक थमा ही नहीं था। और अब ये ईरान के मामले में चुप रहने में भारत की बेइज़्ज़ती का शोर और जुड़ गया है। पर हमारे मोदी जी और उनके परम अनुयायी बहुत ही सच्चे देशभक्त हैं। वे देश की इज़्ज़त को हमेशा बहुत ऊंचे आसन पर रखते हैं। इतने ऊंचे आसन पर, जहां उसे कुछ भी कभी छू भी नहीं सकता है। इसीलिए, तो मोदी कुनबे को जगत की यह गति बिल्कुल नहीं व्यापती! वैसे भी इज़्ज़त और बेइज़्ज़ती, ये सब तो बस मानने की बातें हैं। असल में बेइज़्ज़ती तो उसकी होती है, जो अपनी इज़्ज़त बचाने की फिक्र में दिन-रात रहता है। मोदी कुनबा इन फालतू चक्करों में बिल्कुल नहीं पड़ता है। वे तो बस अपनी धुन में मस्त हैं!
Pawan Singh
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