राजनैतिक व्यंग्य-समागम: कोई नफ़रती ना कहे मेरे, ‘‘गोली मारो…’’ वालों को! : राजेंद्र शर्मा
इसे कहते हैं– न्याय! अदालत ने क्या दूध का दूध और पानी का पानी किया है। दूध अलग और पानी अलग। मजाल है, जो दूध में पानी का कतरा मिलने दिया हो। और पानी में दूध का एक छींटा रहने देने का तो सवाल ही नहीं उठता है। एक तरफ न्याय और दूसरी तरफ अन्याय। और दोनों के बीच कोई बारीक-सी रेखा नहीं, बल्कि समझिए कि चीन की दीवार की टक्कर की दीवार खींच दी है कि रत्ती भर मिलावट का कोई चांस ही नहीं है।
अदालत ने पहले नफरती बोलों के दूध को छानकर अलग किया। यह तो बहुत ही खतरनाक चीज है। इसको अनदेखा करना देश के लिए बहुत ही नुकसानदेह है। कानून में इससे निपटने के लिए काफी उपाय हैं। पता नहीं क्यों, इससे निपटने में अक्सर ढील देखने को मिलती है, वगैरह, वगैरह।
फिर एक झटके में पानी को इस दूध से अलग कर दिया — ‘‘गोली मारो सालों को’’ का नारा लगाने में तो कोई नफरती बोल है ही नहीं। एक सिंपल नारा है और वह भी चुनाव के टैम का नारा। यह कैसी विडंबना है कि एक तरफ तो सेकुलर वाले चुनावी नारों में नफरती बोल खोज रहे हैं और दूसरी ओर इसकी शिकायतें करते हैं कि मोदी जी-शाह जी के राज में, नफरती बोलों की बाढ़ आयी हुई है। बाढ़ आयी हुई है, तो बाढ़ में से कहीं से भी नफरती बोल का डोल भर लाते, मोदी जी के दो हीरों — अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा — पर ही निशाना लगाने की कोशिश क्यों?
न्यायाधीशों ने तो पहली नजर में ही पहचान लिया कि यह पॉलिटिक्स का मामला है। पॉलिटिक्स का भी क्या, बस मोदी जी के विरोध का मामला है। मोदी जी के विरोधियों को विरोध करने के लिए और कुछ नहीं मिला, तो मोदी जी के चहेते युवा सांसदों पर नफरती बोली बोलने का इल्जाम लगा दिया।
और इल्जाम भी किस ने लगाया? एक विपक्षी नेता ने। और विपक्षी भी ऐसी-वैसी नहीं, कम्युनिस्ट नेता ने। अब कम्युनिस्टों का तो नफरत सूंघने का स्पेशलाइजेशन ही माना जाता है। सात पर्दों में छुपी नफरत भी सूंघ निकालते हैं। और उस पर तुर्रा ये है कि ये खुदाई खिदमतगार हैं।
चुनाव दिल्ली में हो रहा था। ठाकुर जी और वर्मा जी दिल्ली के चुनाव में ‘‘गोली मारो…को’’ का आह्वान कर रहे थे। दिल्ली में चुनाव में उनकी पार्टी का मुकाबला, अरविंद केजरीवाल की पार्टी से था। पर शिकायत हुई लाल झंडे वाली पार्टी की नेता को, जिनकी पार्टी चुनाव में कहीं दूर-दूर थी ही नहीं। सोचने की बात है, अगर ‘‘गोली मारो…को’’ में नफरत के बोल होते, तो क्या केजरीवाल की पार्टी को नहीं सुनाई देते, जिसने उस बार तो चुनाव जीता भी था。
हैरानी की बात नहीं है कि अदालत ने पहली नजर में ही पकड़ लिया कि यह नफरती बोल वगैरह के खिलाफ किसी न्याय-व्याय का नहीं, सिर्फ पॉलिटिक्स का मामला है। सच्ची बात तो यह है कि सबसे ऊंची अदालत ने तो अब पकड़ा, बाकी अदालतें भी शुरू से ही इस सचाई को न सिर्फ जाने बैठी थीं, बल्कि पकड़ के भी बैठी थीं। और अदालतें ही क्यों अमित शाह जी वाली दिल्ली पुलिस भी। तभी तो दिल्ली पुलिस को कभी ‘‘गोली मारो…को’’ में कोई नफरती बोल नहीं सुनाई दिया। वैसे भी दिल्ली पुलिस पर काम का बोझ बहुत ज्यादा है और जो ऊपर से कहा जाता है, उसे ही ठीक से सुन-समझ लें तो ही बहुत है। इधर-उधर के बोल भी सुनने के चक्कर में पड़ेंगे, तब तो शायद कुछ भी सुनने लाइक नहीं रह जाएंगे। अगर इधर-उधर के बोल सुनने लगते, तो क्या उन्हें अमित शाह का वोटिंग मशीन के बटन से शाहीन बाग में करेंट लगाने वाला डाइलॉग भी नहीं सुनना पड़ता! बॉस के नफरती बोल…वह तो कुफ्र हो जाता। उन्होंने कुछ नहीं सुना। और जब शाह जी की पुलिस को कोई नफरती बोल नहीं सुनाई दिये, तो निचली अदालत को कैसे सुनाई देते?
अदालतों पर काम का बोझ कम है क्या? जब निचली अदालत ने नफरती बोल नहीं सुने, तो हाई कोर्ट कैसे सुनती? दिल्ली के ही जस्टिस मुरलीधरन की तरह, रातों-रात जज साहब को दंडात्मक तबादला कराना था क्या? और आखिरकार, सबसे ऊंची अदालत को भी ‘‘गोली मारो…को’’ में कोई नफरती बोल नहीं सुनाई दिए। केस क्लोज्ड, याचिका खारिज!
अब प्लीज ये मत कहने लगिएगा कि अदालत के ही कान बंद थे, इसलिए उसे नफरती बोल सुनाई नहीं दिए। इसमें कान का तो काम ही नहीं था। सारा मामला तो यूं ही एकदम साफ था। अदालत की क्लीन चिट तो बनती थी — ‘‘देश के गद्दारों को, गोली मारो…को’’ के लिए! दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के नौजवान नेताओं का नारा था, उसके लिए क्लीन चिट तो यों भी बनती ही थी। नारा है, आगे भी देश की सेवा के लिए काम आएगा, चुनाव में भी और चुनाव से पहले भी तथा बाद में भी। वैसे भी गोली मारो के आह्वान में नफरत वाली तो कोई बात है ही नहीं। बेशक, इस आह्वान को कोई हिंसक कह सकता है, लेकिन था तो सिर्फ आह्वान ही। गोली किसी को मारी गयी क्या? कहां तो भारतीय ज्ञान परंपरा की नयी पढ़ाई में यह पढ़ाने की तैयारियां की जा रही हैं कि गोडसे ने गांधी को जो तीन गोलियां मारी थीं, वो भी नफरत की वजह से नहीं, बल्कि राष्ट्र से प्रेम की वजह से मारी थीं ; और कहां गोली मारने की सिर्फ पुकार को जबरन नफरत से जोड़ा जा रहा है, जबकि गोली एक भी नहीं चली थी, शाहीन बाग के सिवा。
फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि मोदी जी के पार्टी के युवा नेताओं ने गोली किसे मारने की पुकार उठायी थी। देश के गद्दारों को! देश के गद्दारों को गोली मारने का भला नफरत से क्या लेना? यह तो राष्ट्र प्रेम का काम है! माना कि हरेक राष्ट्र प्रेमी गोली मारने लगेगा, तब भी और बड़ी समस्या पैदा हो जाएगी। फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि इसके पीछे भावना राष्ट्र प्रेम की है, न कि मुसलमानों या और किसी के भी प्रति नफरत की। रही बात ‘‘सालों को’’ की, तो साला शब्द के प्रयोग में जरूर नफरत की आशंका हो सकती है, क्योंकि इस शब्द का प्रयोग कई बार गाली की तरह भी किया जाता है। लेकिन, यह एक प्यारे रिश्ते का नाम भी तो है। यह भी हो सकता है कि नारे में साला शब्द का प्रयोग इस प्यार भरे अर्थ में ही किया गया हो। अदालत संदेह का लाभ देकर, ‘‘गोली मारो सालों को’’ का नारा लगाने वालों को, नफरती बोली के आरोपों से बरी करती है। मोदी जी-शाह जी की पार्टी को चुनाव में, चुनाव से पहले और चुनाव के बाद, हरेक सीजन में अपने इस नारे का प्रयोग करने का अधिकार है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)
ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: न्याय का ‘सुविधाजनक’ चश्मा और लोकतंत्र का मौन
राजेंद्र शर्मा जी का यह प्रखर व्यंग्य भारतीय न्याय व्यवस्था और पुलिस तंत्र की उस ‘सुविधाजनक दृष्टि’ (Selective Blindness) को उघाड़कर सामने रखता है, जहाँ सत्ता के करीब बैठे नेताओं के हिंसक और भड़काऊ बयानों को भी ‘राष्ट्रभक्ति’ की चाशनी में लपेट कर वैधानिक मान लिया जाता है। 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान “गोली मारो सालों को” का जो नारा गूंजा था, वह सिर्फ एक चुनावी जुमला नहीं था; वह एक ऐसा सुनियोजित राजनीतिक औजार था जिसने समाज में ध्रुवीकरण की गहरी खाई खोदी और अंततः जिसकी परिणति दिल्ली में हुए दर्दनाक सांप्रदायिक दंगों के रूप में हुई। लेकिन जब यही मामला अदालतों की चौखट पर पहुंचता है, तो कानूनी बारीकियों और ‘टेक्निकलिटीज़’ का सहारा लेकर इसे महज़ एक ‘राजनीतिक आह्वान’ बताकर खारिज कर दिया जाता है। यह स्थिति किसी भी परिपक्व लोकतंत्र के लिए बेहद डरावनी है।
व्यंग्य में जिस बात पर सबसे गहरी चोट की गई है, वह है हेट स्पीच (Hate Speech) की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश। जब देश की जांच एजेंसियां और अदालतें यह तर्क देने लगें कि चूँकि उस वक्त कोई गोली नहीं चली, इसलिए यह नारा नफरत फैलाने वाला नहीं था, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि हम राजनेताओं को भीड़ को उकसाने का खुला लाइसेंस दे रहे हैं। यह एक ऐसा खतरनाक ‘प्रेसिडेंट’ (Precedent – मिसाल) सेट करता है, जहाँ भविष्य में कोई भी नेता किसी भी समुदाय के खिलाफ जहर उगल सकता है और बाद में यह कहकर बच सकता है कि यह तो ‘चुनाव के समय की बात’ थी। यह ‘नये भारत’ की वह कड़वी हकीकत है जहाँ एक तरफ सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को UAPA जैसे संगीन कानूनों के तहत सालों तक बिना जमानत के जेल में सड़ा दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ खुलेआम हिंसा का आह्वान करने वाले नेता ‘वीआईपी’ सुरक्षा और सत्ता का सुख भोगते हैं।
लेखक ने बहुत ही चतुराई से ‘शाहीन बाग’ और ‘वोटिंग मशीन के बटन’ वाले प्रसंग का ज़िक्र किया है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि राजनीतिक नरेटिव को किस तरह ‘इको-चैंबर’ में सेट किया जाता है। जब एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस अपने ‘बॉस’ की आंखों से देखने लगे और न्यायपालिका का एक हिस्सा दबाव में आ जाए (जैसे रातों-रात तबादले का ज़िक्र), तो न्याय अंधा नहीं रहता, बल्कि वह ‘सत्ता की सहूलियत’ के हिसाब से देखने लगता है।
अंततः, ताज न्यूज़ का यह स्पष्ट मानना है कि राजेन्द्र शर्मा का यह व्यंग्य मात्र एक राजनीतिक कटाक्ष नहीं है, बल्कि यह हमारे सामूहिक विवेक (Collective Conscience) पर एक तमाचा है। नफरत को जब ‘राष्ट्र प्रेम’ का लबादा ओढ़ा दिया जाता है, तो समाज की नसें धीरे-धीरे विषैली होने लगती हैं। “देश के गद्दार कौन हैं?” यह तय करने का अधिकार भीड़ को या किसी राजनेता को नहीं, बल्कि देश के संविधान और न्यायपालिका को है। यदि अदालतें इन ‘नफरती बोलों’ को चुनावी राजनीति का सामान्य हिस्सा मानकर नज़रअंदाज़ करती रहेंगी, तो कल को यह आग सिर्फ शाहीन बाग या दिल्ली की सड़कों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे देश के सामाजिक ताने-बाने को झुलसा देगी। इस व्यंग्य की चुभन हमें यह याद दिलाने के लिए काफी है कि एक खामोश और सहिष्णु समाज ही तानाशाहों का सबसे बड़ा हथियार होता है।