ख़ामोशी की दहाड़ : सरकार भले विरोध का स्वर दबा दे, मगर दुनिया सुन रही है

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जंतर-मंतर प्रदर्शन, दिल्ली में अभूतपूर्व नाकेबंदी, असहमति के दमन और लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रख्यात लेखक व शिक्षक अपूर्वानंद का तीखा विश्लेषण

विचार डेस्क 🌐 tajnews.in | रविवार, 11 अक्टूबर 2026, 12:55 AM IST

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विशेष आलेख

अपूर्वानंद

प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं प्रख्यात राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक

भारतीय जनता पार्टी की नींद उड़ गई है। उसे हर तरफ़ विरोधी दिख रहे हैं, विरोधियों का भूत सता रहा है। दिल्ली पुलिस, बंगाल पुलिस, गुजरात पुलिस, मध्य प्रदेश पुलिस, हर राज्य और शहर की पुलिस गली-गली चक्कर लगा रही है, हर नौजवान को आंखों से सूंघ रही है कि कहीं वह 10 तारीख़ को जंतर-मंतर के प्रदर्शन में तो नहीं भाग लेनेवाला! दिल्ली की किसी भी सड़क पर चलने वाले के कदमों को दिल्ली पुलिस भांपने की कोशिश कर रही है कि कहीं वे जंतर-मंतर की तरफ़ तो नहीं मुड़ने जा रहे। इस वक़्त हर व्यक्ति सरकार के लिए एक संभावित प्रदर्शनकारी है।

HIGHLIGHTS
  • जंतर-मंतर प्रदर्शन से पहले दिल्ली छावनी में तब्दील: अर्धसैनिक बलों की 221 कंपनियां, 32,000 से अधिक जवान तैनात।
  • 57 मेट्रो स्टेशन बंद, ट्रेनें रद्द, कैब और होटलों पर पाबंदियां तथा राजधानी के बड़े हिस्से में इंटरनेट ब्लैकआउट।
  • विचारों से लैस छात्र-युवा हिरासत में, जबकि हिंसा की खुली धमकी देने वाले गिरोह बेखौफ।
  • नागरिकों की आज़ादी और अदालतों की भूमिका पर बड़ा सवाल: खामोशी की दहाड़ दबाई नहीं जा सकती।

छावनी में तब्दील राजधानी और अभूतपूर्व नाकेबंदी

दिल्ली पूरी तरह छावनी में तब्दील कर दी गई है। पश्चिम बंगाल, जम्मू और कश्मीर, छत्तीसगढ़ से रिज़र्व पुलिस के जवानों को हवाई जहाज़ से दिल्ली लाया जा रहा है। कोई 20,000 पैरा मिलिट्री के जवान पहले से दिल्ली में तैनात हैं और 12,000 अतिरिक्त जवानों को दिल्ली में उतारा जा रहा है।

ताज़ा खबर के मुताबिक़, केंद्रीय सैन्य पुलिस बल की 221 कंपनियां दिल्ली पुलिस को मुहैया कराई जा रही हैं। 10 डिटेंशन सेंटर तैयार किए गए हैं, जहां गिरफ़्तार लोगों को रखा जाएगा। ओला, उबर जैसी टैक्सी कंपनियों को कहा जा रहा है कि वे 10 अक्तूबर और उसके आस-पास दिल्ली की सड़कों पर न रहें। होटलों को निर्देश दिए जा रहे हैं कि वे अतिथियों को जगह न दें। दिल्ली के दो मुख्य रेलवे स्टेशनों को बंद कर दिया गया है; उनकी तरफ़ आने वाली और वहां से जाने वाली ट्रेनें रद्द कर दी गई हैं। 57 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए हैं। दिल्ली की लगभग हर सड़क पर बैरिकेड लगा दिए गए हैं। दुकानों और रेस्तरांओं को जल्दी काम ख़त्म करने को कहा गया है।

डिजिटल ब्लैकआउट और यूनिवर्सिटी परिसरों पर पहरा

दिल्ली के बड़े हिस्से में इंटरनेट बंद कर दिया गया है। लेकिन अजीब विडंबना यह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में कक्षाएं ऑनलाइन कर दी गई हैं। अब सवाल यह है कि इंटरनेट के बिना वे कक्षाएं कैसे चलेंगी? इसका कोई जवाब प्रशासन के पास नहीं है। परिसरों के आस-पास भारी पुलिस बंदोबस्त लगा दिया गया है।

राजनीतिक दलों के दफ़्तरों के बाहर भी भारी पुलिस तैनात है। कई यूट्यूबर आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें फोन करके जंतर-मंतर जाकर सरकार के पक्ष में नैरेटिव वीडियो बनाने को कहा जा रहा है और इसके लिए बाकायदा पैसे दिए जा रहे हैं।

लट्ठ बजाने वाले आज़ाद, विचार वाले गिरफ़्तार

साफ़ है कि सरकार को अपने लोगों पर भरोसा नहीं रह गया है। या कहें लोगों पर ही भरोसा नहीं है, क्योंकि सत्ता पक्ष से जुड़े लोग खुलेआम वीडियो बना रहे हैं और जंतर-मंतर के आस-पास चक्कर लगा रहे हैं। वे खुलेआम धमकी दे रहे हैं कि वे सरकार के विरोधियों को सबक़ सिखलाने को तैयार हैं।

पुलिस हिंसा की धमकी देने वाले इन तत्वों को क्यों गिरफ़्तार नहीं कर रही? वह जगह-जगह से उन तमाम लोगों को तो पकड़ रही है, जिन पर उसे शक है कि वे प्रदर्शन में भाग लेंगे, लेकिन खुलेआम धमकी देने वालों को उसने खुला छोड़ रखा है। क्या इसलिए कि ये तत्व पुलिस के सहयोगी बन चुके हैं? ये वही लोग हैं, जो नारे लगाते हैं: ‘दिल्ली पुलिस लट्ठ चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं।’ आज लट्ठ बजाने वाले आज़ाद घूम रहे हैं और सिर्फ़ लोकतांत्रिक विचारों से लैस युवाओं को गिरफ़्तार किया जा रहा है। सैकड़ों युवाओं को घरों से उठा लिया गया है और कई घरों पर पुलिस डेरा जमाए बैठी है, जो पूरी तरह गैरकानूनी है।

अदालतों की भूमिका और नागरिकों के बुनियादी अधिकार

चिंताजनक बात यह है कि अदालतों को भी इस स्थिति पर कोई गंभीर एतराज नहीं दिख रहा। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका को न्यायमूर्तियों ने परे खिसका दिया और केवल यह कहकर टाल दिया कि पुलिस इन लोगों को उनके माता-पिता के पास भेज दे। नाबालिग लोगों को बिना कानूनी प्रक्रिया के पुलिस ने गायब कर दिया है और अदालत 13 अक्टूबर तक इंतज़ार करने को कह रही है। यानी पुलिस किसी को भी जब मर्ज़ी और जितने दिन मर्ज़ी हिरासत में रख सकती है।

उसी तरह सर्वोच्च न्यायालय को भी उचित लग रहा है कि सरकार पूरी दिल्ली को जाम कर दे। नागरिकों की आवाजाही की आज़ादी के अधिकार का जैसे अब कोई मतलब ही नहीं रह गया है। अदालत सरकार के बचे रहने को लेकर अधिक चिंतित दिखाई देती है और उसका कहना है कि अनुमति न होने पर विरोध अवैध है, इसलिए पूरे शहर को ठप्प करना भी स्वीकार्य है।

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अगर पूरा राज्य अपनी सारी ताक़त के साथ आपके ख़िलाफ़ खड़ा हो जाए तो क्या साबित होता है? कौन अधिक ताकतवर है और कौन डरा हुआ है? जो डरा हुआ है, वह नारा लगाने वालों को डंडे और बंदूक से डरा रहा है। लेकिन नारे फिर भी लग रहे हैं। सरकार भले अपने कान में बंदूक की गोली ठूंस ले, नारे गूंज रहे हैं और वह न सुन रही हो, बाकी पूरी दुनिया सुन रही है। आज जंतर-मंतर पर अगर गला दबा दिया जाए और खामोशी ही खामोशी हो, तो याद रखिए कि इस खामोशी की दहाड़ ही आने वाले कल में सबसे दूर तक सुनाई देगी।

Pawan Singh Chief Editor Taj News

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