मोदी सरकार की एक बेहतरीन कामयाबी: जीएसटी से पहले और आज

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बदली तस्वीर, क्या आसान हुई व्यापार की राह? एक देश-एक कर के नौ वर्षों के सफर, रिकॉर्ड टैक्स संग्रह और छोटे व्यापारियों की चुनौतियों पर विशेष पड़ताल

विचार डेस्क 🌐 tajnews.in | शनिवार, 10 अक्टूबर 2026, 11:25 PM IST

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विचार डेस्क
Brij Khandelwal
विशेष आलेख

बृज खंडेलवाल

वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक

कल्पना कीजिए, जुलाई 2017 से पहले का भारत। आगरा से दिल्ली जा रहा एक ट्रक रास्ते में बार-बार रुकता है—कहीं चुंगी, कहीं प्रवेश कर, तो कहीं कागजों की जांच। घंटों की देरी से माल पहुंचता है और परिवहन का खर्च बढ़ जाता है। आखिरकार इस पूरे बोझ का कुछ हिस्सा आम ग्राहक की जेब से ही निकलता था। दुकानदारों की मुश्किलें भी कम नहीं थीं। उत्तर प्रदेश में अलग टैक्स, दिल्ली में अलग नियम और दूसरे राज्यों में अलग हिसाब-किताब। कागजात का अंबार, सरकारी दफ्तरों के चक्कर और एक टैक्स के ऊपर दूसरा टैक्स। कारोबार करना आसान नहीं था और टैक्स की दरों में अंतर का फायदा उठाकर कुछ लोग कर चोरी भी करते थे।

HIGHLIGHTS
  • 1 जुलाई 2017 से लागू ‘एक देश, एक कर’ ने चुंगी, वैट और एक्साइज जैसे दर्जनों करों के जाल को समाप्त किया।
  • करदाताओं की संख्या 65 लाख से बढ़कर जून 2026 तक रिकॉर्ड 1.67 करोड़ के पार पहुंची।
  • सितंबर 2026 में 2,03,521 करोड़ रुपये का सकल जीएसटी संग्रह, वित्तीय वर्ष में अब तक 12.46 लाख करोड़ पार।
  • ई-वे बिल और डिजिटल निगरानी से कर चोरी पर नकेल, मगर छोटे व्यापारियों के लिए सरलीकरण की दरकार अब भी बरकरार।

टैक्स सुधार का नया युग: बिखरी व्यवस्था से साझा बाजार तक

फिर आया जीएसटी का दौर। 1 जुलाई 2017 को नरेंद्र मोदी सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू किया। इसका मूल मंत्र था—‘एक देश, एक कर’। मकसद बेहद साफ था: देश में टैक्स की बिखरी व्यवस्था को एक करना, कारोबार को सुगम बनाना और कर चोरी के रास्ते बंद करना। पहले केंद्र सरकार कारखानों में बने सामान पर उत्पाद शुल्क और सेवाओं पर सेवा कर लगाती थी। राज्य सरकारें बिक्री कर, प्रवेश कर और चुंगी जैसे दर्जनों कर वसूलती थीं। हर राज्य के नियम अलग होने से व्यापारियों को भारी मानसिक व आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ती थी। कई बार पहले चुकाए गए टैक्स का पूरा इनपुट क्रेडिट नहीं मिलता था, जिससे ‘टैक्स पर टैक्स’ (कैस्केडिंग इफेक्ट) का बोझ बढ़ता चला जाता था।

जीएसटी ने इस जटिल व्यवस्था के बड़े हिस्से को एक एकीकृत ढांचे में पिरो दिया। अब राज्य के भीतर कारोबार पर केंद्र और राज्य का अपना-अपना हिस्सा (CGST और SGST) होता है, जबकि राज्यों के बीच अंतरराज्यीय बिक्री के लिए IGST की स्पष्ट व्यवस्था है। पहले खरीदे गए सामान पर चुकाए गए टैक्स का विधिवत हिसाब मिलने से कर का दोहरा बोझ काफी हद तक समाप्त हुआ। ऑनलाइन पंजीकरण, डिजिटल रिटर्न और इलेक्ट्रॉनिक भुगतान की पारदर्शी सुविधा ने कागजी कामकाज को काफी घटाया है। नतीजतन, राज्यों की सीमाओं के आर-पार माल भेजना पहले की तुलना में कहीं अधिक सुगम हुआ है।

डिजिटल निगरानी, ई-वे बिल और फर्जी बिलिंग पर प्रहार

जीएसटी व्यवस्था की एक सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें लेनदेन का डिजिटल हिसाब रखना अनिवार्य और आसान हुआ है। ई-वे बिल, ई-इनवॉइसिंग और रियल-टाइम ऑनलाइन रिकॉर्ड से माल की आवाजाही तथा टैक्स भुगतान पर नियामकों की नजर बनी रहती है। इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) प्राप्त करने के लिए भी खरीद और बिक्री के बिलों का डिजिटल मिलान आवश्यक है। इससे फर्जी बिलों और गैर-पंजीकृत माध्यमों से होने वाली कर चोरी पर प्रभावी अंकुश लगाने में भारी मदद मिली है।

हालांकि, इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि कर चोरी पूरी तरह खत्म हो गई है। फर्जी फर्म बनाकर सर्कुलर ट्रेडिंग करने और नियमों में खामियां ढूंढने के मामले आज भी सामने आते रहते हैं। लेकिन डाटा एनालिटिक्स और डिजिटल निगरानी ने ऐसे मामलों को पकड़ने और उन पर त्वरित कार्रवाई के नए रास्ते जरूर खोल दिए हैं।

करदाताओं का दायरा और राजस्व संग्रह का नया रिकॉर्ड

जीएसटी के दायरे में आने वाले कारोबारियों की संख्या में अभूतपूर्व उछाल आया है। शुरुआती वर्षों में जहां महज 65 से 67 लाख पंजीकृत करदाता थे, वहीं जून 2026 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 1.67 करोड़ पहुंच चुकी है। इसका सीधा अर्थ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा औपचारिक टैक्स दायरे में प्रवेश कर चुका है। इसमें नए स्टार्टअप्स और उद्यमों के साथ-साथ बेहतर पंजीकरण प्रक्रिया की भी अहम भूमिका है।

टैक्स संग्रह के आधिकारिक आंकड़े भी इसी मजबूती की गवाही देते हैं। सितंबर 2026 में सकल जीएसटी संग्रह 2,03,521 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले 14.7 प्रतिशत अधिक है। अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच कुल सकल संग्रह 12.46 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर चुका है। इस उछाल में आर्थिक गतिविधियों के विस्तार, तकनीकी अनुपालन और टैक्स लीकेज पर रोक का सम्मिलित योगदान साफ झलकता है।

छोटे व्यापारियों की जमीनी चुनौतियां और सरलीकरण की दरकार

सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि जीएसटी लागू होने के बाद छोटे दुकानदारों को तकनीकी जटिलताओं, बार-बार बदलते नियमों और रिटर्न फाइलिंग की पेचीदगियों से दो-चार होना पड़ा। शुरुआती दौर में राज्यों को भी राजस्व में गिरावट की चिंता थी, जिसे केंद्र की मुआवजा व्यवस्था ने सहारा दिया। वक्त के साथ कंपोजिशन स्कीम और ऑटोमेटेड रिफंड जैसी सुविधाएं लाई गईं, लेकिन जमीनी स्तर पर छोटे व्यापारियों, कारीगरों, महिला उद्यमियों और ग्रामीण कारोबारियों के लिए अनुपालन अब भी एक चुनौती बना हुआ है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और जीएसटी काउंसिल के सामने अब भी सबसे बड़ा काम इस व्यवस्था को और अधिक यूजर-फ्रेंडली बनाना है। हाइवे पर ट्रकों को संदिग्ध मानकर बेवजह रोकने के बजाय जांच ठोस सूचना और डिजिटल ऑडिट के आधार पर होनी चाहिए, ताकि लॉजिस्टिक्स की रफ्तार न थमे।

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जीएसटी की कहानी सिर्फ एक नए कानून की नहीं, बल्कि देश के खंडित बाजारों को जोड़कर एक साझा आर्थिक धुरी बनाने की ऐतिहासिक यात्रा है। कर संग्रह का बढ़ना और औपचारिक तंत्र का विस्तार निश्चित ही मोदी सरकार की एक बड़ी नीतिगत कामयाबी है। लेकिन सुधार की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि व्यापारी का समय और धन कितना बचता है, अनावश्यक कागजी झंझटों से कितनी मुक्ति मिलती है और इस टैक्स व्यवस्था का अंतिम लाभ आम उपभोक्ता तक किस रूप में पहुंचता है। जैसा कि वरिष्ठ उद्यमी मित्तल साहब का सटीक आकलन है—”आर्थिक सुधार तभी सफल माना जाएगा, जब मालवाहक ट्रक बिना रुकावट समय पर गंतव्य तक पहुंचे, व्यापारी फाइलों में उलझने के बजाय अपने कारोबार पर ध्यान दे और आम ग्राहक को उचित मूल्य पर गुणवत्तापूर्ण सामान मिले।”

Pawan Singh Chief Editor Taj News

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