तिलचट्टा, परजीवी…….
शब्दों की मर्यादा और अदालतों की गरिमा
मान भी लें कि कुछ गलत एलिमेंट्स मीडिया में दाखिल हो चुके हैं, और कई एक्टिविस्ट्स सूचनाधिकार का दुरुपयोग करते हैं, तो क्या समूची बिरादरी को कटघरे में खड़ा करना उचित है? वकालत में, डाक्टरी में, न्यायिक व्यवस्था में, राजनीति में, सभी जगह काली भेड़ें अमर्यादित कार्य कर रही हैं, लेकिन क्या पूरा सिस्टम दोषी है?
— बृज खंडेलवाल
अदालतों की इमारतें सिर्फ पत्थर और दीवारों से नहीं बनतीं। उनका असली आधार जनता का भरोसा होता है। इसलिए जब न्यायपालिका जैसे सर्वोच्च संवैधानिक मंचों से कठोर शब्द निकलते हैं, तो वे सिर्फ एक टिप्पणी नहीं रहते, समाज के लिए एक व्यापक संदेश बन जाते हैं।
हाल में “तिलचट्टे” और “परजीवी” जैसे शब्दों के इस्तेमाल ने एक नई बहस को उकसाया है।
15 मई 2026 को वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम से जुड़ी सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने उन लोगों पर चिंता जताई, जो वैध योग्यता या पेशेवर क्षमता के बिना मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई एक्टिविज्म के जरिए संस्थाओं पर लगातार हमला करते हैं। उन्होंने कुछ तत्वों के लिए “तिलचट्टे” और “परजीवी” जैसे शब्दों का प्रयोग किया।
हालांकि, बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी पूरे युवावर्ग या सभी एक्टिविस्टों के लिए नहीं थी, बल्कि उन लोगों के लिए थी जो गलत तरीकों से व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं। यह स्पष्टीकरण जरूरी था और उसका स्वागत होना चाहिए।
लेकिन इसके बावजूद एक असहज सवाल बना रहता है। क्या इतनी तीखी भाषा जरूरी थी?
भारत का युवा पहले ही भारी दबाव में जी रहा है। बेरोजगारी बढ़ रही है। प्रतियोगिता लगातार कठिन होती जा रही है। लाखों पढ़े-लिखे युवा नौकरी, अवसर और पहचान की तलाश में भटक रहे हैं। ऐसे माहौल में जब ऊंचे संवैधानिक पदों से व्यापक टिप्पणियां आती हैं, तो कई लोगों को लगता है कि उनकी निराशा और संघर्ष को समझने के बजाय उनका मजाक बनाया जा रहा है। लोकतंत्र में असहमति रखने वाला हर व्यक्ति दुश्मन नहीं होता。
यह भी उतना ही सच है कि मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई का दुरुपयोग हुआ है। कुछ लोग व्यक्तिगत एजेंडा चलाते हैं। कुछ यूट्यूब चैनल सनसनी बेचते हैं। कुछ लोग आरटीआई को सूचना के अधिकार की जगह निजी बदले का हथियार बना देते हैं। अदालतों पर भी कई बार बिना तथ्यों के आरोप लगाए जाते हैं। सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के खिलाफ फर्जी अभियान चलाए जाते हैं। यह सब चिंता का विषय है。
मीडिया ट्रायल के उदाहरण हमारे सामने हैं। जेसिका लाल हत्याकांड, आरुषि तलवार मामला और सुशांत सिंह राजपूत केस में टीवी स्टूडियो अदालत से पहले फैसले सुनाने लगे थे। चीखती बहसों और सनसनीखेज रिपोर्टिंग ने निष्पक्ष सुनवाई पर असर डाला। सुप्रीम कोर्ट खुद कई बार मीडिया को चेतावनी दे चुका है कि sub-judice मामलों में संयम जरूरी है।
इसी तरह अदालतों ने आरटीआई के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई है। कई मामलों में अधिकारियों ने कहा कि निरर्थक और बार-बार दाखिल आरटीआई आवेदन कामकाज को प्रभावित करते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कुछ मामलों में माना कि बदले की भावना से डाली गई आरटीआई व्यवस्था में “fear and paralysis” पैदा करती हैं। यह चिंता पूरी तरह गलत नहीं कही जा सकती。
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: “इसी आरटीआई कानून ने भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों को उजागर किया। इसी ने आम नागरिक को सवाल पूछने की ताकत दी। कई स्वतंत्र पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सत्ता के दुरुपयोग को सामने लाने का साहस दिखाया। लोकतंत्र में असहज सवाल पूछना अपराध नहीं होना चाहिए।”
समस्या यह है कि आज हर आलोचना को दुश्मनी और हर सवाल को षड्यंत्र मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यही प्रवृत्ति संस्थाओं और जनता के बीच दूरी पैदा करती है। अदालतों की ताकत सिर्फ अवमानना की शक्ति में नहीं, बल्कि जनता के नैतिक विश्वास में होती है。
एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि अदालत की गरिमा बनाए रखने का सबसे अच्छा तरीका उसके फैसलों की गुणवत्ता और न्यायपूर्ण व्यवहार है। यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। बड़े पदों पर बैठे लोगों के शब्दों में कठोरता नहीं, संतुलन ज्यादा दिखाई देना चाहिए।
न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है और उसकी रक्षा हर हाल में होनी चाहिए। लेकिन सम्मान और रचनात्मक आलोचना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ-साथ चल सकते हैं。
एक विविध, बेचैन और तनावग्रस्त समाज में अदालतों की भूमिका सिर्फ कानून लागू करने की नहीं, भरोसा पैदा करने की भी है। इसलिए न्यायपालिका से निकले शब्द ऐसे होने चाहिए जो लोगों को जोड़ें, तोड़ें नहीं। अदालतों की असली ताकत डर पैदा करने में नहीं, बल्कि न्याय और संवेदनशीलता के साथ विश्वास कायम करने में है。
ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: संस्थागत गरिमा बनाम आलोचना का अधिकार और ‘जनविश्वास’ का संकट
बृज खंडेलवाल जी का यह आलेख लोकतंत्र के उस सबसे नाज़ुक और संवेदनशील बिंदु पर प्रहार करता है, जहाँ एक आम नागरिक के ‘सवाल पूछने के अधिकार’ और संवैधानिक संस्थाओं (विशेषकर न्यायपालिका) की ‘गरिमा’ के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है। सर्वोच्च न्यायालय भारत के लोकतांत्रिक ढांचे का अंतिम रक्षक (Ultimate Guardian) है। जब देश की संसद या कार्यपालिका (Executive) अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाती है, तो आम आदमी उम्मीद भरी नज़रों से केवल अदालत की ओर देखता है। लेकिन, 15 मई 2026 को जब देश के मुख्य न्यायाधीश ने बिना किसी विशिष्ट संदर्भ को पूरी तरह स्पष्ट किए ‘तिलचट्टे’ (Cockroaches) और ‘परजीवी’ (Parasites) जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया, तो इसने समाज के एक बड़े वर्ग में निराशा और भय का संचार किया। यह आलेख इस बात को बहुत ही गहराई से स्थापित करता है कि ऊँचे पदों पर बैठे व्यक्तियों का हर शब्द एक ‘सामाजिक फरमान’ की तरह काम करता है, जिसे बेहद सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
आरटीआई (RTI) और मीडिया: ‘परजीवी’ या लोकतंत्र के ‘वॉचडॉग’ (Watchdog)?
यह एक निर्विवाद सत्य है कि कुछ यूट्यूबर्स (YouTubers) और स्वयंभू एक्टिविस्ट्स ने सनसनी (Sensationalism) बेचने के लिए ‘मीडिया ट्रायल’ का एक खतरनाक ट्रेंड शुरू कर दिया है। सुशांत सिंह राजपूत या आरुषि तलवार मामलों में अदालती फैसलों से पहले ही मीडिया ने जो फांसी के फंदे तैयार किए, वे न्याय प्रक्रिया में बाधा बने। इसी तरह, आरटीआई (Right to Information) का इस्तेमाल कुछ लोगों द्वारा ब्लैकमेलिंग (Blackmailing) के लिए किया जाता है, जो प्रशासनिक तंत्र में ‘डर और पंगुता’ (Fear and Paralysis) पैदा करता है। लेकिन, क्या इन ‘काली भेड़ों’ (Black Sheeps) की सज़ा उन ईमानदार पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को दी जानी चाहिए जिन्होंने 2जी (2G), कोल ब्लॉक (Coalgate), और इलेक्टोरल बॉन्ड्स (Electoral Bonds) जैसे महाघोटालों का पर्दाफाश किया? जब अदालतें पूरे एक वर्ग को ‘परजीवी’ कह देती हैं, तो वह अनजाने में उन भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं को एक हथियार दे देती हैं, जो पहले से ही आरटीआई और स्वतंत्र पत्रकारिता का गला घोंटने की ताक में बैठे हैं।
असहमति (Dissent) कोई ‘षड्यंत्र’ नहीं है:
आलेख में जो बात सबसे ज़्यादा ध्यान खींचती है, वह है आधुनिक व्यवस्था की वह प्रवृत्ति जहाँ “हर आलोचना को दुश्मनी और हर सवाल को षड्यंत्र मान लिया जाता है।” लोकतंत्र में ‘न्यायपालिका’ की आलोचना करना कोई अपराध (Contempt) नहीं होना चाहिए, बशर्ते वह तार्किक और सम्मानजनक हो। अगर फैसले की गुणवत्ता (Quality of Judgment) पर सवाल नहीं उठाए जाएंगे, तो व्यवस्था में सुधार कैसे होगा? आज का युवा बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक दबावों से त्रस्त है। ऐसे में जब वह देखता है कि सिस्टम उसके सवालों के जवाब देने के बजाय उसे ही ‘तिलचट्टा’ कहकर कुचलने की मानसिकता रखता है, तो उसका व्यवस्था से मोहभंग (Disillusionment) होना स्वाभाविक है।
निष्कर्ष: ‘डर’ नहीं, ‘संवेदनशीलता’ चाहिए:
‘ताज न्यूज़’ का यह स्पष्ट मानना है कि न्यायपालिका की गरिमा उसके अवमानना (Contempt of Court) के डंडे से नहीं, बल्कि आम जनता के उस ‘नैतिक विश्वास’ (Moral Trust) से तय होती है, जो उसे एक तटस्थ और न्यायपूर्ण संस्था मानता है। अदालतों का काम समाज को डराना नहीं, बल्कि उसे भरोसा दिलाना है कि हर पीड़ित को न्याय मिलेगा। न्यायपालिका को चाहिए कि वह ‘तिलचट्टे’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर व्यवस्था के ‘सिस्टमैटिक फेलियर’ (Systematic Failure) को ढकने के बजाय, उन मूल कारणों पर प्रहार करे जो मीडिया और समाज में इस हताशा को जन्म दे रहे हैं। लोकतंत्र में कोई भी संस्था जनता के सवालों से ऊपर नहीं हो सकती, क्योंकि अंततः हर संस्था का निर्माण उसी ‘परजीवी’ लगने वाली जनता के कर (Taxes) और भरोसे से होता है।