तानाशाही के प्रोजेक्ट पर जेन-ज़ी ने लगाया ब्रेक!

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Wednesday, 29 July, 2026, 03:42:21 PM IST.

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Rajendra Sharma
राजेंद्र शर्मा
संपादक व वरिष्ठ पत्रकार
देश के प्रखर पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक राजेंद्र शर्मा राष्ट्रीय राजनीति, लोकतांत्रिक संस्थाओं, छात्र आंदोलनों और जन-अधिकारों के सुलगते मुद्दों पर अपने बेबाक, तथ्यपरक और प्रखर विश्लेषणों के लिए जाने जाते हैं।

तानाशाही के प्रोजेक्ट पर जेन-ज़ी ने लगाया ब्रेक!

— राजेंद्र शर्मा

आखिरकार, एक लंबे और उग्र जन-आंदोलन के बाद देश के शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान की विदाई हो ही गई। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के अनूठे बैनर तले और डिजिटल माध्यमों के सहारे सामने आई युवा आक्रोश की इस आंधी ने मोदीशाही को अपने उस सबसे बड़े स्वघोषित सिद्धांत को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया है कि ‘उसकी सरकार में जन-दबाव के कारण कभी इस्तीफे नहीं होते हैं’। देश के युवाओं ने, या बल्कि कहना चाहिए कि ‘जेन-ज़ी’ (Gen-Z) ने, अपने शांतिपूर्ण मगर धारदार प्रतिरोध से मोदीशाही को अपनी इस अहंकारी मुद्रा को बदलने पर मजबूर कर दिया है। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि सत्ता की इस तरह की ‘इस्तीफा न देने’ की मुद्रा, जनतंत्र में सुशासन और उसमें भी सबसे बढ़कर कार्यपालिका (Executive) की जवाबदेही का रास्ता कसकर बंद करने की एक तानाशाहीपूर्ण जिद को ही दिखाती है। कार्यपालिका की जनता के प्रति जवाबदेही, उसी प्रकार जनतंत्र की एक न्यूनतम और अनिवार्य शर्त है, जैसे कार्यपालिका का आम जनता द्वारा मतदान से चुना जाना। इस सिलसिले में यह याद दिलाना भी अप्रासांगिक नहीं होगा कि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पिछले 12 सालों से ज्यादा के शासन में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने किसी मंत्री को बदला या हटाया ही न हो। बेशक, अपने तीन कार्यकालों के बीच मोदी ने दर्जनों मंत्रियों के विभागों को बदला है या उन्हें हटाया है।

लेकिन, एक कड़वा सच यह है कि अब तक ये सारे विधिक बदलाव मोदी ने पूरी तरह अपनी मर्जी से और संबंधित व्यक्तियों की उपयोगिता की अपनी निजी समझ के आधार पर ही किए थे। इसका एकलौता अपवाद जेएम अकबर बने थे, जिन्हें ‘मी-टू’ (#MeToo) की राष्ट्रव्यापी लहर में लगे गंभीर आरोपों के सहारे मंत्रिमंडल से बाहर करना, शायद संघ को अपने मंत्रिमंडल को मुस्लिम-मुक्त कराने के एजेंडे के लिए ज़रूरी लगा होगा।

जनतांत्रिक दबाव के सामने झुकना, मोदीशाही के तानाशाहीपूर्ण मिजाज को मंजूर होना तो दूर की बात रही, इससे उल्टा संदेश देना ही हमेशा उसकी मजबूत और ‘अजेय’ आत्मछवि के लिए ज़रूरी माना जाता रहा है। याद रहे कि इसी शिक्षा विभाग में, मोदी राज के शुरूआती दौर में मंत्री बनाकर बैठायी गई, अभिनेत्री से राजनेता बनीं स्मृति ईरानी शुरू से ही विवादों में घिरी रही थीं। उनके कार्यकाल में कुख्यात रोहित वेमुला कांड से लेकर, जेएनयू (JNU) के छात्रों के खिलाफ संघ-भाजपा की खुल्लमखुल्ला शत्रुतापूर्ण मुहिम तक कई गंभीर विवाद शामिल थे। इतना ही नहीं, खुद प्रधानमंत्री मोदी की तरह, स्मृति ईरानी की अपनी शैक्षणिक योग्यता भी निरंतर विवादों और अदालती मुकदमों से घिरी रही थी। इसके बावजूद उन्हें हटाने की देश के समूचे शैक्षणिक समुदाय की जायज मांगों को नरेंद्र मोदी ने लगातार अनदेखा किया और बाद में शिक्षा मंत्रालय से तब उनका तबादला किया, जब इस महत्वपूर्ण मंत्रालय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रत्यक्ष और कठोर नियंत्रण के लिए वह ज्यादा उपयोगी नहीं नजर आईं। इस अर्थ में देखा जाए तो देश के इन युवाओं ने जनतांत्रिक दबाव के प्रभावीपन को फिर से स्थापित करने के जरिए, मोदीशाही की इस अघोषित तानाशाही की परियोजना को कम-से-कम दो कदम पीछे तो धकेल ही दिया है।

जनतंत्र के पक्ष में युवाओं के इस ऐतिहासिक हस्तक्षेप का महत्व इस राजनीतिक तथ्य से बहुत बढ़ जाता है कि यह हस्तक्षेप, विधानसभा चुनावों के हालिया चक्र के फौरन बाद आया है। जिस चक्र के बाद अव्वल तो पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के जरिए, देश में सत्ता पर संघ-भाजपा का शिकंजा और भी कस गया था। और इससे भी महत्वपूर्ण और खतरनाक रूप से, चुनाव के इस चक्र ने देश में स्वतंत्र चुनाव प्रक्रिया की विधिक वैधता को मोदी राज द्वारा रसातल में पहुंचा दिए जाने के प्रबल और डरावने संकेत दिये थे। मोदी राज में चुनाव आयोग (Election Commission) जिस तरह से चुनाव में सभी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए बराबरी का मैदान (Level Playing Field) मुहैया कराने की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से पूरी तरह से मुंह मोड़कर, सत्तापक्ष की ओर मुंह कर के बैठ गया है, वह किसी से छिपा नहीं है। इसके ऊपर से चुनाव के इस हालिया चक्र में सत्तापक्ष को खासतौर पर बंगाल में जिताने के लिए चुनाव आयोग ने एसआईआर (SIR) के नाम पर मतदाता सूचियों में से करीब 27 लाख जेन्युइन और वैध मतदाताओं के मताधिकार को टार्गेटेड तरीके से विवादित बनाकर, उनका मताधिकार निलंबित करा दिया था। इसके अलावा सारे चुनावी तंत्र ही नहीं, बल्कि समूचे पुलिस-प्रशासनिक तंत्र को भी, सचेत रूप से केंद्रीय प्रशासन के सीधे नियंत्रण में दे दिया गया था।

और यह सब जिस नंगई और बेशर्मी से किया गया था और इस सब असंवैधानिक कृत्य को जिस तरह देश की शीर्ष न्यायपालिका ने होते रहने दिया था, उससे जनतंत्र की चिंता करने वाले प्रबुद्ध नागरिकों ने वास्तव में यह सवाल करना शुरू कर दिया था कि क्या ऐसे बदतर हालात में, भारत में चुनाव का कोई अर्थ बचा भी है? यह गंभीर सवाल सिर्फ स्वतंत्र बौद्धिकों या राजनीतिक समीक्षकों तक ही सीमित नहीं था। देश में लगभग समूचा विपक्ष ही किसी न किसी हद तक अस्तित्व के इस सवाल से दो-चार हो रहा था। इसी का नतीजा था कि विधानसभा चुनाव के पिछले चक्र के बाद, विपक्षी ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन में शामिल पार्टियों के अलावा दो अन्य प्रमुख पार्टियों को मिलाकर, कुल 23 राजनीतिक पार्टियों ने, देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को संयुक्त पत्र लिखकर, वर्तमान चुनाव आयोग के एकतरफा कदमों से चुनावों की निष्पक्षता तथा वैधता के खतरे में पड़ जाने के संदर्भ में, न्यायपालिका के विधिक हस्तक्षेप की सख्त जरूरत को रेखांकित किया था। इसके ऊपर से, इन पार्टियों ने संयुक्त रूप से यह सवाल भी उठाया था कि चुनाव आयोग के पक्षपाती होने के बाद न्यायपालिका के अलावा और कोई दरवाजा भी तो नहीं बचा है, जिसे वे न्याय के लिए खटखटा सकें!

आज जब न्यायपालिका समेत जनतंत्र की सभी प्रमुख संस्थाओं पर, संसदीय बहुमत के बल पर कार्यपालिका पर काबिज हुए संघ-भाजपा का करीब मुकम्मल कब्जा हो गया है, देश में जनतंत्र के संवैधानिक ढांचे के नाम पर जो कुछ बचा है, उसके तहत विपक्ष की इस गहरी निराशा में एक और महत्वपूर्ण तत्व, परिसीमन (Delimitation) की सिर पर लटकती तलवार का है। यह परिसीमन सत्तापक्ष को देश के राजनीतिक भूगोल को ही हमेशा के लिए अपने मनमाफिक बदलने का खुला मौका दे सकता है। हाल के वर्षों में, वर्तमान चुनाव आयोग के ही नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर और असम में हुए परिसीमन का कड़वा अनुभव भी देश के सामने आ चुका है। इन दोनों ही राज्यों में परिसीमन इस तरह से किया गया कि उसने सत्तापक्ष के बहुसंख्यकवादी राजनीतिक आधार की चुनावी ताकत तथा प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाने का और खासतौर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों की चुनावी ताकत तथा प्रतिनिधियों की संख्या घटाने का काम किया है। देश के पैमाने पर यदि आबादी को ही आधार बनाकर परिसीमन किया जाता है तो, उत्तर और दक्षिण भारत के राजनीतिक वजन में, उत्तर भारत के पक्ष में भारी उलट-फेर कर सकता है। इसके ऊपर से परिसीमन की पूरी प्रक्रिया पर सत्तापक्ष का सीधा नियंत्रण, उसे राज्यों की सीमाओं के अंदर चुनाव क्षेत्रों में मन मुताबिक फेर-बदल (Gerrymandering) करने का मौका देगा, वह एक अलग खतरा है। इसके बाद तो सत्तापक्ष एक प्रकार से सत्ता पर अपने कब्जे को, जनता की वास्तविक इच्छा से करीब-करीब स्वतंत्र ही कर सकता है।

याद रहे कि संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान, मोदीशाही ने महिला आरक्षण के लागू किए जाने का रास्ता साफ करने की आड़ में, इसी परिसीमन के लिए एक बड़ा संविधान संशोधन पारित कराने की कोशिश की थी। बेशक, उस समय विपक्ष ने एकजुट होकर उसकी इस साज़िश को विफल कर दिया, क्योंकि संविधान संशोधन प्रस्ताव पारित कराने के लिए ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत सत्ता पक्ष की पहुंच से दूर था, लेकिन सत्ता पक्ष ने अपनी इस हार के बाद भी इसे देश पर थोपने की अपनी कोशिशें बंद नहीं की थीं। उल्टे विधानसभा चुनाव के हाल के चक्र के बाद से, खरीद-फरोख्त के नंगे खेल के जरिए, बंगाल में सत्ता से बाहर हुई तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लोकसभा सदस्यों और उद्धव ठाकरे की शिव सेना के भी लोकसभा सदस्यों का दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा, अन्य पार्टियों में मिलाए जाने के रास्ते, सत्तापक्ष में पहुंचाया जा चुका है। इसके अलावा, शरद पवार की एनसीपी (NCP) के सांसदों के इसी तरह पाला बदलने का और द्रमुक (DMK) के सांसदों का भी समर्थन हासिल करने की सत्तापक्ष द्वारा सैटिंग की खबरें लगातार आती रही हैं, जिससे दो-तिहाई बहुमत समर्थन का वह आंकड़ा भी अब सत्ता पक्ष के लिए संभव नजर आने लगा था। वास्तव में बड़े पैमाने पर इसकी अटकलें लगायी जा रही थीं कि संसद के चालू मानसून सत्र में ही मोदीशाही, सिर्फ परिसीमन संबंधी संविधान संशोधन विधेयक ही नहीं, बल्कि मंत्रियों आदि के पांच साल से ज्यादा की सजा वाले आरोप में 30 दिन से ज्यादा हिरासत में रखे जाने पर, मंत्रिपद खुद-ब-खुद छिन जाने से संबंधित संविधान संशोधन भी पारित कराने की कोशिश कर सकती है।

बहरहाल, देश के इन युवाओं के आंदोलन ने, हालांकि यह आंदोलन मुख्यत: शिक्षा के मुद्दों और नीट (NEET) जैसी परीक्षाओं की धांधली पर केंद्रित रहा है, मोदीशाही के इन तमाम तानाशाही मंसूबों पर फिलहाल ठंडा पानी डाल दिया लगता है। इस आंदोलन ने बुनियादी जनतांत्रिक तकाजों के आधार पर, मोदीशाही के तानाशाही के इस पूरे प्रोजेक्ट पर जैसी तगड़ी चोट की है, उसका असर इस प्रोजेक्ट के केवल शिक्षा से संबंधित हिस्से तक ही सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इस समूचे तानाशाही प्रोजेक्ट पर ही पड़ेगा। याद रहे कि मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों से दूरी की अपनी भाषा के बावजूद, इस ‘जेन-ज़ी’ युवा पीढ़ी ने मौजूदा निजाम के बढ़ते हुए तानाशाहाना निजाम की तीखी, स्पष्ट और लगभग चौतरफा आलोचना प्रस्तुत की है और वह भी सीधे आंदोलन के मैदान में खड़े होकर। इसके बाद, मौजूदा निजाम के लिए अपने तानाशाही के इन खतरनाक मंसूबों को आगे बढ़ाना और अधिक मुश्किल हो जाएगा। अब राजनीतिक विपक्ष के साथ ही, सत्ता के इन मंसूबों को देश की युवा पीढ़ी की भी वैचारिक चुनौती का सामना करना पड़ रहा होगा, जिसका मुकाबला करने में संघ-भाजपा तथा उनके शासन की प्रकट असमर्थता ने ही मोदीशाही को, ऐतिहासिक किसान आंदोलन के एक साल से लंबे संघर्ष के बाद, दूसरी बार किसी जन-आंदोलन के सामने इस तरह विधिक रूप से झुकने के लिए मजबूर किया है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

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Chief Editor, Taj News

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