जंतर मंतर खाली कराने के निहितार्थ

खबर शेयर कीजिए

राजधानी में विरोध प्रदर्शनों के दमन और नये स्थलों की अधिसूचना पर वरिष्ठ पत्रकार का तीखा राजनीतिक विश्लेषण

Article Desk, Taj News | Wednesday, October 14, 2026, 09:12:00 PM IST.

Taj News Logo
आर्टिकल डेस्क
Rajendra Sharma

राजेंद्र शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक, ‘लोकलहर’

विशेष स्तंभकार | 🌐 tajnews.in

जंतर मंतर खाली कराने के निहितार्थ

राजेंद्र शर्मा | 14 अक्टूबर 2026

इन नये प्रदर्शन स्थलों के अधिसूचित किए जाने से, जंतर-मंतर के पुलिस के बल पर शासन द्वारा कब्जाए जाने की जघन्यता कम नहीं हो जाती है। जंतर-मंतर का खाली कराया जाना, सिर्फ एक जगह का खाली कराया जाना नहीं है। यह जनतंत्र में प्रदर्शनों का बेदखल किया जाना है। यह लाठी के जोर से जनता की आवाज का बेदखल किया जाना है। यह जनतंत्र से जनता का ही बेदखल किया जाना है।

मोदी-शाह की जोड़ी चाहे तो इसके लिए अपने गाल बजा सकती है कि 10 अक्टूबर को और उसके बाद भी उसने जंतर-मंतर को प्रदर्शनकारियों से खाली रखा है। पिछले कई वर्षों से राजधानी में जनतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का केंद्र रहे जंतर-मंतर की, जो कि देश की सत्ता के मुख्य केंद्र, संसद तथा शासन के अधिष्ठान, प्रधानमंत्री कार्यालय समेत मंत्रालयों तथा केंद्रीय सचिवालय के बहुत ही नजदीक है, इस बार उसने ऐसी पक्की किलेबंदी की थी कि परिंदा भी पर नहीं मार सका। वैसे दिल्ली पुलिस की सारी ताकत के ऊपर से, देश के विभिन्न हिस्सों से जुटाए गए 40 हजार से ज्यादा अर्द्घ-सैनिक बलों तथा तरह-तरह की वाहनियों के जवानों की आक्रामक तैनाती के जरिए, राजधानी को पुलिस राज्य में तब्दील करने और वहां एक नये तरीके का पूरा लॉकडाउन थोपने के बावजूद, जंतर-मंतर पर परिंदे के भी पर नहीं मार पाने की यह शेखी भी शायद पूरी तरह से सही नहीं है। बेशक, सांकेतिक तरीके से सही, 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर की मोदीशाही की अभेद्य किलेबंदी को और किसी ने नहीं, सीपीएम के अस्सी वर्षीय वरिष्ठ नेता और केरल के पूर्व-मुख्यमंत्री, पिनराई विजयन ने अपने दो साथियों के साथ भेदकर दिखाया था और जंतर-मंतर के बीच खड़े होकर गिरफ्तारी से पहले नारा लगाया था —मोदी-शाह तुम देख लो, हम जंतर-मंतर पहुंच गए!

फिर भी यह तो सच है कि मोदीशाही जंतर-मंतर को प्रदर्शनकारियों के लिए वर्जित क्षेत्र बनाने में कामयाब रही है। बेशक, दिल्ली को बाकायदा युद्घ के मैदान में तब्दील करने, करीब दस हजार लोगों को, जिनमें युवाओं की संख्या सबसे बड़ी थी, निर्ममता से मार-पीट कर गिरफ्तार करने के जरिए, राजधानी को लगातार घेरेबंदी में रखने के जरिए और मौजूदा निजाम के फासीवादी चेहरे को नये-नये कोणों से उजागर करने के बाद ही, मोदीशाही को यह ‘जीत’ हासिल हुई है। और हाथ के हाथ, अपनी इस कामयाबी को पक्का करने की कोशिश में उसने राजधानी में सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल के रूप में जंतर-मंतर के तय किए जाने को खत्म ही करने का और इसके बदले में तीन सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल तय करने का ऐलान किया है — रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली में सीबीडी ग्राउंड।

HIGHLIGHTS
  • आवाज की बेदखली: जंतर-मंतर को प्रदर्शनकारियों से छीनना केवल जगह का छिनना नहीं, बल्कि जनतंत्र से जनता को बेदखल करने की साजिश है।
  • नये स्थलों की राजनीति: प्रदर्शनों को सत्ता के केंद्रों और आम नागरिकों की नजरों से दूर धकेलने के लिए बुराड़ी और सीबीडी ग्राउंड का विकल्प थोपा गया।
  • टार्गेटेड पुलिसिया दमन: छात्र-युवा नेताओं, सांसदों और डिजिटल मीडिया को सुनियोजित हिंसा व सेंसरशिप का शिकार बनाया गया।
  • संवैधानिक मर्यादाओं पर प्रहार: मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की न्यायोचित मांग को कुचलने के लिए अभूतपूर्व किलेबंदी और बल प्रयोग।

लेकिन, इन नये प्रदर्शन स्थलों के अधिसूचित किए जाने से, जंतर-मंतर के पुलिस के बल पर शासन द्वारा कब्जाए जाने की जघन्यता कम नहीं हो जाती है। जंतर-मंतर का खाली कराया जाना, सिर्फ एक जगह का खाली कराया जाना नहीं है। यह जनतंत्र में प्रदर्शनों का बेदखल किया जाना है। यह लाठी के जोर से जनता की आवाज का बेदखल किया जाना है। यह जनतंत्र से जनता का ही बेदखल किया जाना है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि जंतर-मंतर को जनता से छीनने के बाद, उसे जो प्रदर्शन स्थल दिए जा रहे हैं, उनका चुनाव सिर्फ यह सुनिश्चित करने की कोशिश नहीं दिखाता है कि जनता के प्रदर्शनों के शोर की आवाज से, लुटियन की दिल्ली में जमे शासकों की नींद में खलल नहीं पड़े। इन प्रदर्शन स्थलों का चुनाव इसकी कोशिश भी दिखाता है कि प्रदर्शनकारी आम देशवासियों से भी कटकर प्रदर्शन करते रहें। उनकी आवाज शासकों ही नहीं, आम देशवासियों तक भी नहीं पहुंचे। तानाशाहों को सबसे ज्यादा डर तो इसी से लगता है कि विरोध की कोई आवाज कहीं जनता तक नहीं पहुंच जाए और जनता इस विरोध की आवाज को अपनी आवाज न बना ले।

रामलीला मैदान को छोड़कर, दोनों सुझाए गए नये प्रदर्शन स्थल एक प्रकार से प्रदर्शनों और विरोध को देश निकाला देने जैसे ही हैं। बहरहाल, इसका नतीजा चाहे जो हो और यह मौजूदा सत्ता के तानाशाहाना चेहरे को चाहे कितना ही बेनकाब क्यों न कर रहा हो, यह एक सबक है, जो मोदीशाही ने 20 जुलाई के जंतर-मंतर के संसद मार्च और उसके बाद के घटनाक्रम से सीखा है, जिसमें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिया जाना भी शामिल था। मोदीशाही के दुर्भाग्य से, वर्तमान जंतर-मंतर-2 के केंद्र में भी, एक बुनियादी व्यवस्थागत विकृति के उपचार की शुरूआत के रूप में, वर्तमान सत्ता द्वारा संरक्षित एक उच्चाधिकारी के इस्तीफे की मांग की है — मुख्य चुनाव आयुक्त, ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग। इस जंतर मंतर-2 को जंतर-मंतर से बेदखल करने के लिए, मोदीशाही का अपनी सारी दमनकारी ताकत झोंक देना, उसके पिछले आंदोलन के सबक को ही दिखाता है। और यह सबक है, अपने बढ़ते विरोध का सामना करने के लिए, तानाशाही की बहुत तगड़ी खुराक आजमाने की जरूरत का।

तानाशाही की बहुत तगड़ी खुराक माने फासीवादी तानाशाही के रास्ते पर तेजी से बढ़ना। इसके लिए दो खासतौर पर हिंसक सबक मोदीशाही ने जंतर मंतर-1 से सीखे हैं। पहला, शासन की दमनकारी ताकत के प्रयोग में हिंसा के पैमाने और प्रकृति, दोनों के परिमाण में बहुत बढ़ोतरी का है। जंतर मंतर-2 के खिलाफ, पूरे शहर की जबर्दस्त किलेबंदी और जन-जीवन को ठप्प करने का ही रास्ता नहीं अपनाया गया है, जिसमें राजधानी की ओर आने वाली सैकड़ों रेलगाड़ियां तथा राजधानी में अधिकांश मैट्रो स्टेशन बंद करने से लेकर, संभावित प्रदर्शनकारियों की रास्ते में से ही तथा घरों से ही गिरफ्तारियां तक शामिल थीं। इसके अलावा, जंतर मंतर-1 से भिन्न इस बार, दमनकारी ताकत का इस्तेमाल अंधाधुंध तरीके से करने की जगह, उसे सोचे-समझे तरीके से टार्गेटेड बनाया गया है।

दमनकारी हिंसा की इस टार्गेटिंग के हिस्से के तौर पर, एक आम तौर पर प्रदर्शनकारियों और खासतौर पर उनके नेताओं को चुन-चुनकर हिंसक हमलों का निशाना बनाया गया है। एक ओर अगर वामपंथी छात्र व युवा संगठनों के शीर्ष नेताओं को चुन-चुनकर, उन्हें शारीरिक चोट पहुंचायी गयी है, तो दूसरी ओर आम छात्राओं तथा छात्रों को यौन प्रताड़ना तथा निजी अंगों पर प्रहार से लेकर, कपड़े फाड़ने तथा निर्वस्त्र तक करने के जरिए अपमानित करने का भी सहारा लिया गया है। और शारीरिक हमलों का सिलसिला हिरासत में न सिर्फ जारी रहा है, बल्कि मोबाइल जेल जैसी अमित शाह की पुलिस की नयी खोजों का, विशेष रूप से इसी के लिए हिरासत में लिए गए युवाओं को, और भी असुविधाजनक तथा असहाय स्थिति में रखने के लिए किया गया है। इसका मकसद, उनका मनोबल बुरी तरह से तोड़ना ही था।

दूसरी ओर, सीपीआई (एम) महासचिव, एमए बेबी और जॉन ब्रिटास समेत अनेक वामपंथी व अन्य सांसदों को सोचे-समझे तरीके से निशाना बनाया गया, ताकि आम तौर पर युवाओं में दहशत पैदा की जा सके। जंतर मंतर-2 के खिलाफ ऐसी ही टार्गेटिंग मीडिया और खासतौर पर डिजिटल मीडिया की भी की गयी। यह भी जंतर मंतर-1 से मोदीशाही द्वारा लिए गए सबक का ही मामला था। वह सबक यह था कि इंटरनेट को बंद कर के, शासन के दमन चक्र की खबरों के फैलने की रफ्तार को धीमा तो किया जा सकता है, लेकिन उनके फैलने को रोका नहीं जा सकता है। इसलिए, इस बार शुरू से ही डिजिटल मीडिया को एक प्रकार से पूरी तरह से कवरेज के क्षेत्र से ही बाहर रखने की कोशिश की गयी। मीडिया पास की कड़़ी शर्तें लगायी गयीं और मीडियाकर्मियों को प्रदर्शन स्थलों से दूर से दूर रखने की ही कोशिश की गयी।

इसके बाद भी, प्रदर्शन स्थलों के करीब पहुंच गए मीडियाकर्मियों को पहचान पत्रों से भली-भांति पहचाने जाने के बावजूद, न सिर्फ उठा-उठाकर पुलिस हिरासत की गाड़ियों में लादा गया, बल्कि उनके साथ मारपीट भी की गयी और अनेक मामलों में फोन छीनने से लेकर, तस्वीरें डिलीट कराने के लिए जोर-जबर्दस्ती भी की गयी। यहां तक कि एक जानी-मानी पत्रकार के हिरासत में लिए जाने का विरोध कर रहे, पांच-छ: अन्य पत्रकारों को भी उठा कर हिरासत में डाल दिया गया। जाहिर है कि यह खबरों को और खासतौर पुलिसिया हिंसा की तस्वीरों को बाहर ही नहीं आने देने की कोशिश थी।

लेकिन, जैसे यह सब भी काफी नहीं हो, प्रदर्शनकारी युवाओं के खिलाफ हिंसक हमले करने के लिए संघ-भाजपा के हथियार बंद गुंडा गिरोहों को, पुलिस के स्वत: स्पष्ट संरक्षण में, बर्बरता के पूरक के तौर पर उतार दिया गया। याद रहे कि जंतर मंतर-1 के संसद मार्च के दौरान भी, अनेक गैरवर्दीधारी गुंडानुमा लोगों के पुलिस की हिंसा में हाथ बंटा रहे होने की तस्वीरें सामने आयी थीं। इस बार यह मामला उससे भी एक कदम आगे निकल गया और 10 अक्टूबर को मीडिया कैमरों में केंद्रीय अर्द्घ-सैनिक बलों की नयी पोशाकों से भरी गाड़ियां दर्ज हुईं, जो संभवत: गैर-कानूनी फर्जी बलों को मैदान में उतारने के लिए लायी गयी थीं। लेकिन, इसके अलावा इस बार कनाट प्लेस समेत कई जगहों पर खासी संख्या में भगवाई गुंडे भी मीडिया कैमरों में दर्ज हुए, जो इक्का-दुक्का छूट गये प्रदर्शनकारी युवा लड़के-लड़कियों को सिर्फ परेशान ही नहीं कर रहे थे, बल्कि उन्हें बुरी तरह से पीट भी रहे थे। और हर जगह पुलिस लोगों से तथा खासतौर पर मीडिया कैमरों से उन्हें बचाने का ही काम कर रही थी।

इन गुंडों के लिए लाठी-डंडों से भरी एक कार को मीडियाकर्मियों द्वारा एक तरह से पकड़ लिए जाने के बाद भी, पुलिस ने उसे भगा दिया, जबकि एक अन्य मामले में एक प्रदर्शनकारी बच्ची को पीट रहे गुंडे को, पकड़ने के बजाय पुलिसवाले ने उसे अपनी करतूत की कैमरे पर रिकार्डिंग रुकवाने के लिए चेताया। याद रहे कि मोदीशाही के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ राजधानी में इस तरह के गुंडादलों को उतारे जाने की शुरूआत तो, 2019-20 में सीएए-विरोधी प्रदर्शन के दौरान ही हो गयी थी। लेकिन, तब तक इसके लिए फिर भी मुस्लिम-विरोध का बहाना था। अब शासन की दमनकारी ताकत के साथ ही गुंडाबलों के इस्तेमाल का फासीवाद का यह लक्षण आम हो गया है। लेकिन, यह सब तो एक फासीवादी तानाशाही के रूप में मोदीशाही के बेनकाब होने को ही दिखाता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

यह भी पढ़ें

ख़ामोशी की दहाड़ : सरकार भले विरोध का स्वर दबा दे, मगर दुनिया सुन रही है | प्रो. अपूर्वानंद का लेख कॉकरोच क्रांति का खतरनाक खेल! वोट नहीं मिलते तो सड़कों पर हंगामा, दलीलें खत्म तो गाली गलौज! | बृज खंडेलवाल सीईसी के इस्तीफे पर अड़ी सीजेपी, छावनी बनी दिल्ली: रनवे पर ही धरे गए आयोजक | विशेष रिपोर्ट “जनता मालिक, प्रतिनिधि सेवक: लोकतंत्र में वास्तविक VIP कौन?” | डॉ प्रमोद कुमार का विशेष विश्लेषण बतौर मछुआरा भी हो महिलाओं की पहचान | माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य यू. वासुकी का विशेष आलेख
Pawan Singh Chief Editor Taj News

Pawan Singh

Chief Editor

pawansingh@tajnews.in | 🌐 tajnews.in


खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment