संपादकीय संदर्भ: भारतीय राजनीति में ‘जाति’ का अमरत्व और चुनावी चक्रव्यूह
भारतीय लोकतंत्र की यात्रा सात दशकों से अधिक लंबी हो चुकी है। जब देश आज़ाद हुआ था और संविधान लिखा जा रहा था, तब राष्ट्र निर्माताओं ने एक ऐसे आधुनिक और समतामूलक समाज का सपना देखा था, जहाँ ‘जाति’ और ‘धर्म’ की दीवारें टूट जाएंगी। डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि सामाजिक लोकतंत्र की नींव मजबूत न हो। उन्होंने सामाजिक न्याय के औजार के रूप में आरक्षण (Reservation) की वकालत की थी, जिसका मूल उद्देश्य सदियों से हाशिये पर खड़े समुदायों को मुख्यधारा में लाना था। यह एक उपचारात्मक कदम था, जिसे समय के साथ समाज के परिपक्व होने पर अप्रासंगिक हो जाना चाहिए था। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल विपरीत। आधुनिकीकरण, औद्योगीकरण और शिक्षा के प्रसार के बावजूद, भारतीय राजनीति में ‘जाति’ कभी खत्म नहीं हुई; बल्कि उसने अपना रूप बदल लिया और चुनाव जीतने की सबसे मज़बूत ‘करेंसी’ बन गई।
स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में कांग्रेस पार्टी ने ‘छाता राजनीति’ (Umbrella Politics) के ज़रिए एक बड़ा सामाजिक गठबंधन तैयार किया था, जिसमें ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम एक साथ थे। लेकिन 1960 के दशक में राम मनोहर लोहिया जैसे समाजवादी विचारकों ने “पिछड़ा पावे सौ में साठ” का नारा देकर इस वर्चस्व को चुनौती दी। यह वह समय था जब पहली बार ‘जाति’ को संख्या बल के आधार पर राजनीतिक हिस्सेदारी मांगने का वैचारिक आधार मिला। हालांकि, भारतीय राजनीति में जातिवाद का असली और सबसे बड़ा विस्फोट 1990 में हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने ‘मंडल आयोग’ (Mandal Commission) की सिफारिशों को लागू कर दिया। इसके तहत अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। इस एक फैसले ने उत्तर भारत की राजनीति का व्याकरण हमेशा के लिए बदल दिया।
मंडल आयोग के बाद के दौर में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, मायावती और कांशीराम जैसे क्षत्रपों का उदय हुआ। कांशीराम ने “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” का नारा देकर बहुजन राजनीति की नींव रखी। 2007 में मायावती द्वारा उत्तर प्रदेश में सोशल इंजीनियरिंग (दलित-ब्राह्मण गठजोड़) के दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना इस बात का प्रमाण था कि भारतीय मतदाता विकास या विचारधारा से ज्यादा ‘जातीय अस्मिता’ और ‘सुरक्षा’ के नाम पर वोट करता है। दक्षिण भारत में यह प्रयोग बहुत पहले ही पेरियार और बाद में करुणानिधि के नेतृत्व में ‘द्रविड़ आंदोलन’ के रूप में सफल हो चुका था, जिसने सत्ता से सवर्ण वर्चस्व को उखाड़ फेंका था।
आज, जब हम 2026 में खड़े हैं, तो राजनीति में डिजिटल क्रांति और डेटा एनालिटिक्स (Data Analytics) का दौर है। राजनीतिक दल अब केवल मंच से जातियों के नाम नहीं लेते, बल्कि एक्सेल शीट्स (Excel Sheets) और बूथ-स्तरीय माइक्रो-मैनेजमेंट के ज़रिए हर जाति और उप-जाति का सटीक हिसाब रखते हैं। इसी बीच, ‘जातिगत जनगणना’ (Caste Census) की मांग ने भारतीय राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है। 2023 में बिहार सरकार द्वारा जारी किए गए जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों ने विपक्ष को ‘सामाजिक न्याय 2.0’ का एक नया हथियार दे दिया है। अब यह बहस छिड़ गई है कि क्या केवल जाति गिनना ही समाधान है या यह समाज को और अधिक टुकड़ों में बांटने की एक नई राजनीतिक चाल है? इसी गंभीर और चुभते हुए विषय पर वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल जी ने अपना 100% मूल और प्रखर आलेख लिखा है, जिसे बिना किसी बदलाव के नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है:
क्या भारत में चुनाव जीतने का असली पासपोर्ट आज भी जाति का प्रमाणपत्र है?
क्यों जाति गणना ?
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बृज खंडेलवाल
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क्या सचमुच भारत में चुनाव जीतने के लिए जाति का प्रमाण पत्र ही असली पासपोर्ट है। सवाल चुभता है, पर जवाब बहुतों को मालूम है। सच यह है कि हाँ, आज भी काफी हद तक यही हकीकत है। लोकतंत्र का मैदान खुला है, पर खेल के नियम अब भी पुरानी पहचानें तय करती हैं。
हमारे संविधान ने उम्मीद का दरवाजा खोला था। मंशा साफ थी। सदियों के अन्याय को तोड़ना था, बराबरी की राह बनानी थी। आरक्षण को एक अस्थायी सहारे की तरह सोचा गया था। जैसे टूटी टांग पर प्लास्टर। ठीक होते ही हट जाना चाहिए। संविधान सभा की बहसों में यह भावना बार बार झलकी। अनुच्छेद 15(4) और 16(4) ने पिछड़ों को आगे लाने का रास्ता दिया। पर समय सीमा तय नहीं हुई। शायद भरोसा था कि समाज खुद बदल जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार संकेत दिया कि यह व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं हो सकती। पर राजनीति ने इस भरोसे को धीरे धीरे अपनी जरूरत के हिसाब से ढाल लिया。
राजनीति की भाषा आदर्शों से नहीं, अंकों से चलती है। यहाँ दर्द भी गिना जाता है, उम्मीद भी तौली जाती है। जो एक पुल होना था, वह मोर्चा बन गया। जो एक उपचार था, वह पहचान बन गया। पढ़ा लिखा शहरी मतदाता भी इस जाल से बाहर नहीं निकल पाया। फर्क बस इतना है कि अब जाति की गणित और ज्यादा परिष्कृत हो गई है। डेटा शीट में दर्ज है। एक्सेल फाइल में सजी है। भावनाएं भी अब कैलकुलेट होती हैं。
शुरुआत में सोच कुछ और थी। सुधारकों ने इसे एक तेज सर्जरी की तरह देखा। एक ऐसा वार जो बराबरी का रास्ता साफ कर दे। लक्ष्य था कि जाति धीरे धीरे अप्रासंगिक हो जाए। पर जमीन पर आते ही कहानी बदल गई। राजनीति ने इस औजार को हथियार बना दिया। वोट बैंक की फैक्ट्री चल पड़ी। पहचानें संगठित हुईं। गुस्सा दिशा पा गया。
राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति को विचार दिया। उनका नारा पिछड़ा पावे सौ में साठ केवल शब्द नहीं था। यह सामाजिक संतुलन का खाका था। पर जैसे ही यह जमीन पर उतरा, वोट की भाषा में बदल गया। आदर्श पीछे छूट गए। गणित आगे आ गया。
फिर आया वह मोड़ जिसने देश की राजनीति की धुरी ही बदल दी। वी.पी. सिंह की सरकार ने 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं। अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण मिला। देश सड़कों पर उतर आया। विरोध हुआ। आत्मदाह तक हुए। सरकार गिरी। पर एक नया राजनीतिक युग जन्म ले चुका था। उत्तर भारत की राजनीति ने नई करवट ली। क्षेत्रीय दल उभरे। जाति अब सिर्फ पहचान नहीं रही, सत्ता की सीढ़ी बन गई。
इसी सीढ़ी पर चढ़कर मायावती ने 2007 में उत्तर प्रदेश में इतिहास रचा। दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम, कई धाराएं एक साथ आईं। 206 सीटों का बहुमत मिला। संदेश साफ था। जाति को जोड़कर भी सत्ता पाई जा सकती है। यह राजनीति का नया व्याकरण था。
दक्षिण भारत में कहानी का रंग अलग दिखता है, पर धागा वही है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने गैर ब्राह्मण राजनीति को संस्थागत रूप दिया। तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण दशकों पुराने सामाजिक समझौते की तरह है। सत्ता का चक्र वहीं घूमता है। कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समीकरण ने दशकों तक राजनीति की चाबी थामे रखी। एच.डी. देवेगौड़ा का उदय इसी गणित का नतीजा था。
आज चुनाव विचारों से कम, आंकड़ों से ज्यादा तय होते हैं। हर पार्टी के पास जाति का पूरा नक्शा है। किस सीट पर कौन भारी है, किसे टिकट देना है, किसे क्या वादा करना है। उत्तर प्रदेश इसका सबसे खुला उदाहरण है। यादव बहुल इलाके, दलित बहुल क्षेत्र, हर जगह अलग रणनीति। विचारधारा अक्सर परदे के पीछे चली जाती है। मंच पर जाति खड़ी रहती है。
कम्युनिस्टों ने वर्ग संघर्ष का सपना देखा था। लगा था कि आर्थिक बराबरी आएगी तो जाति खुद मिट जाएगी। पर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनके आंदोलन भी जातियों में बंट गए। केरल और पश्चिम बंगाल में कुछ सफलता मिली, पर जाति की छाया पूरी तरह कभी कभी नहीं हटी। भारतीय समाज में जाति रोजमर्रा का सच है। शादी से लेकर जमीन तक, रिश्तों से लेकर अवसर तक, हर जगह इसकी मौजूदगी है। वर्ग की लड़ाई, ठोस लाभ के सामने कमजोर पड़ गई。
आज की तस्वीर साफ है। शिक्षा बढ़ी है। शहर फैले हैं। नौकरियों का स्वरूप बदला है। पर जाति अब भी जिंदा है। क्योंकि यह सीधे लाभ से जुड़ी है। डिग्री के साथ साथ जाति का प्रमाण पत्र अब भी जरूरी है। राजनीति के लिए यह सोने की खान है। हर चुनाव से पहले नई मांगें उठती हैं। नए वादे किए जाते हैं। नया ध्रुवीकरण होता है。
कहानी यहीं नहीं रुकती। एक ही जाति के भीतर भी असमानता है। कुछ उप समूह सारे लाभ ले जाते हैं। बाकी पीछे छूट जाते हैं। यह एक चक्र है जो खुद को पोषित करता है। जाति वोट देती है। वोट सत्ता देता है। सत्ता जाति को बनाए रखती है。
अब सवाल यह नहीं कि आरक्षण सही है या गलत। सवाल यह है कि क्या यह साधन रहा या लक्ष्य बन बैठा। क्या हम मंजिल तक पहुंचे या रास्ते में ही डेरा डाल दिया。
जाति की गणना की मांग इसी उलझन से निकली है। 2023 में बिहार के सर्वेक्षण ने तस्वीर का एक हिस्सा दिखाया। पिछड़े और अति पिछड़े मिलाकर करीब 63 प्रतिशत निकले। अब केंद्र भी अगली जनगणना में जाति आंकड़े शामिल करने की तैयारी में है। यह डेटा नीति बनाने में मदद कर सकता है। पर खतरा भी उतना ही बड़ा है। अगर इसे केवल नए आरक्षण की मांग और नए विभाजन के लिए इस्तेमाल किया गया, तो दरार और गहरी होगी。
भारतीय लोकतंत्र आज भी एक नई भाषा की तलाश में है। एक ऐसा भरोसा जो जाति से ऊपर उठ सके। जब तक वह भाषा नहीं मिलती, मतपत्र पर जाति की स्याही सबसे गहरी रहेगी। यह स्याही आसानी से नहीं धुलेगी। पर इसे धोए बिना तस्वीर साफ भी नहीं होगी。
सवाल फिर वही खड़ा है। पासपोर्ट बदलना है या सिर्फ कवर। जवाब हमें ही लिखना है。
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