कलश स्थापना से शुरू होगी नौ दिवसीय साधना; मां शैलपुत्री से मां सिद्धिदात्री तक नौ स्वरूपों की पूजा, व्रत के नियम, भोग और कन्या पूजन की पूरी जानकारी
धर्म-कर्म डेस्क 🌐 tajnews.in | रविवार, 11 अक्टूबर 2026, 01:35 AM IST

आगरा। शक्ति की उपासना, भक्ति और साधना का पावन पर्व शारदीय नवरात्रि रविवार, 11 अक्टूबर से शुरू हो रहा है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाएगी। घरों में कलश स्थापना और विशेष पूजा की तैयारियां हैं, वहीं मंदिरों में भी श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने की उम्मीद है। पूजा सामग्री, चुनरी, नारियल, फूल-माला और व्रत में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की खरीदारी भी नवरात्रि की तैयारियों का हिस्सा है। नवरात्रि भारतीय संस्कृति में शक्ति, आत्मसंयम और आस्था का प्रतीक है। इन दिनों मां शैलपुत्री, मां ब्रह्मचारिणी, मां चंद्रघंटा, मां कूष्मांडा, मां स्कंदमाता, मां कात्यायनी, मां कालरात्रि, मां महागौरी और मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, मंत्र-जप और आरती करते हैं तथा परिवार और समाज के कल्याण की कामना करते हैं।
नवरात्रि में नौ देवियों की पूजा का महत्त्व
नवरात्रि के प्रत्येक दिन देवी के एक स्वरूप की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में मां शैलपुत्री को दृढ़ता और प्रकृति, मां ब्रह्मचारिणी को तपस्या और संयम, मां चंद्रघंटा को साहस और मां कूष्मांडा को सृजनात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। मां स्कंदमाता मातृत्व और करुणा, मां कात्यायनी शक्ति और धर्म की रक्षा, मां कालरात्रि भय पर विजय, मां महागौरी शांति और पवित्रता तथा मां सिद्धिदात्री सिद्धि और आध्यात्मिक पूर्णता से जुड़ी हैं। नौ दिनों की यह साधना श्रद्धालुओं को भक्ति के साथ आत्मचिंतन, अनुशासन और सद्कर्मों की प्रेरणा देती है।
नौ दिनों का संपूर्ण कैलेंडर: तिथि, पूजनीय देवी, रंग और मंत्र
शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू हो रही है। नीचे प्रचलित नवदुर्गा पूजा-क्रम, दिन-विशेष के शुभ रंगों और सिद्ध मंत्रों की विस्तृत सूची दी गई है।
पूजा के दौरान संबंधित देवी के मंत्र का श्रद्धापूर्वक 11, 21 या 108 बार जप किया जा सकता है। यह संख्या कोई सार्वभौमिक अनिवार्य नियम नहीं है। श्रद्धालु अपनी आस्था, पूजा-पद्धति और पारिवारिक परंपरा के अनुसार मंत्र-जप कर सकते हैं।
पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा क्यों होती है?
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, वे पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। उनका वाहन वृषभ यानी बैल है और उनके एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे हाथ में कमल सुशोभित होता है। मां शैलपुत्री को दृढ़ संकल्प और प्रकृति का प्रतीक माना जाता है। पहले दिन श्रद्धालु कलश स्थापना के साथ देवी का आह्वान करते हैं और नौ दिनों की पूजा-साधना का संकल्प लेते हैं। पूजा के लिए स्थान को स्वच्छ करके मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। दीप प्रज्वलित कर पुष्प, अक्षत, धूप, फल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद मां शैलपुत्री के मंत्र का जप और आरती की जाती है।
कलश स्थापना की प्रामाणिक पूजा-विधि
नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना यानी घटस्थापना को विशेष महत्त्व दिया जाता है। यह नौ दिनों की देवी आराधना का पारंपरिक आरंभ है।
- पूजा स्थल की सफाई: घर के मंदिर या पूजा के निर्धारित स्थान को स्वच्छ करें और पूजन सामग्री व्यवस्थित रखें।
- संकल्प: स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर मां दुर्गा का स्मरण करें और अपनी परंपरा के अनुसार पूजा का संकल्प लें।
- कलश की तैयारी: प्रचलित विधि के अनुसार कलश में जल और निर्धारित पूजन सामग्री रखें। कलश पर आम या अशोक के पत्ते तथा नारियल स्थापित करने की परंपरा भी है।
- जौ बोना: कई परिवार मिट्टी के पात्र में जौ बोते हैं और नौ दिनों तक उसकी देखभाल करते हैं। इसे शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
- देवी का पूजन: मां दुर्गा के चित्र या प्रतिमा के सामने दीप जलाएं, पुष्प अर्पित करें और पहले दिन मां शैलपुत्री के मंत्र का जप करें।
- आरती और प्रसाद: पूजा के अंत में आरती करें और फल या अन्य सात्त्विक प्रसाद अर्पित करें।
कलश स्थापना का मुहूर्त स्थान और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए अपने शहर के पंचांग में दिए गए समय का पालन करें।
नौ देवियों के प्रिय एवं पारंपरिक भोग की सूची
नवरात्रि में देवी के अलग-अलग स्वरूपों को विशेष भोग अर्पित करने की परंपराएं प्रचलित हैं। परिवार और क्षेत्र के अनुसार इनमें विविधता देखने को मिलती है।
भोग अर्पित करना देवी के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का धार्मिक माध्यम है। भोग से किसी विशेष परिणाम की गारंटी मानने के बजाय इसे आस्था और परंपरा के रूप में समझना चाहिए।
नवरात्रि व्रत में किन बातों का रखें ध्यान?
कुछ श्रद्धालु पूरे नौ दिन व्रत रखते हैं, जबकि कई लोग पहले और अंतिम दिन या अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार उपवास करते हैं। व्रत के नियम अलग-अलग समुदायों और परिवारों में भिन्न हो सकते हैं। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार फल, दूध, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन और सेंधा नमक का सेवन कर सकते हैं। पर्याप्त पानी पीना, शारीरिक क्षमता के अनुसार भोजन करना और जरूरत पड़ने पर आराम करना भी जरूरी है। किसी स्वास्थ्य समस्या, गर्भावस्था या नियमित दवा के सेवन की स्थिति में उपवास करने से पहले चिकित्सीय सलाह लेना उचित है। पूजा-पाठ के साथ व्यवहार में संयम, सत्य, करुणा और दूसरों के प्रति सम्मान बनाए रखना भी नवरात्रि की साधना का महत्त्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन का महत्त्व
नवरात्रि के अंतिम दिनों में दुर्गा अष्टमी और महानवमी की पूजा विशेष महत्त्व रखती है। अनेक परिवारों में इन अवसरों पर कन्या पूजन या कंजक पूजन किया जाता है। छोटी कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान देकर भोजन कराया जाता है और श्रद्धानुसार दक्षिणा या उपहार दिए जाते हैं। वर्ष 2026 में अष्टमी, नवमी और विजयादशमी के अनुष्ठानों की तिथियों को लेकर पंचांग के अनुसार समय देखना जरूरी है। अलग-अलग स्थानों पर तिथि की गणना और अनुष्ठान के पालन में अंतर हो सकता है। इसलिए कन्या पूजन, हवन और व्रत पारण का समय स्थानीय पंचांग या परंपरा के अनुसार तय करें।
विजयादशमी के साथ होगा पर्व का समापन
शारदीय नवरात्रि के बाद 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी मनाई जाएगी। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है। उत्तर भारत में विजयादशमी का संबंध भगवान श्रीराम की रावण पर विजय से है, जबकि देवी उपासना की परंपरा में यह महिषासुर पर मां दुर्गा की विजय का स्मरण कराती है। नवरात्रि के दौरान मंदिरों में विशेष पूजा, भजन-कीर्तन, दुर्गा सप्तशती का पाठ और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। गुजरात सहित कई क्षेत्रों में गरबा और डांडिया की धूम रहती है। अलग-अलग राज्यों में पर्व मनाने के तरीके भिन्न हैं, लेकिन शक्ति की आराधना इसका साझा केंद्र है।
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