आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत बोले- दुनिया एक है, मानवता एक; धर्म और राष्ट्र के नाम पर भेदभाव खत्म करने की जरूरत

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख ने कहा- मनुष्य का सम्मान और उसकी स्वतंत्रता सर्वोपरि, भारत को दुनिया के सामने समरसता और सद्भाव का उदाहरण बनना चाहिए

राष्ट्रीय डेस्क, 🌐 tajnews.in | रविवार, 30 अगस्त 2026, 07:18:36 AM IST

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tajnews.in | नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने दुनिया में बढ़ते धार्मिक, सामाजिक और राष्ट्रीय विभाजनों के बीच मानवता, समरसता और सद्भाव पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि दुनिया एक है और मानवता भी एक है। हर मनुष्य का अपना सम्मान है और किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, भाषा या अन्य आधारों पर भेदभाव नहीं होना चाहिए

HIGHLIGHTS
  1. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत बोले—दुनिया एक है, मानवता एक; धर्म व जाति के नाम पर भेदभाव गलत।
  2. धर्म का मूल उद्देश्य लोगों को जोड़ना है बांटना नहीं, प्रचार का लक्ष्य सत्ता पाना नहीं होना चाहिए।
  3. सच्चा राष्ट्रवाद समर्पण से जुड़ा है, देश प्रेम का अर्थ अन्य देशों या नागरिकों से नफरत करना नहीं।
  4. भारत के पास दुनिया को एकता का संदेश देने की क्षमता, समाज में संवाद से दूर होंगी गलतफहमियां।

मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा और कार्य का मूल उद्देश्य समाज में एकता, समरसता और मानवता की भावना को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि मनुष्यों के बीच कृत्रिम विभाजन पैदा करने वाली सोच से ऊपर उठकर दुनिया को मानवता के आधार पर आगे बढ़ने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि संघ का विचार किसी पर अपनी बात थोपने का नहीं है, बल्कि समाज को बेहतर दिशा देने और लोगों को जोड़ने का है।

स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनाया अपना संविधान

मोहन भागवत ने कहा कि भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद अपना संविधान अपनाया और उसी के आधार पर देश की व्यवस्था आगे बढ़ी। संविधान देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार और सम्मान प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि भारत की मूल भावना विविधता में एकता की रही है। देश में अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं के लोग रहते हैं, लेकिन इन सभी विविधताओं के बावजूद भारत की पहचान एक साझा राष्ट्रीय चेतना से जुड़ी हुई है।

उनके अनुसार, यदि समाज में यह भावना मजबूत हो जाए कि हर व्यक्ति का सम्मान समान है, तो समाज में मौजूद अनेक प्रकार की दूरियां और संघर्ष अपने आप समाप्त हो सकते हैं।

धर्म का उद्देश्य लोगों को जोड़ना है, बांटना नहीं

मोहन भागवत ने कहा कि आज दुनिया में धर्म को काफी हद तक अनुशासन और जीवन पद्धति के रूप में परिभाषित किया जाता है। धार्मिक अनुशासन व्यक्ति को अपने जीवन में मर्यादा, नैतिकता और सही आचरण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि धर्म का मूल उद्देश्य समाज में विभाजन पैदा करना नहीं हो सकता। धर्म मनुष्य को बेहतर बनाने और समाज को जोड़ने का माध्यम होना चाहिए।

मोहन भागवत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति या समूह धर्म के नाम पर दूसरे लोगों को परेशान करता है, उनके साथ भेदभाव करता है या उन्हें अपमानित करता है, तो ऐसी सोच धर्म के वास्तविक उद्देश्य के विपरीत है।

उन्होंने कहा कि समाज में अलग-अलग विचार और मान्यताएं हो सकती हैं, लेकिन किसी भी विचार को मानने वाले व्यक्ति के सम्मान को कम नहीं किया जा सकता।

प्रचार का उद्देश्य सत्ता हासिल करना नहीं होना चाहिए

मोहन भागवत ने कहा कि जब भी कोई व्यक्ति या संगठन अपने विचारों का प्रचार करता है तो उसका उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि विचारों का प्रसार समाज के हित और मानवता की भलाई के लिए होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति प्रचार के माध्यम से दूसरे लोगों को यह कहने लगे कि केवल उसके पास ही सही रास्ता है और बाकी सभी गलत हैं, तो इससे समाज में टकराव और दूरी पैदा हो सकती है।

मोहन भागवत ने कहा कि संघ के दृष्टिकोण में प्रचार का अर्थ लोगों पर अपनी बात थोपना नहीं है। उद्देश्य समाज में संवाद बढ़ाना और लोगों को एक-दूसरे के करीब लाना होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति और समाज अपने भीतर झांकेंगे और दूसरों के प्रति पूर्वाग्रहों को छोड़ेंगे, तब अनेक गलत धारणियां अपने आप समाप्त होने लगेंगी।

संघ के बारे में गलत धारणियां दूर करने की जरूरत

मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समाज में कई प्रकार की धारणियां और पूर्वाग्रह मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि इनमें से कई धारणियां बिना संघ के कार्य और विचार को ठीक से समझे ही बना ली गई हैं।

उन्होंने कहा कि संघ किसी व्यक्ति को अपने विचार मानने के लिए मजबूर नहीं करता। संघ का उद्देश्य समाज में सेवा, अनुशासन, राष्ट्रभाव और सामाजिक एकता की भावना को मजबूत करना है।

मोहन भागवत के अनुसार, जब लोग किसी संस्था या विचारधारा को नजदीक से समझते हैं और उसके कार्यों को देखते हैं तो उनके मन में बनी कई गलत धारणियां दूर हो जाती हैं।

उन्होंने कहा कि संवाद की कमी कई बार गलतफहमियों को जन्म देती है। इसलिए समाज में विचारों के मतभेद के बावजूद संवाद जारी रहना चाहिए

सबसे पहले अपने लोगों से संवाद शुरू करने की जरूरत

मोहन भागवत ने कहा कि समाज में समरसता और सद्भाव को मजबूत करने का काम सबसे पहले अपने आसपास से शुरू किया जाना चाहिए। परिवार, पड़ोस, गांव, शहर और स्थानीय समाज के स्तर पर लोगों के बीच संवाद बढ़ाने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि यदि समाज का हर व्यक्ति अपने स्तर पर लोगों को जोड़ने का प्रयास करे तो इसका प्रभाव व्यापक स्तर पर दिखाई दे सकता है।

मोहन भागवत ने कहा कि समाज में बदलाव केवल सरकारों या बड़ी संस्थाओं के प्रयासों से नहीं आता। जब सामान्य लोग अपने व्यवहार और सोच में बदलाव लाते हैं तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है।

उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर संवाद बढ़ाने, गलतफहमियां दूर करने और लोगों के बीच विश्वास कायम करने से सामाजिक तनाव कम हो सकता है।

दुनिया को बदलने से पहले स्वयं में बदलाव जरूरी

मोहन भागवत ने कहा कि समाज और दुनिया में परिवर्तन लाने की शुरुआत व्यक्ति को स्वयं से करनी चाहिए। अक्सर लोग दूसरों की कमियां देखते हैं, लेकिन अपने व्यवहार और सोच पर ध्यान नहीं देते।

उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने भीतर मौजूद पूर्वाग्रहों, नफरत और गलत धारणाओं को समाप्त करने का प्रयास करता है, तभी समाज में वास्तविक बदलाव की शुरुआत होती है।

उन्होंने कहा कि यदि हम दूसरों से कुछ नहीं चाहते और अपने व्यवहार को सही करने का प्रयास करते हैं तो समाज में आपसी विश्वास बढ़ सकता है

मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया को बेहतर बनाने के लिए केवल भाषणों और विचारों की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत व्यवहार में बदलाव की भी जरूरत है।

राष्ट्र प्रेम से नफरत नहीं, सम्मान की भावना पैदा होनी चाहिए

मोहन भागवत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति के भीतर अपने देश के प्रति प्रेम होना स्वाभाविक है। लेकिन राष्ट्र प्रेम का अर्थ दूसरे देशों या उनके नागरिकों से घृणा करना नहीं होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हर देश को अपने राष्ट्र और संस्कृति पर गर्व करने का अधिकार है, लेकिन यह गर्व दूसरे लोगों के अपमान या उनके प्रति नफरत का कारण नहीं बनना चाहिए।

उनके अनुसार, सच्चा राष्ट्रवाद अपने देश के प्रति जिम्मेदारी, सेवा और समर्पण की भावना से जुड़ा होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने देश से प्रेम करता है तो उसे दूसरे देशों और वहां रहने वाले लोगों के सम्मान की भावना भी रखनी चाहिए।

भारत को दुनिया के सामने उदाहरण बनने की जरूरत

मोहन भागवत ने कहा कि भारत के पास दुनिया को एकता और समरसता का संदेश देने की क्षमता है। भारत लंबे समय से विविधताओं से भरा देश रहा है, जहां अलग-अलग भाषाएं, धर्म, परंपराएं और जीवन पद्धतियां मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि यदि इतनी विविधताओं के बावजूद भारत आपसी सम्मान और सद्भाव کے साथ आगे बढ़ता है तो यह पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है

मोहन भागवत ने कहा कि भारत का संदेश केवल आर्थिक या राजनीतिक शक्ति तक सीमित नहीं होना चाहिए। भारत को अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति के माध्यम से दुनिया को मानवता और सह-अस्तित्व का रास्ता भी दिखाना चाहिए।

हर मनुष्य का अपना सम्मान है

अपने विचारों के दौरान मोहन भागवत ने कहा कि प्रत्येक मनुष्य का अपना सम्मान है और किसी व्यक्ति के साथ उसकी पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए

उन्होंने कहा कि समाज की वास्तविक ताकत तभी बढ़ती है जब उसमें रहने वाले सभी लोगों को सम्मान और बराबरी की भावना मिले।

उन्होंने कहा कि दुनिया में बढ़ते संघर्षों और विभाजनों के बीच मानवता को केंद्र में रखने की जरूरत है।

मोहन भागवत के विचारों का मूल संदेश यही रहा कि समाज में बदलाव की शुरुआत व्यक्ति से होनी चाहिए। यदि लोग एक-दूसरे को धर्म, जाति, भाषा और अन्य पहचान से पहले एक इंसान के रूप में देखना शुरू कर दें, तो दुनिया की अनेक समस्याओं और दूरियों को कम किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि दुनिया को बेहतर बनाने की शुरुआत किसी दूसरे से नहीं, बल्कि स्वयं से होनी चाहिए। अपने भीतर मौजूद पूर्वाग्रहों को समाप्त कर और दूसरों के सम्मान को स्वीकार करके ही एक अधिक समरस और मानवीय समाज की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

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Pawan Kumar Singh Editor in Chief Taj News

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