छुट्टी पर प्रधानमंत्री, मौज-मस्ती में मोदी! देश के ज्वलंत सवालों के बीच ‘फोटोशूट’ की राजनीति पर बादल सरोज का तीखा प्रहार

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Article Desk, tajnews.in | Wednesday, May 13, 2026, 12:01:45 AM IST

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Badal Saroj Writer
बादल सरोज
संपादक, ‘लोकजतन’
संयुक्त सचिव, अखिल भारतीय किसान सभा
अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव और ‘लोकजतन’ के संपादक बादल सरोज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली, उनके बहुचर्चित ‘फोटोशूट’ और निरंतर हो रही विदेश यात्राओं पर एक बेहद प्रखर आलेख लिखा है। यह लेख वैश्विक संकटों के बीच देश के मुखिया की प्राथमिकताओं और ‘इवेंट मैनेजमेंट’ की राजनीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
HIGHLIGHTS
  1. वैश्विक और आर्थिक संकटों के बीच प्रधानमंत्री की ‘छुट्टियों’ और ‘फोटोशूट’ पर बादल सरोज का तीखा कटाक्ष।
  2. बंगाल चुनाव से लेकर सिक्किम और वाराणसी तक, पीएम के परिधानों और कैमरा-प्रेम पर उठाए गए गंभीर सवाल।
  3. 99 विदेश यात्राओं और 66 अरब रुपये के भारी-भरकम खर्च के बाद भी कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की स्थिति को लेकर जताई चिंता।
  4. ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय: जब देश ज्वलंत मुद्दों से जूझ रहा हो, तब नेतृत्व की जवाबदेही और ‘इमेज बिल्डिंग’ के बीच का फासला समझना जरूरी है।

छुट्टी पर प्रधानमन्त्री, मौज मस्ती में मोदी!

— आलेख : बादल सरोज

जितनी फुर्सत में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं, उतनी निश्चिन्तता और मौजमस्ती में दुनिया का शायद ही कोई राष्ट्र प्रमुख हो।

पूरी दुनिया फिक्रमंद हुई पड़ी है, ट्रम्प और नेतन्याहू के थोपे गए ईरान युद्ध और लेबनान हमलों के प्रभावों और नतीजों का आंकलन कर रही है। होरमुज़ जलडमरूमध्य की पहले बंदी और अब अमरीकी नाकेबंदी के निहितार्थ को समझने में लगी हैं। उनके असरात से अपने-अपने देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बचाने और संभालने के लिए रास्ते ढूँढने में जुटी है। आर्थिक जगत की वैश्विक संस्थाएं भारत की आर्थिक गति-प्रगति को लेकर सवाल पर सवाल खड़े कर रही हैं, जिनके जवाब देने और अगर वे सही हैं, तो जरूरी दुरुस्ती और सुधार करने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय उनका इन्तजार कर रहा है, मगर लगता है देश के प्रधानमंत्री छुट्टी पर हैं और उस पद पर विराजे नरेंद्र मोदी वीतरागी, तटस्थ, निस्पृह भाव के साथ पूरी बेफिक्री से मौजमस्ती और सैर सपाटे में मशगूल हैं।

उनकी पिछले कुछ दिनों की ‘व्यस्तताओं’ पर ही नजर डालने से बात और साफ़ हो जाती है। जब केंद्र सरकार भारतीय नागरिकों के लिए किसी भी मार्ग से ईरान की यात्रा न करने की हिदायत जारी कर रही थी, भारत के झंडे लगे जहाज होरमुज़ में असमंजस में खड़े थे, अमरीकी नाकेबंदी ने उनकी सलामती खतरे में डाल दी थी, ऐसे में प्रधानमंत्री कहाँ थे? वे बंगाल चुनाव प्रचार के दौरान हुगली नदी में नाव में सचमुच की सैर करते हुए एक महंगे कैमरे से न जाने किसकी तस्वीरे खीचने का अभिनय कर रहे थे। ऐसा करते हुए हुए आठों आयामों पर तैनात अपने फोटोग्राफरों से अपनी ही तस्वीर उतरवा रहे थे।

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इस फोटोशूट से फारिग होते ही वे सीधे गंगटोक जा पहुंचे और सिक्किम के 50वें राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर स्थानीय बच्चों के साथ स्पोर्ट्स जैकेट और जूतों में फुटबॉल खेलते हुए तस्वीरें खिंचवाई। उनकी सरकार की विज्ञप्तियों में इसे ऊर्जा से भरे मोदी का अवतार बताया गया। यहाँ से उड़कर वे अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी (बनारस) में अवतरित हुए, जहां वे अब तक 5 बार गंगा आरती में भाग लेते हुए फोटो भी खिंचवा चुके हैं और फिल्म भी बनवा चुके हैं। इस बार यहाँ दो दिन तक रुककर अनेक विशेष फोटो शूट करवाए और वीडियो बनवाये। महिलाओं के सम्मेलन में पहले भाषण देते हुए, फिर उनसे चर्चा करते हुए फोटो शूट का अगला चरण पूरा किया।

अगले दिन बनारस में ही 14 किलोमीटर लंबा रोड शो कर दिखाया। इस रोड शो में फूलों से सजी खुली गाड़ी में उनकी तस्वीरें और काशी की गलियों में लोगों का अभिवादन स्वीकार करते हुए उनके फोटोशूट सामने आए। रोड शो के समापन पर उन्होंने काशी विश्वनाथ के मन्दिर में हाजिरी लगाई।

मंदिर परिसर से बाहर निकलते समय उन्होंने सबसे मारक फोटो शूट कराया। शंकर के वेश में श्रृंगार करके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू लेकर तस्वीरें खिंचाई और इन्हें “भक्ति और शक्ति” के प्रतीक के रूप में अपने ही ट्विटर (अब एक्स) हैंडल से दुनिया भर को दिखाया भी। लगता है, यहाँ थोड़ी सी चूक हुई है : शिव का वेश धरते हुए डमरू और त्रिशूल तो थाम लिया, मगर गले में सांप पहनना भूल गए।

इसके पहले असम के डिब्रूगढ़ के एक चाय बागान में काम करने वाली महिलाओं के साथ फोटो सेशन किया जा चुका था। नित नए, कई बार एक ही दिन में अनेक नए-नए परिधान में फोटो खिंचाने के इस चरण की पूर्णाहुति विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद भाजपा कार्यालय में हुए उत्सव में हुई। यहाँ उन्होंने पारंपरिक बंगाली धोती और पहनावे में तस्वीरें खिंचवाई। इन सबके पहले वे अंडमान निकोबार की सैर कर आये थे और एक भरा-पूरा फोटो अलबम बनवा लाये थे। प्रधानमंत्री के सैर-सपाटे की यह अभी-अभी की ताज़ी-ताज़ी झलकें हैं। अपने 12 वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने कितने दिन इस तरह के कामों के लिए निकाले हैं, इसका विवरण उनकी आधिकारिक साईट में भी नहीं समा पाया है।

फोटो शूट करवाने की उनकी आसक्ति कितनी अधिक है, यह बात 14 फरवरी 2019 को हुए पुलवामा आतंकी हमले के दौरान देखी भी जा चुकी है और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल एवं प्रशासक सतपाल मलिक द्वारा दर्ज भी की जा चुकी है। मलिक ने बताया था कि जब पुलवामा पर हमला हुआ था, उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में डिस्कवरी चैनल के लिए एक शूटिंग में व्यस्त थे। यह काम उन्हें इतना जरूरी लगा था कि दोपहर 3 बजकर 10 मिनट पर इस आतंकी हमले की खबर आने के बाद भी वे शाम करीब 6:30 बजे तक बोट सफारी और फोटोशूट करवाते रहे थे।

इन मौज मस्ती की यात्राओं के अलावा इसी दौरान बाकी का समय मोदी जी ने उस काम – चुनाव अभियान – में लगाया, जिसमें वे सिद्धहस्त और पारंगत दोनों हैं। हाल में निबटे 2026 के पांच राज्यों — पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी — के विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुल 23 चुनावी रैलियां और रोड शो किए। मोदी का सबसे अधिक ध्यान पश्चिम बंगाल पर रहा, जहाँ उन्होंने सबसे ज्यादा 18 रैलियां और रोड शो किये। असम में 2, तमिलनाडू, केरल और पूदुचेरी में एक-एक रैली की।

चुनावी आमसभाओं में घनगरज उनका प्रिय शगल रहा है और यह लगातार बढ़ता जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कुल 206 रैलियां, रोड शो और जनसभाएं कीं थीं। यह संख्या 2019 में की गई 142 रैलियों की तुलना में 64 अधिक थी, जो एक नया रिकॉर्ड है। प्रायोजित टीवी और मीडिया में दिए 80 से अधिक इंटरव्यूज इसके अलावा हैं। विदेशी यात्राओं की आधिकारिक सूची पीएमओ की वेबसाइट पर नियमित रूप से अपडेट की जाती है, लेकिन घरेलू यात्राओं के कुल दिनों का नवीनतम आंकड़ा सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध नहीं है। सिर्फ 2018 तक की रिपोर्ट है, जो 313 दिनों तक मोदी के दिल्ली में न रहने का उल्लेख करती है。

अगर देश का प्रधानमंत्री यही सब कर रहा है, तो फिर प्रधानमंत्री का काम कौन कर रहा है? अगर यही मौज मस्ती, फोटो बाजी, पर्यटन और चुनावी रैलियाँ ही प्रधानमंत्री का काम है, तो सवाल उठता है कि वो कौन है, जो असल में वह काम कर रहा है, जिसके लिये प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है। देश के सामने दरपेश सवालों पर कैबिनेट की मीटिंग करके रास्ते निकालने और जरूरी कदम उठाने का काम कौन कर रहा है – और अगर कर रहा है, तो किस अधिकार से कर रहा है? ध्यान रहे, ये वही प्रधानमंत्री हैं, जिनके बारे में उनकी भक्त मंडली दावा करती है कि वे कभी छुट्टी नहीं लेते, कि वे 18-18 घंटे काम करते हैं!!

यह सिर्फ देश के भीतर के पर्यटन भर का मामला नहीं है, मोदी के नाम भारत के सबसे अधिक विदेश यात्रा करने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड भी है। अभी तक वे 99 अंतर्राष्ट्रीय यात्राएं कर चुके हैं, जिसमें वे 79 से अधिक देशों में, कईयों में दो-दो, तीन-तीन बार भी गए। वर्ष 2014 में पदभार ग्रहण करने के बाद से वे पृथ्वी के 7 महाद्वीपों में से 6 महाद्वीपों की यात्रा कर चुके है। इस मामले में उनका जो रिकॉर्ड है, वह दुनिया के किसी भी राजनेता के नाम नहीं होगा।

सातवें महाद्वीप अन्टार्कटिका भी वे जाते-जाते रह गए। अप्रैल 2025 में, चिली – जिसे अंटार्कटिका का प्रवेश द्वार माना जाता है — के राष्ट्रपति ने उन्हें अंटार्कटिका का दौरा करने के लिए आमंत्रित किया था, इसलिए यह मानकर चला जाना चाहिए कि वे इस महाद्वीप को भी जाए बिना नहीं छोड़ेंगे, वहां भी फोटो शूट करवाकर ही मानेंगे।

इसी महीने मई 2026 में वे चार यूरोपीय देशों — नॉर्वे, स्वीडन, नीदरलैंड और इटली — की यात्रा पर जाने वाले हैं। यह यात्रा 15 से 20 मई के बीच निर्धारित है, जो यूरोपीय संघ के साथ हालिया समझौते के बाद उनकी पहली यूरोप यात्रा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक उनकी अब तक की विदेश यात्राओं पर कोई 66 अरब रुपयों का खर्चा हो चुका है।

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर खर्च ज्यादा मायने नहीं रखता। मायने वह हासिल रखता है, जो इन यात्राओं के बाद हुआ होता है। संसदीय लोकतंत्र में हर विदेश यात्रा के बाद प्रधानमंत्री संसद के जरिये पूरे देश को यह बताया करते थे, उस यात्रा में उन्होंने क्या किया, किन मुद्दों पर चर्चा हुई, देश को क्या मिला। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से संसद को सूचित किये जाने की यह प्रथा भी समाप्त हो गई है।

अब मास्को से लौटते हुए बीच रास्ते में अचानक फ्लाइट लाहौर की तरफ मुड़ जाती है और भारत का प्रधान मंत्री, बिन बुलाये मेहमान के रूप में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की नवासी की शादी में बनारसी साड़ियों और पठानी सूट्स का भात लेकर पहुँच जाता है। उस यात्रा में क्या हुआ, यह किसी को नहीं पता चलता। पाकिस्तान और दूसरे देशों के मीडिया से पता चलता है कि चौंकाने वाली इस कूटनीति के पीछे सौजन्य कम था, विदेश नीति और भी कम थी, अडानी की बिजली और जिंदल की स्टील फैक्ट्री का लेना-देना कुछ अधिक था। सिर्फ यहीं भर नहीं, अधिकाँश विदेश यात्राओं में प्रधानमंत्री के दल में अडानी की मौजूदगी और ऑस्ट्रेलिया से मोजाम्बिक तक हुए अडानी के धंधे से जुड़े करार इन यात्राओं की ‘उपलब्धियों’ के बारे में बता देते हैं।

विदेशों की यात्राएं उन देशों के साथ मित्रता को गाढ़ी और मजबूत करने के लिए होती हैं। नए व्यापारिक अनुबंधों और परस्पर बढ़ते-बढाते सांस्कृतिक संबंधों के लिए होती हैं। नए गठबंधन बनाने के लिए होती हैं। संकट में एक-दूसरे का साथ देने के वादे करने के लिए होती हैं। इतनी सारी, रिकॉर्ड तोड़ विदेश यात्राओं के बाद हासिल क्या हुआ है, यह आज पूरी दुनिया में भारत की स्थिति को देखकर पता चल जाता है。

एक भी पड़ोसी देश ऐसा नहीं है, जिसका नाम लेकर यह बताया जा सके कि उसके साथ हमारे रिश्ते सामान्य हैं। परम्परा से जिन देशों के साथ दोस्ती और विश्वास बना रहा, वह नेपाल और बांग्ला देश तक आज हमारे साथ नहीं हैं। कम से कम उस तरह तो बिलकुल नहीं है, जिस तरह से मोदी सरकार के आने के पहले हुआ करते थे।

मोदी जी द्वारा अपनी यात्राओं से लगभग पूरी दुनिया नाप लेने के बाद आज वैश्विक परिदृश्य में भारत अब तक के सबसे मुश्किल मुकाम पर खडा हुआ है। न अपनी मर्जी से तेल देख पा रहा हैं, न उसकी धार देख पा रहा है। अपने विश्वस्त और सदा-सर्वदा साथ देने वाले मित्र देशों के साथ अमरीका और इजरायल जैसे दुष्ट देशों द्वारा किये जा रहे सरासर गैरकानूनी बर्ताव पर मुंह खोलने तक का साहस नहीं कर पा रहा है। अपनी खुद की संप्रभुता पर होने वाली टीका-टिप्पणियों तक का जवाब नहीं दे पा रहा है。

इतना डरा हुआ है कि ब्रिक्स जैसे जिन साझे मंचों का अध्यक्ष है, उनमें भी नेतृत्वकारी भूमिका तक नहीं निबाह पा रहा है। इसका मतलब यही हुआ कि ज्यादातर विदेश यात्राएं या तो पर्यटन बनकर रह गयीं या अडानी-अम्बानी के व्यावसायिक हितों का माध्यम या दोनों ही बन कर रह गयीं।

कुल जमा यह कि भारत का प्रधानमंत्री अनुपस्थित है। उसे जहां होना चाहिए, वहां छोड़कर बाकी सब जगह वह उपस्थित है : कभी सैर सपाटों में, कभी फोटो शूट में, अक्सर चुनावी रैलियों में और बाकी बचे समय में दुनिया घूमने में व्यस्त है। उसके पास उसी देश के बारे में कुछ अच्छा करने का वक़्त नहीं है, जिसका वह निर्वाचित मुखिया है। और ऐसा होना कतई अच्छी बात नहीं है。

(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)

ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: ‘पीआर’ की राजनीति और जवाबदेही का गहराता संकट

बादल सरोज जी का यह आलेख आधुनिक भारतीय राजनीति के उस सबसे विचलित करने वाले पहलू को उजागर करता है, जिसे ‘इमेज मैनेजमेंट’ (Image Management) या पीआर-संचालित (PR-driven) शासन कहा जाता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में निर्वाचित नेता की सबसे बड़ी ताकत उसकी जवाबदेही (Accountability) और ज़मीनी हकीकत से जुड़ाव होता है। लेकिन जब नेतृत्व ‘गवर्नेंस’ (Governance) से अधिक ‘इवेंट मैनेजमेंट’ (Event Management) पर अपना ध्यान केंद्रित करने लगे, तो आम जनता के असली मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। आज के दौर में राजनीति एक ‘विजुअल स्पेक्टेकल’ (Visual Spectacle) बन गई है, जहाँ कैमरे का एंगल, परिधानों का चुनाव और ‘परफेक्ट फ्रेम’ की चाहत ने गंभीर नीतिगत बहसों की जगह ले ली है।

प्राथमिकताओं का भटकाव और ‘ऑप्टिक्स’ का मायाजाल:
लेखक ने बहुत ही सटीकता से रेखांकित किया है कि जब दुनिया युद्ध, आर्थिक मंदी या आंतरिक सुरक्षा जैसे गंभीर संकटों से जूझ रही हो, तब नेतृत्व का प्रतीकात्मक ‘फोटो-ऑप्स’ (Photo-ops) में व्यस्त रहना देश की जनता के भरोसे पर गहरी चोट है। पुलवामा हमले के समय जिम कॉर्बेट की घटना हो या फिर होरमुज़ जलडमरूमध्य के तनाव के बीच हुगली नदी में कैमरा-प्रेम, ये घटनाएं दर्शाती हैं कि ‘ऑप्टिक्स’ (Optics) यानी ‘दिखावा’ अब यथार्थ पर हावी हो चुका है। जब एक प्रधानमंत्री 18-18 घंटे काम करने का दावा करता है, लेकिन उसके एजेंडे में कैबिनेट की बैठकों से ज्यादा चुनावी रैलियां और रोड शो शामिल हों, तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि देश की शासन व्यवस्था का असल नियंत्रण किसके हाथों में है?

कूटनीतिक विफलताओं का आवरण:
आलेख में विदेश यात्राओं और उन पर हुए 66 अरब रुपये के भारी-भरकम खर्च का जो ज़िक्र किया गया है, वह कूटनीतिक मोर्चे पर एक बड़ा ‘रियलिटी चेक’ (Reality Check) है। विदेशी दौरों का महत्व केवल तभी है जब वे ज़मीनी स्तर पर देश के भू-राजनीतिक (Geo-political) और आर्थिक हितों को मजबूत करें। केवल ‘ग्लोबल अपीयरेंस’ (Global Appearance) या स्टेडियमों में बजने वाली तालियों से कूटनीतिक विफलताओं को नहीं ढका जा सकता। आज जब हमारे पारंपरिक पड़ोसी मित्र देश (जैसे नेपाल, मालदीव और बांग्लादेश) हमसे छिटक रहे हैं और विश्व पटल पर भारत एक रक्षात्मक (Defensive) मुद्रा में खड़ा दिखाई देता है, तो इन रिकॉर्ड-तोड़ यात्राओं की ‘उपलब्धियों’ पर सवाल उठना स्वाभाविक है। कॉर्पोरेट घरानों के व्यावसायिक हितों को विदेश नीति का आधार बना देना राष्ट्रहित के लिए एक खतरनाक प्रयोग है।

निष्कर्ष:
लोकतंत्र में संवाद कभी एकतरफा (Monologue) नहीं हो सकता। संसद में जवाबदेही से बचना और ‘मन की बात’ या प्रायोजित साक्षात्कारों तक सीमित रहना एक पारदर्शी शासन प्रणाली के लक्षण नहीं हैं। जब तक संसद और स्वतंत्र प्रेस के माध्यम से शासक वर्ग की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होती, तब तक ‘मौज-मस्ती’ और ‘पर्यटन’ के ये आरोप सत्ता के गलियारों में गूंजते रहेंगे। असली ‘राष्ट्रवाद’ महज़ तस्वीरों और परिधानों में नहीं, बल्कि उन ठोस और संवेदनशील फैसलों में झलकता है जो देश के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति का जीवन बदल सकें। देश को एक ‘इवेंट मैनेजर’ की नहीं, बल्कि एक ‘राजनेता’ की आवश्यकता है जो संकट के समय कैमरे से दूर रहकर भी जनता के बीच मौजूद महसूस हो।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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