संपादकीय डेस्क, 🌐 tajnews.in | रविवार, 13 सितंबर 2026, 12:35:00 PM IST

संपादक की कलम
BRICS में भारत की आवाज़: चीन से संवाद जरूरी, लेकिन भरोसा सोच-समझकर
(संपादकीय)
प्रमुख अंश (Highlights):
- ग्लोबल साउथ की निर्णायक आवाज: 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की प्रभावी भागीदारी पर दिया जोर।
- चीन से संवाद बनाम सतर्कता: मोदी-शी मुलाकात और कूटनीतिक संवाद का स्वागत, लेकिन गलवान संघर्ष और चीन-पाक रणनीतिक गठजोड़ के मद्देनजर आंख मूंदकर भरोसा न करने की चेतावनी।
- आपूर्ति शृंखला और आर्थिक संप्रभुता: भारी व्यापार घाटे के बीच महत्वपूर्ण खनिजों व तकनीक को हथियार बनाने के खतरे से निपटने हेतु घरेलू विनिर्माण को सशक्त करने की जरूरत।
- रणनीतिक स्वायत्तता की मजबूती: न चीन-विरोधी खेमेबंदी और न अमेरिका पर अंध-निर्भरता; भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का एकमात्र केंद्र केवल और केवल भारत का राष्ट्रीय हित।

Thakur Pawan Singh
नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के खुले सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस भारत की आवाज़ दुनिया के सामने रखी, वह अब केवल अपनी बात कहने वाला भारत नहीं है। वह वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाने, Global South की आवाज़ को निर्णायक बनाने और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में बदलाव की मांग करने वाला भारत है। प्रधानमंत्री ने वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की अधिक प्रभावी भागीदारी की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने BRICS को किसी के विरुद्ध खड़े होने वाला मंच नहीं, बल्कि सहयोग और अधिक संतुलित वैश्विक व्यवस्था का माध्यम बताया।
यह भारत की बदलती वैश्विक भूमिका का महत्वपूर्ण संकेत है। लेकिन किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिया गया भाषण अपनी जगह है और उसके बाद की वास्तविक कूटनीति अपनी जगह।
भारत की असली परीक्षा अब शुरू होती है।
BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने इस परीक्षा को और महत्वपूर्ण बना दिया है। दोनों देशों के बीच संबंधों को आगे बढ़ाने, सीमा पर शांति बनाए रखने और आर्थिक रिश्तों को सुधारने की जरूरत पर सहमति बनी है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्तों में आई कड़वाहट के बीच यह निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या संवाद की इस शुरुआत को भरोसे में बदल देना चाहिए?
हमारी राय में—संवाद जरूर, भरोसा सोच-समझकर।
चीन के साथ रिश्ते सुधरने चाहिए, लेकिन इतिहास भूलकर नहीं
भारत और चीन दो बड़े पड़ोसी और बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। दोनों के बीच तनाव किसी के हित में नहीं है। सीमा पर शांति रहे, व्यापार बढ़े, लोगों के बीच संपर्क बढ़े और दोनों देश अपने मतभेदों को बातचीत के रास्ते सुलझाएं—इससे बेहतर और क्या हो सकता है?
लेकिन भारत यह भी नहीं भूल सकता कि सीमा विवाद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। 2020 का गलवान संघर्ष केवल अतीत की एक घटना नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी का एक गंभीर अध्याय है। चीन के पाकिस्तान के साथ गहरे रणनीतिक संबंध भी भारत की सुरक्षा चिंताओं का हिस्सा हैं।
ऐसे में संबंधों में सुधार का अर्थ यह नहीं हो सकता कि भारत अपनी सुरक्षा संबंधी आशंकाओं को किनारे रख दे।
कूटनीति में हाथ मिलाना समझदारी है, लेकिन आंखें बंद करना समझदारी नहीं।
भारत को चीन से संबंध सुधारने चाहिए। चीन के साथ व्यापार भी बढ़ाना चाहिए, जहां भारत के हित में हो। लेकिन हर क्षेत्र में निर्भरता बढ़ाना भारत के दीर्घकालिक हित में नहीं होगा।
आर्थिक रिश्तों की सबसे बड़ी विडंबना
भारत और चीन के बीच व्यापार तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भारत के बड़े व्यापार घाटे का है। भारत चीन से भारी मात्रा में औद्योगिक सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन और दूसरे महत्वपूर्ण उत्पाद आयात करता है, जबकि चीन को भारत का निर्यात उस अनुपात में नहीं है।
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक रिश्तों से आगे बढ़कर आर्थिक रणनीति पर विचार करना जरूरी हो जाता है।
अगर भारत की महत्वपूर्ण औद्योगिक आपूर्ति शृंखलाएं किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर हो जाएं, तो सामान्य समय में यह व्यापार हो सकता है, लेकिन संकट के समय यही निर्भरता रणनीतिक कमजोरी बन सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS के मंच से तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को हथियार बनाने के खतरे की ओर भी ध्यान दिलाया है। यह चेतावनी भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
इसलिए भारत को चीन से व्यापार करना चाहिए, लेकिन अपनी उत्पादन क्षमता इतनी मजबूत करनी चाहिए कि व्यापार मजबूरी न बने।
दूसरी ओर अमेरिका भी कोई स्थायी गारंटी नहीं
यहां भारत की दूसरी दुविधा सामने आती है।
भारत का अमेरिका के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंध लगातार महत्वपूर्ण हुआ है। अमेरिका भारत के सबसे महत्वपूर्ण निर्यात बाजारों में है और भारतीय उद्योग तथा सेवाओं के लिए वहां का बाजार बेहद महत्वपूर्ण है।
लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि भारत अपनी आर्थिक दिशा को अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भर कर दे?
नहीं।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति हमें बार-बार यही सिखाती है कि कोई भी देश दूसरे देश के राष्ट्रीय हितों की गारंटी नहीं होता। आज जो आर्थिक संबंध अनुकूल हैं, कल उनमें व्यापारिक विवाद, शुल्क, प्रतिबंध या नीतिगत बदलाव आ सकते हैं।
इसलिए भारत के सामने चुनौती चीन और अमेरिका में से किसी एक को चुनने की नहीं है।
चुनौती यह है कि भारत इतना सक्षम बने कि उसे किसी एक को चुनने की मजबूरी ही न हो।
भारत को चीन-विरोधी या अमेरिका-निर्भर नीति नहीं चाहिए
यही भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी खूबसूरती और सबसे कठिन परीक्षा है।
भारत चीन के साथ BRICS में बैठ सकता है और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी भी कर सकता है। भारत रूस से ऊर्जा और रक्षा संबंध बनाए रख सकता है और पश्चिम के साथ तकनीक तथा निवेश के रिश्ते भी मजबूत कर सकता है।
यह विरोधाभास नहीं है।
यह रणनीतिक स्वायत्तता है।
BRICS को यदि कोई अमेरिका-विरोधी गठबंधन बनाने की कोशिश करता है तो भारत को उससे सावधान रहना होगा। दूसरी ओर यदि कोई भारत से यह अपेक्षा करता है कि वह चीन को चुनौती देने के लिए पूरी तरह अमेरिकी खेमे में चला जाए, तो भारत को उससे भी उतनी ही सावधानी बरतनी होगी।
भारत का रास्ता किसी दूसरे देश द्वारा तय नहीं किया जा सकता।
असली जरूरत—भारत की अपनी ताकत
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपने विनिर्माण को मजबूत करे, निर्यात बाजारों में विविधता लाए, तकनीकी क्षमता बढ़ाए, महत्वपूर्ण खनिजों और आवश्यक औद्योगिक वस्तुओं की आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित करे और घरेलू उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाए।
तभी विदेश नीति वास्तव में आत्मनिर्भर होगी।
क्योंकि मजबूत विदेश नीति केवल अच्छे भाषणों से नहीं बनती। उसके पीछे मजबूत अर्थव्यवस्था, मजबूत उद्योग, मजबूत सैन्य क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और व्यापक व्यापारिक संबंध होने चाहिए।
BRICS का विस्तार और बढ़ती वैश्विक भूमिका भारत के लिए एक बड़ा अवसर है। लेकिन अवसर तभी परिणाम में बदलेगा जब भारत BRICS की घोषणाओं के साथ अपनी राष्ट्रीय क्षमताओं को भी मजबूत करेगा।
अंत में
चीन से संवाद बंद करना भारत के हित में नहीं है।
चीन के साथ संबंध सामान्य करना भी आवश्यक है।
लेकिन क्या हिन्दुस्तान को चीन पर सहज ही भरोसा कर लेना चाहिए?
इसका उत्तर है—नहीं।
उसी तरह अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी जरूरी है, लेकिन अमेरिका पर ऐसी निर्भरता भी उचित नहीं होगी जो किसी नीति परिवर्तन के साथ भारत की अर्थव्यवस्था को झटका दे।
भारत को दोनों से संबंध रखने हैं, लेकिन अपने हितों की कीमत पर किसी के साथ नहीं।
BRICS के मंच से भारत ने दुनिया को अपनी बात बता दी है। अब भारत के सामने अगली चुनौती यह है कि वह अपनी बढ़ती वैश्विक भूमिका को अपनी आर्थिक और सामरिक ताकत में कैसे बदलता है।
भारत को चीन से संवाद करना चाहिए, लेकिन चीन पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
भारत को अमेरिका के साथ साझेदारी बढ़ानी चाहिए, लेकिन अमेरिका पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
क्योंकि अंततः—
भारत की विदेश नीति का केंद्र न चीन हो सकता है, न अमेरिका।
उसका केंद्र केवल और केवल भारत होना चाहिए।
BRICS के मंच पर भारत ने अपनी आवाज बुलंद कर दी है। अब जरूरत इस बात की है कि दुनिया भारत की आवाज के साथ उसकी ताकत भी महसूस करे।
दोस्ती के दरवाजे खुले रहें, लेकिन राष्ट्रीय हितों की चौखट कभी कमजोर न पड़े।
ठाकुर पवन सिंह
pawansingh@tajnews.in
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