जो दवा के नाम पे जहर दे, उस चारागर की तलाश पूरी: अब देश बंदी की तैयारी! बादल सरोज का तीखा प्रहार

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Article Desk, tajnews.in | Friday, May 15, 2026, 10:50:00 PM IST

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Badal Saroj Writer
बादल सरोज
संपादक, ‘लोकजतन’
संयुक्त सचिव, अखिल भारतीय किसान सभा
अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव और ‘लोकजतन’ के संपादक बादल सरोज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नवीनतम ‘सप्तपदी’ हिदायतों (जैसे- वर्क फ्रॉम होम, कम तेल खपत) और उनके अपने ही आचरण के बीच के भारी विरोधाभास पर एक बेहद प्रखर आलेख लिखा है। यह आलेख देश के रणनीतिक तेल भंडार की कमी और विदेश नीति की विफलताओं को जनता पर थोपने की साजिश का पर्दाफाश करता है।
HIGHLIGHTS
  1. बादल सरोज का तीखा प्रहार: जनता को पेट्रोल-डीजल बचाने की हिदायत देने वाले प्रधानमंत्री खुद 100 से अधिक वाहनों के काफिले के साथ रोड शो कर रहे हैं।
  2. ‘वर्क फ्रॉम होम’ और ‘सोना न खरीदने’ जैसी सलाह को लेखक ने 50 लाख लोगों का रोज़गार चौपट करने वाली ‘जानलेवा दवा’ बताया है।
  3. भारत का रणनीतिक तेल भंडार केवल 9.5 दिन की खपत के लिए पर्याप्त है; जबकि चीन और अमेरिका इस मामले में हमसे कोसों आगे हैं।
  4. ताज न्यूज़ का संपादकीय विश्लेषण: विदेश नीति (ईरान और रूस से तेल खरीद रोकना) की विफलताओं का बोझ ‘कर्तव्य’ के नाम पर आम जनता पर क्यों थोपा जा रहा है?

जो दवा के नाम पे जहर दे, उस चारागर की तलाश पूरी : अब देश बंदी की तैयारी

(आलेख : बादल सरोज)

वे जब भी, जो भी करते हैं, एकदम नया और चौंकाने वाला करते हैं। वे कोई भी रूप धारण कर सकते हैं, किसी भी धजा में हाजिर हो सकते हैं, कहीं भी साष्टांग लम्बलोट हो सकते हैं, मौके-बेमौके हास-परिहास और अट्टहास कर सकते हैं। वे न पहली सदी के रोम के राजा नीरो हैं, न तेरहवीं सदी के तुगलकाबाद वाया दिल्ली के बादशाह मोहम्मद बिन तुगलक हैं और न ही सत्रहवीं सदी की फ़्रांस की साम्राज्ञी मैरी एंटोईनेट हैं। वे इक्कीसवीं सदी के मोदी हैं और अपनी मिसाल आप हैं। नोट बंदी से शुरू की अपनी यात्रा को वे वोट बंदी तक ला चुके हैं : इस बीच में तालियाँ और थालियाँ बजवा चुके हैं, मोमबत्ती जलवा चुके हैं। देश की अर्थव्यवस्था को पटियों पर ला चुके हैं, एक जमाने में जो भारत आधी दुनिया के देशों का स्वाभाविक नेता हुआ करता था, उसे लाइबेरिया की हैसियत में पहुंचा चुके हैं। वे “फकीरे शहर के तन पर लिबास बाकी है/ अमीरे शहर के अरमाँ अभी कहाँ निकले” के भाव से इतने विभोर हैं कि कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते। यही उत्कट भाव 10 मई को पहले हैदराबाद की आमसभा में प्रकट हुआ और उसके बाद यह साबित करने के लिए कि वह यूं ही अचानक निकल गयी अललटप्पू बात नहीं थी, अगले दिन वड़ोदरा सहित बाकी की सभाओं में भी दोहराया गया।

जैसी कि आशंका थी, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव निबटने के साथ ही सरकार आपदाओं की नयी बौछार लेकर आएगी, वही हुआ भी। मतगणना पूरी होने से पहले ही कमर्शियल गैस सिलेंडर पर लगभग हजार रूपये की बढ़ोत्तरी कर दी गयी और लाखों छोटे दुकानदारों का काम-धंधा मुश्किल में डाल दिया। नई सरकारों के शपथ लेने के पहले ही जनता पर चौतरफा हमलों के नए पैकेज का एलान स्वयं मोदी ने अपने श्रीमुख से कर दिया। ‘संकटों में कर्तव्य सर्वोपरि’ के मन्त्र के साथ आये इस नुस्खे में देश के प्रधानमंत्री ने जनता के लिए कर्तव्यों की जो सप्तपदी गिनाई है, उसमें पेट्रोल-डीजल का संयम से इस्तेमाल करना, बाहर जाना कम करना, सार्वजनिक परिवहन अधिक काम में लाना और कोरोना काल की तरह घर से ही काम — वर्क फ्रॉम होम – करना, एक साल तक शादी-विवाह सहित किसी भी तरह से सोना खरीदना बंद करना, कम से कम एक वर्ष तक विदेश यात्रा पर नहीं जाना, खाने के तेल के उपयोग में भी कमी लाना, खेती किसानी में खाद और उर्वरक का इस्तेमाल कम करना और प्राकृतिक खेती की ओर लौटना, विदेशी सामान नहीं खरीदना, स्वदेशी पर जोर देना आदि-आदि शामिल हैं। कई मायनों में यह बिना किसी महामारी के ही कोविड महामारी के समय उठाये गए कदमों से भी ज्यादा आगे के उपाय हैं। एलान करते ही स्वयं मोदी ही खुलेआम इन सबकी धज्जियां उड़ाने निकल पड़े।

जिस हैदराबाद की सभा में वे पेट्रोल, डीजल की खपत कम करने का निर्देश दे रहे थे, उस सभा के मंच पर वे पूरे 18 किलोमीटर का रोड शो करने के बाद पहुंचे थे और यहाँ घनगरज करने के बाद शाम को सीधे जामनगर पहुंचकर फिर रोड शो किया। अगले दिन 11 मई को सोमनाथ में रोड शो करने के बाद भी मन नहीं भरा, तो शाम को वड़ोदरा में फिर सडकों पर जनता के दर्शनार्थ जनार्दन बन स्वयं खुली झांकी निकाली। प्रधानमंत्री के रोड शो के काफिले में अत्याधुनिक हथियारों से लैस एसपीजी के जवान, जैमर वाहन और एम्बुलेंस सहित 10 से अधिक सुरक्षा वाहन शामिल रहते हैं। इनके अलावा 50 से लेकर 100, कई बार उनसे भी अधिक, कारें होती हैं। यह प्रधानमंत्री के साथ चलने वाले काफिले के वाहनों की संख्या है। इनके अलावा हर 200 मीटर पर खड़ी की गयी सुरक्षा चौकियों के वाहन और वहां खड़े होने वाले सुरक्षा बलों को लाने-ले जाने वाले वाहन अलग से होते हैं। कुल मिलाकर, एक मझोले शहर की कुल तेल खपत से भी ज्यादा तेल एक एक रोड शो में फूंक दिया : वह भी देश भर को कटौती करने के सार्वजनिक रूप से किये गए उपदेश के महज चौबीस घंटों के भीतर ही। संतोष इतने पर भी नहीं हुआ, तो न जाने कितने पुराने सोमनाथ मंदिर की 75वीं वर्षगांठ मना डाली और इस मौके पर सोमनाथ में एयर शो भी करवाया, जिसमें देश की वायुसेना के अतिविशिष्ट माने जाने वाले 6 हॉक एमके विमानों से मंदिर के ऊपर तिरंगे के रंगों का धुआं छोड़ते हुए आसमान में ‘दिल’ की आकृति बनवाई और मंदिर पर फूल बरसवाये। इस आतिशबाजी जैसे नज़ारे का लुत्फ़ लेने के लिए हजारों लोग इकट्ठा किये गए थे और जाहिर है कि वे पाँव-पाँव चलकर नहीं आये थे। पेट्रोलियम उत्पादों की किफायत के अपने ही आह्वान का ऐसा मखौल सिर्फ मोदी नहीं उड़ा रहे थे : उनका पूरा कुनबा इसी में लगा था । कोलकता में बिठाये गए भाजपाई मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने सभी 20 भाजपाई मुख्यमंत्री अपने-अपने हवाई जहाज़ों में लदकर गए थे । कमोबेश ऐसी ही जम्बूरी गुवाहाटी में हिमंता विषसरमा के शपथ ग्रहण के समय हुई। छोटे वाले भी बड़ों से कम नहीं दिखने पर आमादा है : मध्यप्रदेश में एक अदने से पद मप्र पाठ्य पुस्तक निगम के नवनियुक्त अध्यक्ष अपना पदभार ग्रहण करने के लिए उज्जैन से 700 कारों का विशाल काफिला लेकर भोपाल पहुंचे।

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इन तमाशों से निबटने के बाद, विदेश यात्राएं न करने की हिदायत देने वाले प्रधानमंत्री जी स्वयं विदेशी तमाशे देखने के लिए 15 मई से 5 देशों — संयुक्त अरब अमीरात, स्वीडन, नीदरलैंड, नॉर्वे और इटली — के भ्रमण के लिए निकल रहे हैं। यह ‘पर उपदेश कुशल’ होने भर का मामला नहीं है। यह उस नए इंडिया का मुजाहिरा है जिसमे संकट का बोझा उठाने का ‘कर्तव्य सर्वोपरि’ नारा सिर्फ जनता के लिए होता है, हुक्मरानों के लिए नहीं। यह पिछले 12 वर्षों में नागरिक को प्रजा में बदलने के तेजी से किये गए प्रयत्नों का अगला चरण है। आम जन के प्रति तिरस्कार और अवज्ञा भाव का भौंडे से और अधिक विद्रूप होते जाना है। मीडिया पर सम्पूर्ण प्रभुत्व कायम करने के बाद किसी भी तरह की आलोचना या समीक्षा या जवाबदेही से अभयदान मिलने के चलते उपजी निर्लज्जता का चरम है। ढीठता इतनी है कि कल तक खुद किसी तरह की कमी नहीं है, कोई संकट नहीं है, के गाल बजाने के बाद आज अचानक कोरोना जैसे संकट में पहुँच जाने की सफाई भी नहीं दी जा रही। हास्यास्पदता इतनी है कि इधर प्रधानमंत्री कमी की दुहाई दे रहे हैं, उधर उन्हीं के पेट्रोलियम मंत्री पर्याप्त भंडार होने का दावा कर रहे हैं।

पहली बात तो यह कि जिस आपदा की बात की जा रही है, वह आई नहीं है, ट्रम्प की घुड़कियों में आकर बाकायदा बुलाई गयी है। सबसे पुराने और भरोसेमंद देश ईरान से आने वाले तेल को खरीदना बंद किया, जो ईरान से सीधे भारत तक आने वाली पाइप लाइन डाली जाने वाली थी, उसे अधबीच में रोक दिया गया। अगली घुड़की में रूस से मिलने वाले सस्ते तेल की खरीद भी रोक दी। भारत के रासायनिक खाद बनाने वाले कारखानों के लिए अप्रैल में 60,000 टन रूसी तरल गैस — एलएनजी — लेकर आ रहे जहाज को बीच में ही रोक दिया। इधर मोदी किसानों से खाद और उर्वरक का उपयोग कम करने का आह्वान करके उनकी खेती को आदिम युग में पहुंचा रहे हैं, उधर कुनपेंग’ नाम का टैंकर अभी भी समंदर में भटक रहा है। दूसरी और उतनी ही अहम बात तेल के सुरक्षित भंडारण के मामले में अदूरदर्शिता और दिवालियापन की है। दुनिया जानती है कि तेल अर्थव्यवस्था के पहिये को चलाने का सबसे महत्वपूर्ण अवयव है। सारे देश पर्याप्त मात्रा में इसे सहेज कर रखते हैं। चीन के पास लगभग 140 करोड़ बैरल का भण्डार है। यह अमेरिका, जापान और कई यूरोपीय देशों की कुल संयुक्त क्षमता से भी अधिक है। इसमें से लगभग 36 करोड़ बैरल सरकारी और 100 करोड़ बैरल राष्ट्रीय तेल कंपनियों के पास है। इसके बाद अमरीका का नम्बर आता है, जिसके पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा भंडार है, जिसकी क्षमता लगभग 41.3 करोड़ बैरल है। जापान करीब 26.3 करोड़ बैरल के साथ तीसरे स्थान पर है। यूरोपीय देशों के पास कुल मिलाकर लगभग 17.9 करोड़ बैरल का भंडार है। इस सबमें भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, की स्थिति क्या है? उसकी रणनीतिक तेल भंडार क्षमता मात्र 3.91 करोड़ बैरल की है। यह क्षमता दक्षिण कोरिया जैसे देश की 7.9 करोड़ बैरल से आधी से भी कम है। मार्च 2026 की स्थिति में ये भंडार भी लगभग 64% ही भरे हुए हैं। अपनी इस पूरी क्षमता पर, भारत का रणनीतिक रिजर्व केवल लगभग साढे नौ दिनों की राष्ट्रीय खपत को पूरा कर सकता है। पिछले 12 वर्षों में अडानी और अम्बानी इधर तेल खरीद कर उधर दुनिया भर में बेचते रहे, इसके इंतजाम तो किये जाते रहे, मगर देश की अपनी भण्डारण क्षमता बढाने की तरफ ध्यान नहीं दिया गया। यह अनायास हुई चूक या अनदेखी नहीं है – यह कॉर्पोरेट हिमायती नीतियों का नतीजा है। बजाय इसकी जिम्मेदारी लेने के अब सारा बोझ जनता पर लादा जा रहा है।

सभी से घर से काम – वर्क फ्रॉम होम – करने की बात कहकर प्रधानमन्त्री मोदी ने यह साबित कर दिया है कि उन्हें काम क्या होता है, इसका रत्ती भर ज्ञान नहीं है। इस देश का 95 फीसदी से अधिक काम मोबाइल या इन्टरनेट से नहीं सीधे हाथों से औजारों का इस्तेमाल करके किया जाता है। सशरीर उपस्थिति के बिना न उत्पादन संभव है, न किसी भी तरह का निर्माण मुमकिन है। रोजमर्रा की जिन्दगी की जरूरतों के छोटे-छोटे लगने वाले सब्जी, दूध, किराना जैसे काम भी घर बैठे नहीं होते। विडियो कांफ्रेंसिंग और ऑनलाइन मीटिंगों से देश की अर्थव्यवस्थाएं नहीं चलती। मोदी ने कोविड काल का उदाहरण तो दिया, मगर यह बताना भूल गए कि उस दौरान इस देश के करीब 15 करोड़ लोगों का काम-धंधा बंद हुआ था। इनमें से करीब एक-तिहाई का फिर दोबारा कभी शुरू ही नहीं हुआ। अपनी सरकार की अमरीका भीरुता और चौपट विदेश नीति से उपजे संकट से उबरने के लिए वे जिस तरह की दवा लेकर आये हैं, वह बीमारी से भी ज्यादा जानलेवा है। एक साल तक सोना न खरीदने की उनकी ‘सलाह’ अकेले ही देश के 50 लाख लोगों के रोजगार को चौपट करने और सोने के दुकानदारों को कभी न उबर पाने वाले कर्ज के फंदे में जकड़ने की ताब रखती है। इसी तरह की बेतुकी बात किसानों से खाद और उर्वरक का इस्तेमाल बंद कर प्राकृतिक खेती की ओर लौटने की है। इससे जाहिर होता है कि श्रीमान को न तो इस देश की खेती के बारे में कुछ पता है, न ही इन्हें पड़ोसी देश श्रीलंका की प्राकृतिक खेती के ऐसे ही मूर्खतापूर्ण प्रयोग के विनाशकारी परिणामों की याद है。
लेकिन उन्हें यह भी पता है कि उनका सप्तम सुर में दिया नुस्खा एक बहुत बड़े असंतोष को जन्म दे सकता है। इसीलिए वे अंग, बंग, कलिंग, सूर्योदय और पूर्वोदय की तुकबन्दी और मुस्लिम लीग की सरकार में मंत्री रहे श्यामाप्रसाद मुखर्जी के कारनामों की कल्पित कहानियों और साम्प्रदायिक नफरती विषाक्तता से भरे अपने भाषणों में मजदूरों की हड़तालों को कोसना नहीं भूलते। इन हड़तालों से निबटने के लिए इनके नेताओं पर निगाह रखने और ऐसे मामलों में साथ देने के लिए न्यायपालिका तक का आह्वान करते हैं। वामपंथ के खत्म हो जाने का मुगालता पालते हैं。

समस्या की जड़ यह है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री जी ने जब खुद के नॉन-बायोलॉजिकल, मतलब धरा पर सीधे अवतरित होने का एलान किया, तो अनेक दिलजलों ने उनकी बात नहीं मानी। जुर्रत यहाँ तक की कि मजाक उड़ाने का दुस्साहस कर दिया। बस तब से ही, अपनी सारी ऊर्जा लगाकर उसे मनवाने के लिए जुटे हुए हैं। इस मकसद को वे हासिल कर पायें या न कर पायें, एक बात तो उन्होंने साबित कर दी है कि वे अपनी मिसाल आप हैं। वे अपने से पहले के अपनी मिसाल आप कहे और माने जाने वालों – नीरो, तुगलक और मैरी एंटोईनेट — से भी आगे के हैं। उनके परिवर्धित और संवर्धित संस्करण हैं। इन तीनों ने अपने शिगूफों से अपने अपने देशों की जनता का जो कल्याण किया था, वह इतिहास में दर्ज है。

(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: ‘त्याग’ का एकतरफा बोझ और ‘पर उपदेश कुशल’ शासन प्रणाली

बादल सरोज जी का यह आलेख आधुनिक भारतीय राजनीति के उस सबसे विचलित करने वाले दोहरेपन को रेखांकित करता है, जहाँ हुक्मरान जनता से ‘त्याग’ और ‘बलिदान’ की उम्मीद करते हैं, लेकिन खुद ‘राजाओं’ जैसी जीवनशैली जीते हैं। प्रधानमंत्री द्वारा देश की जनता को ‘वर्क फ्रॉम होम’, कम तेल खपत और सोना न खरीदने की ‘सप्तपदी’ हिदायतें देना एक बात है, लेकिन उसी हिदायत के 24 घंटे के भीतर 100 से अधिक वाहनों के काफिले के साथ रोड शो करना, और अपने 20 मुख्यमंत्रियों को चार्टर्ड उड़ानों से शपथ ग्रहण समारोहों में भेजना, ‘सुशासन’ नहीं बल्कि ‘संवैधानिक अहंकार’ (Constitutional Arrogance) का प्रतीक है। यह उस ‘मैरी एंटोइनेट’ मानसिकता की याद दिलाता है जो ज़मीनी हकीकत से पूरी तरह कटी हुई है। जब देश का 95% वर्कफोर्स असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) में दिहाड़ी मज़दूरी, खेती या छोटी दुकानदारी करता है, तो ‘वर्क फ्रॉम होम’ का उनका सुझाव उनकी ज़मीनी अनभिज्ञता (Ground Ignorance) का सबसे बड़ा प्रमाण है।

रणनीतिक तेल भंडार: एक राष्ट्रीय सुरक्षा विफलता
आलेख में भारत के ‘रणनीतिक तेल भंडार’ (Strategic Petroleum Reserve – SPR) की जो तुलना चीन और अमेरिका से की गई है, वह किसी भी देशभक्त नागरिक को डराने के लिए काफी है। जब चीन के पास 140 करोड़ बैरल और एक छोटे से देश दक्षिण कोरिया के पास 7.9 करोड़ बैरल का रिज़र्व है, तो 140 करोड़ की आबादी वाले भारत के पास महज़ 3.91 करोड़ बैरल (केवल 9.5 दिन की खपत) का रिज़र्व होना एक भयानक राष्ट्रीय विफलता है। पिछले 12 वर्षों में जब वैश्विक तेल की कीमतें ऐतिहासिक रूप से नीचे थीं (विशेषकर कोविड काल में), तब सरकार ने इस बुनियादी ढांचे को विकसित करने के बजाय कॉरपोरेट्स को रियायतें देने पर अधिक ध्यान दिया। आज जब अमेरिका के दबाव में भारत ने ईरान और रूस (जिसका 60,000 टन LNG का जहाज़ रोक दिया गया) से सस्ता तेल लेना बंद कर दिया है, तो इसका खामियाजा आम जनता को ‘कमर्शियल सिलेंडर’ के बढ़े हुए दामों के रूप में चुकाना पड़ रहा है। ‘विदेशी दबाव’ के सामने घुटने टेकने की इस नीति को ‘कर्तव्य सर्वोपरि’ के झूठे राष्ट्रवाद से ढंकने की कोशिश की जा रही है।

श्रीलंका जैसी ‘प्राकृतिक खेती’ की ओर धकेलने की साज़िश?
आलेख का एक और बेहद गंभीर बिंदु ‘प्राकृतिक खेती’ (Natural Farming) से जुड़ा है। किसानों को अचानक रासायनिक खादों (Fertilizers) का उपयोग बंद करने का निर्देश देना श्रीलंका की उस आर्थिक बर्बादी (Sri Lankan Economic Crisis 2022) की याद दिलाता है, जहाँ रातों-रात जैविक खेती लागू करने से देश में खाद्यान्न संकट पैदा हो गया था। भारत का किसान कोई ‘प्रयोगशाला का चूहा’ नहीं है जिस पर इस तरह के सनक भरे फैसले थोपे जाएं। इसी तरह, ‘सोना न खरीदने’ का फरमान सीधे तौर पर 50 लाख स्वर्ण शिल्पियों (Goldsmiths) और छोटे सर्राफा व्यापारियों के रोज़गार पर हमला है। ‘ताज न्यूज़’ का यह स्पष्ट मानना है कि आर्थिक और विदेश नीतियों की विफलता का ठीकरा ‘जनता के कर्तव्यों’ के नाम पर नहीं फोड़ा जा सकता। जब सरकार खुद को ‘नॉन-बायोलॉजिकल’ (अवतार) मानने के अहंकार से ग्रस्त हो जाए, तो आम जनता को ‘नागरिक’ से घटाकर ‘प्रजा’ बनने में देर नहीं लगती। यह ‘देश बंदी’ की तैयारी नहीं, बल्कि एक ‘आर्थिक आत्मदाह’ (Economic Suicide) की पटकथा है, जिसके खिलाफ एक सजग लोकतांत्रिक चेतना का जागना अत्यंत आवश्यक है।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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