आर्टिकल Desk, Taj News | Saturday, April 18, 2026, 05:41:00 PM IST


एवं समाजसेवी, आगरा
संपादकीय संदर्भ: बलिया का वह ‘यंग तुर्क’ जिसने कभी समझौता नहीं किया
भारतीय राजनीति के पन्नों को जब भी पलटा जाएगा, तो उसमें एक ऐसा अध्याय हमेशा स्वर्ण अक्षरों में चमकता हुआ मिलेगा, जो किसी की दया, खैरात या चापलूसी से नहीं, बल्कि अपनी शर्तों, उसूलों और फौलादी इरादों से लिखा गया था। वह अध्याय है—देश के आठवें प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी जैसे छोटे से गांव में 17 अप्रैल 1927 को जन्मे चंद्रशेखर भारतीय राजनीति के ऐसे इकलौते ‘शेर’ थे, जिनकी दहाड़ से दिल्ली के तख्त हमेशा खौफ खाते थे। समाजवादी विचारधारा के पुरोधा आचार्य नरेंद्र देव के शिष्य रहे चंद्रशेखर ने अपने जीवन में जो भी मुकाम हासिल किया, वह अपने बागी तेवर और ज़मीनी संघर्ष के दम पर किया। आज जब राजनीति में अवसरवादिता और विचारधाराओं के पतन का दौर चल रहा है, तब डॉ. के.के. सिंघल द्वारा लिखा गया यह आलेख हमें उस दौर की याद दिलाता है जब राजनीति में ‘सम्मान’ और ‘सिद्धांत’ ही सबसे बड़ी पूंजी हुआ करते थे।

चंद्रशेखर की राजनीतिक यात्रा किसी भी आम नेता से बहुत अलग थी। उन्हें कांग्रेस के भीतर ‘यंग तुर्क’ (Young Turk) कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने उस दौर में इंदिरा गांधी जैसी शक्तिशाली नेत्री की नीतियों का मुखर विरोध करने का साहस दिखाया था। 1975 में जब देश पर आपातकाल (Emergency) थोपा गया, तो चंद्रशेखर कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) के सदस्य होने के बावजूद इंदिरा गांधी के इस तानाशाही कदम के खिलाफ खड़े हो गए। नतीजा यह हुआ कि उन्हें अपनी ही पार्टी की सरकार द्वारा मीसा (MISA) कानून के तहत गिरफ्तार कर पटियाला जेल में डाल दिया गया। जेल में बिताए उन दिनों ने उनके फौलादी जिगर को और मजबूत कर दिया।
इसके बाद 1983 का वह ऐतिहासिक वर्ष आया, जब देश को समझने और आम जनता के दर्द को करीब से महसूस करने के लिए चंद्रशेखर ने कन्याकुमारी से लेकर दिल्ली के राजघाट तक 4260 किलोमीटर लंबी ऐतिहासिक ‘भारत यात्रा’ (पदयात्रा) की। इस यात्रा ने पूरे देश की राजनीति में एक भूचाल ला दिया था। उनके पैरों के छालों ने देश के बुनियादी मुद्दों को सड़क से लेकर संसद तक गूंजने पर मजबूर कर दिया था।

1990 में जब वे देश के प्रधानमंत्री बने, तो वह दौर भारत के लिए आर्थिक रूप से सबसे चुनौतीपूर्ण था। देश का खजाना खाली था और दिवालिया होने का खतरा मंडरा रहा था। ऐसे संकट के समय में चंद्रशेखर ने देश की साख बचाने के लिए सोना (Gold) गिरवी रखने का कड़वा लेकिन बेहद साहसिक फैसला लिया था। यह फैसला कोई आम नेता नहीं ले सकता था। उनकी सरकार कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चल रही थी, लेकिन जब कांग्रेस नेता राजीव गांधी ने उन पर जासूसी कराने का बेबुनियाद आरोप लगाकर दबाव बनाने की कोशिश की, तो इस ‘बलिया के शेर’ ने बिना एक पल की देरी किए सत्ता को ठोकर मार दी। उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी को इस तरह त्याग दिया जैसे पैर की धूल हो, क्योंकि उन्होंने साफ कह दिया था कि “मैं किसी की दया या ब्लैकमेलिंग पर देश नहीं चला सकता।”
वैचारिक मतभेदों के बावजूद चंद्रशेखर के राजनीतिक रिश्ते कितने गहरे और मर्यादित थे, इसका सबसे बड़ा उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उनकी गहरी मित्रता थी। संसद के भीतर भले ही वे अलग-अलग खेमों में बैठते हों, लेकिन एक-दूसरे के प्रति उनका सम्मान अद्वितीय था। इसी पृष्ठभूमि में, प्रख्यात चिकित्सक डॉ. के.के. सिंघल ने नीचे अपने आलेख में संसद का वह किस्सा बयां किया है, जब अटल जी का अपमान करने वाले युवा नेताओं को चंद्रशेखर ने ऐसा सबक सिखाया था कि उनकी रूह कांप उठी थी। पढ़िए डॉ. के.के. सिंघल का यह 100% मूल और प्रामाणिक आलेख:

Pawan Singh
7579990777





