सियासत का भूकंप: क्या दो-तिहाई बहुमत की राह में ढहेंगे क्षेत्रीय दलों के किले?
रणनीतिक दलबदल, संवैधानिक संशोधन का चक्रव्यूह और क्षेत्रीय प्रासंगिकता का संकट
— बृज खंडेलवाल
क्या भारतीय राजनीति एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है? क्या दलबदल अब महज़ अवसरवाद नहीं, बल्कि सत्ता के बड़े खेल का सबसे असरदार हथियार बन गया है? देश की राजनीति में एक बार फिर दलबदल की तेज़ आंधी उठी है। लेकिन इस बार कहानी केवल सरकारें बनाने और गिराने तक सीमित नहीं है। असली लक्ष्य संसद में ऐसा संख्याबल जुटाना है, जिससे संवैधानिक संशोधनों की राह आसान हो सके। राजनीतिक विश्लेषक इसे लोकतंत्र की आत्मा और संविधान की मूल भावना के लिए गंभीर चुनौती मान रहे हैं।
हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसदों और नेताओं के पाला बदलने की अटकलों ने सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। इतिहास बताता है कि दलबदल भारतीय राजनीति का नया रोग नहीं, लेकिन इसकी रफ़्तार और मंशा अब पहले से कहीं अधिक व्यापक और रणनीतिक हो गई है। साल 2016 में अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस के 44 में से 43 विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे। गोवा और मणिपुर में भी दलबदल ने सरकारों की तस्वीर बदल दी। सवाल यह है कि क्या अब यही प्रयोग राष्ट्रीय स्तर पर दोहराया जा रहा है?
पश्चिम बंगाल का जनादेश और किलों का क्षरण
पश्चिम बंगाल के 2026 विधानसभा चुनाव परिणाम केवल एक राज्य में सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं हैं। वे पूरे देश में बदलते राजनीतिक मौसम की पहली तेज़ दस्तक हैं। जो क्षेत्रीय किले कभी अभेद्य माने जाते थे, उनमें अब गहरी दरारें दिखाई दे रही हैं। भाजपा ने लगभग 207 सीटों के साथ बंगाल में नया इतिहास रच दिया, जबकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस करीब 80 सीटों पर सिमट गई। ये आंकड़े केवल चुनावी नतीजे नहीं हैं। वे बदलते जनमत, करिश्माई नेतृत्व की सीमाओं और सत्ता-विरोधी लहर के संकेतक हैं।
लंबे समय तक ममता बनर्जी का व्यक्तिगत करिश्मा और संघर्षशील छवि बंगाल की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत रही। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप, संगठनात्मक थकान और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा शहरी युवा मतदाताओं के बीच भाजपा की बढ़ती पैठ ने तृणमूल की नींव हिला दी। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की फुसफुसाहटें तेज़ हो गई हैं। वरिष्ठ नेताओं की नाराज़गी और बड़े पैमाने पर दलबदल की अटकलें संकेत देती हैं कि दीवारें पहले ही कमजोर पड़ चुकी थीं।
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, यह बदलाव केवल बंगाल तक सीमित नहीं है। देशभर में क्षेत्रीय दल अस्तित्व और प्रासंगिकता की दोहरी चुनौती से जूझ रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना के दोनों धड़ों का संघर्ष, दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी की चुनौतियां तथा तमिलनाडु में एआईएडीएमके का कमजोर होता जनाधार इस बदलती तस्वीर का हिस्सा हैं। सियासत का एक पुराना उसूल फिर सामने है; यहां न कोई स्थायी मित्र होता है, न स्थायी दुश्मन। स्थायी होता है तो केवल सत्ता का गणित। कल तक जो नेता एक-दूसरे पर तीखे हमले कर रहे थे, आज वे गठबंधन और समझौतों की राह तलाश रहे हैं। विचारधारा की चमक अक्सर सत्ता की सीढ़ियों पर फीकी पड़ जाती है। विपक्षी एकता की परतें भी तेजी से उधड़ रही हैं। बाहरी चुनौतियों से अधिक, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं और नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा गठबंधनों को भीतर से कमजोर कर रही हैं।
पूर्ण बहुमत की छटपटाहट और परिसीमन का चक्रव्यूह
दूसरी ओर, भाजपा अपनी चुनावी सफलताओं को दीर्घकालिक रणनीतिक बढ़त में बदलने की कोशिश कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद पूर्ण बहुमत से दूर रहना उसके लिए एक स्पष्ट संदेश था। यही कारण है कि वह नए राजनीतिक सहयोगियों की तलाश में अधिक सक्रिय दिखाई दे रही है। परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीतिक तापमान बढ़ रहा है। दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के बावजूद उनके संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी आ सकती है। भाजपा इसे बेहतर प्रतिनिधित्व और प्रभावी शासन का माध्यम बताती है, जबकि आलोचकों का आरोप है कि इससे संघीय संतुलन प्रभावित हो सकता है। आने वाले वर्षों में यह बहस भारतीय राजनीति के केंद्र में रहने वाली है।
रिपोर्ट के अनुसार, राज्यों में भी नए समीकरण बन रहे हैं। बिहार में नीतीश कुमार युग के बाद की राजनीति आकार ले रही है। तमिलनाडु में अभिनेता विजय की राजनीतिक पारी पारंपरिक द्रविड़ दलों के लिए नई चुनौती बन सकती है। कांग्रेस नए सहयोगियों की तलाश में है। समाजवादी पार्टी में हलचल जारी है। मायावती फिर सक्रिय दिख रही हैं, जबकि असदुद्दीन ओवैसी भी अपनी राजनीतिक ज़मीन मजबूत करने में जुटे हैं।
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, आख़िर में सबसे निर्णायक भूमिका मतदाता की ही होगी। क्षेत्रीय दल खत्म नहीं हो रहे, लेकिन केवल करिश्माई नेतृत्व, जातीय समीकरण या पहचान की राजनीति के भरोसे अब लंबी पारी खेलना आसान नहीं रहा। संगठनात्मक मजबूती, suresh सुशासन और जनता से निरंतर संवाद ही भविष्य की राजनीति की असली पूंजी बनेंगे। बंगाल का जनादेश पूरे देश के लिए साफ संदेश है, जो समय के साथ खुद को बदलेगा, वही टिकेगा। सियासत में हवा का रुख़ बदलते देर नहीं लगती। जो इसे पहचान लेगा, वही आने वाले दौर का खिलाड़ी होगा। जो पुराने भ्रमों में जीता रहेगा, वह इतिहास के हाशिये पर खड़ा दिखाई देगा।
(लेखक आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसाइटी के संस्थापक हैं।)